सन्तानोत्पादन—भारी दायित्व
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जमाने की हवा जिस दिशा में चल रही है उसे देखते हुए मनुष्य का मन यदि जोड़ी बनाकर रहने और कामुकता का रसास्वादन करते रहने के लिए चले तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मनोरंजन के माध्यमों में प्रकृति ने जननेन्द्रिय को प्रमुख बनाया है। फिर वातावरण ऐसा बन गया है कि साहित्य, सिनेमा, टेलीविजन, रेडियो, गायन, वादन, आदि क्षेत्रों में कामुकता का गहरा प्रवेश हो चला है। अश्लील फिल्मों, चित्रों की कानून का बांध तोड़ते हुए बाढ़ सी आ गई है। एकान्त की पारस्परिक चर्चाओं में इसी संदर्भ का बाहुल्य रहता है। ऐसी दशा में संयमशील ब्रह्मचारी जीवन जी सकना किसी शूरवीर और मनोजयी का ही काम है। जो बात कभी सामान्य थी अब वह अपवाद हो गई है। नर नारी सभी इस तूफान में तिनके पत्तों की तरह उड़ते चले जा रहे हैं।
ऐसी दशा में गुप्त व्यभिचार या अप्राकृतिक कृत्यों से होने वाली हानि तथा अव्यवस्था, अस्तव्यस्तता से बचने के लिए हमें उन उपायों को अपनाना पड़ेगा जिसमें दुराव पाखण्ड रचने की अपेक्षा यथार्थता को अपनाया और सामान्य रीति से जिया जा सके।
सभी धर्म सम्प्रदायों में उनका नेतृत्व करने वाले पीर फकीरों, सन्त महन्तों का एक बड़ा वर्ग होता है जो एकाकी रहने का—अविवाहित समय गुजारने का दम्भ रचता है। इनमें से उंगलियों पर गिनने जितने ही ऐसे होते हैं जो मन, वचन, कर्म से वास्तविक ब्रह्मचर्य का पालन करें। शेष उसमें कहीं न कहीं के छिद्र ढूंढ़ लेते हैं। भेद प्रकट होने पर निन्दा होती है। चर्चा का विषय बनता है। तब एक घोंसले को खाली करके दूसरे जंगल में दूसरे पेड़ पर दूसरा घोंसला बनाते हैं। ऐसे ही उजड़ते बिगड़ते खेल चलते रहते हैं और वह प्रसंग गौद हो जाता है जिसके लिए उनने अपने को समर्पित करने की घोषणा की थी।
इस विडम्बना की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि लोक सेवी-धर्म सेवी, नर नारी कार्य संलग्न तो इसी निश्चय से रहें, पर अपने साथी तलाश कर ले। प्राचीनकाल के प्रायः सभी ऋषि मुनि जोड़ियों में रहते थे। कबीर ने तत्कालीन पाखण्ड को उखाड़कर अपनी पत्नी तलाश ली थी। राम कृष्ण परमहंस भी विवाहित थे। देवताओं में से प्रायः शत-प्रतिशत गृहस्थ हैं। जापान के गांधी कागाबा ने लोक सेवा का व्रत लिया था, पर उनकी पत्नी सहेली के रूप में उनके कार्य में निरन्तर हाथ बंटाती रही। जिनमें साहस रहा है। अन्तर और व्यवहार को एकाकार बनाकर जीवन यापन करने की हिम्मत रही है, उनने अपने को विशिष्ट प्रदर्शित करने की अपेक्षा सामान्य रहने में सत्य का निर्वाह अधिक अच्छी तरह होते देखा और जोड़ा बना लिया। यदि धर्माचार्यों के मन को परखा जाय और परम्परा के आडम्बर को महत्वहीन होने का तथ्य समझाया जाय तो अपने जैसी आयु तथा भावना वाले साथी आसानी से ढूंढ़ सकते हैं और अपेक्षाकृत अधिक अच्छा और अधिक मात्रा में काम कर सकते हैं। सिख धर्म में गुरुओं की परम्परा के साथ गृहस्थ जीवन जुड़ा रहा है। अच्छा हो अन्य वर्गों के सन्त भी इसी रीति-नीति को अपनायें और निरर्थक आडम्बर को उतार फेंकें। ‘संभोग से समाधि’ की संरचना करने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि साथी सेक्रेटरी आदि जो भी नाम रखें पर दाम्पत्य व्यवस्था बनाकर उन लाभों से लाभान्वित हों जो एक सद्गृहस्थ को सुख-दुःख में साथ देने वाले मित्र के रूप में मिलते हैं।
