संस्कृति चिंतन
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मनुष्य की बुद्धि और विचार के जन्म के साथ ही संस्कृति की पैदाइश हुई। इसकी रचना में जीवन के प्रायः सभी तत्वों का समावेश है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि संस्कृति इंसानी सभ्यता, काल, एवं इतिहास का ऐसा निचोड़ है जिसकी रासायनिकता बता पाना संभव नहीं, इसे तो सिर्फ अनुभव किया जा सकता है। इसके दृश्य रूप के साथ अदृश्य रूप भी है। जीवनशैली में जहाँ व्यक्ति और समाज की संस्कृति दिखाई देती है वहाँ चिंतन शैली के विचारों में स्पन्दन अदृश्य होने पर भी संस्कृति का प्रभावी परिचय देते हैं।
इस तरह यह स्थूल है और सूक्ष्म भी, साथ ही दृश्य होने के साथ अदृश्य भी है। इसका संबंध समाज के सभी वर्गों यानि की धनी, निर्धन, विद्वान, अशिक्षित हर किसी से होता है। इस लिए यह स्वाभाविक है कि इसके कतिपय रूप हों। बाहरी तौर पर उनमें कुछ अंतर हो सकता है लेकिन एक ही इंसानी समाज की उत्पादकता से जुड़े होने के कारण उनमें कुछ खास आँतरिक भिन्नता नहीं होती। केवल ग्रहणशीलता सूक्ष्म होने के कारण ही वर्ग विशेष में उच्चस्तरीय होने का सतही आभास होता है। इसीलिए संस्कृति को सही मायने में समझने के लिए सतह को भेदना जरूरी है। सतह के अन्दर ही मिलती है सहजता, प्रवाह, एवं जीवन सत्व और वही है किसी भी संस्कृति का मूलमंत्र।
मानव जाति के इतिहास से अभिन्न रूप से जुड़ी संस्कृति की नैसर्गिक धारा बहती चली आ रही है। प्रागैतिहासिक काल के अणु युग तक इसका विकास इसी में परिलक्षित होता है। संस्कृति स्वयं ऊर्जा पर चलने वाली शक्ति है। सभ्यता की कहानी और इतनी सरल नहीं है। जहाँ एक तरह सृजनात्मक भाग है तो दूसरी और विघटनात्मक एवं विनाशकारी तत्व उपस्थित हैं। संस्कृति से सौम्यता है, सृजनात्मक शक्ति है साथ ही इसमें सुरक्षा एवं संघर्ष के तत्व भी हैं। जैसे-जैसे मूल्यों का विकास हुआ, उन पर आधारित संस्थाओं का विकास हुआ। सांस्कृतिक मूल्यों पर आघात तभी हुए। संस्कृति अपने आप में प्रेरणाओं का अभेद सुरक्षा कवच बन गयी। इसकी सुरक्षा के लिए उपजे संघर्ष में अनगिनत बलिदान हुए, नुकसान भी हुआ लेकिन आखिर बर्बरता को हर बार हार माननी पड़ी, इसे किसी भी तरह विनष्ट नहीं किया जा सकता है। लोकविश्रुत स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में संस्कृति के बढ़ते महत्व का आकलन इसी से किया जा सकता है कि किसी भी सभ्यता का उत्थान और पतन उस समय की संस्कृति की स्थिति पर निर्भर रहा है इसीलिए सभ्यता के मूल्याँकन के लिए संस्कृति को एक प्रमुख तत्व माना गया है। सही बात तो यह है कि संस्कृति का समाज से अटूट संबंध है। तभी तो किसी भी समाज किसी भी देश की सभ्यता स्वयं को असंस्कृति-कुसंस्कृति अथवा संस्कृतिविहीन कहलाना नहीं पसन्द करती है।
