सुयोग्य जोड़ियां इस तरह मिलेंगी
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जिस प्रकार बाल-विवाह और दहेज प्रदर्शन धूम-धाम वाले विवाहों का प्रचलन लोगों की अभिरुचि में सम्मिलित हो गया है। उसी प्रकार वर-कन्या के अनुरूप जोड़ा मिलने में भी लोगों के कुछ विशेष दृष्टिकोण हैं। यों कई समुदायों में लड़के के लिए लड़की ढूंढ़ने के लिए निकलने का भी रिवाज है, पर आमतौर से लड़की वाले ही लड़का ढूंढ़ने निकलते हैं। इसमें पहली बात होती है अपनी जाति या उपजाति की। लड़का उसी में मिलना चाहिए इसके बाद यह देखा जाता है कि उसकी पैतृक आजीविका क्या है? कभी यह सोचा जाता रहा होगा कि लड़का कमाने योग्य न रहे तो उसके संचित सम्पदा के हिस्से पर लड़की का पालन-पोषण होता रहे। उन दिनों शिक्षा और स्वावलम्बन पर अधिक ध्यान नहीं दिया था, पर वह मान्यता समय की प्रगति के साथ-साथ थोथी सिद्ध होती गई। पैतृक सम्पत्ति बड़ी दीखने पर भी उसके कई हिस्सेदार होते थे। वे समर्थ होने पर मिल जुलकर साथ रहने की अपेक्षा बंटवारा पसन्द करते थे। हर एक के हिस्से में थोड़ी-थोड़ी भूमि आती थी। बड़ा घर होने पर उसका बंटवारा और भी कठिन पड़ता था। विधवा या संकोची का हिस्सा दूसरे समर्थ भागीदार छुड़ा लेते थे फलतः जिस सम्पदा पर बड़ी आशा लगाई गई थी और उसे निश्चिन्तता का आधार समझा गया था, वह सम्मिलित रहने पर तो सबका गुजारा करती थी, पर बंटवारा होते ही वह कांच के टूटे गिलास की तरह बिखर जाती और जिनका कब्जा मजबूत था, उन्हीं के काम आती। लड़के की योग्यता से भी अधिक जिस पैतृक सम्पदा को ध्यान में रखा गया था वह समय आने पर कागज की नाव जैसी सिद्ध होती। आये दिन उसी को लेकर द्वेष-दुर्भाव और कोर्ट कचहरी का सिलसिला चलता रहता। यह बात समझदार ही स्वीकारने लगे कि पैतृक सम्पदा के आधार पर लड़के का चुनाव करना बेकार है।
सुन्दरता कागज के फूल जैसी है। सोलह से बाईस वर्ष तक, छै वर्ष ही वह टिकती है। इसके बाद प्रौढ़ता परिपक्वता आती है। वह कोमलता विदा हो जाती है जिसे सुन्दरता कहा जाता था। इस देखभाल का नम्बर तीसरा माना जाता है कि लड़का स्वतन्त्र रूप से कुछ कमाने खाने लगा या नहीं। उसके पीछे व्यसन, दुर्गुण, कुसंग तो नहीं लग गये। सुन्दर और सम्पन्न घर का होते हुए भी यदि लड़का दुर्व्यसनों का शिकार हो गया है, स्वभाव से क्रोधी या कमजोर है तो वह न केवल स्वयं सदा परेशान रहेगा वरन् उस लड़की को हैरानी में डाले रहेगा जो उसके पल्ले बंधी है। देखभाल इन्हीं सब बातों की होनी चाहिए।
