नासमझी पर विजय प्राप्त कराने वाली मनःस्थिति है-गायत्री
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बेटे! ऋतम्भरा प्रज्ञा किसको कहते हैं? ऋतम्भरा प्रज्ञा उसे कहते हैं, जो आदमी को उछाल देती है, ऊपर की तरफ। ऊँचे उठे हुए व्यक्ति का दायरा बड़ा हो जाता है और विचार करने का, देखने का और सोचने का स्तर ऊँचा उठ जाता है, तब जबकि ऋतम्भरा प्रज्ञा जग जाती है। ऐसे व्यक्ति के लिए वे सभी वस्तुएँ-चीजें बिलकुल नाचीज हैं, जिनकी जीवन में कुछ खास अहमियत नहीं है। आदमी की दैनिक जीवन की जरूरतें बिलकुल थोड़ी सी हैं, नगण्य हैं। पेट भरने को जरा सा मुट्ठी भर अनाज चाहिए तन ढकने को मुट्ठी भर कपड़ा चाहिए और रहने को जरा सी जगह चाहिए। आदमी की जरूरतें इतनी कम हैं कि छह फुट लंबे आदमी का पेट आसानी से भरा जा सकता है और आदमी खुशी की जिंदगी जी सकता है, पर आदमी जिस बेअक्ली की वजह से, जिस बेवकूफी की वजह से सारी जिंदगी दु:खों में व्यतीत कर देता है कष्टों में व्यतीत कर देता है, चिन्ताओं में व्यतीत कर देता है, वह बेटे, नासमझी हैं। इस नासमझी पर विजय प्राप्त करने वाली जो हमारी मन:स्थिति है, उसका नाम है ऋतम्भरा प्रज्ञा। जीवन का लक्ष्य क्या हो सकता है? जीवन में शांति कहाँ से आ सकती है? जीवन की दबी हुई सामर्थ्यों को हम कैसे विकसित कर सकते हैं? ये हमारी मूर्च्छित सामर्थ्य है शोचनीय सामर्थ्य है, गई गुजरी सामर्थ्य है, लेकिन इससे अत्यधिक महत्त्वपूर्ण जो सामर्थ्य हैं, उनको विकसित करने के लिए क्या करना चाहिए और कैसे करना चाहिए ये समझ और ये अक्ल जहाँ से आती है, उसका नाम ऋतम्भरा प्रज्ञा है।
गायत्री किसका नाम है? ऋतम्भरा प्रज्ञा का। गायत्री किसे कहते हैं? ऋतम्भरा प्रज्ञा को। गायत्री कोई देवी नहीं होती, कोई देवता नहीं होता। ऋतम्भरा प्रज्ञा का ही नाम गायत्री है। वास्तव में अगर यही ऋतम्भरा प्रज्ञा हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाए तो हमको मालदार कर सकती है, सावित्री और सत्यवान के तरीके से। अगर वही गायत्री जिसको हमने ऋतम्भरा प्रज्ञा के नाम से कहा है, हम पर प्रसन्न हो जाए तो हमको गुरु वसिष्ठ बना सकती है, विश्वामित्र बना सकती है और हम विश्वामित्र के तरीके से राजपाट को भी ठोकर मार दें और ऋतम्भरा प्रज्ञा को प्राप्त करने के लिए कोशिश करें। ऋतम्भरा प्रज्ञा अर्थात गायत्री को प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना होगा या क्या करना चाहिए? पुराणों की कहानियाँ जिसको आपने सब कुछ मान लिया है। जिसको आपने जाने क्या मान लिया है, जाने क्यों मान लिया है? ऋतम्भरा प्रज्ञा गायत्री मंत्र की शक्ल और सूरत हमको बताइए कि गायत्री माता किसे कहते हैं? गायत्री माता उसे कहते हैं बेटे, जो एक जवान महिला है। जवान महिला के दो पैर हैं। एक भौतिक पहलू और दूसरा आध्यात्मिक पहलू। भौतिक पहलू यह होता है कि इसकी नाक कैसी है? कान कैसे हैं? मुँह कैसा है? दाँत कैसे हैं? ये किस काम आ सकता है? यह रूप और सौंदर्य के देखने में काम आ सकता है? कामवासना