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Books - गृहस्थ जीवन एक तपोवन

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Language: HINDI
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विवाह वयस्क होने पर ही हो

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विवाह किस आयु में करें इस सन्दर्भ में विचार करने से पूर्व यह देखना होगा कि मनुष्य को स्वाभिमान और सही तरीके से जीना है तो उसे किन मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करनी चाहिए। स्वास्थ्य सबसे पहली आवश्यकता है। उसी के आधार पर चैन से जिया जा सकता है। साथियों को चैन से रहने दिया जा सकता है। स्वस्थ मनुष्य श्रम करता और आजीविका उपार्जित करता है। स्वावलम्बन उसी के लिए संभव है जो निरोग है। जो शरीर से स्वस्थ हृष्ट पुष्ट है पूरी आयु भी उसको मिलती है। अपने बच्चों का शुभचिन्तक होने की बात को प्रमाण देकर सिद्ध करना पड़ता है। अन्यथा शत्रुता निभाने वाला भी अपने को शुभचिंतक कह सकता है।

पुत्री के शुभचिन्तक वे ही माने जा सकते हैं जो उसे स्वस्थ, शिक्षित स्वावलम्बी और सद्गुणी बनाने के लिए समुचित परिश्रम करें। आहार विहार के औचित्य के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि बच्चों का ब्रह्मचर्य परिपक्व होने तक सुरक्षित रहे। कच्ची आयु में छेड़छाड़ करने से शरीर ऐसा हो जाता है जैसा रस निचुड़ जाने के उपरान्त बचा हुआ नीबू का छिलका। यह तथ्य लड़की और लड़के दोनों पर समान रूप से लागू होता है। नटखट लड़के पेड़ों का गोंद निकालने के लिए उनमें खोदकर गड्ढे बना देते हैं। गोंद निकलने लगता है और पेड़ सूखने मुरझाने लगता है। बाल विवाह के उपरान्त आम तौर से वर वधू काम-क्रीड़ा करने लगते हैं। अपरिपक्व शरीरों से ऐसी छेड़छाड़ उन्हें कमजोर बनाती है। जीवनी शक्ति घटाती है। कोई बड़ा पुरुषार्थ करने योग्य, परीक्षा में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने योग्य नहीं रहने देती। विवाह का अर्थ ही काम क्रीड़ा की छूट माना जाता है। अल्प वयस्क वर वधू वैसा आचरण करने लगें तो उन्हें कोई रोकेगा नहीं वरन् बराबर वाले तथा मजाक कर सकने के रिश्ते वाले उन्हें इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं। उपेक्षा दिखाने पर भर्त्सना करते हैं।

लड़कियों की यह विशेषता है कि वे छोटी आयु में बहुत जल्दी गर्भिणी हो जाती हैं। अमेरिका में सहशिक्षा का प्रचलन है। वहां लड़की लड़के यौनाचार को भी बहुत बुरा नहीं मानते। फलस्वरूप 14 से लेकर 17 वर्ष की आयु में एक तिहाई छात्रायें गर्भवती हो जाती हैं। यह नियम सर्वत्र लागू होता है। अपने देश में भी। बाल विवाह वाली लड़कियां 16 वर्ष से पहले ही गर्भवती हो जाती हैं। जब कि शारीरिक दृष्टि से परिपक्व होने की उनकी न्यूनतम आयु 18 वर्ष है। ऐसी लड़कियों की वृद्धि रुक ही जाती है। उनके रक्त मांस में से ही एक नया प्राणी बनना शुरू हो जाता है। इसका तात्पर्य है कि जो कुछ उस समय तक कमाया था उसका महत्व पूर्ण भाव छिन जाना।

प्रसव-पीड़ा में कोमल अंग क्षत-विक्षत हो जाते हैं। फलतः आजीवन उन्हें जननेन्द्रिय सम्बन्धी बीमारियों का शिकार रहना पड़ता है। साथ ही अपच, सिरदर्द, रक्ताल्पता जैसे रोग घेर लेते हैं। जो काम करते हैं वह अशक्ति के रहते जिस तिस प्रकार हो पाता है। दूध कम निकलने से ऐसे बच्चों की मृत्यु भी अधिक होती है और बच्चे मरते ही नया गर्भ फिर पेट में आ जाता है। देखा गया है कि बीस वर्ष पहुंचते-पहुंचते कई लड़कियां तीन चार बच्चों की माता बन चुकी होती हैं। इससे बच्चे दुबले पतले रहते ही हैं माता का भी कचूमर निकल जाता है। वे भरी जवानी में बुढ़ापे के लक्षणों से घिर जाती हैं। बीमारियों से घिरी रहती हैं और कराहते घिसटते ज्यों त्यों करके समय बिताती हैं। अकाल मृत्यु मरती भी हैं। कितनी ही तो प्रसव पीड़ा में ही दम तोड़ देती हैं। वह बाल विवाह का ही दुष्परिणाम है जिसे सम्पन्न करते हुए अभिभावक मोद मनाते हैं। सच पूछा जाय तो इस प्रकार की सिसकती मौत के मुंह में धकेल देने की जिम्मेदारी उन्हीं की है। जिसे वे न जानते हैं और न मानते हैं।