संस्कृति का स्थूल भाग कला, परम्परा, रहन-सहन और रीति-रिवाजों के रूप में होता है। इसी कारण इतिहास के भिन्न-भिन्न चरणों में संस्कृति को संरक्षण एवं प्रोत्साहन विभिन्न वर्गों से मिलता रहा है। इसका सूक्ष्म भाग आध्यात्मिक, सामाजिक मूल्यों एवं चिंतन पद्धतियों आदि के सोच के तौर-तरीकों का होता है। इसे जीवन के प्रति नजरिया भी कह सकते हैं। यह साहित्य के बतौर सामने आता है। मानव सभ्यता के प्राचीनतम इतिहास में ऐसे भी जीवन्त उदाहरण हैं जब इन सूक्ष्म मूल्यों का रक्षण साहित्य व पुस्तकों द्वारा संभव नहीं होता तो ऐसी दशा में उन्हें मौखिक रूप से सहेजा गया और पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचाया गया।
श्रुत और ऋचाओं के रूप में वैदिक वाङ्मय की धरोहर इसी का प्रमाण है। यही वजह है कि संस्कृति की धारा अक्षुण्ण ढंग से बहती चली आ रही है। इसके प्रति हमेशा से जागरूकता रही है। इसकी उपेक्षा के अति गम्भीर परिणाम अवश्यम्भावी हैं।
आज की सांस्कृतिक विपन्नता का कारण है - तथ्यपूर्ण तार्किकता की कमी और भावनात्मक आवेश की अधिकता। इसी वजह से काफी कुछ विसंगतियाँ उपजी हैं। वर्तमान समय में आधुनिकीकरण के व्याख्याकारों ने पारस्परिक संस्कृति को प्रगमित अवरोधक माना और निरंतर सांस्थानिक और मूल्यात्मक परिवर्तन का राग अलापते रहे। संस्कृति की सृजनात्मक ऊर्जा की ओर से मुँह मोड़ लिया गया। उनको भी यह अहसास नहीं रहा कि संस्कृति की तीव्र प्रतिरोधात्मक प्रक्रिया से आधुनिकीकरण का महत्व धराशायी हो जायेगा।
एक ओर जहाँ पूर्वाग्रही संस्कृति की गत्यात्मकता को समझे बिना किसी सुदूर अतीत और उसके मूल्यों से चिपके रहे------------------। ये नये समाज का स्वप्न-------------- क्राँतिकारी दृष्टिकोण एवं परम्पराओं को नष्ट करके उसमें मिलती जुलती परम्परावादिता का अनुदान वर्तमान भविष्य की हर समस्या का हल पुरातन परम्पराओं में खोजने के लिए प्रयत्नशील है। दोनों ही संस्कृति की गति-प्रगति एवं मौलिक चिंतन के अवरोधक हैं। दूरदृष्टि के अभाव में इसमें से किसी ने परम्परा एवं प्रगति के बीच की दूरी और संबंध सूत्रों को खोजने की सही कोशिश नहीं की। इसके बिना उज्ज्वल भविष्य की संकल्पना साकार नहीं हो सकती।
एकदम आधुनिक एवं पूरी तरह से पारम्परिक, संस्कृति के ये दोनों रूप भ्रामक हैं। इनमें निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर गति नहीं एक अबूझ भटकाव है। कुछ ऐसी ही बातें अभिजात्य संस्कृति और लोक संस्कृति के बीच है। ये भी दो भिन्न धरातल हैं। उनमें संपर्क सूत्र तो है, पर स्तर भेद के कारण उनके परिप्रेक्ष्य में काफी भेद है। समस्या तब और जटिल हो जाती है जब अनेक सांस्कृतिक कारकों के कारण उनमें लोकव्यापी जन संस्कृति और लोकरुचि की संस्कृति का उदय होता है। संस्कृति की इन चार शैली वृत्तों में परिभाषित व्याख्यायें अलग-अलग होती हैं। उनमें संवाद एवं आदान-प्रदान भी बना रहता है। लेकिन उनकी परिधि प्रायः अलग ही रहती है।