के सेवन करने में आता है। हँसी मजाक करने के काम आता है। ये कलेवर, कलेवर हैं। कलेवर स्थूल हैं, लेकिन नारी की जो छवि, गायत्री माता की छवि के रूप में हमने आपको बताई थी, उसके अंदर एक और विशेषता है। नारी के भीतर नारी का प्राण है। नारी का प्राण क्या है? नारी किसे कहते हैं? देवता कभी देखे हैं आपने? नहीं साहब, देवता हमने नहीं देखे। सपने में देखे हैं, अच्छा आइए हम आपको देवता दिखा सकते हैं। दिखाइए? अच्छा तो हम आपको पहले देवी दिखा दें तो फिर ऐतराज तो नहीं है आपको, नहीं साहब? देवी नहीं दिखा सकते हैं, तो आप भले ही देवता दिखा दीजिए। पहले आप दिखा दीजिए कुछ भी।
चलिए हम आपको पहले दिखाते हैं एक महिला की तसवीर, हम आपके सामने पेश करते हैं एक महिला को, देवी के रूप में। देवी के रूप में जब हम देखते हैं, किसी स्त्री के भीतर प्रवेश करते हैं, उसकी अंतरात्मा में झाँकते हैं तो उसके अंदर साक्षात देवी का दर्शन होता है। समर्पण की देवी, प्रेम की देवी, स्नेह की देवी, बलिदान की देवी, जिसने अपनी सारी जिंदगी, सारी महत्त्वाकांक्षाओं को समाप्त किया, कोई विवाह करके आई, समर्पित जीवन लेकर आई। पति के आगे उसने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उसने कहा-आप जैसा हुक्म करेंगे, वैसा हम करेंगे। जो आप खिलाएँगे वह हम खाएँगे, आप जो काम करने के लिए कहेंगे, वह हम करेंगे। बेपैसे के गुलाम होकर के हम रहेंगे। जैसे भी आप रखें हम रह लेंगे, गाली देंगे आप तो भी हम बरदाश्त करेंगे। हम आपके इशारे पर आपकी छाया के तरीके से रहेंगे। समर्पण कौन कर सकता है? समर्पण बेटा बहुत मुश्किल है। गीता में भगवान कह गए है-मन आधत्स्व मयि बुद्धि निवेशय ।निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय:।
उन्होंने कहा-अरे! मूर्खों अपनी अक्ल तो हमको दे दो। अपनी इच्छाएँ हमको दे दो। अपना सामान हमको दे दो। लेकिन उनकी बात को मंजूर नहीं किया। हर एक ने कहा-हम आपको अक्षत चढ़ा सकते हैं, चंदन चढ़ा सकते हैं और आपकी आरती उतार सकते हैं लेकिन देने के लिए अँगूठा है। हम भी यही कहते और करते रहे, लेकिन हमारी देवी ने समर्पण करके दिखा दिया। बेटे देवी है इसके भीतर। कौन सी देवी है? समर्पण जिसका उद्देश्य है। समर्पण जिसका स्वभाव, समर्पण जिसकी प्रकृति है।
मित्रो! देवी है वह। कौन? जिसने एक नन्हे से भ्रूण-कलल को अपने कलेजे में छिपाकर रखा और नौ महीने तक अपना रक्त और अपना माँस और अपनी हड्डियाँ निचोड़कर के खिलाती रही और पिलाती रही और अपने शरीर में से छह पौंड का-साढ़े सात पौंड का एक बच्चा पैदा कर दिया। साढ़े छह पौंड खून आप दीजिए हमको। नहीं महाराज जी, हम तो नहीं दे सकते। बेटे? हमारे शरीर में खून की कमी है और डॉक्टर ने कहा है कि इसमें आधा पौंड खून चढ़ा दे गुरुजी के तो हम मोटे हो जाएँगे। अपना खून दे जा। नहीं महाराज जी, हम तो नहीं दे सकते। आधा पौंड भी नहीं दे सकता। लेकिन बेटे, साढ़े छह पौंड रक्त और माँस और हड्डियों में से हड्डियाँ निकाल करके उसने दी जब बच्चा पैदा हुआ। बच्चा