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Magazine - Year 1997 - Version 2

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पेड़-पौधों की विचित्र दुनिया

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प्रकृति रहस्यों से भरी पूरी है। उसने अपने मातृ-सुलभ स्नेह से अपनी संतानों को विलक्षणता के आलौकिक अनुदान दिये हैं। अकेले मनुष्य ही इसका दुलार पाया हो ऐसा नहीं है। वह भले ही अपनी क्षमताओं से गर्वोन्नत, मदान्ध हो उठे लेकिन यह उसकी अहंवृत्ति है। यदि वह अपनी इस अंधता की पट्टी को उतार कर फेंक दे और चारों ओर नज़र डाले तो जानेगा कि साँस भी जड़ कहे जाने वाले पौधों का अनुदान है। जिन्हें हम जड़ कहते हैं, उपेक्षित समझते हैं, उनकी भी क्षमताएँ कम रहस्यमय और कम विलक्षण नहीं हैं। कभी तो वे हमें प्यार से भर कर अपना सब कुछ लुटा देते हैं और कभी हमारी कृतघ्नता का दण्ड देने के लिए हमारा शिकार तक कर लेते हैं।

हिमालय के तिब्बत, लद्दाख वनेपाल के उच्च बर्फीले क्षेत्र में ट्यूर नामक एक विशेष प्रजाति का वृक्ष पाया जाता है, जो आहार में घी शक्कर सरीखा स्वादिष्ट पदार्थ प्रस्तुत करता है। इसके वृक्ष लम्बे और हरे होते हैं। इसके रंगीन व सुगंध युक्त पराग से यहाँ के लोग गुड़, शक्कर बनाते हैं। इसमें लगने वाला फल मीठा और स्वादिष्ट होता है। इसके अन्दर की गुठली पीसने पर घी सरीखा गाढ़ा चिकना व सफेद तेल निकलता है, इससे पकवान बनाये जाते हैं। उत्तरीय महासागरीय द्वीपों में ‘ब्रेड ट्री’ नाम से जाने जाने वाले वृक्ष की एक विशेष जाति होती है जिसमें बड़ी गेंद की तरह कोमल व आकर्षक फल लगते हैं। जिसके भीतर कोमल स्वादिष्ट, पौष्टिक गुच्छा होता है। वहाँ के लोग रोटी कर तरह इसे मक्खन लगाकर खाते हैं। इसमें काफी खनिज लवण व पौष्टिक तत्व पाये जाते हैं।

उत्तरी अमेरिका में मक्खन देने वाले पेड़ पाये जाते हैं। इनमें अख़रोट की तरह का कड़े आवरण वाला फल लगता है। इसे सुखाकर तोड़ने पर अन्दर मक्खन जैसे रंग, स्वाद एवं गंध वाला सफेद चिकना पदार्थ निकलता है, यह अत्यंत पौष्टिक एवं स्वादिष्ट होता है। इसे दो सालों तक बिना खराब हुए सुरक्षित रखा जा सकता है। यूरोप के मेडागास्कर में वृक्षों की ऐसी प्रजाति पायी जाती है जो प्यासे राहगीरों की प्यास बुझाती है। इसके पत्तों की बनावट प्यालों की तरह होती है, इनमें वर्षा का पानी इकट्ठा हो जाता है। यह पानी कई सप्ताह तक भरा रहता है।

एक ऐसा वृक्ष भी होता है, जिसमें चीरा लगाने पर मीठे पानी का फव्वारा फूट पड़ता है। इससे राहगीर गर्मी में अपने पानी की आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। चीरा लगाने के थोड़ी देर बाद पानी निकलना अपने आप बन्द हो जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस वृक्ष में काफी पानी होता है जो शिराओं के माध्यम से दौड़ता रहता है। इसी तरह अण्डमान निकोबार में ‘कुवार्व’ या केलेमान अण्डमानिकस नामक पौधे की प्रजाति पायी जाती है जिसके पर्ण वृत में पानी पाया जाता है। क्षेत्रीय आदिवासी पानी न मिलने पर इसी से अपनी प्यास बुझाते हैं। एक ऐसा आरोही पौधा भी पाया जाता है जिसकी पत्तियों व तने के रस को पानी में मिला देने पर पानी बर्फ की तरह जम जाता है अपनी इस विशेषता के कारण इसे जल जमनी या वाटर फ्रीज़र कहा जाता है।