कार्य में रुकावट तब पड़ती है जब बाल बच्चों का दायित्व सिर पर आता है और उसे निवाहने के लिए हजार प्रपंच रहने पड़ते हैं। अब यह पूर्णतया संभव है कि बिना बच्चों का वैवाहिक जीवन चल सके। मनीषियों, लोक सेवियों, समाज सुधारकों, धर्मोपदेशकों को ऐसे ही विवाह करने चाहिए। उन्हें ब्रह्मचर्य की परिभाषा बच्चे न उत्पन्न करने के रूप में करनी चाहिए। पत्नी हाथ बंटाती है, पर बच्चे जनने के उपरान्त वह भी निरर्थक हो जाती है और पति को भी भोंड़े तरह के जंजाल में जकड़ देती है। जिनके सामने कोई उद्देश्य नहीं है उन्हें खाली बैठे रहने की अपेक्षा बच्चे पैदा करने और पालने में लगे रहना भी एक मनोरंजक काम है।
आदर्शवादी उद्देश्यों के लिए लोक-मंगल निरत हलका फुलका जीवन यापन करना ही ब्रह्मचर्य का मूलभूत उद्देश्य है। इसके लिए यदि नर या नारी को अपना साथी चुनने की आवश्यकता अनुभव हो तो फिर इतना और दायित्व ओढ़ना चाहिए कि साथी की प्रकृति तथा क्षमता के अनुकूल अनुरूप बनाने के लिए निर्धारण से पूर्व ही समुचित प्रयत्न कर लिया जाय। शोभा या शिक्षा से प्रभावित न होकर यह देखना चाहिए कि आदर्शवादी रीति-नीति के निर्वाह में जिस सादगी, सज्जनता, श्रमशीलता, संतोष भावना की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है, उसके बीजांकुर पहले से ही मौजूद हैं या नहीं। गाड़ी के दोनों पहिये एक लाइन पर चलें तो ही गति बनती है। यदि एक अड़ जाय या उलट जाय तो फिर बात पैदल चलने से भी महंगी पड़ती है। साधारण गृहस्थ जीवन में भी समन्वय और सहयोग की आवश्यकता रहती है फिर आदर्शवादी गतिविधियों में तो कर्त्ताओं को सर्वतोभावेन एकीभूत होना चाहिए। ऐसा विवाह करके सन्तानोत्पादन से बचा रहने वाला विवाह वस्तुतः ब्रह्मचर्य पालन की आवश्यकता ही पूरी करता है।
सन्त परम्परा का ब्रह्मचर्य ऐच्छिक है। उसे बीच में तोड़ा या छोड़ भी जा सकता है। पर कुछ बाधित ब्रह्मचर्य भी हैं। उनमें समाज परम्परा एवं परिस्थितियों को ध्यान में रखना पड़ता है। बड़ी उम्र के विधुर जिनके कई बच्चे भी हैं, इसी प्रकार कई सन्तानों वाली विधवायें, परित्यक्तायें भी असमंजस की स्थिति में रहती हैं। उन्हें बच्चों के हित को ध्यान में रखना पड़ता है। प्रथम तो ऐसे जिम्मेदारियों से लदे व्यक्ति के साथ रहने के लिए कोई साथी तैयार ही नहीं होता। दूसरे यदि हो भी जाय और नए साथी से सन्तानें होने लगें तो पिछली और अब की सन्तानों के बीच भेद-भाव चल पड़ता है। पैतृक सम्पत्ति को लेकर बंटवारे के प्रश्न पर कलह खड़ा होता है। यह विग्रह सन्तानों की ही नहीं अपने अभिभावकों को भी लपेट में ले लेता है। बच्चे छोटे रहते हैं तब तक गाड़ी चलती रहती है पर जैसे ही वे बड़े होते हैं अभिभावकों से उलझने लगते हैं और आपस में भी कलह से बढ़कर शत्रुता तक जा पहुंचते हैं। आरम्भ में जिस उत्साह से बच्चों को छोटा समझकर उनके भरण-पोषण के लिए सहायता तलाशने की दृष्टि से विवाह किया था वह ही कुछ समय उपरान्त पश्चाताप का कारण बनता है। गुत्थी सुलझने की अपेक्षा और अधिक उलझ जाती है।
