विवाह खिलवाड़ नहीं, भारी दायित्व है
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
सड़े गले विचारों वाले दकियानूसी समुदाय में यह अपेक्षा की जाती है कि विवाह के उपरान्त जल्दी ही सन्तान होनी चाहिए। उसे सौभाग्य समझा जाता है। विवाह हुए कुछ समय निकल जाये और सन्तान न हो तो चिन्ता की जाने लगती है। वधू को वन्ध्या कहकर उस पर दोषारोपण का सिलसिला चल पड़ता है। दूसरा विवाह कर लेने की बात सोची जाने लगती है। खाली गोद नारी को अभागी कहा जाने लगता है। जबकि ऐसे अधिकांश मामलों में पुरुष की दुर्बलता ही आधार भूत कारण होती है। लड़कों में बचपन से ही कुटेवें पड़ जाती हैं और वे अपना पुरुषत्व खो बैठते हैं। ऐसी दशा में पुरुष की हीनता का दोष नारी के सिर पर मढ़ने का रिवाज ही व्यापक होते देखा गया है। जिनके जल्दी-जल्दी कई बच्चे हो जाते हैं उन्हें भाग्यवान कहा जाता है। लड़के हुए तो सोचा जाता है कि कमाई से घर भरेगा। लड़कियां होने लगें तो लड़कों की प्रतीक्षा में उस संदर्भ में और भी जल्दबाजी के प्रयोग किये जाते हैं। कई बार तो इसी प्रयोग में ढेरों लड़कियों से घर भर जाता है और उनके लिए जननी को लज्जित तिरस्कृत किया जाता है।
विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या विवाह के उपरान्त जल्दी ही बच्चे होने चाहिए और उनकी संख्या बढ़ती ही रहनी चाहिए? समय को देखते हुए यह चिन्तन सर्वथा अनुपयुक्त ही कहा जा सकता है। ईसा के चार हजार वर्ष पूर्व संसार भर में मनुष्य की जनसंख्या पांच करोड़ के करीब थी। अब वह बढ़कर 500 करोड़ हो गयी है। यह बढ़ोत्तरी यदि इसी चक्रवृद्धि गति से चलती रही तो अगले पचास वर्ष में यह गणना 1000 करोड़ तक पहुंच सकती है।
वर्तमान स्थिति का पर्यवेक्षण करने से पाया गया है कि जितने मनुष्य अभी हैं उनके लिए खाद्य पदार्थ कम पड़ रहे हैं। ईंधन बेतहाशा घट रहा है। लकड़ी, कोयला, तेल, बिजली आदि को अधिक मात्रा में उपलब्ध किये जाने की पग-पग पर आवश्यकता अनुभव की जाती है। बढ़ती हुई आबादी के लिए रोजी, शिक्षा, चिकित्सा, मकान, कपड़ा, आदि सभी जीवनोपयोगी वस्तुएं कम पड़ती जाती हैं। अनुमान है कि यह संकट अगले पचास वर्ष में अत्यधिक भयावह रूप धारण कर लेगा। कारखानों की बढ़ोत्तरी से हवा और पानी विषाक्त होता चला जाता है। खाद्य के साथ खनिजों की भी कमी पड़ेगी। धरती का जितना दोहन संभव है उसकी चरमसीमा पर जा पहुंचा है। जनसंख्या बढ़ते रहने पर दुर्भिक्ष पड़ेंगे। बेरोजगारी बीमारी अशिक्षा का अनुपात बढ़ेगा। ऐसी दशा में प्रगति के लिए किये जाने वाले सभी प्रयास ओछे पड़ते जायेंगे। मनुष्य जाति क्रमशः मुसीबत के अधिक गहरे दलदल में फंसती जायगी।
विज्ञजनों की पुकार है कि अब धरती का बोझ न बढ़ाया जाय। सन्तानोत्पादन रोका जाय। इस कारण जो भारी विपत्ति बढ़ रही है उसे यहीं पर विराम दिया जाय। कुछ वर्षों तक सन्तानोत्पादन को समाज द्रोह घोषित किया जाय। जो समझाने पर नहीं समझते उन्हें कड़ा दण्ड दिया जाय। जिस भी उपाय से प्रजनन रुकता हो उसे काम में लाया जाय। परिवार नियोजन की आवश्यकता जन साधारण को समझाने के लिए सरकारें विपुल धन खर्च कर रही हैं, पर अनगढ़ों की कमी नहीं वे अपने लिए स्वयं विपत्ति मोल लेने से बाज नहीं आ रहे हैं। यह भारी चिन्ता का विषय है और भयानक दुर्गति की संभावना का भी। लगता है कि ना समझी की विकल्प प्रताड़ना ही हो सकती है। भले ही वह शासन द्वारा समाज द्वारा या प्रकृति द्वारा ही जाय।