वृक्ष हमारे लिए खाद्य पदार्थ या पानी ही नहीं जुटाते बल्कि अपनी विलक्षणताओं से हमें आश्चर्यचकित भी करते हैं। छोटानागपुर में ‘काला कौरैया’ नामक एक ऐसा वृक्ष पाया जाता है जिसकी छाया के नीचे उसकी घास जल जाती है और मिट्टी का रंग काला हो जाता है। इसी तरह हिमालय क्षेत्र में कुछ ऐसे पौधे पाये जाते हैं जो रात के अंधेरे में रेडियम व हीरे की तरह चमकते हैं। ‘सोल औषधि’ नामक एक पौधे की प्रतिपदा की चाँदनी से पूर्णिमा की रात तक 15 पत्तियाँ लगती हैं व अमावस्या की रात में सभी झड़ जाती हैं और पौधा सूख कर लकड़ी के समान दिखने लगता है व रात को चमकता है।

कुछ ऐसे भी पौधे पाये जाते हैं जिनके तने से निकलने वाला विशेष प्रकार का रस अंधेरे में चमकता है। कवकों में कुकुरमुत्तों की कुछ जातियाँ रात में कई रंगों का सुनहरा प्रकाश उत्पन्न करती हैं।

पौधों में कुछ ऐसे भी हैं जो पूरी तरह सूखने पर भी पानी में डालने पर हरे भरे हो जाते हैं। संजीवनी बूटी के नाम से प्रख्यात ऐसा ही सदाबहार पौध है। कुछ पौधे मनुष्य की भाँति शर्माते भी देखे जा सकते हैं। लाजवंती (छुई-मुई) ऐसा ही शर्मीला पौधा है। स्पर्श करते ही यह लजा जाता है। जीव-जन्तु व मनुष्यों की भाँति पौधे रोते भी हैं। ‘फेनरीद्वीप’ में पाया जाने वाला लाउरेल नामक वृक्ष ऐसा ही है, इसे आँसू बहाते देखा जा सकता है। मेडूँक वृक्ष की आकृति मनुष्य से काफी मिलती जुलती हैं इसे काटने या उखाड़ने पर यह बच्चे की तरह रोने लगता है। मनुष्य व जीव जन्तुओं में तो माँसाहारी पाये जाते हैं, लेकिन वनस्पति जगत में भी कुछ ऐसे सदस्य हैं जो मास भक्षण करते हैं। ज्यादातर यह दलदली भूमि में पाये जाते हैं जहाँ नाइट्रोजन की कमी रहती है। अपवाद स्वरूप पुर्तगाल में पाया जाने वाला यूरोपियन फ्लाई क्रेचर सूखी व चट्टानी जमीन में उगता है। एशिया के कुछ ऐसे देशों में पाया जाने वाला पिपरप्लाण्ट (घटपर्णी) माँसाहारी पौधे का एक सुपरिचित नाम है। इसमें पत्ती एक छोटे घड़े की आकार की होती हैं, कीड़े फिसल कर इसके अन्दर चले जाते हैं व इसका शिकार बन जाते हैं। ’सनड्यू’ एक ऐसा पौधा है जिसकी पत्तियों के किनारों पर अनेक चिपचिपी व रस कुण्डलिनी के समान रचनाएँ निकलती हैं जो संपर्क में आये कीट पतंगों को निगल जाती हैं।