लोक संस्कृति में कुछ मोहक तत्व भी होते हैं। जिनका परिष्कृत रूप अभिजात्य संस्कृति में झलकता है। शिक्षा एवं आधुनिक संचार माध्यम द्वारा अभिजात संस्कृति का कुछ रोचक रूप लोक संस्कृति में प्रवेश पाता है। लोकरुचि निरन्तर परिवर्तनशील होने के कारण अभिजात एवं लोक संस्कृति पर इसका प्रभाव साफ परिलक्षित होता है। व्यापक जन संस्कृति के निर्माण में पारम्परिक संस्कृति के रूपों एवं लोकरुचि संस्कृति के तत्वों का मिश्रण होता है। कालान्तर में स्थिर स्वरूप को धारण कर लोकव्यापी जन संस्कृति में परिवर्तित हो जाती है।
तरह-तरह की समस्याओं से घिरे देश में संस्कृति की सक्रिय सोच अंकुरित होती देखी जा सकती है। अपनी अभिरुचि और संवेदनाओं के अनुरूप एक विशिष्ट दायरे में संस्कृति के तत्वों का मूल्याँकन और उनका सत्र निर्धारित होता है। मुख्यतः ये कला रूपों के उच्च उपलब्धियों से आकर्षित होते हैं। संगीत, साहित्य और उत्कृष्ट कलाओं---------------------- को उनके मूल्याँकन में ऊँचा स्थान मिलता है। इन तत्वों के महत्वपूर्ण होने के बावजूद संस्कृति की परिभाषा का परिसर विस्तृत है। खेल-कूद संस्कृति के अंग हैं, मनोरंजन भी। युद्ध और शाँति संस्कृति के दायरे में आबद्ध है। श्रम भी संस्कृति है और विचार भी। राजनीति की अपनी संस्कृति होती है और धर्म की अपनी। व्यक्ति और समूह की प्रवृत्तियाँ संस्कृति द्वारा बदलती हैं। यह संस्कृति के आधार और केन्द्रीय मूल्यों को प्रभावित करता है। इस तरह संस्कृति का सर्वांगीण आकलन व्यापक और समुचित दृष्टिकोण द्वारा ही संभव है।
अपने को संस्कृति का हिमायती कहने वालो के नजरिये में एक दोष आ जाता है। वे इसे जाति आदर्श पूर्ण ढंग से अपनाने के लिए मजबूर करते हैं अथवा फिर बहिष्कृत कर देने में विश्वास करते हैं। जबकि बात तो यह है कि संस्कृति के पहिये की धुरी स्थित एवं अपरिवर्तित होती है लेकिन परिधि में सामयिक परिवर्तन भी होते हैं। परन्तु इसके अभाव में कई विकृतियाँ अमरबेल की तरह फैल जाती हैं। अन्याय, शोषण और उत्पीड़न को चाहे धर्म का परिधान पहनाया जाये पर छिपाया या मिटाया नहीं जा सकता। प्रतिक्रिया स्वरूप सामाजिक असंतोष का भाव पनपता है और संस्कृति रूढ़ियों, मूढ-मान्यताओं परम्पराओं की बेड़ियों को झटक कर तोड़ फेंकती है।
अपने नये रूप में यह संस्कृति विकृतियों का विरोध, अन्याय का उन्मूलन, सुधार के मार्ग प्रशस्त करती है। जब भी ऐसी स्थिति आई उसे असंख्य विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ा। संस्कृति क्राँति के प्रणेता गौतमबुद्ध और उनके श्रमणों का मजाक उड़ाया गया। महावीर को अनगिनत यातनाएँ दी गयी तथा ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा। इसका इतिहास दर्दनाक एवं लम्बा होने के बावजूद क्राँति के अग्नि स्नान से पुरातन मूढ़ताओं को धोकर पुनः ऊर्जावान हुई संस्कृति की अनोखी दास्तान है। इसके प्रणेता भी अपने इस अनुदान के कारण युगपुरुष बनकर प्रतिष्ठित हुए। सही मायने में संस्कृति है ही युगानुरूप सत्य की अन्वेषक। संतों, मनीषियों ने भावनाएँ ही नहीं सिखायी बल्कि उसमें से अनेक युग शोध और परिवर्तन परिवर्तक भी थे। यदा-कदा इस प्रयास में विसंगतियाँ भी आ जाती हैं पर उनकी सृजनात्मक भूमिका की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