शिक्षा के लिए भी तो समय चाहिए। मैट्रिक को यदि शिक्षा का मध्यवर्ती स्तर माना जाए तो वहां तक पहुंचने के लिए शहरी लड़कियों को न्यूनतम 16 और ग्रामीण लड़कियों को अठारह वर्ष लगने चाहिए। शिक्षा की उपयोगिता स्वास्थ्य से कम नहीं। मानसिक विकास के लिए पढ़ना लिखना आवश्यक है। अशिक्षित महिलायें न बच्चों को सुयोग्य बना सकती हैं और न जीवन विकास के लिए आवश्यक विषयों से परिचित हो पाती हैं। अशिक्षित को कूप मण्डूक की अन्धे की उपमा दी जाती है जो बहुत हद तक ठीक भी है। वे बाजारू खरीद फरोख्त, व्यापार, नौकर, राजकीय झगड़े, झंझट आदि हर महत्वपूर्ण कार्य में अपने को असहाय असमर्थ पाती हैं।

शिक्षा का स्वावलम्बन से भी गहरा सम्बन्ध है। ऊंची नौकरी के लिए शिक्षा होना अनिवार्य है अन्यथा शारीरिक श्रम की ही कोई मजदूरी करके तंगी के दिनों में परिवार का पोषण करना पड़ता है। कई बार तो घर से बाहर जाने का प्रतिबन्ध इस प्रकार की आजीविका कमाने में भी बाधक बन जाता है। पर शिक्षित महिलायें इस प्रकार के बन्धनों को स्वीकार नहीं करतीं और घर बाहर जहां भी रोजी रोटी की गुंजाइश मिलती है उससे अपने घर परिवार की आर्थिक सहायता करती हैं किन्तु जिन लड़कियों को छोटी आयु में ही बाल-विवाह के शिकंजे में कस दिया गया उनके लिए न तो स्वस्थ रहना संभव है न शिक्षित बनने के लिए आवश्यक समय मिलना। छोटी उम्र में तो चिट्ठी पत्री लिखना जितना ही पढ़ पाती हैं। ससुराल में पढ़ने का प्रयत्न करने पर उन्हें दुत्कारा जाता है। पढ़ना तो बाप के घर ही संभव है। ससुराल में तो दिनभर काम करना पड़ता है फिर जिस घर में अशिक्षा का साम्राज्य है वहां नई वधु को पढ़ने में छूट देने में अन्य महिलाओं की हेठी जो होती है।

पिछले दिनों अभिभावक, अध्यापक बच्चों को उन विषयों की शिक्षा देते थे जो उनके व्यक्तित्व को विकसित करें। शालीनता, सुसंस्कारिता की सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूपरेखा बतायें। सद्गुणों का महत्व माहात्म्य समझायें और सुसंस्कारों के आधार पर उपलब्ध होने वाली गरिमा को हृदयंगम करायें। वस्तुतः उसी को शिक्षा कहा जा सकता है जिसके आधार पर चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार को शालीनता से सम्पन्न किया जा सके। यह व्यक्तिगत परामर्श और अभ्यास का विषय है। इसके लिए प्रश्नोत्तर शैली पर समस्याओं का समाधान किया जाता है। इस प्रकार व्यावहारिक अभ्यास करने का अवसर दिया जाता है जिससे व्यक्ति, व्यवहार में सभ्य और दृष्टिकोण में सुसंस्कृत बन सकें। यही शिक्षा का मूलभूत आधार भी है। सामान्य ज्ञान की विभिन्न विषयों की पुस्तकें पढ़ कर भी समझा जा सकता है। जो जीवन व्यवहार में समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी का समावेश कर सके उसी को सद्ज्ञान कहा जाता है। यह सब आवश्यक तो लड़के के लिए भी है पर लड़कियों के लिए तो अनिवार्य ही है क्योंकि उन्हें पितृ गृह में स्नेह और ससुराल में सम्मान इसी आधार पर उपलब्ध होता है। सर्वत्र गुणों की ही पूजा होती है। किसी का समुन्नत बनना, प्रगति पथ पर अग्रसर होना इसी बात पर निर्भर है कि उसे संस्कारिता को समझने, अपनाने और व्यवहार में उतारने का कितना अवसर मिला। प्राचीन काल में भारत की नारियां इसीलिए देवी की उपमा से विभूषित होती थीं कि उनके व्यक्तित्व में देवत्व का—वर्चस्व का अनुपात असाधारण मात्रा में भरा रहता था। इसके लिए उन्हें लम्बे समय तक सिखाया और अभ्यास कराया जाता था। ऐसी लड़कियां जिस घर में जाती थीं, वे घर की रानी बन कर रहती थीं। गृहलक्ष्मी कहलाती थीं। यह सब अनायास ही नहीं हो जाता था पर इसके लिए उन्हें बचपन और किशोरावस्था को पूरी तरह अभ्यास के लिए नियत निर्धारित रखना पड़ता था। समय भी काफी लगता था। इस परीक्षा में खरे सोने की तरह उत्तीर्ण होने के उपरान्त ही उनके विवाह की चर्चा चलती थी। ऐसा घर वर ढूंढ़ा जाता था जहां रूप श्रृंगार को नहीं सद्गुणों को पहचाना, ढूंढ़ा और सम्मानित किया जाय।

