परिवार संस्था का सुसंचालन
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विवाह में वर कन्या का ही गठबन्धन नहीं होता, दो परिवार भी आपस में बंधते हैं। एक दूसरे के सहयोग परामर्श से अपनी कठिनाइयों से निबटने और उन्नति की दिशा में बढ़ने का प्रयत्न करते हैं। दो पड़ौसी परस्पर सहानुभूति के आधार पर मित्र बन जाते हैं और दुःख बंटाने, सुख बांटने में यथा सम्भव सहायता करते हैं। तो कोई कारण नहीं कि कन्या और वर के परिवार मिलजुलकर एकता स्थापित न करें और एक दूसरे के शुभ चिन्तन बनकर न रहें। उन्हें स्थिति के अनुरूप एक दूसरे की सहायता भी करनी चाहिए। यह आवश्यक नहीं कि कन्या पक्ष ही वर पक्ष की आजीवन सहायता करता रहे। यदि सम्भव हो तो और आवश्यकता पड़े तो वर पक्ष को भी कन्या पक्ष वालों की सहायता करनी चाहिए। घनिष्ठ सहानुभूति तो रखनी ही चाहिए। विवाह के बाद कन्या से पूरी तरह पल्ला नहीं छुड़ा लेना चाहिए। विवाह के बाद कन्या बिक नहीं जाती वरन् अपना अधिकार अभिभावकों पर भी बनाये रहती है। जिससे छुटकारा पा लेना आजीवन सम्भव नहीं होता। इस तथ्य को सदा ध्यान में रखा जाय और कन्या को समय-समय पर बुलाते चलाते रहा जाय। इसकी कुछ पारिवारिक गुत्थियां हों तो उन्हें सुलझाने में सहायता करते रहना भी कर्त्तव्य है। जिस प्रकार अपने घर परिवार के झगड़े झंझट सुलझाये जाते हैं उसी प्रकार बेटी के घर की समस्याओं को सुलझाने में भी समुचित योगदान देते रहना चाहिए। बेटी को सर्वथा उपेक्षित असहाय छोड़ देने पर उसके परिवार के कर्कश निष्ठुर लोगों की बन आती है। यह स्थिति नहीं ही बनने पाये इसके लिए कन्या पक्ष को भी ध्यान रखे रहने की आवश्यकता है।
विवाह पति-पत्नी के बीच ही नहीं होता वरन् उसके माध्यम से विवाहितों का पूरा परिवार उनकी सेवा सहायता के लिए आकांक्षी बन जाता है। विवाह से पूर्व लड़के के भरण पोषण, शिक्षा, दीक्षा आदि में जो समय और धन लगाया जाता रहा है, उसे एक विश्वस्त व्यवसाय में लगी हुई पूंजी समझी जा सकती है। विवाह के दिनों दम्पत्ति स्वावलम्बन के नजदीक पहुंच चुके होते हैं। वे समर्थ भी हो चले होते हैं। ऐसी दशा में उनका कर्त्तव्य हो जाता है कि परिवार को सुखी-समुन्नत व्यवस्थित एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए जो भी सम्भव हो सके वह करे। वह अहसान करना नहीं वरन् ऋण चुकाना है।
परिवार में कई सदस्य तो समर्थ और स्वावलम्बी होते हैं, पर कई बाल, वृद्ध ऐसे होते हैं जिन्हें आर्थिक एवं भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता पढ़ती है। प्रौढ़ भी सम्मान शिष्टाचार तो चाहते ही हैं। इन आवश्यकताओं को पूरी करते रहना दम्पत्ति का कर्त्तव्य है। ऐसा भी होता है कि बड़े लड़कों को पढ़ाने में घर की पूंजी चुक जाती है। सोचा जाता है कि लड़का जब समर्थ हो जायेगा तो उस पूंजी को लौटा देगा। घर के अन्य असमर्थों को समर्थ बनाने में अपना योगदान देगा, पर देखा जाता है कि उनका दृष्टिकोण बदल जाता है। सोचते हैं कि अपनी कमाई को पति पत्नी के बीच ही खर्च करके अधिक विलासी और खुशहाल जीवन क्यों न बितायें? घर वालों की सहायता में अपनी कमाई क्यों लगायें? इस स्वार्थपरता से प्रेरित नवयुवक अलग हो जाते हैं या कहीं अन्यत्र बदली करा लेते