यूट्रोकुलेरिया जिसे व्लैडर वर्ट भी कहते हैं, अधिक दलदली जगहों पर उगता है और जल कीटों को अपना प्रमुख आहार बनाता है। उत्तरी अमेरिका में ‘वेनस फ्लाइट्रप’ नामक माँसभक्षी पौधे की प्रजाति मिलती है। इसके किनारे काँटेदार पत्ते खुल या अन्दर हो सकते हैं। सामान्यता अन्य माँसभक्षी पौधे धीरे-धीरे पानी के तालाब में डूबते हैं या चिपकाऊ पत्तों या बालों में कीड़ों को उलझा देते हैं लेकिन ‘वेनस फ्लाइट्रेप’ शिकार के पत्तों पर बैठते ही तीव्र आक्रामकता के साथ झपट पड़ता है और अपने पाचक रसों द्वारा शिकार को गलाकर पोषक तत्व ग्रहण करता है।

दक्षिण अमेरिका में अर्जेन्टीना के जंगलों में ‘क्लोरोफार्म ट्री’ नामक प्रजाति पायी जाती है। ऐसे ही पौधे नरभक्षी जावा व सुमात्रा के समुद्रतटीय जंगलों में पाये जाते हैं, इन्हें ‘मैन ईटर ट्री’ कहते हैं। जब कोई जीव-जन्तु इन पौधों के नीचे आता है तो पेड़ की टहनियाँ चारों ओर से उसे अपने शिकंजे में कस लेती हैं, दम घुटते ही जब जीव मर जाता है तो वापस उठ जाती हैं।

कुछ पौधे इनसान की तरह घुमक्कड़ प्रकृति के होते हैं। अमेरिका में पाया जाने वाला मेनगोव ऐसा ही पौधा है, यह तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है। अपना घूमने का शौक पूरा करने के लिए हजारों कि.मी. की दूरी तय कर लेता है। सड़ी लकड़ियों के बीच उगने वाला ‘स्लामर वाँल्ड ‘ भी एक ऐसा ही पौधा है। यह बैक्टीरिया पर जीवित रहता है। अपने कुछ ही घण्टों के जीवन काल में यह 12 इंच की दूरी तय कर लेता है। यह प्रकाश की ओर चलकर अपनी अगली पीढ़ी के लिए उपयुक्त घर को सुनिश्चित करता है।

कई पौधे जमीन में पौष्टिक तत्वों के न मिलने पर हवा व वर्षा में अपना पोषण ग्रहण करते हैं। अमेरिका के वर्षा वनों में पाये जाने वाले रेड एल्डेन और मेपल की कुछ प्रजातियाँ इसी तरह की हैं। अधिक बरसात के कारण इन पेड़ों के नीचे के खनिज व पोषक तत्व बह जाते हैं, अतः ये अपनी खुराक हवा व वर्षा में लेते हैं।

खिलने वाले फूलों में दक्षिण पूर्वी एशिया का रैफलेटिया नामक फूल सबसे बड़ा होता है। यह परजीवी पौधा है। इसके फूल का व्यास एक मीटर व भार 7 किलो तक होता है। इसी तरह से सबसे छोटा फूल इकवीड़ के नाम से जाना जाता है। पानी में तैरने वाला यह फूल इंच का 30वाँ भाग होता है।

वृक्षों के विशेषताओं की कोई सीमा नहीं है। अब सिकोया जाइगैथ्ष्टया की बात करें तो उसकी ऊँचाई 360 फीट तक होती है। उम्र भी 1000 साल से कुछ ऊपर ही होती है। इसे यूँ भी कहा जा सकता है कि यह पेड़-पौधों के खानदान में सबसे लम्बा एवं दीर्घायु सदस्य है। कहने को बाँस की लम्बाई सबसे ज्यादा मानी जाती है लेकिन बड़े से बड़ा बाँस भी अधिकतम 121 फीट का ही होता है। घास सामान्यता जमीन पर रेंगने वाली प्रजाति है लेकिन फफैली घास जब अपना सिर उठाकर खड़ी होती है तो इसकी लम्बाई 18 फुट तक जा पहुँचती है। कभी-कभी पौधों की कुछ प्रजातियाँ अपना कुछ अधिक ही विकास कर लेती हैं। मेक्सिको में मक्का की एक किस्म 20 फीट तक ऊँची पायी गयी है। इसी तरह बाँस एक दिन में तीन फीट तक बढ़ता है और कभी-कभी ही यह फूलता है। जापानी बाँस की एक किस्म 120 वर्ष में एक ही बार फूलती है। पौधा फूलने के बाद प्रायः मर जाता है।