पैदा होने के समय में कितनी मुसीबतें उठाई और पैदा होने के पश्चात् अपनी छाती का दूध लाल रंग के खून को सफेद रंग के दूध में बदलकर के पिलाती रही बच्चे को। रात को वह टट्टी करता रहा, पेशाब करता रहा, चिल्लाता रहा, नींद हराम करता रहा। सारी रात माँ गीले में सोती रही और उसे सूखे में सुलाती रही। किसी ने कहा-ये बड़ा अभागा बच्चा है, क्यों पैदा हो गया। वह कहती रही यह तो हमारा भाग्य है, जो हमारी गोदी में बच्चा आ गया। बेटे इसे कह सकता हूँ। यह देवी है। नारी का अर्थ है देवी। अगर आप गहराई में प्रवेश करें तब, और अगर बाहर से देखें तो नारी का अर्थ है भोग्या। उसके कान को देखिए अलग अलग स्थान को देखिए कामुकता के हिसाब से देखिए वासना के हिसाब से देखिए तो वह भोग्या है। लेकिन अगर आप गहराई में जाएँ तो वह देवी है।
गायत्री किसका नाम है? ऋतम्भरा प्रज्ञा का। गायत्री किसे कहते हैं? ऋतम्भरा प्रज्ञा को। गायत्री कोई देवी नहीं होती, कोई देवता नहीं होता। ऋतम्भरा प्रज्ञा का ही नाम गायत्री है। वास्तव में अगर यही ऋतम्भरा प्रज्ञा हमारे ऊपर प्रसन्न हो जाए तो हमको मालदार कर सकती है, सावित्री और सत्यवान के तरीके से। अगर वही गायत्री जिसको हमने ऋतम्भरा प्रज्ञा के नाम से कहा है, हम पर प्रसन्न हो जाए तो हमको गुरु वसिष्ठ बना सकती है, विश्वामित्र बना सकती है और हम विश्वामित्र के तरीके से राजपाट को भी ठोकर मार दें और ऋतम्भरा प्रज्ञा को प्राप्त करने के लिए कोशिश करें। ऋतम्भरा प्रज्ञा अर्थात गायत्री को प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना होगा या क्या करना चाहिए? पुराणों की कहानियाँ जिसको आपने सब कुछ मान लिया है। जिसको आपने जाने क्या मान लिया है, जाने क्यों मान लिया है? ऋतम्भरा प्रज्ञा गायत्री मंत्र की शक्ल और सूरत हमको बताइए कि गायत्री माता किसे कहते हैं? गायत्री माता उसे कहते हैं बेटे, जो एक जवान महिला है। जवान महिला के दो पैर हैं। एक भौतिक पहलू और दूसरा आध्यात्मिक पहलू। भौतिक पहलू यह होता है कि इसकी नाक कैसी है? कान कैसे हैं? मुँह कैसा है? दाँत कैसे हैं? ये किस काम आ सकता है? यह रूप और सौंदर्य के देखने में काम आ सकता है? कामवासना के सेवन करने में आता है। हँसी मजाक करने के काम आता है। ये कलेवर, कलेवर हैं। कलेवर स्थूल हैं, लेकिन नारी की जो छवि, गायत्री माता की छवि के रूप में हमने आपको बताई थी, उसके अंदर एक और विशेषता है। नारी के भीतर नारी का प्राण है। नारी का प्राण क्या है? नारी किसे कहते हैं? देवता कभी देखे हैं आपने? नहीं साहब, देवता हमने नहीं देखे। सपने में देखे हैं, अच्छा आइए हम आपको देवता दिखा सकते हैं। दिखाइए? अच्छा तो हम आपको पहले देवी दिखा दें तो फिर ऐतराज तो नहीं है आपको, नहीं साहब? देवी नहीं दिखा सकते हैं, तो आप भले ही देवता दिखा दीजिए। पहले आप दिखा दीजिए कुछ भी।