लड़की देखते समय इस सम्बन्ध में उसकी शकल सूरत भर देखी जाती है। उसका बहुत थोड़ा महत्व है। असल में लड़की की सूरत से नहीं वरन् स्वभाव से घर भर का काम पड़ता है। उसी के कारण गृहस्थियां बनती और बिगड़ती हैं। दस पांच मिनट में किसी को देखकर या दो चार प्रश्न पूछकर किसी के स्वभाव को नहीं जाना जा सकता। यह तभी संभव है जब किसी रिश्तेदारी या पड़ौस का उसके साथ निकटवर्ती सम्बन्ध रहा हो और यह देखा जाय कि किस प्रकार की उसमें आदतें पक रही हैं। क्रोधी, आलसी, असहिष्णु, अनुदार जैसी प्रकृति तो नहीं है। ये ही दुर्गुण पारिवारिक कलह का कारण बनते हैं। इनके बीजांकुर पहले से ही हों या ढील डालने पर पनपते रहें। प्रौढ़ हो जाय तो फिर आदत में सम्मिलित होने के उपरान्त उनका छूटना कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में उन दोषों को टालने या सहते रहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह जाता। तब वह लड़की घर सम्भालने या नेतृत्व कर सकने के योग्य तो रहती नहीं। किसी प्रकार निर्वाह भर करना पड़ता है। तलाश करने पर निकला जाय तो उसके स्वभाव का पता लगाया जाय। इसलिए ऐसे पड़ौसी से पूछताछ की जाय जो उस घर में आता जाता रहा हो और स्वभाव सम्बन्धी अधिक ध्यान देता रहा हो।
लड़कियां भी सुन्दर वर चाहती हैं। लड़के तो प्रायः इसी बात पर अड़ जाते हैं और अभिभावकों तक की अवज्ञा करके उस लड़की के लिए आग्रह करते हैं जो उनकी पसंदगी पर खरी उतरे। उनकी कसौटी सिनेमा की नर्तकियों को देखते-देखते बनती है। पर यह भूल जाते हैं कि धनवान, विद्वान होने की तरह रूपवान होने का भी एक नशा होता है। यदि वह भड़कने लगे तो सामान्य शकल सूरत के पति से संतुष्ट नहीं होती। उसके प्रति लगाव भी कम रहता है। उपेक्षा अवज्ञा का सिलसिला चल पड़ता है। घर में आने-जाने वाले उस पर जोर डालना शुरू करते हैं और बहका फुसला कर पतन के गर्त में गिराने तक के लिए सहमत कर लेते हैं। संस्कृत में एक उक्ति आती है ‘‘अतिरूपवती भार्या शत्रु’’ पत्नी का अतिरूपवान होना भी एक प्रकार से घर में शत्रु पाल लेने के बराबर है। उनमें मनचलापन आ जाता है, बौरा कर दिया जाता है। ऐसी दशा में घर में धन दौलत से लेकर प्रतिस्पर्धा जन्य मारकाट तक की नौबत आ जाती है। लड़की को देखते समय यह भी सोच लेना चाहिए कि वह भी अपने सदृश्य वर चाहे और न मिलने पर सन्तुष्ट रहे तो कुछ बेजा बात नहीं है। लड़के तो आमतौर से इस प्रकृति के होते हैं। खासतौर से खूबसूरत लड़के। वे पत्नी के प्रति असंतोष प्रकट करते या उपेक्षा करते देखे गये हैं। अस्तु औसत भारतीय के अपने देश में आमतौर से देखे जाने वाले रंग रूप को ही मध्यवर्ती सम्भावना मानकर स्वीकार करना चाहिए, बहुत खूबसूरत लड़का या लड़की देखने के कुचक्र में नहीं फंसना चाहिए।
अमीरों के घर में उनका मुंह मांगा दहेज देकर पहुंचा देने के लिए मध्यवर्ती या गरीब लोगों का प्रयत्न करना बेकार है। गरीब घरों की लड़कियां अमीरों के घर जाकर तिरस्कृत होती हैं और नौकरानी की तरह काम करने के लिए बाधित होती हैं। उन्हें ‘‘बेचारी’’ बनकर रहना पड़ता है। जिस घर में अमीरी पहुंचती है उसमें अहंमन्यता एवं बदमिजाजी, बदसलूकी भी जा पहुंचती हैं। सज्जनता, नम्रता, सहानुभूति, शिष्टता जैसे सद्गुण अनायास ही विदा हो जाते हैं। उन दुर्गुणों का दबाव उस लड़की पर पड़ता है जो गरीब घर से