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Magazine - Year 1997 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
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निर्भीक कवि की बेबाक अभिव्यक्ति

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First 30 32 Last
सामंत सालमसिंह की सियासती चालें अपना रंग दिखा रही थी। युवराज गजसिंह उसके चक्रव्यूह में फँसकर अपना कर्तव्य भूल गये बैठे थे। विलासिता का राग-रंग और चाटुकारों की ओछी प्रशंसा बस यही उनकी दिनचर्या थी। महाराज मूलराज के निधन के समय वह सिर्फ चौदह वर्ष के थे। नाबालिग होने के कारण उस समय उनके हाथों में शासन का अधिकार नहीं था। सामन्त मण्डल में सालमसिंह को युवराज गजसिंह का रक्षक बना दिया।

युवराज गजसिंह को जब भी फुर्सत मिलती, वह लोकगायकों के गीत संगीत को सुनता। युवराज के साथ रियासत के जागीरदार, ठाकुर, मंत्री परिषद् के सदस्य और मित्र आदि होते थे। कभी-कभी उनकी इस महफ़िल में सालमसिंह भी दल-बल सहित शामिल होता था।

एक दिन ऐसी ही महफ़िल सजी हुई थी। उस महफ़िल में सामन्त सालमसिंह भी था। तभी एक लोक गायिका ने एक ऐसा गीत गाया, जिसमें सालमसिंह की क्रूरता, अन्याय और लालच का वर्णन किया था। इस गीत की हर पंक्ति गजसिंह की कायरता और दब्बूपन को उजागर कर रही थी। गीत सुनकर गजसिंह और सालमसिंह दोनों आग बबूला हो उठे।

गायिका तो बेचारी प्राणों की भीख माँगती वहाँ से भाग खड़ी हुई। लेकिन सामन्त सालमसिंह ने तुरन्त फरमान जारी किया कि ऐसा विद्रोह गीत लिखने वाले कवि को पकड़कर युवराज के समक्ष पेश किया जाये। राज्य के गुप्तचर सभी गाँवों, रास्तों, डाँडियों और सुनसान रेगिस्तान तक कवि की खोज में जा पहुँचे। जब किसी तरह से उस एक गीतकार का पता नहीं चला तो सालमसिंह के आदेश से रियासत के सभी कवियों और गायकों को पकड़ लिया गया।

अगले दिन युवराज और सामन्त के सामने सभी कवियों को एक कतार में लाकर खड़ा कर दिया। सालमसिंह उन सभी की ओर देखते हुए गरजा - “अब तुम में से हर एक बारी-बारी से हमें एक गीत सुनायेगा।”

सभी कवि बारी-बारी से कभी युवराज तो कभी सालमसिंह को समझदारी, उनके उदार हृदय, उनकी सुन्दरता, उनकी ताकत और अपनी बड़ाई की ख्याति के गीत गाने लगे। उन्होंने जो गाया उसका सार वही था कि इस धरती पर युवराज और सामन्त जैसा महान और बुद्धिमान तथा न्यायप्रिय शासक तो कोई पैदा ही नहीं हुआ है।

युवराज एक के बाद एक कवि को छोड़ने का आदेश देते गये। आखिर में चार कवि रह गये । उन चार कवियों ने गाने की बात तो दूर कुछ बोलने तक के लिए इंकार कर दिया। उनके उस व्यवहार से खीझकर युवराज ने उन चारों को जेल में बन्द करने का आदेश दिया। सभी ने सोचा कि युवराज उन चार व्यक्तियों के बारे में भूल गये हैं।

ठस युवराज गजसिंह पूर्णतया बालिग हो गये। इस समय तक शासन के सारे अधिकार सीधे तौर पर उनके हाथ में आ गये थे फिर भी सामन्त सालमसिंह का पहले वाला रुतबा और प्रभाव बरकरार था।