कुछ समय पहले यह समझा जाता था कि विवाह एक अनिवार्य आवश्यकता है। जिसे हर किसी को करना चाहिए। अयोग्य लड़कियों और लड़कों को भी किसी प्रकार इस बन्धन में बांध दिया जाता था। विवाह का अर्थ यौनाचार की खुली छूट भी है। यौनाचार का प्रतिफल है सन्तानोत्पादन। यह क्रम चल पड़े तो फिर बहुत समय तक चलता ही रहता है। एक-एक जोड़ा कई-कई सन्तानें जनता है। उनकी संख्या कई बार तो दस बारह तक पहुंचती है। औसत प्रजनन चार-पांच तक तो होता ही है। इनमें से दो-तीन मर भी जायें तो भी हर पचास वर्ष में आबादी दूनी हो जाती है और फिर वह चक्रवृद्धि दर से बढ़ती है। इनमें से अधिकांश अनगढ़ और अशिक्षित होते हैं। उनके शरीर के लिए उपयुक्त आहार, जल, हवा और मस्तिष्क के लिए शिक्षा संगति का प्रबन्ध न होने पर भी उस उत्पादन को अनगढ़ होना ही चाहिए।
इस जमाने में बच्चा पालना हाथी खरीदने के समान है। उसे स्वस्थ और सुयोग्य बनाने के लिए भरण-पोषण की बहुमुखी सुविधाएं चाहिए। पर अकेली जननी उन सब को घेर बटोर कर बैठती सोती है। तो सबके लिए समुचित स्थान, वस्त्र, आहार, शिक्षा, चिकित्सा, खेल, विनोद, संगति आदि का प्रबन्ध न के बराबर हो पाता है। ऐसी दशा में वे किसी प्रकार जीते-मरते घास-फूंस की तरह बढ़ते और बनते-बिगड़ते रहते हैं। सही रीति से पालन करने के लिए बच्चे पर भी उतना ही खर्च आता है जितना हाथी बांधने पर। जिनके पास अपने पत्नी के परिवार के निर्वाह के उपयुक्त साधन नहीं वे किस प्रकार इस बढ़े हुए नये उत्पादन की व्यवस्था करें? कैसे उन्हें सुयोग्य, सुविकसित बनायें?
हर व्यक्ति का विवाह—हर विवाह में ढेरों खर्च हर दम्पत्ति द्वारा ढेरों प्रजनन—हर बच्चे की ढेरों आवश्यकताएं—उन्हें जुटाने के लिए साधनों का अभाव—यह समूचा गोरखधंधा ऐसा है जिसके फलस्वरूप अगणित प्रकार के अभाव और संकट उत्पन्न होते हैं। उन्हें सुलझाने का जितना प्रयत्न बन पड़ता है उससे अनेक गुनी नई आवश्यकताएं सामने आती हैं। वे अपूर्ण रहने पर अभिभावकों के लिए ही नहीं समूचे विश्व के लिए विपत्तियों के घटाटोप बनकर घुमड़ती बरसती हैं। इस जंजाल से निपटने के लिए कुपित प्रकृति ऐसे भयंकर उपाय करती है जिनके कारण सर्वत्र हाहाकार ही उमड़ता है। शांति संतुलन बुरी तरह खतरे में पड़ जाता है।
इस अनसुलझी गुत्थी को सुलझाने का एक ही उपाय है कि विवाहों की वर्तमान परिपाटी, प्रक्रिया और परिणिति पर रोक लगायी जाय। असमर्थ नर-नारी विवाह न करें। जो इसके बिना न रह सकें वे सन्तानोत्पादन न करें। परिणिति को समझें। गर्भ धारण करने पर नारी की जीवनी शक्ति निचुड़ती है। इसके अतिरिक्त उसे अपना रक्त दूध के रूप में बच्चे को पिलाना पड़ता है। यह प्रथम चरण है जिसकी विपत्ति जननी को ही खोखला बना देती है। अब पिता की बारी आती है उसे भरण-पोषण की सामग्री जुटानी पड़ती है। शिक्षा, चिकित्सा, शादी रोजी आदि की एक से एक भारी व्यवस्था करनी पड़ती