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Magazine - Year 1997 - Version 2

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किसकी सलाह लें, कब लें ?

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सलाह किसकी मानें ?बड़ा उलझन भरा सवाल है। अपने सगे संबंधियों, मित्र, परिचितों द्वारा प्रायः कई तरह के मशविरे दिये जाते रहते हैं उनमें से किसे स्वीकार करें, किन्हें अस्वीकार, इसका निर्णय करते नहीं बनता। ऐसी दशा में बड़ा असमंजस एवं धर्म संकट की स्थिति आ खड़ी होती है। और वे इतने घनिष्ठ होते हैं कि उनका मन रखने की बात ध्यान में रखनी पड़ती है। इन्हें अप्रसन्न, असंतुष्ट, रुष्ट कैसे करें ? भारी संकोच उस समय होता है जब बात गले नहीं उतरती, लेकिन आग्रह को टालते भी नहीं बनता।

प्रायः ऐसी कठिनाई तब पड़ती है, जब किसी आदर्शवादी प्रोत्साहन के लिए किसी सुदूर क्षेत्र से आवाज आती है। बात उचित है किन्तु कहने वाला दूर होने अथवा घनिष्ठता का नाता न रहने से प्रत्यक्ष प्रभाव डालने की स्थिति में नहीं होता। उसका आग्रह किताबों के पन्नों, सूक्ष्म मानसिक प्रेरणाओं अथवा हृदय में उठने वाले भावपूर्ण स्पन्दनों से अपने तक पहुँचता है, जिसका न कोई प्रत्यक्ष संबंध होता है और न सामाजिक रिश्ता। संबंधों के सगेपन की न तो यहाँ कोई दुहाई होती है और न इस तरह का दबाव प्रभाव। इस दशा में किस तरह की सलाह औचित्यपूर्ण लगते हुए भी उसे अपनाने स्वीकारने का साहस नहीं जुटता।

वैसे भी अनौचित्य को ठुकरा देना और औचित्य को अपना लेना हर तरह से हर किसी के लिए लाभदायक है। तुरत-फुरत का लाभ उसमें न हो, थोड़ी बहुत सामयिक हानि दिखती है तो उसे अंततः सत्परिणाम औचित्य को अपनाने में ही मिलते हैं। इतने पर भी सलाहकारों के व्यक्तिगत आग्रह को ध्यान में रखते हुए कई बार अनौचित्य को स्वीकार करने और औचित्य को छोड़ने का असामंजस्य सामने आ खड़ा होता है। ऐसे समय में हमें क्या करना चाहिए ? इसका कोई सुनिश्चित विधान निश्चित कर लिया जाये तो फिर उचित कदम उठाने का निर्णय सुविधाजनक हो सकता है।

इसके लिए अच्छा यही हो कि हम आदर्श और औचित्य को ही अपना सगा संबंधी, शुभचिंतक, मित्र, घनिष्ठ मानकर चलें। व्यक्तियों में हर किसी को उतने ही अंश का सगा मानना चाहिए जितने में वह औचित्य का पालन करता है। हर इंसान के भीतर देवत्व और असुरता थोड़े बहुत अंशों में मौजूद होते हैं। ज्वार-भाटे की तरह दोनों ही तत्व समय-समय पर सभी में उभरते रहते हैं। एक व्यक्ति एक समय में एक सीमा तक ही कार्य के लिए ठीक सलाह अथवा सहायता दें सकता है लेकिन यह जरूरी नहीं कि वही व्यक्ति दूसरे समय, दूसरे प्रयोजन के लिए उचित सलाह दे।

यह भी हो सकता है कि जिसने एक समय में मुसीबत में बचाना और ऊँचा उठाने में कारगर सहायता दी, वही दूसरे समय दूसरे क्षेत्र में कारगर साबित हो। यह उभयपक्षीय परस्पर विरोधी संभावनाएँ हर समय हो सकती हैं। प्रायः हर इंसान दोहरे व्यक्तित्व से जकड़ा रहता है इसलिए जान-बूझकर अथवा अनजाने में उसके आग्रह अनौचित्य और औचित्य से भरे हो सकते हैं। इसलिए महत्व परामर्श या आग्रह को नहीं उसमें छिपे तथ्यों को देना चाहिए और यह देखना चाहिए कि जो कहा जा रहा है वह किस सीमा तक उचित है और किस सीमा तक अनुचित है। हमारी स्वीकृति उचित अंश को ही मिलनी चाहिए। व्यक्तिगत घनिष्ठता, खून के रिश्ते अथवा प्रभावशाली पद का संबंध रहते हुए भी अनुचित को विनय पूर्वक अस्वीकार कर देना चाहिए।