अचानक एक दिन महाराज गजसिंह ने उन चार कवियों को दरबार में तलब किया और आदेश दिया कि अब उन में से हर कोई मुझे एक एक गीत सुनाए। उन चारों में से दो फौरन गजसिंह और सालमसिंह की समझदारी, दरियादिली, सुन्दरता, उनकी बड़ाई और ख्याति के बारे में गाने लगे। उन दोनों कवियों को छोड़ दिया गया।

अब दो कवि बाकी बचे थे। वे दोनों कुछ भी गाने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्हें एक खुले मैदान में ले जाया गया। जहाँ एक पिंजरे में खूँखार और कई दिनों से भूखा एक बाघ बेचैन होकर डोल रहा था। दोनों कवियों को पिंजरे के सामने खड़ा देखकर बाघ बार-बार जोरदार दहाड़ के साथ झपटता। मगर पिंजरे की मजबूत सलाखें उसका रास्ता रोक रही थी। बाघ का दिल दहला देनी वाली दहाड़ को सुनकर अच्छे-अच्छों के हृदय काँप उठते थे।

“ अभी तुम दोनों को इस भूखे बाघ के पिंजरे में डाल दिया जायेगा।” सालमसिंह गरज कर बोला। “ महाराज आखिरी मौका देकर कहते हैं कि अपना कोई गीत सुनाओ ” सामन्त के स्वरों में अति चेतावनी थी।

सामन्त के इस चेतावनी भरे शब्द को सुनकर उन दोनों कवियों में से एक की हिम्मत टूट गयी और उसने गजसिंह और सालमसिंह की अक्लमंदी, उदारता, महानता का बखान करना शुरू कर दिया। उस कवि को भी छोड़ दिया गया। बस एक जिद्दी कवि बाकी रह गया था, जो कुछ भी नहीं गाना चाहता था।

उसे फिर गरजती आवाज में चेतावनी मिली। जिसे सुनकर वह कहने लगा - “ मैं साहित्यकार हूँ, माँ सरस्वती का सच्चा पुत्र। किसी लोभ अथवा भय से चाटुकारी करके मैं सरस्वती का अपमान नहीं कर सकता। साहित्य का धर्म सद्गुणों की प्रशंसा करके समाज को उन्हें अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। दुर्गुणों, दुष्प्रवृत्तियों की निन्दा का मतलब सिर्फ इतना है कि व्यक्ति इनसे बाज़ आये। यदि तुम्हें मेरी कविता सुनने का इतना ही शौक है तो फिर सुनो।” इतना कहते हुए वह सालमसिंह की क्रूरता और अत्याचार तथा गजसिंह की कायरता और दब्बूपन के बारे में वही गीत गाने लगा, जिसे सुनकर यह मामला शुरू हुआ था।

गीत की पंक्तियों के साथ ही सालमसिंह भड़क उठा। उसने कवि को भूखे बाघ के पिंजरे में धकेलने का इशारा किया अभी पिंजरा खुलता कि इससे पहले सभा स्थल में महाराज का तेज स्वर गूँजा - “रुको इस सच्चे कवि को आजाद कर दो इसने मेरी आँखें खोल दीं। मेरे सोये हुए विवेक को जाग्रत कर दिया।” हरेक की नजर उस कवि पर थी, जिसने मौत की परवाह न करके साहित्यकार का धर्म निभाया था। उसकी कविता की पंक्ति में सत्य की खनक थी। हर शब्द में जन सामान्य का दुख-दर्द उजागर हो रहा था। साथ ही शासकों की अकर्मण्यता भी प्रतिबिम्बित हो रही थी। महाराज स्वयं खड़े होकर उसे गले लगाते हुए बोले - “ मित्र ! तुम्हारी स्पष्ट अभिव्यक्ति ने हमें दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों से उबार लिया।” क्या आज के साहित्यकार में, पत्रकार में वह मन्यु है जो प्रलोभन में डिगे बिना सत्य कहलवा सके ?

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