आई है। पग-पग पर तिरस्कृत होते रहने के कारण बहुत बार उन्हें आत्महत्या तक करनी पड़ती है। इन तथ्यों को ध्यान से देखते हुए औसत दर्जे या गरीब वर्ग के व्यक्ति को अपनी ही स्थिति का सुयोग ढूंढ़ना चाहिए। अमीरों के घर में खुशामद करके या दान-दहेज में अपना घर पूरा बेचकर उनके यहां ठूंसने की चेष्टा नहीं करनी चाहिए। ऐसा करते समय सोचा यह जाता है कि हमारी लड़की किसी प्रकार सुखी बनने की स्थिति में जा पहुंचेगी किन्तु होता ठीक उससे उल्टा है। लड़का ढूंढ़ते समय कन्या के अभिभावकों को इस तथ्य को भी सम्मिलित कर लेना चाहिए। न बहुत खूबसूरत लड़का ढूंढ़ा जाय, न अधिक सम्पन्न और न पैतृक सम्पदा पर नजर डाली जाय। देखा केवल इतना जाय कि लड़का कमाऊ है या नहीं। वह अपने परिश्रम से इतना कमा सकता है या नहीं। जिससे अपने परिवार का भली प्रकार निर्वाह कर सके। शिक्षा उच्चस्तरीय ही हो इसका महत्व नहीं मानना चाहिए क्योंकि बाप की दौलत को खर्च करते हुए कोई भी लड़का कालेज की पढ़ाई पढ़ सकता है। पर जैसा कि चाहा गया है कि उस आधार पर ऊंची नौकरी मिल जायेगी। इसकी कोई गारंटी नहीं। तीसरे डिवीजन पास होने वालों को ऊंची कक्षाओं में अच्छे स्कूलों में दाखिला तक नहीं मिलता। फिर ऊंची नौकरी कहां से मिले। उच्च शिक्षितों में एक भावना घर कर जाती है कि मिले तो ऊंची नौकरी ही मिले। लम्बे समय तक उसकी प्रतीक्षा कर लेने पर उन्हें झकमार कर कोई कम पैसे की निजी नौकरी करनी पड़ती है। वह इतनी कम होती है कि परदेश में किराये का मकान लेने में वेतन का अधिकांश भाग तो उसी में चला जाता है। साथ ही इज्जत रखने वाले कपड़े पहन कर भी रहना पड़ता है। इसके बाद जो बचता है वह इतना नहीं होता कि परिवार का पालन ठीक प्रकार हो सके। स्त्रियां तो जननी बनने के बाद योग्य नहीं रहतीं कि घर से बाहर जाकर कुछ कमाने धमाने में हाथ बंटा सकें। उनकी अशिक्षा, संकोचशीलता और प्रतिबन्धिताएं भी ऐसी होती हैं कि वे यदि कुछ करना चाहें तो कर भी नहीं सकतीं। ऐसी दशा में उन्हें वास्तविक गरीबों से भी गई गुजरी स्थिति में रहना पड़ता है। सुशिक्षित लड़के के साथ रहकर भी वे गरीबों से गई गुजरी स्थिति में रहती हैं।
ये वे खतरे हैं जिन्हें आकर्षण समझकर कम आय वाले फंस जाते हैं और पीछे जन्म भर अपनी भ्रान्ति के लिए सिर धुनते रहते हैं। लड़का या लड़की ढूंढ़ने से पूर्व उचित सुयोग, संयोग, ढूंढ़ने से पहले अपना दिमाग साफ कर लेना चाहिए किनके दरवाजे जाना है, किनके नहीं। इस संदर्भ में अपना मत बन जाने पर आधी भाग दौड़ में कटौती हो जाती है और केवल उन्हीं के यहां जाया जाता है जहां उपयुक्तता है।