अप संस्कृति हर युग में विषपायी देन है। इसमें कुछ का निराकरण संभव होता है, कुछ को समाज में किसी कारणवश विशेषाधिकार मिल जाने से उसका आश्चर्यजनक विस्तार होता चला जाता है। इसी का नतीजा है कि आज समाज अनियंत्रित आर्थिक लाभ व उच्छृंखल कामुकता की ज्वाला से जल रहा है। सफलता के लिए मानवीय मूल्यों व आदर्शों की तिलाञ्जलि देने में कोई हिचक नहीं है। आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर अंकुशहीन भोगवाद पनप रहा है। सामाजिक और पारिवारिक सौहार्द्रता चटककर व्यक्ति के स्वार्थ केंद्र में सिमट आई है। साहित्य एवं जन संचार माध्यम इसी अप संस्कृति का विश्व व्यापी प्रचार कर रहे हैं। वैज्ञानिक तकनीकों का भरपूर लाभ अप संस्कृति उठा रही है। मानवीय मूल्य बाज़ार में बिकने के समान हो गया है। स्वार्थ रूपी व्यवसायिकता की जड़े गहरी हुई हैं। सांस्कृतिक मूल्य दम तोड़ते मालूम पड़ते हैं और विघातक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को प्रश्रय देकर इंसानी पाँव किस सर्वनाश की ओर मुड़ चले हैं शायद उसे स्वयं नहीं मालूम।
इस विकराल विप्लवी समस्या के समाधान के लिए जरूरी है - सांस्कृतिक क्राँति में सक्रिय भागीदारी। युगऋषि ने जिस विचारक्रांति की रचना की है, उसमें युगानुकूल राष्ट्रीय चरित्र निर्माण के सभी तत्व जरूरी हैं। वह सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी मानसिकता को हर स्तर पर निर्माण का अभियान है। अपने देश में जो वर्तमान मानसिकता है, उसे शब्द चित अल्डुअस हक्सले ने बखूबी खींचा है, उनका कहना है कि भारतीय लोगों को राजनीति और राजनीतिक चर्चा करने की लाइलाज बीमारी लग गयी है। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि राजनीतिक नितान्त घटिया चीज है लेकिन आज कुटिलता भ्रष्टाचार इसकी मजबूरी बनी हुई है जबकि संस्कृति मानवीय दिलों के दायरे को जोड़कर अखण्ड समाज की रचना में समर्थ है। शायद उसकी उपेक्षा ही वह कारण है कि बड़े-बड़े बाँध, इमारतें, कारखाने बन जाने के बावजूद लोगों के मन बाँधने का यानि की राष्ट्रीय चरित्र निर्माण का स्वप्न पूरा नहीं हो सका है। राष्ट्र, राष्ट्रीयता, एकता और लोकतंत्र की संकल्पना को हमने स्वतंत्रता के पश्चात् नये सिरे से स्वीकार तो कर लिया पर इसे असरकारक ढंग से अमल में लाने के लिए संस्कृति की, युग क्राँति की उपेक्षा कर रहे हैं।
संस्कृति दो मंजिलें मकान की तरह है। इसकी पहली मंजिल में एकदम मूलभूत मगर जीवन के चिरन्तर तत्व होते हैं, वे मूल्य कायातीत हैं, शाश्वत हैं। यही इंसान के सामाजिक जीवन की नींव की ईंट हैं। पहली मंजिल पर दूसरी मंजिल का निर्माण ऐतिहासिक परम्परा, आर्थिक लेन-देन सामाजिक संबंध और परिस्थितिजन्य अन्य मूल्यों द्वारा निर्मित होता है। यह व्यवस्था मूलतः संरक्षणात्मक होने की वजह से तरह-तरह के प्रतीक, परम्पराओं, मान्यताओं का बड़ा सा पिंजड़ा बनाती है। इसे देखकर पहली मंजिल पर दूसरी मंजिल की आश्रित मूल अवस्था को श्रेष्ठता का भ्रम होने लगता है। इस भ्रम से कई तरह की विकृतियाँ पैदा हो जाती हैं। ज्ञान-विज्ञान के विकास से होने वाला बदलाव यानि की सामाजिक परिवर्तन इस विकृति से संघर्ष करने लगता है। दुनिया के सभी देशों के साथ अपना देश भी आज इसी संकट के दौर से गुजर रहा है।