किन्तु आज की स्थिति ही बदल गई। बचपन से ही विवाह होने लगे। ऐसी दशा में उन्हें स्वास्थ्य रक्षा, शिक्षा संचय तक का जब अवसर नहीं तो फिर सुसंस्कारिता के अभिवर्धन अभ्यास के लिए समय कहां से मिले। गुड़ियों से खेलने और झूले पर झूलने वाली बच्चियों को जब विवाह के बन्धन में हाथ पैर बांधकर कर दिया जाता है तो वे अपने आप को दीन, हीन, असहाय, असमर्थ के अतिरिक्त और क्या कुछ अनुभव कर सकती हैं।

लड़कों के लिए यह गुंजाइश है कि घर में अथवा समाज में जहां कहीं रहें वहां से जानकारियां बढ़ाते रहें, अनुभव सम्पादित करते चलें, इस प्रकार उनके ज्ञान भण्डार में बढ़ोत्तरी होती रहे, किन्तु विवाह के उपरान्त लड़कियों के लिए सभी मार्ग बन्द हो जाते हैं। वे पितृगृह से ससुराल और ससुराल से पितृगृह आती जाती रहती हैं। बहुत हुआ तो किसी विवाहोत्सव मेले ठेले या तीर्थयात्रा में चली गईं। इससे स्थान बदलने का पर्यटन मनोरंजन तो हो जाता है पर ऐसा नहीं होता कि वहां से कुछ ऐसा ज्ञान सम्पादन करके अपने उस ज्ञान भण्डार को बढ़ा सकें। ऐसा ज्ञान भण्डार जो उनके व्यक्तित्व विकास या पारिवारिक उत्कर्ष के काम आये। इसका तात्पर्य यह हुआ कि बचपन में विवाह से पहले जो कुछ उनने सीखा था उसी पूंजी पर उन्हें सारी जिन्दगी काटनी पड़ेगी।

स्वास्थ्य जो माता-पिता के घर से आया था उसकी आयु के हिसाब से स्थूलता भले ही बढ़ जाय पर मौलिक जीवनी शक्ति में घटोत्तरी ही होती चलती है। मासिक धर्म के हिसाब से प्रकृति निचोड़ती है। स्तनपान के हिसाब से बच्चे उन्हें चूसते हैं। गर्भ में उन्हीं का रक्त मांस कट कर नया लोथरा बनता है। प्रसव पीड़ा को तो किसी भयंकर मेजर आपरेशन के समतुल्य ही समझा जाना चाहिए जिसमें जब तक अनी नहीं टल जाती, जननी को शूली पर ही चढ़े रहना पड़ता है। इन विपत्तियों में से मात्र मासिक धर्म ही एक प्रकृति प्रदत्त है। शेष सभी तो विवाह के उपहार हैं। जिनके ऊपर नारी शरीर की तिल-तिल करके बलि चढ़ती रहती है। उस अग्नि परीक्षा में लड़की को वयस्क होने से पहले ही गुड़ियों से खेलने की उम्र में ही झोंक देना परिणाम की दृष्टि से विशुद्ध अत्याचार है। लोकाचार की दृष्टि से उसे कुछ भी क्यों न कहा जाय।

