प्रतिभा मात्र इसी जन्म की देन नहीं
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आद्यशंकराचार्य के बारे में विख्यात है कि 6 वर्ष की छोटी उम्र से ही वे महामानवों जैसी दृष्टि अपना उसकी पूर्ति में जुट गये और उस तादात्म्य ने उन्हें महामानवों की सर्वोच्च श्रेणी प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया । बचपन से ही वे प्रखर प्रतिभा के धनी थे। यों तो प्रतिभा पराक्रम, मनोयोग एवं साहस के सम्मिश्रण से बनती है । क्रिया-कुशल पुरुषार्थ परायण, संलग्नशील एवं महत्त्वाकाँक्षी जैसे व्यक्तित्व का मूल्य समझने वाले लोग अपनी आदतों को तद्नुरूप ढालकर प्रतिभाशाली बन भी जाते हैं । किन्तु सबसे अधिक रहस्यमय तथा चौंकाने वाली वे घटनाएँ होती हैं जिनमें बिना शिक्षण प्राप्त किये विशिष्ट स्तर की प्रतिभा किन्हीं-किन्हीं बालकों में अनायास ही प्रकट हो जाती है । जन्मजात प्रतिभा की इस विलक्षणता का कुछ सुनिश्चित कारण अनुसंधानकर्ता, मनःशास्त्री एवं न्यूरोलॉजिस्ट नहीं बता पाते । आनुवांशिकी से जोड़े जाने वाले तीर-तुक्कों की भी अब कोई सटीक संगति नहीं बैठती, अन्यथा जीनियस कहे जाने वालों के यहाँ मूर्ख और मूर्खों के यहाँ जीनियस न पैदा होते । निश्चित ही इन घटनाओं का कारण पूर्व संचित संस्कारों की सम्पदा को ही माना जा सकता है ।
इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने अनेक तरह की शोधें की हैं और उन्हें मनोविज्ञान अनुसंधान समिति द्वारा ‘द ह्युमन पर्सनालिटी एण्ड इट्स सरवाइवल आफ्टर बॉडिली डेथ’ नामक शोध ग्रंथ में विस्तार पूर्वक प्रकाशित भी किया है । वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रायः देखा गया है कि चिरप्रयत्न के बाद भी जो विशिष्टता-प्रतिभा प्रौढ़ों में विकसित नहीं हो पाती, वही विशिष्टता किन्हीं-किन्हीं में वह अनायास प्रस्फुटित हो जाती है । आये दिन ऐसी कितनी ही घटनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं । उदाहरण के लिए दार्शनिक जे. बेन्थम जब चार वर्ष के थे, तभी लैटिन और ग्रीक भाषाएँ ठीक तरह बोल लेते थे । पिछले दिनों आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने एक चार वर्षीय बालिका बेबल थेम्पसन के गणित अध्ययन के लिए अतिरिक्त प्रबन्ध किया । यह बालिका इतनी छोटी आयु में ही अंकगणित, त्रिकोणमिति और भौतिकी में असाधारण गति रखती है । इस उम्र के बच्चे, जिनने प्रारम्भिक पढ़ाई क्रमबद्ध रीति से नहीं पढ़ी हो, उन्हें आगे कैसे पढ़ाया जाये? इसका निर्धारण करने के लिए तब शिक्षा-शास्त्रियों की एक विशेष समिति गठित की गयी थी ।
इसी प्रकार मद्रास अकादमी न्यास की ओर से रविकिरण नामक ढाई वर्ष के बालक को उसकी अद्भुत संगीत प्रतिभा के लिए छात्रवृत्ति देने की घोषणा की गयी थी । यह बालक न केवल वाद्ययन्त्रों को ठीक से बजाना जानता था, वरन् दूसरों द्वारा गलत बजाने पर उस गलती को भी बताता था । इन उदाहरणों के अतिरिक्त उक्त पुस्तक में प्रतिभा सम्पन्न कम आयु के बच्चों के ऐसे अनेक उदाहरण दिये गये हैं जो गणित, संगीत, ज्यामिती, चित्रकला आदि में इतने पारंगत थे कि उस विषय के विशेषज्ञ, प्राध्यापक भी इतने निष्णात नहीं होते ।
कहा जा चुका है कि आद्य शंकराचार्य ने भी अपने गुरु को ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा से अचंभित कर दिया था । केवल पाँच-छह वर्ष जितनी छोटी आयु में ही इस प्रकार का असाधारण ज्ञान होना केवल एक ही आधार पर संभव हो सकता है कि किसी आत्मा को अपने पूर्वजन्म की संचित ज्ञान सम्पदा उपलब्ध हो । पूर्वजन्म के संग्रहित सुसंस्कारों का बाल्यावस्था में उदय आत्मा के स्वतंत्र अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण है । उदाहरण स्वरूप पूर्वजन्मों के संस्कारों के आधार पर ही केवल 6 वर्ष और ग्यारह माह की स्वल्प आयु में चल बसने वाले कोचीन के एक बालक ने बीस हजार से अधिक चित्र एवं पेन्टिग्स् का आलेख किया था ।
