विवाह इस प्रकार हों
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शारीरिक और मानसिक दृष्टि से परिपुष्ट परिवार बनने में समय लगता है। यदि ऐसी ही जोड़ी तलाशनी हो तो वह बड़ी आयु की ही मिलेगी। लड़कों को पढ़ने लिखने की, आने जाने की, ट्यूशन की सुविधा अधिक मिलती है। इसलिए वे जितने दिन में अमुक पढ़ाई पूरी करते हैं। योग्यता अर्जित करते हैं। उतनी करने में स्वभावतः लड़कियों को अधिक समय लग जाता है। लड़कों का छोटी उम्र से ही बालमन्दिरों में जाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इसमें लगने वाली फीस भी घर वाले खुशी-खुशी बर्दाश्त कर लेते हैं। किन्तु कन्याओं को यह लाभ नहीं मिलता। वे प्रायः पांच वर्ष से अधिक की हो जाती हैं तब कहीं प्राइमरी स्कूल में भर्ती होती हैं। लड़कों के लिए जल्दी दर्जा चढ़ाने और फेल न होने देने के लिए ट्यूशन भी लगाये जाते हैं। पर लड़कियों को ऐसी सुविधा मात्र बड़े घरानों में ही मिलती है। इस फेर में लड़कियां आयु और कक्षा के हिसाब से कुछ पीछे ही रहती हैं।
इसके अतिरिक्त शिक्षित लड़कियों के लिए उपयुक्त ढूंढ़ने में भी दसियों देख भालें रद्द करनी पड़ती हैं। लड़कियों की आयु बढ़ जाती है। जबकि लड़कों को बड़ा नहीं होने देते। उस हुण्डी को जितनी जल्दी भुनाया जा सके भुना लेते हैं। लड़कियां पढ़ाई पूरी करने में बड़ी हो जाती हैं। सयानी लड़कियों की रुचि भी देखनी पड़ती है। वे अनुपयुक्त स्थानों में जाने की अपेक्षा कुमारी रहना अधिक पसन्द करती हैं। सुयोग्य लड़के एक तो कम उम्र में ही घिर जाते हैं फिर उनकी कीमत भी इतनी होती है कि सामान्य स्तर का व्यक्ति उतना जुटा नहीं पाता। ऐसी दशा में कितनी ही लड़कियां बड़ी उम्र की हो जाती हैं। फिर उनसे भी बड़ी उम्र का लड़का खाली मिलना और भी कठिन हो जाता है।
अपने समाज में एक रिवाज यह भी है कि लड़की से लड़का बड़ा होना चाहिए। लड़की वाले भी यही चाहते हैं और लड़के वाले भी। डर यह रहता है कि बड़ी आयु की लड़की होगी तो वह विकसित स्तर की होगी। लड़का-बुद्धू होगा तो उससे दबेगी नहीं। मारपीट गाली-गलौज भी न सहेगी। इसलिए लड़की की उम्र अपेक्षाकृत छोटी ही होनी चाहिए ताकि उसे कारणवश या अकारण ही चाहे जब डराया धमकाया मारा पीटा जा सके और वह स्वाभिमान जाग्रत न हो पाने के कारण उस सबको सहती सुनती रहे। वर से छोटी लड़की ढूंढ़ने के ऐसे ही कुछ कारण हो सकते हैं।
वस्तुतः मनुष्य, मनुष्य है और प्रकृति, प्रकृति। नर और नारी दोनों के ही शारीरिक मानसिक विकास की आयु समान है। पच्चीस वर्ष तक दोनों के शरीर समान रूप से बढ़ते और परिपक्व होते हैं। यह आयु विवाह की मानी जाती है। प्रचलन के अनुसार लड़की लड़के से कम उम्र की पसंद की जाती है। जबकि ऐसा कोई वास्तविक कारण है नहीं। दोनों समान आयु भी हो सकते हैं।