अस्वीकार कर देने में यदि पर्याप्त विनम्रता बरती गयी है तो कोई जरूरी नहीं कि सामने वाला नाराज़ ही हो। नाराज़गी का अवसर तो तब आते हैं जब सलाह देने वाले के परामर्श को मूर्खतापूर्ण, अनैतिक, अनुपयुक्त कहकर उसके अहंकार को चोट पहुँचायी जाती है। इस सीधे टक्कर से बचा जा सके तो कटुता के अप्रिय प्रसंग नहीं बनेंगे। यदि किसी अन्य वजह से कटुता हुई तो बहुत थोड़ी होगी। जिसे अपना अंतःकरण और विवेक ठीक नहीं समझता है उसे मान लेने में क्या-क्या कठिनाई पड़ेगी, इस बात को आग्रहकर्ता को नम्र किन्तु स्पष्ट शब्दों में बता देना चाहिए।

हानियाँ कई तरह की होती है, शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, आर्थिक, सामाजिक आदि। अनुचित आग्रह मानने पर किन-किन कठिनाइयों में फँसना पड़ सकता है इसके लिए तर्क और आधार पहले तो अपने मन में तैयार कर लिया जाये और और बाद में सामने वाले को बता दिया जाये। अनैतिक परामर्शों के बारे में धर्म, इंसान, भगवान एवं अंतरात्मा की असहमति की बात भी कही जा सकती है। इस संदर्भ में ज्यादा दबाव डालने पर अपने आपको कमजोर, कायर, दुर्बल भी अस्वीकार किया जा सकता है। सलाहकार के अहंकार को तुष्ट करते हुए यह भी कहा जा सकता है कि आप तो साहसी होने के नाते ऐसा कर और सोच सकते हैं। पर मेरे जैसे धर्मभीरु के लिए ऐसा करना मुश्किल होगा, मन को मारकर आँतरिक विद्रोह के साथ यदि आपकी सलाह मानी जाये तो उलझी हुई मनःस्थिति में वह स्वीकृति व्यक्त करते भी आपके लिए प्रसन्नता होगी।

इस तरह नम्रता के साथ अपनी कठिनाई व्यक्त करते हुए बात को समझाया जा सके तो परामर्शदाता के दबाव को आसानी से टाला जा सकता है, साथ ही सामने वाले को बिना नाराज किए स्वयं को अनौचित्य से बचाया जा सकता है।