है। यह सब जुटाने में उसका भी कचूमर निकल जाता है। जुगाड़ बिठाने में कमर टेढ़ी हो जाती है। ईमानदारी, बेईमानी का अन्तर भुलाकर जैसे भी जो भी करते बन पड़े करना पड़ता है। इसके बाद भी असंस्कृत बालक स्वयं जिस प्रकार दुःख पाते, अभिभावकों को दुःख देते और समाज में व्यापक अनाचार फैलाते हैं उसे देखते हुए एक स्वर में यही कहा जा सकता है कि काम क्रीड़ा के लिए किये गये विवाह इतने अलाभदायक होते हैं कि उन्हें नरक भुगतने के समतुल्य कहा जा सकता है।
भगवान ने जिन्हें आगा-पीछा सोचने की सामर्थ्य नहीं दी है उन विमूढ़ों को क्या कहा जाय? वे तो अंधे होकर चलते हैं। जगत गति उन्हें व्यापती ही नहीं। मक्खी मच्छरों की तरह पेट प्रजनन में निरत रहते हैं और निरर्थक जीते निरर्थक मरते हैं। विवेकहीन अदूरदर्शी जो भी कर गुजरें उसे कम ही मानना चाहिए।
इस संदर्भ में उच्चस्तरीय विज्ञ वर्ग में एक ऐसी योजना पर विचार किया जा रहा है कि सांपों का सफाया तो न किया जाय। अपितु उन सुन्दर एवं उपयोगी प्राणी को विषहीन बना कर जीवित रहने दिया जाय। तात्पर्य यह है कि विवाह तो होते रहें पर वे बच्चे पैदा न करें, परिवार नियोजन इस कार्य पद्धति का नाम है। इस योजना पर प्रायः सभी विचारशील देश और वर्ग अत्यन्त गंभीरतापूर्वक चिन्तनरत हैं। इस निमित्त कितने ही उपकरण विनिर्मित किये गये हैं, पर उनके आधे-अधूरे प्रयोग किन्हीं बिरलों ही द्वारा किये जाने के कारण सफलता नाम मात्र को ही मिल रही है। विभाग अपनी जगह काम करता रहता है और प्रजनन अपनी रीति से अपनी राह पर चलता रहता है। समझदार लोग रोकथाम के उपाय करते हैं पर उन पिछड़े लोगों के लिए क्या कहा जाय जो इस प्रकरण में लाभ-हानि जैसे कुछ सोचते ही नहीं और जो होता है उसे होने देने में संकोच नहीं करते।
विज्ञ समाज में यह सरल माना गया है कि विवाहों की रोकथाम किये बिना भी किस प्रकार प्रजनन वृद्धि से बचा जा सकता है। इसके लिए जंजाल भरे उपायों से पीछे हटकर एक अत्यन्त निरापद और सर्वसुलभ उपाय पाया गया है कि ‘‘वीर्यपात योनि से बाहर किया जाय।’’ इसमें किसी खर्च या झंझट की आवश्यकता नहीं पड़ती। समझदार लोग इतनी भर सतर्कता आसानी से बरत सकते हैं और विवाहित रहते हुए भी ब्रह्मचारी जैसी उपलब्धि से लाभान्वित हो सकते हैं।
ऐसे अनेक लोक सेवियों मनीषियों के उदाहरण सामने हैं जिनने विवाह से मिलने वाली सुविधा का लाभ तो उठाया पर थोड़ी सतर्कता बरतकर सन्तानोत्पादन के जंजाल से बच गये। जो शक्ति बच्चों के भरण-पोषण में लगती उसे बचाकर उनने अपने दाम्पत्य जीवन को सुविकसित बनाया, मिल-जुलकर महत्वपूर्ण कार्य किये और जितनी परिवार की जिम्मेदारियां पहले से ही सिर पर थीं उन्हें निभाया। अमेरिका में इससे भी एक कदम बढ़कर ऐसा प्रचलन आरम्भ हुआ है कि स्त्री-स्त्री से विवाह कर ले और मिल-जुलकर समुन्नत निश्चिन्त जीवन जिये।
कौन क्या उपाय अपनाये यह ऐच्छिक विषय है। अविवाहित रहने से लेकर परिवार नियोजन के कृत्रिम उपायों तक जिसे जो सूझ पड़े वह उस राह को अपनाये, पर ध्यान इतना अवश्य रहे कि यह समय आंखें बन्द करके संतानोत्पादन करते रहने का नहीं है। प्राचीन काल में इसके लिए ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम उपाय था उसे साहसी और संयमी व्यक्ति अभी भी अपना सकते हैं।
जिन्हें बच्चे पालने की इच्छा है वे पिछड़े लोगों के बहुप्रजनन में से कुछ अण्डे बच्चे अपने घोंसले में रखकर उन्हें पोसने और पढ़ाने, स्वावलम्बी बनाने का पुण्य परमार्थ जैसा कार्य अपने लिए चुन सकते हैं।
जिनके पास कोई स्थायी सम्पत्ति नहीं है। जो रोज कमाते और रोज खाते हैं जिनकी स्त्रियां कमाने-धमाने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे लोग भी अपने पीछे कई-कई बच्चे छोड़कर मर जाते हैं। इन स्त्रियों की सबसे अधिक दुर्दशा होती है। सहानुभूति के अभाव में ससुराल वाले या पिता के घर वाले भी इस बड़े कुटुम्ब का पालन करने में उत्साह नहीं दिखाते ऐसी दशा में इन अनाथ बालकों की भी जो दयनीय दुर्दशा होती है उसे देखकर कलेजा कांपता है। कई परित्यक्ताओं के बालकों को भी ऐसी स्थिति में निर्वाह करना पड़ता है।
जिनकी संतानें नहीं हैं। यदि हैं तो अधिक बच्चे पालने की स्थिति में हैं उन्हें ऐसे बच्चों को भरण-पोषण के लिए एकत्रित कर लेना चाहिए और उन्हें स्वावलम्बी बनाने के बाद स्वतन्त्र जीवन यापन के लिए छोड़ अपने पैरों खड़ा हो जाने देना चाहिए।
उत्तराधिकारी बनाने के लिए, वंश चलाने के लिए जो किसी का बच्चा गोद रख लेते हैं, वे भारी गलती करते हैं। ऐसे बच्चे तनिक समझदार होते ही यह चाहने लगते हैं कि गोद रखने वाला कितनी जल्दी मरे और उन्हें गुलछर्रे उड़ाने के लिए कब धन-दौलत हाथ लगे। मुफ्त का धन हर किसी को दुर्व्यसनी, दुर्गुणी बना देता है। इसलिए गोद रखने की ओर बिना संतान वालों को मन नहीं ललचाना चाहिए। इसमें बुढ़ापे में सहायता पाने का स्वार्थ है जो उल्टी प्रतिक्रिया पैदा करता है। गोद लिया हुआ बच्चा कदाचित ही उन लालची अभिभावकों की इच्छा पूर्ति करता हो, जो समर्थ है उन्हें तोता, कबूतर, कुत्ता, बिल्ली आदि पालने का शौक पूरा करने की अपेक्षा यही उचित है कि असमर्थ लोगों द्वारा अंधाधुंध बच्चे पैदा कर लेने और उन्हें पाल न सकने की स्थिति जहां भी देखी जाय वहां उदार सहायता का हाथ बढ़ाया जाय और अपने घर को ही एक अनाथालय बना लिया जाय।
संभव हो तो आश्रयहीन, साधनहीन, महिलाओं, परित्यक्ताओं, विधवाओं के भरण-पोषण का ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए जिससे वे घर रहकर भी कुछ उद्योग धंधों के सहारे कमा लिया करें। कुछ सहायता प्राप्त कर लिया करें। जिनके मर जाने पर पत्नी तथा संतान की ऐसी दुर्दशा होने की संभावना है उन्हें विवाह का दायित्व नहीं ओढ़ना चाहिए। ओढ़ ही लिया है तो बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए। यदि कर ही बैठे हैं तो इतनी रकम का बीमा करा लेना चाहिए जिससे आश्रितों का भरण-पोषण होता रहे। भाइयों के भरोसे उन अनाथों को छोड़ जाना व्यर्थ है। स्वार्थान्ध हो विधवाओं की बची पूंजी हड़पने का जो प्रयत्न करते हैं। सहायता तो क्या देंगे?
विवाह एक अत्यन्त जोखिम भरा और उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य है। खेल खिलवाड़ न समझा जाय। जो उसे अन्त तक निभा सकने की क्षमता अपने में पायें वे ही इस हेतु कदम पढ़ायें।

