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Magazine - Year 1997 - Version 2

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अपने अगले पड़ाव की तैयारी कर

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राहगीर यहाँ ललचाई आँखों से मत देख। यह सराय है । तेरा घर तो बहुत दूर है। लम्बी मंजिल चलकर ही वहाँ तक पहुँचेगा।

यह सराय एक रात विश्राम के लिए है। सो यहाँ भले मानस की तरह प्रवेश कर, शालीनता के साथ रहकर सज्जनता के साथ अपना रास्ता पकड़।

भूल गया भुलक्कड़। ऐसी न जाने कितनी सराय में तू ठहर चुका। आगे लम्बी मंजिल पार करने के लिए कितनी ऐसी सराय में ठहरना पड़ेगा। ललचाने की आदत छोड़। मुसाफिर ठहरने की सुविधा को पर्याप्त न मानकर सराय पर अधिकार जताने लगे तो उसकी मूर्खता की चारों ओर निन्दा होगी।

सराय वाले को शुक्रिया अदा करें, जिसने रात ठहरने के लिए व्यवस्था की। सुविधापूर्वक रहा तो चैन की नींद सोएगा। इतना मिल गया बहुत है इसे अनुभव करके संतोष कर प्रसन्न हो कृतज्ञ बन और शाँति के साथ अगले पड़ाव की तैयारी कर।

गड़बड़ मत फैला। पलंग मेरा, कमरा मेरा, रसोईघर मेरा, बर्तन मेरे, कर्मचारी मेरे, सराय मेरी, मालिकी मेरी। मैं ही सबका मालिक, यह सारी सम्पत्ति मेरी है, इस पागल पन को छोड़? कोई सुनेगा तो क्या कहेगा? रात भर ठहरने वाला मूसाफिर सराय पर अपनी मालिकी जताता है। समझाने पर मानता नहीं। मेरी मेरी ही कहे चला जा रहा है। अरे भला यह सराय तेरा कैसे हो सकता है? यह बनाने वाले की है। यहाँ के कर्मचारी तेरी सम्पत्ति कैसे हो सकते हैं, इनका अपना अस्तित्व है । इन्हें खिलाने-सँभालने वाला कोई दूसरा है। मूर्ख बेकार की बकवास मत कर, सुनने वाले सुन लेंगे तो बुरी दुर्गति बनायेंगे।

बगीचा देख लिया सो ठीक, फूल सूँघ लिये तो ठीक, पर यह तेरे नहीं हैं। दूसरों की तरह तू भी देख ले, सूँघ लें और इतनी देर तक मोद मनाने के सौभाग्य का सराहता हुआ आगे बढ़ चल।

तेरा घर दूर है। उसकी मंजिल लम्बी है। अपनी मंजिल के मील गिन चलने को कमर कस। रास्ते में, जलपान का प्रबंध कर और हलका फुलका होकर चल। सराय की चीज उठाकर चलेगा तो बोझ से तेरी गर्दन टूट जायेगी, फिर कोई ले जाने भी क्यों देगा ?

नेक मुसाफिर यहाँ रहकर जब तक ठहरना है भलमनसाहत बरत, हँस और हँसा, प्यार दे और प्यार लें।

छोड़ सके तो ऐसी याद छोड़ जो जो सराहना के साथ पीछे वालों के मन में उठती रहे। ले जा सके तो यहाँ पवालारे की श्रद्धा और सद्भावना लेता जा। लेने और छोड़ने के लिए इतना ही काफी है। परदेशी मोह के जाल मत बुन। यहाँ न तो कोई तेरा है और न तु किसी का। रैन बसेरा में कितने आते हैं और रात ठहरते हैं, दूसरे दिन चले जाते हैं। रात भर हँस बोल लिए, मिल जुल कर रह लिया, यही क्या कम है। मैं उसका वह मेरा इस ममता से बँधेगा तो रोना और रुलाना ही पल्ले पड़ेगा। मत रो मत रुला, हँसते हुए रह और हँसता हुआ जा, इसी में तेरी गरिमा है।

मोह नहीं प्यार कर। मोह में बन्धन है, प्यार में मुक्ति। मोह अधिकार माँगता है, प्यार उत्सर्ग में संतुष्ट होता है। असंतोष छोड़ संतोष कर।

मनचले मचलना छोड़। जिस दुकान पर खिलौने दिखाई दिये वहाँ मचलने लगे, जिस दुकान पर मिठाई दिखाई पड़ी वहाँ अड़ गये, इस बचकाने पन से क्या करेगा ? यह मेला है, यहाँ सब कुछ अनोखा ही अनोखा है, देख और खुशी में उछलता-कूदता अपने घर की राह ले। यह जलपरी का बगीचा है, एक से बढ़कर एक फूल खिले हैं। देखने और खुश होने के लिए हैं, छूना और तोड़ना सख्त मना है। गलती करने वाले को सख्त सजा भुगतनी पड़ती है। मुसाफिर अपनी मंजिल को याद रख सफर के उद्देश्य को मत भूल। सरायों में ठहरता हुआ आगे बढ़ता चल। लालच किया और अधिकार जमाया तो बुरी तरह मारा जायेगा।

एक भूखा और बेहाल व्यक्ति पेरिस के प्रसिद्ध होटल दयोरोंतोंद में खाना खाने गया । काफी कुछ खा चुकने के बाद उसने वेटर से झिझकते हुए कहा - “मेरे पास पैसे नहीं हैं, मुझे राजनीतिक कारणों से निर्वासन भोगना पड़ रहा है। फ्राँस के अतिथि के तौर पर तुम मुझे बिल चुकाने लायक पैसे दे दो, मैं तुम्हें वापस लौटा दूँगा।” वेटर ने उसकी दुख भरी कहानी सुनकर उसे पैसे दे दिये।

यह अजनबी और कोई नहीं, अपितु महान रूसी क्राँतिकारी और बोल्शोविक दल के नेता लेनिन था। रूसी क्राँति और जारशाही के समाप्त हो जाने के बाद भी लेनिन को कर्ज की याद रही और उसने उस वेटर के पास रकम और ढेरों उपहार सधन्यवाद भिजवाये। लेकिन वेटर ने यह रकम हाथों-हाथ लौटा दी ओर कहा - “वह रकम मैंने एक भूखे तथा गरीब निर्वासित को उधार दी थी, न कि एक महान और शक्तिशाली राष्ट्र के शासक को।”

*समाप्त*

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