हैं। जो कमाते हैं उसे अपने ऊपर ही खर्च कर लेते हैं। परिवार के लोगों को निराश ही रहना पड़ता है। यह बुरी बात है। होना यह चाहिए कि पति पत्नी मिलकर पहले परिवार के अंग बनकर रहें। उन पर जो समय तथा धन खर्च हुआ है उसे सेवा सहायता करते हुए चुकाने में लगे रहें। इस संदर्भ की सभी आवश्यकताएं जब पूरी हो चलें, छोटे बहिन भाइयों की शिक्षा, शादी पूरी होले तब इसके उपरान्त बच्चे पैदा करने की तथा घर परिवार बसाने की बात सोचें। अन्यथा यह परिवार का ऋण भार लेना ऐसा ही है जैसा कि किसी साहूकार या बैंक का दिया हुआ ऋण लेकर भाग जाना। यह स्थिति उत्पन्न न करना ही भलमनसाहत है। अन्यथा अपनी पढ़ाई, शादी भरण पोषण में घर की अधिकांश राशि खर्च करा लेना और पीछे वालों को असहाय छोड़ देना बुरी बात है।
परिवार संस्था को हमें टूटने नहीं देना चाहिए। उसका वातावरण सही रहने में इस खदान से नर रत्नों का उत्पादन होता है। परिवार की एक कड़ी व्यक्ति निर्माण के साथ जुड़ती है। दूसरी समाज निर्माण के साथ। बच्चे और बड़े अपने गुण, कर्म, स्वभाव के भले बुरे होने का अभ्यास परिवार की पाठशाला में ही करते हैं। इस प्रकार वह व्यक्ति निर्माण का आधार है। परिवारों की कड़ियां मिलकर ही समाज बनता है। समाज की अलग से कोई सत्ता नहीं वह परिवारों का ही समुच्चय है। परिवारों की जो व्यवस्था तथा सभ्यता होती है उसी को व्यक्ति अपनाते जायें तो वैसा ही समाज बन जायगा। इसलिए समाज निर्माण में नव दम्पत्ति को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए। क्योंकि नई प्रतिभा के रूप में उनका दबाव सब पर पड़ता है। फिर जो कमाकर लाते हैं वह घर में ही तो रखते हैं इसलिए उनका अहसान भी घर के सभी लोग मानते हैं। शत-प्रतिशत नहीं तो उनकी बातें अधिकांश में मानी जाती हैं।
विवाह के उपरान्त पति पत्नी को परस्पर तनाव उत्पन्न नहीं करना चाहिए। लड़ झगड़ की राह अपनाने की मूर्खता नहीं करनी चाहिए। यह अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए कि दूसरा पक्ष अपने ही संकेतों पर चलेगा। उसका अपना भी मानस है, अपना स्वभाव भी, उसे पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। समझदारी इसी में है कि जितना सम्भव हो, उस हद तक तालमेल बिठा लिया जाय और जो मतभेद रह जायं उन्हें उपेक्षा के गर्त में डाल दिया जाय। तेतीस प्रतिशत नम्बर लाने पर बच्चे पास हो जाते हैं। पचास प्रतिशत पर सैकिण्ड डिवीजन और साठ से ऊपर लाने पर फर्स्ट डिवीजन। पति पत्नी का तालमेल जिस अनुपात में मिल जाता हो उसी को सौभाग्य और सुयोग मानकर संतोष करना चाहिए और प्रसन्न रहना चाहिए। दोषों को भुला दिया जाय गुणों का स्मरण रखा जाय तो इतने भर से दाम्पत्य जीवन की अधिकांश सफलता सिद्ध हो जाती हैं। शत-प्रतिशत एक दूसरे के अनुगामी होंगे इसकी अपेक्षा नहीं ही करनी चाहिए। गुणों को बढ़ाने का तरीका यह है कि दूसरों के सामने साथी के जो गुण हों उनकी प्रशंसा की जाय। जो दोष हों उनके सम्बन्ध में चुप्पी साथ ली जाय। उन्हें चर्चा का विषय न बनाया जाय। मतभेदों को आपस में मिलजुल कर सुलझाया जाय। इसके लिए तर्क उदाहरण प्रस्तुत किये जायें। अहंकार को आगे रखकर रूठ बैठना और आवेश में भरकर अपमान जनक व्यवहार करने लगना ऐसा दुर्व्यवहार