समाज में मृत और जीवित संस्कृति भी होती है। मृत संस्कृति का पहला प्रमाण है कि वहाँ जीवन रस सूख चुका होता है। इसमें न हलचलें होती है और न नवसृजन के स्पन्दन। दूर से यहाँ सब कुछ शान्त-शान्त लगता है। पर वह शांति मरघट की शांति की तरह होती है जहाँ जीवन की राख के अलावा कुछ नहीं। जीवित संस्कृति में विचारों के अंतर्विरोध होते हैं। अतीत और भविष्य के संबंधों की खोज में वर्तमान तनावपूर्ण भी होता है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए यहाँ वर्तमान में संघर्ष की टंकारें रह-रहकर गूँजती हैं। भारतीय संस्कृति ऐसी असंख्य अनुभूतियों को अपने में समेटे आज उज्ज्वल भविष्य के लिए कार्यरत है।
डॉ. राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति की इस प्रवृत्ति के बारे में कहा करते थे - साहित्य एक है पर उसे कई भाषाएँ रचती हैं। विचारों में विविधता हो सकती है इसीलिए मानदण्ड होना चाहिए। तनाव से हो, टकराव से हो, भारतीय संस्कृति में गहरा चिंतन खोजने की प्रवृत्ति हमेशा से रही है। इसके जीवंत होने का सबसे बड़ा प्रमाण है धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष सभी की एक साथ स्वीकारोक्ति क्योंकि जीवन अलग-अलग हिस्सों में बैठा है। किसी को काटने-हटाने छोड़ने का मतलब है - संस्कृति का अधूरापन। इसकी पूर्णतया के जीवन्त प्रवाह को हर जगह पहुँचाने की जिम्मेदारी प्रतिभाओं की है। परन्तु भटकाव के इस दौर में याद आते हैं ए. गिलवर्ट के शब्द - “मैंने अपनी पीढ़ी की योग्यतम प्रतिभाओं को पतनावस्था में देखा है। उनका रोना मैंने सुना है, जैसे बगीचे में कोई बूढ़ा या बच्चा रोता है।”
इन पंक्तियों में उन योग्यतम प्रतिभाओं को दुरावस्था के भँवर से उबारने और संस्कृति क्राँति में भागीदार होने के लिए आह्वान है, अनुरोध है और हृदय की गहराइयों से पुकार है। क्योंकि व्यक्ति समाज और राष्ट्र-विश्व की सभी समस्याओं का समाधान इसी संस्कृति के निर्णायक विकास में है। अतः इसमें अधिकतम जीवन ऊर्जा के निवेश की जरूरत है। इस भारी जरूरत की पूर्ति स्वार्थ की बेड़ियों को तोड़कर फेंकने वाली प्रतिभाएँ ही कर सकती हैं।
सांस्कृतिक प्रयासों को अब अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकता भी मान लिया गया है। यूनेस्को की अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक विकास दशाब्दी समिती की रिपोर्ट में इसे स्पष्ट रूप से बताया गया है। उनके अनुसार यह आवश्यक है कि विकास शब्द को दर्शन और विचार के संदर्भ में समझा जाये। किसी खास और प्रमुख ढाँचे के आधुनिकीकरण को ही प्रायः विकास समझा जाता रहा है। जबकि वास्तव में आवश्यकता यह है कि इसमें सांस्कृतिक एकाधिक विचारधाराओं, विभिन्न