यदि छोटे बड़े की बात आवश्यक समझी जाती हो तो यह भी हो सकता है कि लड़की बड़ी हो और लड़का कुछ छोटा हो। कच्ची आयु में तो छोटे बड़े का कुछ कारण समझा भी जा सकता है किन्तु जब दोनों तरुण हो गये तो अन्तर देखने की बात समाप्त हुई समझी जानी चाहिए। लड़की बड़ी भी हो सकती हैं और लड़का कुछ छोटा भी। नैपोलियन की, अब्राहम लिंकन की पत्नियां उनसे कई वर्ष बड़ी थीं। इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब की धर्म पत्नी फातिमा पति की अपेक्षा बीस से भी अधिक वर्ष बड़ी थीं। कृष्ण के बड़े भाई बलराम की पत्नी रेवती उनसे बहुत बड़ी थीं। इस अन्तर से उनके दाम्पत्य जीवन में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं पड़ा। वे लोग सुख पूर्वक अपने गृहस्थ धर्म का निर्वाह करते रहे। यदि लड़की से लड़का कई वर्ष बड़ा हो सकता है तो इसमें क्या हर्ज हो सकता है कि वर से वधू भी कई वर्ष बड़ी हो सकती है। बड़ी आयु की पत्नी घर गृहस्थी को संभालने में, बच्चों को सुविकसित स्थिति में जन्म देने में अधिक सफल हो सकती है। पति के ऊपर भार न रहकर उसे वे अच्छे साथी और सहयोगी की भूमिका निभा सकती हैं।
यदि किसी की लड़की बड़ी हो गई और कुछ वर्ष छोटे लड़के से विवाह का सुयोग बनता है तो उसमें पुरातन मान्यता के कारण किसी प्रकार की अड़चन नहीं पड़ने देना चाहिए। वरन् सच तो यह है कि जिसे समझदार साथी की जरूरत है उसे अपने से बड़ी आयु की वधू ही तलाश करनी चाहिए। वह विधवा भी हो सकती है। जब विधुर को कुमारी कन्या के साथ विवाह करने का अधिकार है तो यह क्यों नहीं हो सकता कि विधवा वधू का विवाह कुंआरे वर के साथ हो। इसमें किसी भी दृष्टि से कोई अड़चन नहीं है। जिसके कारण ऐसे चयन में कोई बाधा समझी या अटकाई जाय। प्रचलन के अनुसार वधू की आयु तो वर से कुछ कम होने की बात एक मान्यता बनी ही हुई है। अब समझदारी का तकाजा है कि वधू बड़ी हो तो भी वर पक्ष को उससे कोई आपत्ति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि वे नफे में ही रहते हैं। इस आधार पर उन्हें शरीर की परिपुष्टता और बुद्धि की परिपक्वता के दोनों ही लाभ अतिरिक्त रूप में मिलते हैं।
जिनके सामने कोई बड़े लक्ष्य हैं। समय की कमी तथा मानसिक व्यस्तता है। समाज सेवा जैसे कार्यों में उत्कट लगन है। जो बिना विवाह अपना सीधा सादा जीवन जी सकते हैं, वे अविवाहित रहें तो भी कुछ हर्ज नहीं। कितनी ही बाल-विधवाएं अपना जीवन पवित्रता पूर्वक काट लेती है। कई साधु, ब्रह्मचारी विवाह से पूर्व ही संन्यास ले लेते हैं और अपनी व्रत शीलता निभाये रहते हैं। अतएव विवाह करना अनिवार्य नहीं है। कई बड़ी लड़कियां पिता के न रहने पर स्वयं नौकरी करती और छोटे भाई बहिनों को पढ़ा लिखाकर सुयोग्य बनाती देखी गई हैं।
विवाह का प्रमुख उद्देश्य काम तृप्ति समझा जाता है। घर बसाना भी। दो साथियों में से एक घर सम्भाले दूसरा उपार्जन कर्म में जुटा रहे तो दोनों ही पक्ष अपने-अपने हिस्से का काम ठीक तरह निपटाते रह सकते हैं। इन सबसे बढ़कर है दो सच्चे मित्रों का एक जुट होकर जीवन नौका को सहयोग पूर्वक खेकर पार करना। यह कार्य एकाकी उतनी अच्छी तरह नहीं बन पड़ता जितना कि युक्त मिलकर उसे पार करता है। गाड़ी के दो पहिये मिलकर चल सकते हैं। चलने में दोनों पैरों का योगदान रहता है। हाथ से बन पड़ने वाले कार्यों में दोनों ही मिलकर किसी व्यवस्था को सम्पन्न करते हैं। मनुष्य के जीवन में भी विवाह के रूप में ऐसी ही आवश्यकता पड़ती है। यह सरल भी है और सुविधाजनक भी। फिर भी यह अनिवार्य नहीं है। जो साथी की गहरी मित्रता अर्जित करने में अपने को अयोग्य अनुभव करते हों वे अपने ऊपर अंकुश लगाकर भी अविवाहित रहने में भी अधिक सुविधा अनुभव करते एवं सुखी रहते हैं।