एक बार कोचीन के एक पार्क में बच्चों की चित्र प्रतियोगिता रखी गयी थी, जिसमें ईसाई परिवार में जन्में क्लिन्ट ने प्रथम बार ही भाग लिया था । बच्चे जब चित्रों का आलेखन करने लगे, तब उसके पिता जोसेफ थेमस, जो क्लिन्ट को छोड़ने आये थे, पार्क में चहलकदमी करने लगे । तभी एक व्यक्ति ने उन्हें सूचना दी - “ देखो चित्र प्रतियोगिता में आये एक बालक को चित्र बनाते देखने के लिए भारी भीड़ एकत्रित हुई है । केवल पाँच वर्ष का छोटा बालक मूर्धन्य चित्रकारों जैसा चित्र देखते-देखते बना लेता है उसकी चित्रकला को देखकर लोग हैरान रह जाते हैं ।” सन् 1983 के ग्रीष्म ऋतु में चल बसने से पूर्व केवल एक ही वर्ष वह स्कूल में रहा । इस दौरान तेरह प्रतियोगिताओं में से उसे बारह प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक सहित कितने ही इनाम मिले थे, जिसमें कोजीकोड में सम्पन्न हुई अट्ठारह वर्षीय बच्चों की प्रतियोगिता भी सम्मिलित थी । इसमें भी इस बालक ने प्रथम परितोषिक पाया था । इस प्रतियोगिता में दस हजार से अधिक बच्चों ने भाग लिया था ।
प्रायः जिस आयु में बच्चे उछल-कूद करते रहते हैं, उस उम्र में नन्हा क्लिन्ट एक प्रतिभाशाली चित्रकार बन चुका था । मात्र पाँच साल की आयु से ही वह अच्छे चित्र बनाने लगा था । प्रशिक्षक ने तो मात्र तूलिका चलाने और रंग मिलाने जैसी मोटी रूपरेखा ही बतायी थी, पर चित्रकला की हर बारीकी उसने आप सीखी थी । माता-पिता उसे डेविड, गणपति, अभिमन्यु जैसे महामानवों की जो कहानियाँ सुनाया करते थे, क्लिन्ट की छोटी-छोटी अंगुलियाँ उन्हें आनन-फानन में रेखांकित कर डालतीं । रंग-बिरंगे उड़ते फुदकते परिंदों के जो रेखाचित्र उसने अंकित किये, उन्हें देखकर हर कोई आश्चर्य चकित हुए बिना नहीं रहता । दायें हाथ से जब चित्र बनाते- बनाते वह थक जाता तब बायें हाथ में तूलिका पकड़ लेता और उसी द्रुतगति से रेखांकन करने लगता । ‘दि सेन्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ फिशरीज टेक्नालॉजी कोचीन’ में कार्यरत उसके पिता जब कागज नहीं जुटा पाये तब वहाँ उक्त विभाग में पड़े रद्दी कागजों पर ही अपनी कला को निखारने लगा और बीस हजार से अधिक चित्र बनकर तैयार हो गये । यद्यपि तीन वर्ष की आयु से ही वह गुर्दे की बीमारी से त्रस्त था, फिर भी चाहे वह घर में रहा हो या अस्पताल में, रेखाचित्र बनाने का कार्य अविराम गति से चलता ही रहा ।
पूर्व जन्मों से संचित संस्कारों के बिना यह कैसे संभव हो सकता है? मृत्यु से दो दिन पूर्व ही उसने अपनी मृत्यु की भविष्यवाणी कर दी थी । हुआ यों कि एक दिन वह बेहोश होकर गिर पड़ा । चिकित्सक बुलाने की तैयारी हुई ही थी कि वह उठ बैठा और हँसते हुए अपने पिता से बोला - कैसा चकमा दिया । दूसरे दिन फिर से उस प्रसंग को याद करते हुए बताया कि कल की तरह आज भी मैं सो जाऊँगा, लेकिन फिर नहीं जागूँगा, माँ मुझे बुलाना नहीं । मानों वह पूर्वाभास कर रहा हो । एक घण्टे बाद ही उसकी मूर्च्छा ‘कोमा’ में बदल गयी और वह सदा के लिये सो गया ।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध भौतिकशास्त्री डॉ. स्टीवेन्सन ने 600 से अधिक ऐसी घटनाएँ एकत्रित की हैं जिनमें विशेषकर 14 वर्ष की आयु से कम के बच्चों द्वारा बताये गये अनेक पूर्व जन्म के अनुभव जाँच-पड़ताल करने पर प्रामाणिक सिद्ध हुए हैं । 