जीवन पद्धतियों, अलग-अलग आस्थाओं, तथा जीवन मूल्यों का समायोजन हो ताकि समूची मानव जाति अपने चरम लक्ष्य को पा सके। आधुनिकीकरण का मतलब किसी विशिष्ट जीवन पद्धति की मशीनी नकल नहीं है वरन् विकास पद्धति को संस्कृति के संबंध में पुनर्जीवित करना है। विकास के तत्वों की सांस्कृतिक अंतर्वस्तुओं को भी महत्व देना होगा जिसमें स्थानीय व भौगोलिक प्रासंगिकता पर्यावरणीय तत्व, ऐतिहासिक परम्पराएँ, परम्परागत ज्ञान और कौशल शामिल हैं।
इसी कारण एक नयी अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति नीति की आवश्यकता है जिससे समूचा मानव समाज अपनी आत्माभिव्यक्ति दें सके। इस नीति से विश्व भर के विचारों, दृष्टिकोणों में मानवी विकास हेतु उचित सामंजस्य बिठाया जा सकेगा। साथ ही दूर होगी विभिन्न देशों के निवासियों की वह संवेदनहीनता जिसकी वजह से समस्त कतिपय लोग अपना स्वार्थ सुधारने के लिए अपने भोले-भाले देशवासियों में दूसरे देश के लोगों के प्रति नफरत के बीज बोते हैं। किसी भी देश के मनुष्य मानवीय भावनाओं से वंचित नहीं होते हैं। सभी में कोमल संवेदनाएँ होती हैं। हाँ इन संवेदनाओं की वजह से उनमें यदि अपनी मातृभूमि के प्रति प्यार है तो गलत क्या है। लेकिन यदि उन्हें बताया जा सके, सिखाया जा सके कि मातःभूमिः पूत्रोऽहम् प्रथिव्याँ कि यानि धरती हमारी माता है हम पृथ्वी के पुत्र हैं
और एक माँ की संतानों को जिस तरह से रहना चाहिए हम उसी तरह से रहें। इस तत्व को हृदयंगम कर पाना संस्कृति शिक्षण से ही संभव है। भारतीय संस्कृति में सबसे अधिक सामंजस्य एवं समन्वय की क्षमता रही है। इस संदर्भ में उनके अनुभव भी बहुत हैं। आज भी यह विश्व के विभिन्न भू-भागों में प्रचलित जीवन मूल्यों, आवश्यक तत्वों को अपने में आत्मसात् कर सकती है। यह पारस्परिक सांस्कृतिक संवाद ही सभी समस्याओं का सार्थक हल है।
क्योंकि अभी देशों का पारस्परिक परिचय वहाँ के राजनेताओं के बीच होता है, जन जीवन तो आपस में अपरिचित ही रहता है। जब सांस्कृतिक क्रिया-कलापों से जनजीवन आपस में परिचित होगा, तो जनभावनाएँ भी उमंगेंगीं। जनभावनाओं के इस उफनते ज्वर में संकीर्णता की दीवारें, कतिपय स्वार्थी लोगों की कुटिल चालें रेत के महल के मानिद बह जायेगी, फिर अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव पनपेगा, समस्यायें नहीं। इस कार्य की शुरुआत हमें ही करनी है यानि की हम भारतवासियों को, क्योंकि हमारे यहाँ की मानवता के इतिहास में पहली बार वसुधैव कुटुम्बकम् की गूँज उठी है।
परिस्थितियाँ विपरीत हुई तो क्या, विश्व संस्कृति के निर्माण की जिम्मेदारी हम भारत वासियों को पूरी करनी है। मानवता के सामने यह सबसे बड़ा कार्य है। अप संस्कृति का जहर भी इसी से शान्त होगा। संस्कृति की अवहेलना से उत्पन्न दोष को इसी प्रयास से भरा जा सकता है। संस्कृति ही समस्त मानवीय विकास का आधार है। सांस्कृतिक क्राँति के अग्रदूतों की जिम्मेदारी है कि इसके तत्वों को सुदूर विश्व के कोने कोने तक पहुँचाये।

