दाम्पत्य जीवन आदर्शों पर आधारित रहे
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विवाहित जीवन बिताना एक बड़ा उत्तरदायित्व है। इसे उन्हीं को वहन करना चाहिए जो वर-वधू अपने को इस योग्य समझते हों। साथी पर भार बनने की अपेक्षा उसे ऊंचा उठाने, आगे बढ़ाने, आवश्यक सहयोग, सहायता कर सकने में अपने को उपयुक्त समझते हों। जो अपना जिन का भार नहीं उठा सकते उन्हें दूसरे को सुखी समुन्नत बनाने की जिम्मेदारी अपने सिर पर नहीं लेनी चाहिए। अच्छा हो असमर्थ पक्ष स्वेच्छा पूर्वक अविवाहित रहे। उसके स्वजन संबंधी भी ऐसा ही परामर्श दें। असमर्थों को उकसाया-भड़काया न जाय, यह अनिवार्य न माना जाय कि हर किसी का विवाह होना ही चाहिए, सेना में भर्ती होने वाले सैनिकों की हर प्रकार जांच पड़ताल कर ली जाती है। ठीक इसी प्रकार जिनको विवाह का उत्तरदायित्व वहन करना है, उन्हें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से इतना समर्थ होना चाहिए कि अपना निज का भार तो स्वयं वहन कर ही सकें। साथ ही साथी के लिए आवश्यक सुविधाएं भी जुटा सकें। जिन्हें पीढ़ियों तक चलने वाला रोग किसी प्रकार लग गया हो उन्हें विवाह का विचार ही छोड़ देना चाहिए। इसे अनिवार्य विषय न बनाया जाय। ऐच्छिक ही रखा जाय। जो इच्छुक हैं उनकी भी जांच पड़ताल कर ली जाय कि वे इस भार वहन में समर्थ हैं भी या नहीं।
दोनों पक्षों पर यह उत्तरदायित्व आता है कि साथी की योग्यता, समर्थता, प्रतिभा बढ़ाने में योगदान करें। कन्या दान का तात्पर्य ही यह है कि पिता अपनी भरण-पोषण से लेकर योग्यता बढ़ाने तक की सभी जिम्मेदारियां वर के कंधे पर स्थानान्तरण करता है। इस कार्य में ससुराल वालों को भी पूरा सहयोग करना चाहिए। पिता के घर कन्या जैसा स्वास्थ्य और जितनी शिक्षा प्रतिभा साथ लेकर आई थी उसमें काफी समय तक अभिवृद्धि होनी चाहिए। सोचा तो यह भी जा सकता है कि पिता ने कन्या का जितना विकास किया उतना ही ससुराल वालों को करके अपनी ली हुई जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। उसे अधिक सुशिक्षित, अधिक स्वस्थ, अधिक सुसंस्कृत बनाने के लिए जो संभव हो शक्ति भर करना चाहिए। वर वधू को इतना अवसर मिलना चाहिए कि वे एक दूसरे की सहायता किस प्रकार कर सकते हैं, इसकी योजना बनायें और कार्यान्वित करें। इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि विवाह के उपरान्त कई वर्ष सन्तानोत्पादन से बचा जाय। अन्यथा दम्पत्ति प्रेम, सहयोग, विचार-विनिमय, विनोद सहयोग आदि के सभी अवसर चले जाते हैं। उसकी शिक्षा प्रगति के सभी द्वार बन्द हो जाते हैं। गर्भवती एक प्रकार से रोगिणी जैसी स्थिति में जा पहुंचती है। उसे अपनी परिचर्या के लिए दूसरों की सहायता लेनी पड़ती है। ऐसी दिशा में वह अपने और दूसरों के लिए भारभूत होकर ही रह सकती है। बच्चे होने के बाद तो उसे इतना अवसर ही नहीं मिलता कि आगे की प्रगति का सिलसिला जारी रख सके। इसलिए विवाह के अवसर पर ही यह प्रतिज्ञा भी लेनी चाहिए कि कम से कम पांच वर्ष पत्नी का दायित्व समझने और उससे लाभ लेने का अवसर उसे मिले। बच्चे की भारी आवश्यकता पड़ रही हो तो ही उस संदर्भ में विवाह के पांच वर्ष बाद विचार करना चाहिए। इस संदर्भ में जल्दबाजी करने से कन्यादान का वह उद्देश्य नष्ट होता है जिसमें पिता ने अपनी पुत्री को अधिक