विवाहोत्सव—ऐसा ही पारिवारिक हर्षोल्लास आयोजन है जैसे—दिवाली, दशहरा आदि मनाये जाते हैं। इनमें घर परिवार के लोग एकत्रित होते हैं, मंगल गीत गाते, मिलजुल कर जलपान प्रीतिभोज आदि सामूहिक क्रिया-कृत्य करते हैं। लड़की की विदाई लड़के के घर में नया प्रवेश यह अवसर प्रसन्नता भरा माना जा सकता है। इसकी अभिव्यक्ति के लिए घर में कुछ रौनक हो, दीपक जलें, गीतवाद्यों का शुगल हो, खान-पान चले, दोनों पक्ष के स्वजन सम्बन्धी उस समारोह में सम्मिलित हों। विवाह संस्कार के मन्त्रोच्चार हवन आदि उपक्रम रहें तो कुछ हर्ज की बात नहीं है। इस सारे समारोह में सौ, दो सौ रुपये खर्च हो जायं तो भी हर्ज नहीं। यह समारोह दोनों पक्षों के लिए समान प्रसन्नता का है। इसलिए उसका खर्च दोनों पक्ष मिलजुल कर वहन करें तो ज्यादा अच्छा है। इसमें समानता का बांध भी होता है और यह प्रतीत होता है कि किसी पर किसी का बोझ लदा नहीं है। दोनों ने इस मिलन सम्मेलन में समान रूप से हाथ बटाया है। किसी ने किसी को विवश बाधित नहीं किया। दोनों पक्षों की अभिव्यक्ति समान रही। हमें इसी प्रचलन का शुभारम्भ करना चाहिए। विदेशों में भी विवाह होते हैं; पर उनका स्वरूप ऐसी ही सादगी से जुड़ा रहता है। किसी को इसके लिए आर्थिक चिन्ता नहीं करनी पड़ती। छोटे घरेलू उत्सव में धन दौलत की बड़ी सी फिजूल खर्ची हो भी नहीं सकती। बौद्धों, ईसाइयों, मुसलमानों में भी विवाह संस्कार कुछ घण्टों में निपट जाते हैं। जो बहुत दूर से आये हैं वे रात को ठहर भी जाते हैं। अन्यथा निकटवर्ती पड़ौसी सम्बन्धी उस आयोजन में अपनी हाजिरी दर्ज कराने के उपरान्त अपने-अपने घर जाते हैं।
इन दिनों अपने यहां वे रिवाज बने हुए हैं, जो सामन्तकाल में कन्या अपहरण के दिनों प्रयुक्त किए जाते थे। वर पक्ष के लोग डकैतों की तरह फौज बनाकर बंदूकें चलाते हुए बेटी वाले के घर पर धावा बोलते थे। लड़की को रोती कलपती उठाकर ले जाते थे। बेटी वाले में यदि सामना करने की शक्ति न हुई तो आत्म समर्पण कर देता था। घर में जो थाली, बर्तन, कपड़ा, जेवर, पैसा आदि होता उसे विजेता की तरह लूट ले जाते थे। यह लूट उसने मान्य करली इसके प्रमाण स्वरूप जो लुटेरा समुदाय आया था उसकी आव भगत करनी पड़ती थी। मिष्ठान्न, पकवानों की दावत जेवनार देनी पड़ती थी और कन्या को सज-धज के साथ विदा करना पड़ता था। इसमें आक्रामकों की विजय और जिन पर आक्रमण हुआ उनकी पराजय माननी पड़ती थी। वे अपनी हार गिड़गिड़ाते हुए भेंट उपहार देते हुए स्वीकार करते थे। कन्या बलपूर्वक अपहरण की हुई मानी जाती थी। उस पर पूरा अधिकार ससुराल वालों का वैसा ही हो जाता था, जैसा खरीदे गए पशु पर। उसे दासी की तरह आजीवन इच्छा पर अनिच्छा से विजेताओं के घर उचित अनुचित सेवा करनी पड़ती थी। प्रतिबन्ध में रहना और आदेश मानना पड़ता था।