ऐसी ढेरों मूढ़ताएँ, अंध परम्पराएँ हैं जो नैतिक, आर्थिक, सामाजिक दृष्टि से अहितकर होते हुए भी घर के बड़े बुजुर्गों या फिर सगे संबंधियों द्वारा पर थोपी जाती हैं, उन्हें अपनाने के लिए दबाव दिया जाता है तो कभी अपने अहसानों की दुहाई दी जाती है। ऐसे प्रसंगों में दर गुजर उनकी की जा सकती है जिनका मतलब किन्हीं चिन्ह पूजाओं से हो। यों लकीर पीटने में श्रम, समय एवं धन बरबाद करने की कोई आवश्यकता नहीं। फिर भी घर में बेकार कलह पैदा न होने देने के लाभ को ध्यान में रखते हुए उनमें शामिल हुआ जा सकता है। किन्तु जिनका प्रभाव महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया नहीं उत्पन्न करता उन्हें न मानने में ही भलाई है। मोहग्रस्त वृद्धजन बाल विवाह में कुछ ज्यादा ही रुचि रखते हैं। उन्हें अपने बेटे पोते की शादी देखने की आतुरता लगी रहती है। उनको यह भी मालूम नहीं रहता कि इस जल्दबाजी से इन बच्चों के शरीर, स्वास्थ्य, शिक्षा एवं भविष्य पर क्या असर पड़ेगा ? ऐसे आग्रह को यदि बच्चे खुद ही न मानें तो उसमें कुछ खास बुराई नहीं है। बड़ों का सम्मान करना, उनकी सेवा सहायता करना पारिवारिक सद्व्यवहार है, उसका पालन किया जाना चाहिए। लेकिन उसके आधार पर मजबूरी नहीं उत्पन्न करनी चाहिए कि वे कुछ भी अनर्थकारी आदेश देंगे और उसका पालन होता रहेगा। दहेज जैसी कुरीति पारिवारिक एवं सामाजिक, आर्थिक व नैतिक संतुलन का सत्यानाश कर रही है परन्तु उसे ये परम्परावादी सलाहकार नहीं छोड़ने दे रहे हैं। कानूनी बंधन और सामाजिक असम्मान बढ़ जाने से उन कुरीतियों को अपनाये रहना कठिन रहता। लोग रिश्वतखोरों की तरह चोरी छुपे उस ढर्रे को चलाये जा रहे हैं। ऐसे प्रसंगों में घर के विकासशील लोग अथवा लड़की-लड़के स्वयं इन सलाहकारों की सलाह को ठुकरा देने का साहस जुटायें तो सब तरह से उचित होगा। देखने में हो सकता है यह बड़ों की अवज्ञा जैसी लगे पर अन्याय और व्यापक लोकहित को देखते हुए इसमें अनुचित जैसा कुछ नहीं है।

मित्रों में से कितने ही अपने साथ दुर्व्यसनों में शामिल होने की सलाह देते हैं। आधुनिकता के नाम पर नशेबाजी, महँगे होटलों में फूहड़ नाच-गानों की आवारागर्दी जैसी अनेकों बुराइयाँ प्रायः मित्र मण्डलों की सलाह के दबाव में आकर अपनायी जाती हैं, पीछे वही बुराइयाँ आदतें बनकर जीवन पतन के गर्त में डुबोती रहती हैं। यदि शुरुआत में इसी सलाह को कड़क स्वर में इंकार कर दिया होता तो ही अच्छा। एक दिन की इस रुखाई से आजीवन तरह-तरह की हानियाँ उठाते रहने की विपत्ति तो न खड़ी होगी। होना तो यह चाहिए कि दोस्तों को शुरुआती दौर में सबसे ज्यादा सावधानी इस बात की बरती जानी चाहिए कि दुर्गुणी, कपटी, धूर्त प्रकृति के व्यक्तियों से मित्रता न की जाये क्योंकि ऐसे लोग मित्रता के जाल में फँसा कर शत्रुओं से भी अधिक दुर्गति करते हैं।

इन दिनों यह खतरा कदम कदम पर खड़ा है। सज्जनों को भारी व्यस्तता रहने से उनके पास यार बाजी के लिए समय नहीं है। फालतू आवारा लोग ही मित्र फँसाने के जाल कन्धे पर लादे घूमते रहते हैं। इन लोगों की सलाहों के कुचक्र में फँस कर आये दिन उदीयमान व्यक्तित्व पतन के गर्त में समाते रहते हैं। अतः जहाँ आग्रह मानने में संकोच करने का सवाल है तो अच्छा यही है कि ऐसे अनुपयुक्त व्यक्तियों की मित्रता का हाथ न थामा जाये। इस संदर्भ में उपेक्षा बरतने में ही भलाई है। पहले ही यदि उपेक्षा बरती जा सकी तो बाद में संकोच का सामना न करना पड़ेगा।

अधिक घनिष्ठ संबंधी कहे जाने वालों की सलाह को आँख मूँदकर नहीं स्वीकार करना चाहिए। उनका परामर्श ही माना जाये तो औचित्य की सीमा के अंतर्गत हो भले ही उसमें उनके असंतुष्ट या रुष्ट हो जाने का खतरा ही क्यों न उठाना पड़े।