जड़े गहरी होना एक मुहावरा है, लेकिन किसी की जड़े 100 मीटर तक गहरी होंगी, ऐसा कम ही होता होगा। यह बात अफ्रीका में पाये जाने वाले ‘ऐड्रसोनिया डिजीटोटा’ नामक पौधे के बारे में सच है। इसके विशाल उदर में पानी भर कर रखा जाता है। जिसे रेगिस्तानी यात्रियों को बेचा जाता है। एक प्रौढ़ वृक्ष के खोखले तने में शव को दफनाते हैं जो सैकड़ों सालों तक सुरक्षित रहते हैं। आस्ट्रेलिया के एक शहर में तो इस वृक्ष के तनों को जेलखाने के रूप में उपयोग किया जाता है। अचरज की बात यह है कि इसमें पानी का टैंक बनाने, शव दफनाने और बन्दी गृह में उपयोग करने के बावजूद भी यह वृक्ष सूखता नहीं, बल्कि बढ़ता ही रहता है।

साधारण तौर पर वृक्ष से हमारा मतलब लम्बा तना, फैली हुई शाखाओं पत्तों से होता है। लेकिन कई वृक्ष इस ढाँचे से हटकर अपनी विचित्रता प्रदर्शित करते हैं। अफ्रीका का वाओवस व आस्ट्रेलिया के वॉटल ट्री इसी तरह के विचित्र वृक्ष हैं। स्थानीय किंवदन्तियों के अनुसार हयेना नामक दुष्ट भूत ने पहले वाओ वृक्ष को उल्टा आरोपित कर दिया था, जिसके कारण यह एक उलटे वृक्ष की तरह दिखता है। इसके मोटे तने को पानी का भण्डारगृह माना जाता है। पुराने वृक्ष प्रायः खोखले होते हैं, कभी कभी इन्हें घर के रूप में भी उपयोग में लाया जाता है। एक प्रसिद्ध वृक्ष तो बस स्टॉप के रूप में उपयोग किया जा रहा है जिसमें एक समय तीन यात्री शरण ले सकते हैं।

मलाया के जंगलों में यदि कोई राही मार्ग भटक जाये तो जंगल में लगा कैडलोना नामक पेड़ मार्ग बोध कराता है, इसकी शाखा हमेशा दक्षिण की ओर झुकी रहती है। वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसा पेड़ के चुम्बकत्व गुण के कारण है। इस तरह के पेड़ भटके लोगों के लिए दिशा सूचक का काम करता है।

वृक्ष वनस्पतियों के इस विचित्र संसार में अनेकों आश्चर्य भरे पड़े हैं। कहीं तो ये हमारे लिए स्वादिष्ट खाद्य जुटाते हैं, कहीं मधुर पेय, तो कहीं अपने अनोखेपन से चकाचौंध कर देते हैं। कभी इनका क्रोध डराने वाला भी होता है। अपने हर रूप में ये मानव जाति को एक ही संदेश देते हैं, ‘कबिरा गरव न कीजिए’, यानि कि गर्व न करो, तुम्हारा गर्व बेकार है। हमारी क्षमताएँ किसी तरह से कम नहीं। सृष्टि की मूल वृत्ति सहयोग सहकार है। तुम हमें पुष्पित करो, हम तुम्हें समृद्ध करेंगे। तो क्यों न मिलजुल कर प्रकृति के अनुदानों का उपयोग करें और परमेश्वर की बहुरंगी सृष्टि में सौंदर्य भरें।

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