इस प्रकार के विवाह जहां करने ही पड़ें वहां यह पहले से ही निश्चय कर लेना चाहिए कि दूसरे पति या पत्नी से नई सन्तान न पैदा की जायगी। विधवा और विधुरों के लिए ब्रह्मचर्य पालन की परम्परा है। यदि व्यक्ति साथ-साथ सहयोगी के रूप में रहें किन्तु सन्तानोत्पादन न करें तो बात निभ सकती है, गाड़ी चलती रह सकती है।
ऐसे विवाह सेवक या सेविका नियुक्ति के रूप में भी हो सकते हैं। निर्धारित वेतन मिलते रहने पर समयानुसार कुछ पूंजी जमा हो जाती है और उससे उस समय का सहारा हो सकता है जब घर के कलह से दोनों को अलग होना पड़े। अथवा स्वयं ही घर छोड़कर अपना स्वतंत्र ठिकाना बनाना पड़े। वृद्धावस्था के लिए हर समझदार आदमी को ऐसी व्यवस्था रखनी चाहिए जिससे उन्हें बालकों पर आर्थिक दृष्टि से बोझ बन कर न रहना पड़े। जो लोग हाथ खाली करके पूरी तरह सन्तान पर आश्रित हो जाते हैं उन्हें सन्तान की बेरुखी और उनकी पत्नियों की तानेकशी शूल के समान चुभते हैं। पर मन मसोस कर बैठा रहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहता। अच्छा हो कि सामने से पहले ही इस कठिनाई से बचे रहने का मार्ग मोड़ लिया जाय।
परित्यक्ताओं और विधवाओं की स्थिति प्रायः समान होती है। बच्चों का प्रश्न उनके भी आड़े आता है। उनके साथ बच्चे भी भगा दिये जाते हैं। कभी-कभी उन्हें छीन भी लिया जाता है। दोनों ही परिस्थितियों में उनका मन कचोटता रहता है। पाश्चात्य देशों में सरकारी बालगृहों में अनाथ सन्तान के भरण-पोषण की व्यवस्था है, पर भारत में ऐसा कुछ नहीं है। मातायें अपने बलबूते पर उन्हें सुयोग्य स्वावलम्बी नहीं बना पातीं। ऐसी दशा में उन्हें बाल श्रमिक-बाल अपराधी-या आवारा भिक्षुक बनना पड़ता है।
अच्छा हो जिनकी सन्तानें नहीं हैं, जो उत्तराधिकार में सम्पदा सौंपने के लिए किसी सम्बन्धी का बच्चा गोद रखना चाहते हैं, वे अपना दृष्टिकोण बदलें और वंश चलाने, बुढ़ापे का सहारा ढूंढ़ने की अपेक्षा किन्हीं अनाश्रित बालकों को स्वावलम्बी सुशिक्षित बनाने के लिए अपने पास रख लें और परमार्थ भाव से उनका भरण-पोषण करें।
अपने देश में नारी की दयनीय दशा को देखते हुए ऐसी परमार्थिक संस्थाओं की अतीव आवश्यकता है जो अनाश्रित महिलाओं विशेषकर उनके बालकों के भरण-पोषण की व्यवस्था करें। गौशाला चलाने की अपेक्षा यह पुण्य-परमार्थ किसी भी प्रकार कम सहृदयता-पूर्ण नहीं है।
जिस विधवाओं या विधुरों की सन्तान नहीं हैं, उनके विवाह तो परस्पर किसी प्रकार हो भी सकते हैं। पर असली कठिनाई उन परित्यक्ताओं, विधवाओं के सामने हैं जिन्हें अनाथ होते समय कोई पूंजी नहीं मिली है। वरन् बच्चों का दायित्व कन्धे पर आया है। उनके लिए ऐसे महिलाश्रयों की उदारचेताओं को व्यवस्था करनी चाहिए जहां रह कर वे कुछ उद्योग कर सकें और अपने बालकों को पाल सकें। जहां ऐसी आशंका हो, वहां महिलाओं को पहले से ही सतर्क रहना चाहिए कि उन पर कम से कम सन्तान का दायित्व तो न लदे। निर्धन लोगों को जो नित्य कमाते नित्य खाते हैं सन्तानोत्पादन को एक अपराध मानकर उससे बचना चाहिए।
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*समाप्त*