170 प्रमाण अकेले भारत के हैं । ऐसी ही एक घटना पूर्व जर्मनी के विलक्षण प्रतिभासम्पन्न तीन वर्षीय बालक हामेन केन की है। वह मस्तिष्क विद्या-विशारदों न्यूरोलॉजिस्टों के शोध का केन्द्र बना रहा । इतनी अल्प आयु में ही यह बालक न केवल उच्च जर्मन साहित्य पढ़ लेता था, वरन् उनका विश्लेषण भी कर लेता था । इसी प्रकार जेरा कालबर्न नामक आठ वर्षीय बालक ने दिमागी आधार पर कठिन से कठिन प्रश्नों के उत्तर की जो क्षमता दिखाई थी, उससे बड़े-बड़े गणितज्ञ ही काफी समय लगाकर कागज पर हिसाब बिठाकर हल कर सकते थे, उन्हें यह बालक बिना क्रमबद्ध अध्ययन के, बिना हिचके आनन-फानन में कैसे हल कर लेता था, अनुसंधानकर्ता इस रहस्य को अभी तक नहीं जान पाये ।
यों तो प्रतिभा या विशेषज्ञता साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा बढ़ाई जाती है, किन्तु पूर्व जर्मनी में दो सौ वर्ष पूर्व जन्में हानिरस हान्केन नामक तीन वर्षीय बालक के बारे में क्या कहा जाये, जिसने इतनी कम उम्र में हजारों लैटिन मुहावरे कंठस्थ कर रखे थे । कठिन से कठिन जोड़, बाकी, गुणा, भाग वह बड़ी आसानी से कर लेता था । इसी उम्र में उसने फ्रेंच एवं अन्य कई भाषाएँ सीखनी आरम्भ कर दी थीं । प्रख्यात कवि गैटे 9 वर्ष की आयु में कविता लिखने लगे थे । विकासवाद के जन्मदाता डार्विन भी ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे । ऐसे कितने ही उदाहरण हैं जो यह दर्शाते हैं कि यह दक्षताएँ जिन्हें भी उपलब्ध होती हैं वह जन्मजात रूप में पूर्व संचित सम्पदा के रूप में ही उपलब्ध होती हैं । ट्रिनिटी कॉलेज का एक विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में ही एक दूसरे कॉलेज में प्रकृति विज्ञान का प्राध्यापक नियुक्त हो गया । अध्ययन और अध्यापन दोनों कार्य साथ-साथ करता रहा । नियुक्ति के समय उस पर यह शर्त लगायी गयी थी कि दो वर्ष के भीतर वह कुछ आवश्यक डिग्रियाँ प्राप्त कर ले, वह शर्त उसने समय से पूर्व ही पूरी कर दी, साथ ही अपनी पढ़ाई भी यथावत् जारी रखी । इसी प्रकार लेबनान के केण्टुकी नगर का मार्टिन जे. स्पैडिडंग 14 वर्ष की आयु में गणित का प्रोफेसर बना । वह उन दिनों सेन्ट मैरीज कॉलेज में पढ़ रहा था । तभी उसकी प्रतिभा को देखकर इस पद पर नियुक्ति कर दी गयी । बाद में वह वाल्टीमोर के आर्कविशप पद पर आसीन हुआ ।
बारह वर्ष से भी कम उम्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त करना अपने आप में एक विश्व रिकार्ड है । कैलीफोर्निया अमेरिका के एडरगल ईस्टवुड दीयलों ने सन् 1988 में मात्र 11 वर्ष 8 माह की आयु में गणित में स्नातक की डिग्री प्राप्त की । इसी तरह भारतीय मूल के बाल मुरली अंबारी ने एक-एक वर्ष में दो-दो कक्षाएँ पास करते हुए 11 वर्ष में हाई स्कूल अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर लिया और अमेरिका के माउण्ट सिनाई स्कूल ऑफ मेडिसिन में मात्र 17 वर्ष की आयु में चिकित्सक बनकर निकला । इतना ही नहीं, उसने सबसे कम उम्र में चिकित्सक बनने का न केवल विश्व कीर्तिमान बनाया, वरन् एड्स जैसी खतरनाक बीमारी पर एक अनुसंधान पूर्ण ग्रंथ की रचना भी कर डाली, जिसे अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा पुरस्कृत किया गया ।
प्रायः मनुष्य अपने जीवन में किसी न किसी क्षेत्र विशेष में विशेषज्ञता हासिल करने का भरपूर प्रयत्न करता है, अधिकांश उसे सफलता भी मिलती है और वह उस विषय का मर्मज्ञ भी बन जाता है । पर कई बार ऐसा भी होता है कि मेहनत एवं आशा के अनुरूप वह योग्यता विकसित नहीं हो पाती । ऐसी स्थिति में यह कदापि नहीं समझना चाहिए कि उसके इस जीवन का प्रयास सर्वथा निरर्थक गया । वस्तुतः ऐसे ही पुरुषार्थ अगले जन्म में प्रतिभा बनकर प्रकट होते और लोगों को आश्चर्य चकित करते हैं ।