यदि अभिभावक उतनी उतावली न बरतें और लड़की को कूड़ा कचरा समझकर किसी दूसरे के घर में फेंक देने की निष्ठुरता न बरतें तो यह हो सकता है कि लड़कों की तरह लड़कियां भी किशोरावस्था को माता पिता के घर रहकर ही पूरी करलें। इस अवधि को पति की चरणदासी, ससुराल की बेगारिन बनने की अपेक्षा यदि उस विकास के लिए नियत निर्धारित अवधि को स्वास्थ्य सम्पादन, शिक्षा संचय, व्यक्तित्व को प्रतिभावान बनाने में लगने दिया जाय तो इससे कोई गाज नहीं टूट गिरेगी। विवाह में जो पैसा खर्चा गया था उसे यदि बैंक में जमा कर दिया जाय—व्यापार में लगा दिया जाय तो उसके ब्याज मुनाफे से ही इतना मिलता रह सकता है कि लड़की पितृगृह में रहकर ही अपने भविष्य की दृढ़ता और सुनिश्चितता का संचय करती रहे।

मनुष्य शरीर के साथ यदि मनुष्य हृदय भी मिला हो तो बच्चे-बच्चे के बीच अन्तर करने की कोई गुंजाइश नहीं है। भले ही वह लड़का हो या लड़की। सृष्टि क्रम के दोनों ही अविभाज्य अंग हैं। दोनों का ही समान महत्व है। सच पूछा जाय तो लड़की की उपयोगिता, आवश्यकता एवं महत्व लड़कों से कहीं अधिक बढ़कर है। वह जननी है, उसी के अनुग्रह और बलिदान से मानवी वंश चल रहा है। यदि वह अपने अनुग्रह की मुट्ठी सिकोड़ ले तो जीवित पीढ़ी का सौ वर्ष से भी कम समय में उजाड़ हो जायगा। धर्मपत्नी के रूप में वही घर बसाती है। यदि वह किसी की चरणदासी या बेगारिन बनने से इनकार कर दे और स्वावलम्बी स्वतंत्र जीवन जीने का निश्चय कर ले तो समझना चाहिए कि परिवार नाम की धरती पर स्वर्ग का आनन्द देने वाली संस्था के बनने बसने का कोई आधार न रहेगा। घर के चलते-फिरते खिलौनों में लड़के तो नटखट भी पाये जाते हैं, पर लड़कियां तो मृदुलता की मूर्तिमान प्रतिमा होती हैं। बहिन भाई का प्यार अपने ढंग की अनोखी, पवित्रता और घनिष्ठता लिए होता है। इन विशेषताओं के कारण दार्शनिकों और भाव विश्लेषकों ने नारी को गृहदेवी की उपमा दी है। वह स्वर्ग की अप्सराओं से, वन देवियों से, किन्नरियों और यक्षिणियों से किसी प्रकार कम नहीं है। पुरुष पराक्रम की दृष्टि से अपने आप को बढ़−चढ़ कर इसलिए बड़ा कह सकता है कि नारी ने प्रजनन का कठोर कर्त्तव्य अपने कंधों पर लेकर शारीरिक दृष्टि से दुर्बलता ओढ़ने की स्वीकृति दे दी है। इसी उदारता को विवशता मानकर पुरुष का दर्प फूला है। यदि नारी उस विवशता को अस्वीकृत कर दे तो वह किसी भी दृष्टि से किसी भी क्षेत्र में पुरुष से पीछे नहीं हो सकती। उसे पति परमेश्वर कहलाने की, अन्नदाता बनने की डींग हांकने की कहीं कोई गुंजायश न रहेगी।

इसे विडम्बना ही कहना चाहिए कि लड़कियों को कूड़ा कचरा और लड़कों को हीरा मोती समझा जाता है। हर व्यवहार में उनके बीच अन्तर रखा जाता है। भोजन, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा, मनोरंजन आदि में लड़की के लिए निरन्तर कटौती होती रहती है और लड़कों के ऊपर उदारता के मणिमुक्तक बरसाये जाते रहते हैं। लड़के से आशा की जाती है कि वह वंश चलाएगा, परलोक में पिण्डदान पहुंचायेगा। बुढ़ापे में सहारा देने वाली लकड़ी बनेगा। ये सभी बातें अनगढ़ कल्पनायें मात्र हैं। लड़का जो प्राप्त करता है उसका सौ वां अंश भी नहीं लौटाता। जब कि लड़की श्रद्धा और सद्भावना तो बनाये ही रहती है। उसे यदि पुत्र मानकर चला जाय तो जो आशायें लड़के से की गई थीं उन्हें वह कहीं अच्छी तरह पूरा कर सकती है।

बाल विवाह में लड़की की अवज्ञा के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है। जिस दिन समता का प्रकाश होगा उस दिन इस अन्धकार भरे प्रचलन का भी अस्तित्व न रहेगा।

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गृहस्थ जीवन एक तपोवन
Type: TEXT
Language: HINDI
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