उपयुक्तता की कसौटियां ये मानी जा सकती हैं कि लड़का स्वस्थ है भले ही सुन्दर न हो। स्वभाव व्यवहार में असभ्य न हो। भले ही वह उच्च शिक्षित न हो। काम धन्धे से लगा हुआ हो भले ही उसके घर में पैतृक सम्पदा न हो। उसका परिवार सुसंस्कारी, सज्जन मिलनसार हो। ऐसा न हो जो कमाई अधिक या अवांछनीय होने के कारण गर्व से फूल गया हो और सीधे मुंह बात न करता हो। अनुचित कमाई से घर भरने वाले ही अधिक इतराते, अधिक उद्दण्डता दिखाते देखे गये हैं उनके घरों में मांस मदिरा का भी दौर रहता है। ऐसे घरों में किसी आधुनिका का गुजारा तो हो सकता है किन्तु संभ्रान्त घर की शालीन, संकोची या सज्जन घर की लड़की का निर्वाह नहीं हो सकता। किसी प्रकार उसे दिन काटने पड़े तो रोते रुलाते ही अपना समय गुजारती है।
इसलिए सयानी कन्या जब 12 वर्ष से अधिक आयु की हो जाय तब विवाह की बात सोचनी चाहिए और अपने प्रचलन के हिसाब से लड़का या लड़की ढूंढ़ने के लिए निकलना चाहिए।
लड़की को ऐसी न रहने दिया जाय कि वह घर गृहस्थी के बारे में, अपने शरीर के बारे में, दाम्पत्य जीवन के उत्तरदायित्व के सम्बन्ध में कुछ समझती ही न हो। जीवन में आये दिन काम आने वाले गुण, कर्म, स्वभाव का स्वरूप एवं ढांचा स्कूलों में नहीं पढ़ाया जाता। वहां अंकगणित, बीज गणित, इतिहास, भूगोल आदि के ऐसे विषय पढ़ाये जाते हैं जो व्यावहारिक जीवन में काम नहीं आते। जो काम आते हैं वे पढ़ाये नहीं जाते हैं। इसलिए अभिभावकों का कर्तव्य है कि वे लड़कियों को ही क्यों? लड़कों को भी व्यावहारिक ज्ञान के सम्बन्ध में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। यह कार्य ट्यूशन लगा कर किराये के मास्टरों से नहीं कराया जा सकता। यह ऐसा दायित्व है जिसे स्वयं ही निभाना चाहिए। माता-पिता दोनों मिलकर उन सभी विषयों को पढ़ा सकते हैं जो स्कूलों में नहीं पढ़ाये जाते, पर स्कूली पढ़ाई से भी अधिक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि इस प्रकार की भारत की क्षेत्रीय एवं जातीय समस्याओं के अनुरूप समाधान सुझाने वाली पुस्तकें लिखने का काम कहीं से भी आरम्भ नहीं हुआ है। बाजार में केवल अंग्रेजी पुस्तकों के अनुवाद मात्र देशी भाषाओं में मिलते हैं। उनमें पाश्चात्य देशों की स्थिति के अनुरूप ही कुछ लिखा छपा मिलता है।
उपयुक्त लड़की लड़के तलाश करने में एक कठिनाई और है कि पुरातन मान्यता पग-पग पर आड़े आती है कि अपनी ही जाति में शादी करनी चाहिए। जातियां बिखरी हुई हैं। पास-पास वे कदाचित ही बड़ी संख्या में कहीं बसी हों। इसलिए लड़की लड़के ढूंढ़ने के लिए दूर-दूर बिखरे क्षेत्रों में जाना पड़ता है। तब ऐसे लड़की लड़कों का पता लगाना कठिन होता है जो गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अनुकूल पड़ते हैं। उनके बारे में समग्र एवं गहरी जानकारी हो।