है जिसके आधार पर खाई चौड़ी होती है। गुत्थी सुलझने की सम्भावना तो रहती ही नहीं। दबाव देकर साथी को इच्छानुरूप चलने के लिए बाधित करना जंगली कानून है। वह स्वाभिमानी मनुष्यों पर प्रयोग नहीं किया जा सकता, जो हठवादिता अपनाते हैं वे घाटे में रहते हैं। सरल और सुखी दाम्पत्य जीवन बिताने का तरीका यही है कि दोनों में से कोई हठवादी न बने। विचार विनिमय का द्वार खुला रखा जाय और जिस सीमा तक सहमति बन पड़े उसी में सन्तोष किया जाय।
परिवार के सदस्यों में शिष्टाचार, मितव्ययिता, श्रमशीलता, सुव्यवस्था और उदार सहकारिता का बीजारोपण करना चाहिए। किसी को भी उद्दण्ड उच्छृंखल नहीं बनने देना चाहिए। अपनी गलती तलाश करने और उसे सुधारने की आदत सभी को डालनी चाहिए। नशेबाजी जैसे दुर्व्यसनों को घर में प्रवेश नहीं करने दिया जाय। अपव्यय की आदत पड़ जाती है तो उचित अनुचित किसी भी तरीके से धन प्राप्त करने की ललक बनी रहती है। इसका प्रतिफल चरित्र पतन के रूप में सामने आता है। आलसी व्यक्ति श्रम बचाता है, पर इसके बदले योग्यता बुद्धि से वंचित रह जाता है। जो दूसरों के काम में हाथ नहीं बंटाता उसे कामचोर, स्वार्थी और आलसी समझा जाता है। ऐसे स्वभाव वाले दूसरों की आंखों में खटकते हैं। भर्त्सना के पात्र बनते हैं। इससे उनमें आत्महीनता या विद्वेष की भावना उत्पन्न होती है। हंसी खुशी की उस सौगात से वंचित रह जाते हैं जो उत्साह, श्रमशील, सेवाभावी होने की स्थिति में उनको सहज की मिलती रह सकती है।
परिवार में बड़े-बूढ़ों का आग्रह पुराणपंथी मान्यताओं में अटका रहता है। विवाह शादियों में बाल विवाह, धूमधाम, दहेज का लेन देन उन्हीं के आग्रह से होता है। मृतक-भोज, भूत-पलीत, देवी-देवता, छूत-छात, पर्दा-घूंघट जैसा निरर्थक बुढ़िया पुराण उन्हीं का चलता है। पीर-फकीरों से वे ही ठगाती रहती हैं। हर पुरानी परिपाटी को वे पत्थर की लकीर मानती हैं। अपनी बातों पर बड़े-बूढ़े बहुत जोर देते हैं। कई बार तो उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेते हैं। इन बातों को हंसी की उपेक्षा में टाल देना चाहिए। इन बातों पर झगड़ना तो नहीं चाहिए पर उन मूढ़ मान्यताओं को चलने भी नहीं दिया जाना चाहिए। सुधार के लिए उन्हें बदलते जमाने और समय की मांग को ही प्रधान तर्कों के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, इन प्रसंगों में ऐसी बुद्धिमत्ता से काम लेना चाहिए कि अन्धविश्वासों का प्रश्रय न भी मिलने पाये और कोई बड़ा सा झगड़ा झंझट भी खड़ा न हो।
बड़े-बूढ़ों का पुराने ढंग का कड़ा अनुशासन और नई पीढ़ी का सामयिक स्वतन्त्रता का उपयोग इन दोनों ही बातों से आये दिन टकराहट होती रहती है और घर झगड़े झंझटों के अखाड़े बने रहते हैं। इस गृह युद्ध को गम्भीर होकर नहीं हलके-फुलके मन से हंसी-मजाक में ही टाला जा सकता है। दोनों पक्षों को थोड़ा-थोड़ा झुकना चाहिए ताकि मिलकर चलने के बिन्दु पर आ सकें। जो इतना कर पायें उन्हें शासन चला सकने की नीति कुशलता में प्रवीण पारंगत कहा जायगा।
