जीवन-सम्पदा का सुनियोजन : आज का युगधर्म
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स्व उपार्जित धन वैभव और ईश्वर प्रदत्त श्रम समय का उपयोग शत प्रतिशत शरीर सुविधा में ही नियोजित रहने लगे तो समझना चाहिये कि आत्म-पोषण का द्वार बन्द हो गया। ऐसी दशा में अन्तर्निहित देवत्व की भूख-प्यास से तड़पने जैसी स्थिति में पड़े रहना पड़ेगा। शरीर जिये, पर आत्मा न मरे, ऐसा सुयोग बन सके तो समझना चाहिए कि बुद्धिमत्ता काम आई। दूरदर्शिता को उपयोगिता दी गई। यह जीवन की सर्वोपरि समस्या है। दैनिक प्रयोजनों में आये दिन कई उतार चढ़ाव सामने आते हैं। उनका महत्व राई रत्ती जितना है। राई को पर्वत और पर्वत को राई की तरह नहीं आंका जाना चाहिये। आये-दिन सामने आने वाली समस्यायें अपने समाधान मांगती हैं और विवेक एवं पौरुष की जांच-पड़ताल करने के बाद इधर या उधर लुढ़क जाती हैं। जिसका जितना महत्व है उसे उतना मान मिलना चाहिए। तिल का ताड़ नहीं बनाया जाना चाहिए।
सर्वोपरि महत्व की समस्या एक ही है। उसी पर पूरी तरह अपना वर्तमान और भविष्य अवस्थित है। वह है—जीवन की सम्पदा का सही सदुपयोग करा सकने वाला निर्धारण। जिसने इस गुत्थी को सुलझा लिया, समझना चाहिए कि उसकी प्रायः सभी साधारण समस्यायें अनायास ही हल हो गयीं। जीवन अजस्र सौभाग्य की तरह मिला है। इसका महत्व समझा जाना चाहिए। यों फिजूल खर्ची और बर्बादी हर वस्तु की बुरी मानी जाती है पर यदि जीवन सम्पदा के बारे में उस मूर्खता का उपयोग हुआ तो समझना चाहिए कि अनर्थ ही हो गया। ऐसा अनर्थ, जिसका भूल सुधार समय निकल जाने के उपरान्त किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता।
मनुष्य इस सृष्टि का मुकुट मणि है। तदनुरूप ही उसे गौरव और वर्चस्व भी मिला है। उसके उपकरण एवं साधन न केवल असीम हैं वरन् उच्चस्तरीय भी हैं। इनका उपयोग भी यदि उसी प्रक्रिया से होता रहे जिसे कृमि कीट अनायास ही सम्पन्न करते रहते हैं, तो फिर समझना चाहिए कि हीरा घुमची के बदले बेच दिया गया, चन्दन को जलाऊ लकड़ी की तरह प्रयुक्त किया गया। पेट और प्रजनन का तानाबाना बुन लेने जितनी कुशलता क्षुद्र स्तर के जीवधारियों को भी प्राप्त है। इसी कोल्हू में यदि मनुष्य भी पिसता रहा तो समझना चाहिए कि राजगद्दी के समय वनवास मिलने जैसी दुर्घटना घटित हो गई। यदि मनुष्य इतनी छोटी परिधि में जिये इसी कुचक्र में कोल्हू का बैल बना रहे तो समझना चाहिए कि उपलब्ध गरिमा का श्राद्ध तर्पण हो गया।
मनुष्य महान् है। महान का ज्येष्ठ पुत्र—युवराज है। इसलिए स्वभावतः उसका उत्तरदायित्व भी महान है। उनकी उपेक्षा-अवज्ञा इसलिये नहीं होनी चाहिए कि लोभ-मोह के जाल-जंजाल में उलझे रहने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। महान प्रयोजनों की ओर ध्यान दिया ही नहीं जाता। हेय योनियों के ऊपर उठकर मनुष्य स्तर तक पहुंचने पर मंजिल पूरी नहीं हो जाती। अभी महामानवों ऋषियों, सिद्ध पुरुषों, देवात्माओं और अब तारों की पदोन्नति के अनेकों अवसर विद्यमान हैं, उन सबसे मुख मोड़कर ललक लिप्सा की कीचड़ ही नहीं चाटते रहना चाहिये।
विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाने की जिम्मेदारी मात्र मनुष्य की है। आदिम युग से लेकर अब तक के इतिहास में उसी की गरिमा का बोलबाला है। ऊबड़-खाबड़—खाई खड्डों वाली इस कानी कुबड़ी धरती को चित्र जैसी सुन्दर कलाकृति के रूप में परिणति करने में उसकी सूझ-बूझ और तत्परता ने महती भूमिका निभाई है। पर आगे समग्र प्रयोजन पूरा कहां हुआ, जो करना शेष है, जितना कराना बाकी है वह कहीं अधिक है। विगत की तुलना में आगत अधिक भारी है। उस जिम्मेदारी का वहन भी उसी को करना पड़ेगा।