सलाह किसकी स्वीकार करें ? अपना सच्चा हितैषी कौन है ? इसका निर्णय करते हुए यही तथ्य ध्यान रखा जाना चाहिए कि औचित्य, न्याय एवं विवेक की कसौटी पर कौन से परामर्श खरे उतरते हैं लोकमत और लोकापवाद की चिन्ता भी औचित्य के आधार पर नहीं करनी चाहिए। यदि सही बात मानने के कारण, सही राह चलने के कारण उपहास सहना पड़ रहा है तो उस अवसर पर 'हाथी चलता है और कुत्ते भौंकते हैं' वाली नीति ही अपनायी जानी चाहिए किन्तु किसी दबाव में आकर अनीति नहीं अपनानी चाहिए।

सलाह यदि अपनत्व के आधार पर ही मानी जानी चाहिए तो अपने अपनत्व के आधार के दायरे को थोड़ा बढ़ाया जाना चाहिए। खून के रिश्तों से कहीं अधिक सगे-से-सगे व्यक्ति होते हैं जो स्वार्थ एवं अहं से रहित हैं। जिनकी वृत्तियों में शोषण का कलुष नहीं है। ऐसे विशिष्ट प्रज्ञावान पुरुष अपने सगे संबंधियों से भी अधिक अपने होते हैं। युद्ध विवेकानन्द जैसे ज्ञानीजनों ने अपने समय में अनेकों को अनूठी सलाह देकर तुच्छ से लोगों का भाव विकास कर उन्हें आसमान की बुलंदियों तक पहुँचा दिया। अपने समय में उठे विचार क्राँति का तूफान भी कुछ ऐसा ही है प्रज्ञावतार की सलाह एवं प्रेरणाएँ जिस किसी को भी महामानव बनाने में समर्थ हैं बशर्ते उन्हें पूर्ण हृदय से स्वीकारा जाये। महामानव भले स्थान की दृष्टि से दिवंगत हो चुके हों फिर भी आवश्यकता पड़ने पर उनकी भावभरी याद करते ही उनके उदात्त स्पन्दन अपने हृदय एवं मन में कोई भी कहीं भी महसूस कर सकता है। वह सूक्ष्म प्रवाह न केवल हमें संकट से उबारते हैं बल्कि जीवन को दिशा भी प्रदान करते हैं। रोजमर्रा के कामकाज में अनेकों से वास्ता पड़ता है। धोबी, नाई, डाक्टर, दुकानदारी, मजदूर आदि ऐसे ढेरों है जिनसे काम चलाऊ शिष्टाचार बनाये रखना ही ----------------अपने क्षेत्र में उचित सलाह का ही मूल्याँकन करना चाहिए। लेकिन जहाँ तक जिन्दगी की समस्याओं में उलझाने, सुलझाने वाले परामर्श का मामला है वहाँ पर यह काम सिर्फ प्रामाणिक व्यक्तियों के भरोसे पर ही करना चाहिए। प्रामाणिक वे हैं जिन्होंने अपनी वृत्तियों का परिमार्जन किया है। जिसका हमसे कोई स्वार्थ नहीं है। जिसका हृदय सहज ही हमारे प्रति प्रेम से भरा है। जिसके पास हमें देने के लिए जिन्दगी के अनुभव हैं, अमूल्य विचार हैं, भावभरी संवेदनाएँ हैं। ऐसे व्यक्तियों के परामर्श में जीवन की दिशाधारा को बदल देने की शक्ति होती है। इनकी सलाह हमारे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करती है।

इसलिए सलाह स्वीकार करने में सतर्कता बरतने में ही भलाई है। किसकी किस प्रकार की कितनी सलाह माननी चाहिए और कितनी उपेक्षा करनी चाहिए अथवा असहमति प्रकट करना चाहिए, निर्णय सूक्ष्म दृष्टि, विवेकशीलता और दूरदर्शिता के आधार पर करना चाहिए। जो भी संपर्क में आया उसकी उलटी सीधी सलाह को मानकर प्रभावित हो जाने में भारी खतरा है। ऐसा किया जाये तो समझना चाहिए कि अपनी उथली दुर्बल मनोभूमि के कारण हमें पथभ्रष्ट होने और कुमार्ग की कटीली झाड़ियों में भटकने का संकट सहन करना पड़ेगा

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