चलिए हम आपको पहले दिखाते हैं एक महिला की तसवीर, हम आपके सामने पेश करते हैं एक महिला को, देवी के रूप में। देवी के रूप में जब हम देखते हैं, किसी स्त्री के भीतर प्रवेश करते हैं, उसकी अंतरात्मा में झाँकते हैं तो उसके अंदर साक्षात देवी का दर्शन होता है। समर्पण की देवी, प्रेम की देवी, स्नेह की देवी, बलिदान की देवी, जिसने अपनी सारी जिंदगी, सारी महत्त्वाकांक्षाओं को समाप्त किया, कोई विवाह करके आई, समर्पित जीवन लेकर आई। पति के आगे उसने अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया। उसने कहा-आप जैसा हुक्म करेंगे, वैसा हम करेंगे। जो आप खिलाएँगे वह हम खाएँगे, आप जो काम करने के लिए कहेंगे, वह हम करेंगे। बेपैसे के गुलाम होकर के हम रहेंगे। जैसे भी आप रखें हम रह लेंगे, गाली देंगे आप तो भी हम बरदाश्त करेंगे। हम आपके इशारे पर आपकी छाया के तरीके से रहेंगे। समर्पण कौन कर सकता है? समर्पण बेटा बहुत मुश्किल है। गीता में भगवान कह गए है-मन आधत्स्व मयि बुद्धि निवेशय ।निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय:।
उन्होंने कहा-अरे! मूर्खों अपनी अक्ल तो हमको दे दो। अपनी इच्छाएँ हमको दे दो। अपना सामान हमको दे दो। लेकिन उनकी बात को मंजूर नहीं किया। हर एक ने कहा-हम आपको अक्षत चढ़ा सकते हैं, चंदन चढ़ा सकते हैं और आपकी आरती उतार सकते हैं लेकिन देने के लिए अँगूठा है। हम भी यही कहते और करते रहे, लेकिन हमारी देवी ने समर्पण करके दिखा दिया। बेटे देवी है इसके भीतर। कौन सी देवी है? समर्पण जिसका उद्देश्य है। समर्पण जिसका स्वभाव, समर्पण जिसकी प्रकृति है।
मित्रो! देवी है वह। कौन? जिसने एक नन्हे से भ्रूण-कलल को अपने कलेजे में छिपाकर रखा और नौ महीने तक अपना रक्त और अपना माँस और अपनी हड्डियाँ निचोड़कर के खिलाती रही और पिलाती रही और अपने शरीर में से छह पौंड का-साढ़े सात पौंड का एक बच्चा पैदा कर दिया। साढ़े छह पौंड खून आप दीजिए हमको। नहीं महाराज जी, हम तो नहीं दे सकते। बेटे? हमारे शरीर में खून की कमी है और डॉक्टर ने कहा है कि इसमें आधा पौंड खून चढ़ा दे गुरुजी के तो हम मोटे हो जाएँगे। अपना खून दे जा। नहीं महाराज जी, हम तो नहीं दे सकते। आधा पौंड भी नहीं दे सकता। लेकिन बेटे, साढ़े छह पौंड रक्त और माँस और हड्डियों में से हड्डियाँ निकाल करके उसने दी जब बच्चा पैदा हुआ। बच्चा पैदा होने के समय में कितनी मुसीबतें उठाई और पैदा होने के पश्चात् अपनी छाती का दूध लाल रंग के खून को सफेद रंग के दूध में बदलकर के पिलाती रही बच्चे को। रात को वह टट्टी करता रहा, पेशाब करता रहा, चिल्लाता रहा, नींद हराम करता रहा। सारी रात माँ गीले में सोती रही और उसे सूखे में सुलाती रही। किसी ने कहा-ये बड़ा अभागा बच्चा है, क्यों पैदा हो गया। वह कहती रही यह तो हमारा भाग्य है, जो हमारी गोदी में बच्चा आ गया। बेटे इसे कह सकता हूँ। यह देवी है। नारी का अर्थ है देवी। अगर आप गहराई में प्रवेश करें तब, और अगर बाहर से देखें तो नारी का अर्थ है भोग्या। उसके कान को देखिए अलग अलग स्थान को देखिए कामुकता के हिसाब से देखिए वासना के हिसाब से देखिए तो वह भोग्या है। लेकिन अगर आप गहराई में जाएँ तो वह देवी है।

