दर्शन का मर्म समझें
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
वस्तुतः दर्शन करने, सुनने की चीज नहीं। असल में जो फायदा उठाना चाहते हैं, वह किससे मिल सकता है? जीवात्मा के आशीर्वाद से। शरीर का कोई आशीर्वाद नहीं है। हमारा आशीर्वाद हमारी भावनाओं में जुड़ा हुआ है, हमारे स्नेह में जुड़ा हुआ है, हमारे सिद्धांतों में जुड़ा हुआ है, हमारे मन में जुड़ा हुआ है। अगर स्नेह के साथ में तुम्हें कोई आशीर्वाद दे या परामर्श दे तो उसका कोई असर शरीर पर पड़ेगा क्या? शरीर पर कोई असर नहीं पड़ सकता। गायत्री उपासना-गायत्री साधना के क्रियापरक कर्मकाण्ड की तुलना शरीर के कलेवर से की जा सकती है। शरीर और चेतना दो भिन्न चीजें हैं। इससे शरीर का लाभ है क्या? शरीर का भी लाभ है। हम क्या सेवा कर सकते हैं हाथ से? हम आपके लिए पानी पिला सकते हैं, तेल मालिश कर सकते हैं, हजामत बना सकते हैं। और क्या कर सकते हैं? पैर दाब सकते हैं, हाथ-पाँव से यही सेवा कर सकते हैं, लेकिन हम अपने ज्ञान के द्वारा आपका कायाकल्प कर सकते हैं और अपनी ज्ञान की भावनाओं के द्वारा कोई आशीर्वाद देना चाहें तो आपके जीवन का विकास कर सकते हैं। शरीर की अपेक्षा प्राण बहुत बलवान है। शरीर हमारा वैसे भी कमजोर है, छोटा है लेकिन प्राण की शक्ति असीमित है। इसी तरह गायत्री उपासना का कर्मकाण्डपरक क्रियाकृत्य भी है। गायत्री साधना का यह कर्मकाण्ड आप लोगों ने बहुत समय से सीखा है और जाना है। एक खास बात मैं समझता हूँ कि इतना लाभ तो जरूर हुआ होगा कि मन की एकाग्रता हुई होगी। गायत्री उपासना आप बहुत दिनों से करते रहे हैं फिर क्या लाभ हुआ? अपनी दिशाएँ अस्वस्थ हों तो प्रगति रुक गई होगी उससे। और क्या लाभ हुआ होगा और कोई खास लाभ तो नहीं हुआ होगा, क्योंकि आपकी उपासना क्रिया-कलाप तक सीमित थी, कलेवर तक सीमित थी। यह भजन था उसका, कलेवर था, शरीर था जो कि बहुत दिनों से आपको हम सिखाते हुए चले आ रहे थे। उसमें क्रियाएँ करनी होती थीं। किससे? शरीर से, अब तक आपने कलेवर सीखा होगा। उसमें क्रियाएँ करनी पड़ती थीं।