बहुत दूर दराज के रिश्तों में एक प्रकार से सम्बन्ध विच्छेद की स्थिति बन जाती है। पितृगृह और ससुराल एक दूसरे से जब बहुत दूर पड़ जाते हैं तो दोनों परिवारों के सदस्य परस्पर बहुत दिनों में मिलते हैं। तब उनकी घनिष्ठता और आत्मीयता भी कम हो जाती है। यह स्थिति दुःख सुख बंटाने में और परस्पर निकटवर्ती रहने में सहायक नहीं रहती। लड़कियों को तो विशेष रूप से इससे भावनात्मक ठेस लगती है। एक पक्ष से तिरस्कृत होने पर दूसरे पक्ष की हिम्मत हिमायत सिफारिश का आधार बना रहता है। इस स्थिति में वे निराश नहीं होतीं। हिम्मत में कमी नहीं आने पाती। दुःख मुसीबत में एक पक्ष उपेक्षा करे तो दूसरे से सहायता मिलने की आशा बनी रहती है। यह स्थिति दूरदृष्टि से उपयोगी है। एक पक्ष के सिर पूरी तरह मढ़ दिए जाने, दूसरी ओर से सांत्वना के स्वर भी न मिलने से वे टूट जाती हैं और अपने को तिरस्कृत, उपेक्षित, असहाय अनुभव करने लगती हैं। इस स्थिति से तभी बचा जा सकता है जबकि दोनों परिवारों के बीच लम्बी दूरी न हो, किसी न किसी के आने जाने की खबर सुध लेते रहने का सिलसिला बना रहे।
जाति, उपजातियों की कट्टरता अब टूट रही है। प्रगतिशीलता समूचे हिन्दू समुदाय को एक करके रहेगी। जातियों के आधार पर अभी जो बिखराव चल रहा है वह बहुत समय टिक न सकेगा। लोग जाति बन्धन को तोड़कर हिन्दू मात्र में विवाह करने लगेंगे। कारण कि जाति-पांति के विभाजन का आधार न तो तर्क संगत है न विवेक संगत। न उसमें बुद्धि विवेक का समर्थन है न उसकी संगठनात्मक उपयोगिता। प्राचीन परम्पराएं भी इसका समर्थन नहीं करतीं। व्यवसाय के हिसाब से वर्ण और जातियां बनी थीं। अब हर व्यक्ति हर व्यवसाय को करने लगा है। ऐसी दशा में जाति वंश का कोई स्थिर आधार नहीं रहा और वह प्रचलन लकीर पीटने जैसा रह जाता है।
यदि अभी से इन टीलों को, खाई खड्डों को ढहा कर समतल बनाना शुरू कर दिया जाय तो यह सब प्रकार श्रेयस्कर ही होगा। विवाह शादियों में इससे भारी सुविधा मिलेगी। अपनी ही जाति का लड़का या लड़की ढूंढ़ने में उस छोटे दायरे के अन्तर्गत इच्छित जोड़ियां मिलने में भारी कठिनाई होती है। लड़कों की नीलामी बोली भी इसलिए बढ़ती है कि उस छोटे दायरे में विक्रेता कम और खरीददार ज्यादा होते हैं। अच्छे लड़कों का एकाधिकार बन जाता है और फिर वे अपना माल मुंह मांगी कीमत पर बेचते हैं। यदि दायरा चौड़ा हो। कम से कम उन जातियों का झंझट तो मिट ही जाय। प्राचीन काल की तरह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चार ही विभाजन हों तो हर वर्ग के करोड़ों लड़के और करोड़ों लड़कियां सामने होंगे इनमें से इच्छित जोड़ी मिलाने में तनिक भी कठिनाई न होगी। पड़ौस के गांव मुहल्ले में भी जान पहचान के सम्बन्धी मिल जायेंगे और शादियों की ढूंढ़ खोज के लिए जो भारी दौड़ धूप करनी पड़ती है उसकी आवश्यकता न रहेगी।
अपने गायत्री परिवार में ही इन दिनों चौबीस लाख के करीब सदस्य हैं। यह संख्या किसी बड़ी उपजाति के समतुल्य है। यदि इसी परिवार के लोग बिना जाति उपजाति का सवाल उठाये आपस में विवाह शादी करने लगें तो उनकी विचारों की समता के कारण आत्मीयता भी अधिक रहेगी और दान, दहेज, बारात, धूमधाम का सवाल भी न उठेगा। यदि सुयोग्य जोड़े ढूंढ़ने हैं तो हमें जाति पांति की कट्टरता छोड़नी होगी और आदर्शवादियों को अपने परिकर को इस हेतु महत्व देना होगा।