समर्थ, अधिक शिक्षित एवं अधिक स्वावलम्बी सुसंस्कृत बनाने के लिए वर के—ससुराल वालों के सुपुर्द किया था। उस प्रतिज्ञा को पूरी करने के लिए आवश्यक समय मिलना चाहिए। सन्तानोत्पादन के कुचक्र में आरम्भ से ही बांध देने पर तो समझना चाहिए कि पिता के घर से जो स्वास्थ्य शिक्षा लेकर आई थी उसमें भी बुरी तरह कटौती आरम्भ हो जायेगी। दाम्पत्ति जीवन का सुखी समुन्नत, हंसी, खुशी से भरे रहने का जो समय मिला था वह बेकार चला गया। बच्चे तो जन्म भर हो सकते हैं, पर यह अवसर लौटकर फिर कभी नहीं आ सकता, इसलिए आरंभिक दिनों में पति-पत्नी एक दूसरे का सहयोग करके परस्पर अधिक प्रगतिशील बनने बनाने में एक दूसरे की सहायता करें। इस बीज इतनी घनिष्ठ आत्मीयता सम्पादित कर लें जो जीवन भर संचित पूंजी की तरह काम देती रहे।
विवाह के दिन तो दोनों पक्ष एक दूसरे से अपरिचित होते हैं। बाद में पहचान आरम्भ होती है। इसे सुदृढ़ बनाने के लिए चार सिद्धान्तों का दृढ़तापूर्वक निरन्तर प्रयोग करना चाहिए
(1) स्नेह (2) सहयोग
(3) सम्मान
(4) विश्वास ।
आत्मीयता को सघन बनाने के ये चार स्तम्भ हैं, इन्हें जितना अधिक सम्भव हो सुदृढ़, परिपक्व एवं कार्यान्वित करना चाहिए।
स्नेह आत्मिक सम्पदा है। उसमें यह सोचा जाता है कि हम दूसरे पक्ष की सम्पत्ति हैं। साथ ही दूसरे को अपने लिए खरीद कर आत्मसात कर लिया गया है। दो शरीर एक प्राण। एक दूसरे पर निछावर। द्वैत में अद्वैत। इतनी घनिष्ठ मित्रता कि एक दूसरे की निकटता चाहे और एक दूसरे के लिए क्या कर सकते हैं यह सोचें। स्मरण रहे प्रेम में अपनी इच्छा अभिलाषाओं स्वार्थों को दूसरे के हित में विसर्जित किया जाता है। उसमें लेने का—बदला चाहने का भाव कभी भी नहीं होता। दूसरा यदि बदला नहीं भी चुका सके तो उसका कोई मलाल मन में न आने देना। यही मैत्री का चिह्न है। वह एक पक्षीय भी हो सकती है। अपनी ओर से घनिष्ठ आत्मीयता का प्रयोग-प्रदर्शन करते रहना और साथी की ओर से कुछ चढ़कर अपेक्षा न करना। हो सकता है कि साथी संकोची स्वभाव का हो, उसे मुखर होने की, खिल पड़ने की प्रकृति प्राप्त नहीं हुई हो। ऐसी दशा में दूसरे को अपने अनुरूप बनाने की अपेक्षा अपने को ही दूसरे के स्वभाव के साथ ताल मेल बिठाने वाला परिवर्तन करना चाहिए। दूसरे को बदलना कठिन है पर अपने आपका परिवर्तन तो आसानी से किया जा सकता है। प्रेम का सुनिश्चित निर्वाह इसी प्रकार किया जाता है।
सहयोग का तात्पर्य है हाथ बढ़ाना। इनके जिम्मे वाले कार्यों में जान बूझकर सहयोग देना। भले ही दूसरे को उनकी आवश्यकता प्रतीत न होती हो। पत्नी के घरेलू कार्यों में पति समय-समय पर हाथ बंटाता रहे तो इस क्रिया कलाप में आनंद भी बहुत आता है और सुविधा भी बहुत रहती है। पत्नियां आमतौर से पतियों के बीसियों काम प्रचलन के आधार पर भी करती रहती हैं, पर पति ही अपने बड़प्पन का अहंकार इसमें समझते हैं कि पत्नी के किसी काम में हाथ न बंटायें। उसके समय और सुविधा का ध्यान न रखें। इस प्रथा को उलटकर उसके बदले में श्रद्धा और आत्मीयता खरीदनी चाहिए। स्वास्थ्य संवर्धन के लिए व्यायाम, मालिश, शिक्षा संवर्धन के लिए अध्यापक की भूमिका निभाना, अनुभव बढ़ाने के लिए घर से बाहर साथ ले जाना जैसे छोटे-छोटे कार्यों में भी सहयोग की गंध आती है। होना यह चाहिए कि पत्नी के श्रम में हाथ बंटाना और उसे अधिक स्वस्थ समुन्नत बनाने के लिए सामयिक परिस्थितियों को देखते हुए कुछ कर गुजरने के लिए प्रयास करना आवश्यक है। इस दिशा में स्त्रियां पहले से ही सहयोगिनी से बढ़कर सेविका की भूमिका निभाती हैं। उन्हें यह ध्यान रखना चाहिए कि वह सब बेगार भुगतने की तरह नहीं वरन् परिपूर्ण उत्साह और श्रद्धा के साथ करना चाहिए। इस प्रकार किया हुआ किसी भी पक्ष का कर्म अत्यधिक आनंददायक और उत्साहवर्धक बन जाता है। उसके बदले प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष श्रद्धा भी मिलती है और मन जीत लिया जाता है। यह व्यवहार पति-पत्नी तक ही सीमित न रहे वरन् समूचे परिवार के साथ परिस्थिति और आवश्यकता के अनुरूप करना चाहिए। छुट-पुट कामों में से किसी का कुछ घिसता नहीं वरन् बदले में दूसरों की सद्भावना जितनी अधिक मात्रा में मिलती है। उसे असाधारण उपलब्धि ही कहा जा सकता है।
मैत्री की घनिष्ठता का तीसरा पक्ष है—सम्मान। आमतौर से स्त्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वे पुरुषों का सम्मान करें, पर पुरुष वैसा करने में अपनी हेठी समझते हैं। इस समानता के युग में उस पुरातन परिपाटी को बदलकर दोनों ही पक्षों को एक दूसरे का समुचित सम्मान करना चाहिए। शिष्टाचार से किसी को भी च्युत नहीं होना चाहिए। अपने को छोटा और साथी को बड़ा मानकर चला जाय और अपने को सभ्य समाज का सदस्य माना जाय तो स्वभावतः मधुर भाषण, सम्मति सूचक सम्बोधन एवं शिष्टाचार के सभी पक्षों का अनायास ही निर्वाह होने लगेगा। आते-जाते समय प्रसन्नता सांत्वना जैसी मुद्राएं बनती रहें तो वाह्य व्यवहार से भी यह प्रकट होता रहता है कि साथियों के बीच स्नेह की, सम्मान की समुचित भावना है। रूखा स्वभाव रखना अथवा उपेक्षा बरतना अहंकार को आड़े देना सम्मान के प्रकटीकरण में बाधक होता है। इस बाधा को मैत्री में व्यवधान नहीं बनने देना चाहिए। आत्मीयता के प्रकटीकरण में सम्मान, शिष्टता को कार्यान्वित करते रहना भी आवश्यक मानकर चलना चाहिए। इस सामान्य सी प्रक्रिया से घनिष्ठता के संवर्धन में आशातीत योगदान मिलता देखा गया है।
चौथा आधार है विश्वास। एक दूसरे पर परिपूर्ण विश्वास किया जाय। किसी प्रकार का छल करने की आवश्यकता न की जाय। कहीं कुछ ऐसा होता भी हो तो उसे भुला देना चाहिए और अपनी कल्पना की त्रुटि माननी चाहिए। कमाने का काम पुरुष का है, घर खर्च चलाने का स्त्री का। व्यावसायिक पूंजी को सुरक्षित रखने की बात दूसरी है। पर घर खर्च के निमित्त अर्जित आजीविका को पत्नी के या माता के हाथ पर रखना चाहिए और उन दोनों के परामर्श से ही बजट बनाकर खर्च करना चाहिए। माता के न होने पर या उसकी समझदारी में कमी होने पर उस अधिकार का उपयोग पत्नी ही करती है। खर्च में से कुछ बचा लिया होगा। फिजूलखर्ची के लिए घर की सम्पदा में से छिपाकर बचाया होगा, ऐसा संदेह नहीं ही करना चाहिए। कभी कुछ ऐसा होता भी हो तो उसे हंसी-उपहास तक ही रहने देना चाहिए। गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। ऐसा तभी होता है जब स्त्री समझती है कि मेरा धन और पति का धन अलग-अलग है। जब पूरी सम्पदा पर अधिकार का भाव बन चले तो चोरी करने जैसे प्रसंग का आरंभ ही नहीं होता।