जहां स्वार्थपरता, चालबाजी, धूर्तता, अनीति का समावेश हो उन बातों को नहीं ही चलने देना चाहिए। इसमें अपना असहयोग, विरोध या संघर्ष भी खड़ा किया जा सकता है ऐसे प्रसंग पुराने ढंग की विवाह शादियों के सम्बन्ध में हो सकते हैं। बाल विवाह, दहेज, धूमधाम के प्रसंगों में नई पीढ़ी को बड़े-बूढ़ों के सामने अपनी आदर्शवादी मान्यता स्पष्ट कर देनी चाहिए। कहना चाहिए कि यह मूढ़ परम्परा उन्हें किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं। वे आजीवन कुंवारे रह सकते हैं, पर उनका रिश्ता स्वीकार नहीं करेंगे जो देन-दहेज या धूमधाम को आवश्यक मानते हैं। लड़की हो या लड़का दोनों को ही इस आदर्शवादिता पर अड़ जाना चाहिए। किसी गरीब को साथी बना लेना चाहिए, पर उस कुप्रथा को सहन नहीं करना चाहिए जिससे घर बर्बाद होते हैं और समाज में गरीबी बेईमानी का माहौल बनता है।
पाश्चात्य देशों में स्वेच्छाचार की बाढ़ आने से परिवार संस्था टूट गई। बूढ़ों को सरकारी बुढ़े खानों में आश्रय लेकर मौत के दिन पूरे करने पड़ते हैं। पति पत्नी के बीच तनिक सा मनमुटाव होते ही तलाक के लिये जाते हैं। बिना विवाह के न स्त्रियां रह पाती हैं न पुरुष। ऐसी दशा में बच्चों को जहां-तहां छोड़कर नया घर बसाने की उतावली पड़ती है। ऐसे बच्चे, बच्चा खानों में पल तो जाते हैं पर अभिभावकों की स्वार्थपरता और हृदयहीनता उन्हें आजीवन खटकती रहती है। फलतः वे अनेक दुर्गुणों और मानसिक रोगों के शिकार हो जाते हैं। ऐसे परित्यक्त बालकों की संख्या उन देशों में निरन्तर बढ़ती जाती है।
भारत में दूसरे तरह की समस्याएं हैं। पति पत्नी की ओर से बदल जाने पर पूरा परिवार अपने पराये के उस मतभेद में अपने की हिमायत करता है। पत्नी को ही दोषों की खान ठहराया जाता है और प्रयत्न यह किया जाता है कि किसी प्रकार उससे पीछा छुड़ाकर नई बहू लाने का जुगाड़ बिठाया जाय।
विधवा और परित्याक्ता की स्थिति प्रायः एक जैसी होती है। दोनों के ही बच्चे दुर्दशाग्रस्त रहते हैं और माताएं छाती पर पत्थर रखकर किसी प्रकार वह सब सहन करती रहती हैं। आवेश आने पर उन्हें नींच-ऊंच कदम भी उठाने पड़ते हैं।
पाश्चात्य देशों की और भारत की पारिवारिक स्थितियों में अन्तर तो हैं, पर दोनों को ही हेय अनुपयुक्त कहा जा सकता है। यह ढर्रा देर तक नहीं चल सकता। अतिवाद सदा निभता नहीं। उसके अपने-अपने ढंग के दुष्परिणाम खड़े होते रहते हैं।
सर्वसुलभ समाधान यह है कि ‘‘लार्जर फेमिली’’ कम्यून स्तर की सहकारी समितियां गठित की जायं। उसमें सभी सदस्यों की सुविधा, जिम्मेदारी तथा आदर्श व्यवस्था सुरक्षित रहे। सौदा खरीदना, बच्चों को खिलाना, पढ़ाना, भोजन बनाना, कपड़े धोना, मनोरंजन आदि काम सहकारी स्तर पर हों उसी में एक खण्ड ऐसा भी रहे कि सदस्यों में से जो अनाथ, अपंग हो जाय उसका भी लार्जन फेमिली द्वारा निर्वाह चलता रहे। ऐसी समितियां साम्यवादी देशों में गठित भी की गई हैं और वे सफलतापूर्वक चल भी रही हैं। सामर्थ्य भर श्रम करने, आवश्यकता के अनुरूप लेने का सिद्धान्त ऐसा है जिसे अपना लेने पर केन्द्रीय सम्पन्नता बढ़ती रहती है। उसका लाभ हर सदस्य को मिलता है। न कोई पिसता है—न कोई पीसता है। सभी की स्वतन्त्रता और जिम्मेदारी अक्षुण्ण बनी रहती है।
परिवार संस्था को जीवन्त और सक्षम रहना आवश्यक है। इसके लिए न्यायोचित और सुविधाजनक तरीका ‘लार्जर फेमिली’ वाला ही है। वह जहां जितने अंशों में सम्भव हो कार्यान्वित किया जाना चाहिए।