उसी प्रकार के ध्वंसावशेष अभी तक बने हुए हैं। बरातियों की लम्बी चौड़ी सेना की सज-धज करनी पड़ती है। तरह-तरह की फरमाइशें करते हैं। बेटी वालों की सभी खुशहाली दहेज के नाम पर लूट ली जाती है चाहे उनके घर में पीछे के लिए गुजारे भर के लिए न रहे। चाहे ऋण लेना पड़े; पर ससुराल वालों को इसमें सहानुभूति जताने की आवश्यकता नहीं होती। वे जितनी राजी, बेराजी में हाथ लगे उतना निचोड़ लेते हैं। यह कृत्य कौतुक हो जाने के उपरान्त भी लड़की को सताते रहते हैं कि वह बाप, भाइयों को अपनी कष्ट कथा सुनाये और जो कुछ अधिक से अधिक उनसे रोकर गिड़गिड़ाकर खुशामद से ला सकती है। वह बाद में भी लाती रहे। न ला सकने पर कितनी ही लड़कियों को परित्यक्ता बनना पड़ता है। आत्महत्या तक कर लेने के लिए विवश होना पड़ता है। हिन्दू समाज में हर साल इस प्रकार की आत्महत्याएं बड़ी संख्या में होती हैं। कितनी ही उत्पीड़न सह-सहकर अपमान पूर्वक जीवन इसलिए जीती हैं कि वे ससुराल वालों की फरमाइशें पूरी न कर सकीं।
इस कुप्रथा का अब अन्त होना चाहिए। सामन्तकाल चला गया। आक्रमण, अपहरण की प्रथा भी अब नहीं है। इस परिवर्तन का कोई चिह्न विवाह-शादियों में भी परिलक्षित होना चाहिए।
कन्या को विदा कराने के लिए वर परिवार के खास-खास व्यक्ति जाएं। बरात के लिए जाने अनजानों का जमघट एकत्रित न करें। बरात को सज-धज के साथ बाजार में निकालने की कोई आवश्यकता नहीं है। कन्या के पिता ने यदि लड़की को विदाई के समय कुछ वस्त्र उपहार दिया है तो उसे विशुद्ध रूप में उसी का स्त्री धन माना जाय। इस पर ससुराल वाले किसी प्रकार अधिकार न जताएं और न ऐसा प्रदर्शन करें जिससे बेटी वाले की सम्पन्नता या गरीबी का ढिंढोरा पिटता हो। दहेज तो वस्तुतः ससुराल वालों को देना चाहिए। जिन्हें सुयोग्य कन्या सम्मानपूर्वक मुफ्त में मिली है घर में गृहलक्ष्मी का प्रवेश हुआ है, इस सौभाग्य की अभिव्यक्ति करने के लिए वे लोग अपनी-अपनी इच्छा या हैसियत के अनुसार वधू को भेंट उपहार प्रस्तुत करें। और जो दोनों पक्षों से मिला है उसे लड़की के नाम किसी बैंक में जमाकर दिया जाय ताकि वह ब्याज समेत बढ़ता रहे और जीवन में कभी कोई विपत्ति आ खड़ी हो तो काम आये।
अब हमें इसी प्रकार का नया प्रचलन आरम्भ करना चाहिए। इसमें पारिवारिक उत्सव से बढ़कर किसी प्रकार की अनावश्यक धूम-धाम या दान, दहेज का प्रसंग न चले। कन्यादान अपने आप में इतना बड़ा दान है जिसके लिए ससुराल वालों को आजीवन कृतज्ञ रहना चाहिए। वर को अपने जीवन में एक बड़े आभार की पूर्ति मानकर उन लोगों का चरण वंदन करना चाहिए जिनने कृपापूर्वक इतना बड़ा अनुदान प्रदान किया है। गृहीता को दानी का अहसान मानना चाहिए न कि उलटे ऐंठ अकड़ दिखाई जाय और ग्रहण करने में अपना बड़प्पन दिखाते हुए साथ ही और भी बहुत कुछ पाने का दबाव डाला जाय।
अब तक जिस प्रकार भी विवाह होते रहे उस बात को भूल जाना चाहिए। भूल का, अनुपयुक्तता का प्रायश्चित्त करना चाहिए। आगे के लिए सुधार किया जाना आवश्यक है। विवाह पूर्ण सादगी के साथ हों, उसका भार कन्या पक्ष पर तो किसी प्रकार पड़ना ही नहीं चाहिए। कुछ खर्च करना भी हो तो बेटे वालों के लिए अनायास ही कन्या पक्ष सह लेता है। उन्हीं को कृतज्ञ एवं विनम्र भी होना चाहिए।
विवाहोत्सव धूम-धाम से ही करने का मन हो तो गायत्री परिवार के किसी यज्ञ आयोजन में उसे कर लेना चाहिए। शान्तिकुंज में भी वैसी व्यवस्था है। जिससे दोनों पक्ष वहां ठहर कर तीर्थ यात्रा का आनन्द भी लें और विवाह भी विधि-पूर्वक करने के उपरान्त अपने-अपने घर लौट जायं। यहां देन दहेज या वस्तु प्रदर्शन का कोई अड़ंगा खड़ा नहीं करने दिया जाता।

