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Books - गायत्री महाविद्या की उच्चस्तरीय साधना

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Language: HINDI
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बेटे! मैं यह कह रहा था आपसे कि चमड़े की आँख से नारी को देखने की अपेक्षा ऋतम्भरा प्रज्ञा की आँखों से, दिव्य चक्षु से देखना शुरू कीजिए। हमने आपको अभ्यास कराया था गायत्री माता का फोटो दे करके किं आप इनको माता के रूप में देखिए। बेटे! यह माता नहीं हैं तो क्या है? शिवाजी ने एक मुसलमान महिला को देखा, जो उसके लिए लाई गई थी। उसे देखते ही उन्होंने कहा-यह तो मेरी माँ हो सकती है। यदि ऐसी खूबसूरत हमारी माँ होती तो हम भी इतने खूबसूरत क्यों न होते? उस खूबसूरत औरत में उन्होंने अपनी माँ को देखा और माता को देखकर के विदा कर दिया। विदा करने के बाद में देवी ने प्रसन्न होकर के उनके हाथ में अक्षय तलवार दी और कहा कि यह तलवार अक्षय है। शिवाजी जहाँ चाहे लड़ेगा, इसकी कभी हार नहीं हो सकती। यह कौन सी देवी थी? यह वो देवी थी जिसके नारी के रूप में, एक खूबसूरत महिला के रूप में शिवाजी ने अपनी माता का साक्षात्कार किया और गाण्डीव क्या था? कहाँ से आया था गाण्डीव? वहीं से आया था जहाँ गहराई की दृष्टि से ऋतम्भरा प्रज्ञा मिली थी। नारी को उसने प्रज्ञा से देखा। जब देवताओं की सहायता करने के लिए अर्जुन स्वर्गलोक में गए और स्वर्गलोक में प्रसन्न होकर के देवताओं ने उस लोक की सबसे ज्यादा सुंदर महिला को उनके पास भेजा। उस महिला को देखकर उन्होंने पूछा-क्यों आई है? बेचारी क्या कहती? कहने लायक बात हो तो बताए। देवताओं का उद्देश्य बता करके बेचारी अपने ढंग से कहने लगी। पुराने समय की भाषा अलग थी, उसने कहा-आपके जैसा बच्चा हमारे पेट में हो जाता तो कितना अच्छा होता। उद्देश्य अर्जुन समझ गया। उसने कहा-मेरे दरवाजे से खाली हाथ तो कोई गया नहीं, मैं आपकी भी सहायता करूँगा और आपको मेरे जैसा ही बच्चा पैदा हो जाएगा। लेकिन जो तरीका आप चाहती हैं, वह सही नहीं है। आप क्या हैं? आप मेरी माँ कुंती के समान हैं और मैं आपका बेटा, ठीक है, यह कहकर वह चली गई और उसने जाकर अपने देवताओं को बताया। जब मैं गई तो उसने मेरे चरणों की धूल अपने मस्तक पर लगाई और कहा-आप हमारी माँ और मैं आपका बेटा! हमने उसके मस्तक पर हाथ रखा कि तू हमारा बेटा है। मेरे से वह काम नहीं हो सका, जिसके लिए भेजा गया था। देवताओं ने कहा-ठीक है यदि वह ऐसा शालीन है, ऐसी मजबूत ऋतम्भरा प्रज्ञा वाला है तो हम उसे जरूर अनुदान वरदान देंगे।

यह है अध्यात्म शक्ति, आत्मशक्ति, आत्म चेतना, जिसकी हम उपासना कराते हैं। अर्जुन की उपासना को देखकर देवताओं ने कहा-इसे कोई बड़ा उपहार देना चाहिए कोई बड़ा चमत्कार देना चाहिए कोई बड़ी सिद्धि देनी चाहिए कोई बड़ा वैभव देना चाहिए कोई बड़ा यश देना चाहिए। अर्जुन को देवताओं ने गाण्डीव दिया। देवताओं से गाण्डीव लेकर के आए थे अर्जुन। गाण्डीव किसे कहते हैं? बेटे! बाँस के बने हुए तीर-कमान को कहते हैं। यह गाण्डीव कितना जबरदस्त था कि इसने अकेले ही महाभारत पर विजय प्राप्त कर ली। इतना ही जबरदस्त हो सकता है गाण्डीव। गाण्डीव किसे कहते हैं? तलवार में ताकत होती है। नहीं बेटे! आत्मबल में ताकत होती है। तो क्या कलाई में ताकत होती है? बेटे! कलाई में ताकत होती है। कलाई में दरद हो रहा है या कलाई नहीं होगी तो तलवार क्या काम करेगी? कलाई में दरद हो रहा है तो भी तलवार चला, हमने तुझे २५० रुपए की तलवार दी है। अरे साहब! तलवार कौन उठाएगा, हमारे तो हाथ में दरद होता है। हाँ बेटे। तलवार नहीं चलती, हाथ नहीं चलते, हिम्मत चलती है। पुरानी बंदूकों को देखकर लोग शोर मचाते हैं। बंदूक लिए जो व्यक्ति फिरता है, अगर हाथ में ताकत नहीं है तो चोर आता है और चाँटा मारता है और बंदूक भी छीन ले जाता हैं और कारतूस भी छीन ले जाता है। बंदूक चलती हैं? नहीं बेटे! कलाई चलती है? नहीं हिम्मत चलती है। इसलिए जो कुछ भी दिया होगा, मैं समझता है देवताओं ने अर्जुन को तो क्या दिया होगा? आत्मबल दिया होगा जो दुनिया की सबसे बड़ी सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ा वैभव है। उससे बड़ा कोई वैभव नहीं हो सकता। किस कीमत पर दिया था? गायत्री को माता माना था। स्त्री को माता माना था। ये क्या बात कह रहा हूँ मैं। ऋतम्भरा प्रज्ञा का यह एक नमूना है। नारी के भीतर गहराई में जाइए और उसके भीतर देवी को देखिए। आज की बात समाप्त।

।।ॐ शान्ति:।।
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