पति पत्नी के बीच चरित्र, व्यभिचार संबंधी आशंका का जन्म भी नहीं होना चाहिए। विवाह से पूर्व किन्हीं का किन्हीं से कुछ लगाव रहा हो तो उस बात को दर गुजर कर देना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि इतने भर से कोई सदा के लिए अविश्वास-पात्र या चरित्रहीन हो गया। हो सकता है कि वहां विवाह वार्ता ही चल रही हो और बाद में टूट गई हो। पतिव्रत धर्म या पत्नीव्रत धर्म वस्तुतः विवाह हो जाने के बाद ही आरंभ होता है। इससे पूर्व जो सिलसिला कहीं किसी प्रकार चलता रहा है उसे लगभग पूर्व जन्म की घटना मानकर विवाह के बाद हुए इस नये जन्म पर कोई प्रभाव न डालने वाली ही मानकर चलना चाहिए। विवाह संस्कार के समय में एक प्रायश्चित होम भी होता है जिसका तात्पर्य है कि विवाह से पूर्व यदि किसी ने किसी से सम्पर्क बनाया है तो उस घटना को विवाह के समय सदा के लिए भुलाकर सदा के लिए प्रायश्चित हुआ समझना चाहिए। विवाह से पूर्व की घटनाओं को लेकर जीवन भर उलाहना देते रहना व्यर्थ है। वस्तुतः विवाह के बाद ही एक दूसरे से परिचित होते हैं और वफादार बनते हैं। मनुष्य का स्वभाव परिवर्तनशील है। जो कभी गलत राह पर चल गया है, वह समझदारी-जिम्मेदारी आने पर अपनी राह को सुधार भी सकता है।
सामान्यतया मेले-ठेले, हाट-बाजार, सभा-सम्मेलन, विवाह-शादी आदि आयोजनों में कई नर-नारी मिल जुलकर जाते हैं तो उसमें अविश्वास को आड़े आने नहीं देना चाहिए। महिलायें काम-धन्धे के लिए, सौदा सामान खरीदने के लिए बाहर जाती हैं तो उनके साहस को सराहना चाहिए। इन अवसरों का उपयोग वे दुश्चरित्रता के लिए करेंगी ऐसा सन्देह नहीं उपजना चाहिए। विश्वास से विश्वास बढ़ता है और संदेह से संदेह। दुराचारी अपनी सांठ-गांठ सौ प्रकार से लगा सकते हैं और साहसी अनाचारियों के बीच अपने शील की रक्षा कर सकते हैं। गांव, घर, मुहल्ले का कोई व्यक्ति कुशल क्षेम पूछने-कहने यदि घर आया है तो उसका आतिथ्य करना चाहिए। यह नहीं सोचना चाहिए कि इस प्रकार का आगमन सदा दुर्बुद्धि से ही होता है। कड़ी नजर उन्हीं पर रखनी चाहिए जिनका स्वभाव एवं चरित्र संदिग्ध हो।
पर्दे की प्रथा अनुचित है। जब पुरुष स्त्रियों के बीच बिन घूंघट के आ जा सकते हैं तो स्त्रियों को ही किस लिए अप्रमाणिक माना जाय। वे भी पुरुषों की ही तरह निर्भीक, साहस, सदाचारी क्यों न समझी जायं? संदेह, अविश्वास के कारण नारी को पर्दे में कैद रखने की परम्परा उनके साहस मनोबल को गिराने और डरपोक, हीन भावना बनाने जैसी है।
मिल-जुलकर कार्य करने का अभ्यास घर में भी रहना चाहिए और दुकान व्यवसाय में भी। किसान मजदूर अपनी स्त्रियों समेत काम निपटाते हैं, फिर व्यापार व्यवसाय में वैसा ही प्रयोग क्यों नहीं किया जा सकता? इससे पुरुषों की भांति नारी स्वावलम्बी अनुभवी बनती है और समय पड़ने पर उस कर्म को बिना पुरुष की सहायता के भी चलाती रह सकती है।
नारी के प्रति समानता का भाव रखा जाय। उसे कामिनी, रमणी, भोग्या, वैश्या न माना जाय। दो भाई-भाई अथवा भाई-बहिन किन्हीं कार्यों को मिलकर कर सकते हैं तो पति-पत्नी के बीच भी ऐसी ही सहकारिता-विश्वसनीयता क्यों नहीं होनी चाहिए। पाश्चात्य देशों में नर की ही भांति नारियां भी सरकारी पद सम्भालती, व्यवसाय करती तथा सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर काम करती हैं। हमें अपने घरों की महिलाओं को ऐसी ही निर्भीक, कर्मठ तथा स्वावलम्बी बनाना चाहिए। कुदृष्टि से न उन्हें देखना चाहिए और न देखने देना चाहिए।