मनुष्य भी स्वभावतः वनमानुषों की बिरादरी का है। मानवी चेतना के विकास की अगणित मंजिलें पूरी हुई हैं। आदिम काल में न भाषा थी न लिपि, न वस्त्र थे न उद्योग। शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, संचार, शिल्प विज्ञान कला जैसे प्रसंगों से नर वानरों का भला क्या सम्बन्ध रहा होगा। यह मानवी सूझ-बूझ ही है कि उसने परिवार संस्थान, समाज और शासन का ढांचा खड़ा कर दिया। नीति, दर्शन, आचरण और अनुशासन का ऐसा तन्त्र खड़ा किया कि मनुष्य को सभ्यता का दावेदार और सुसंस्कारिता का धनी कहा जा सकता है। इसमें ईश्वर की अनुकम्पा के उपरान्त यदि किसी की सराहना हो तो इसके लिये मनुष्य द्वारा चेतना क्षेत्र में प्रस्तुत की गई भूमिका को ही श्रेय दिया जायेगा।
सुविधा सम्वर्धन और भावनात्मक परिष्कार के दो रचनात्मक क्षेत्र तो मानवी पुरुषार्थ को भाव भरे निमन्त्रण देते हैं। समय की चुनौती भी वरिष्ठता को झकझोरती है। इसके अतिरिक्त संव्याप्त विकृतियों की गन्दगी भी कम विषमता उत्पन्न नहीं कर रही है। अनाचार का प्रदूषण वातावरण में इतनी घुटन भर रहा है कि सांस लेते न बन पड़े। इससे जूझना एक तीसरा मोर्चा है, जिसमें लड़ने के लिए भी मनुष्य को ही प्रत्यंचा चढ़ानी और तुम्वीर की फेंट बांधनी पड़ेगी। सर्वनाश की विषम विभीषिका में इस महाभारत के लिए गाण्डीवधारी को नियति ने आह्वान भेजा है। युगधर्म के निर्वाह से इन्कार करने की बात उनसे नहीं बन पड़ेगी जिनमें मानवी गरिमा के अनुपम ओजस विद्यमान है।
मनुष्य पेड़ नहीं है। उसकी सत्ता शिश्न के लिए समर्पित नहीं हो सकती। निर्वाह का तिल, लालच का पर्वत बन पड़े ऐसा भी क्या? परिवार एक हंसता-हंसाता उद्यान है उसे भव बन्धन मानकर क्यों रखा जाये? समाज के साथ जुड़कर उदात्त विशालता का अभ्यास किया जाता है। उनमें भेड़ियों जैसा परस्पर फाड़ खाने का प्रचलन क्यों बढ़े? करने योग्य वह नहीं है जो किया जा रहा है, सोचने योग्य वह नहीं है जो सोचा जा रहा है। मानवी गरिमा का न अस्त होना चाहिये और न अन्त होने जैसी विपन्नता से आक्रान्त होना चाहिए।
तब करना क्या? इसका उत्तर एक ही है कि हममें से हरेक मानवी गरिमा का स्मरण करे। देखे कि उसके लिए गूलर का भुनगा, कुएं का मेढ़क बनकर संकीर्णता की चारदीवारी में बैठा रहना ही पर्याप्त है या इससे आने की भी कुछ बात हो सकती है। विचार की आवश्यकता ही न समझी जाय तो बात दूसरी है अन्यथा गहराई में उतरने पर हर सीढ़ी एक भाव-भरी प्रेरणा प्रस्तुत करती दिखाई देगी। नव परिवर्तन के प्रभात पर्व पर उसे विशेष रूप से अपने महान उत्तरदायित्वों का स्मरण करना चाहिये। और जो सम्भव हो उसके लिए अधिकाधिक साहस जुटाना चाहिये।
कौन क्या करे? यह निर्धारण अति सरल है। अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुसार नवसृजन की त्रिवेणी की किसी भी धारा में स्नान अवगाहन करने लगे। सुव्यवस्था स्वच्छता और शालीनता के तीन मोर्चों में से किसी पर भी तीनों पर भी जूझने का उपक्रम बन सकता है। अभाव अज्ञान और अनाचार के त्रिविध असुर—महिषासुर, भस्मासुर और वृत्रासुर की तरह आलस्य, अहंकार और अनाचार की तरह अपनी दुर्दान्त दुष्टता का परिचय दे रहे हैं। ऐसे आपत्तिकाल में किसी भी जीवन्त को मूकदर्शक बनाकर हाथ-पर-हाथ रखकर बैठे रहना अशोभनीय होगा। तिनके की आड़ में पर्वत नहीं छिपाना चाहिये। मनुष्य न विवश है, न पराधीन, न दुर्बल। आत्म-विस्मृति ही उस पर अभिशाप की तरह चढ़ दौड़ती है और राजा को रंक जैसी अनुभूति कराती है। जिस कच्चे धागे में गजराज को बांध रखा है वह लोहे का रस्सा नहीं है। पूंछ हिलाने, कान फड़फड़ाने भर से इधर-उधर किया जा सकता है।
इस प्रयास का शुभारम्भ कैसे हो? इसके लिए पट्टी पूजन की तरह छोटा श्री गणेश भी किया जा सकता है और एकाकी बड़ा साहस न बन पड़ने पर बच्चे की भांति उंगली पकड़कर चलना भी सीखा जा सकता है। सब कुछ या कुछ नहीं वाली अतिवादिता कोई रास्ता नहीं निकालती वरन् असमंजस खड़ा करती है।
युग निर्माण की सदस्यता में न्यूनतम शर्त जुड़ी हुई है कि नित्य नियमित रूप से दस पैसा ज्ञानघट में डाले जायें और एक घण्टा समय जन-सम्पर्क द्वारा युगान्तरीय चेतना के आलोक वितरण में लगाया जाये। ईमानदार सदस्यों में से प्रत्येक उस का निर्वाह नियमित रूप से कर रहा है। आलसी और अश्रद्धालु ही आना-कानी करते हैं। यह निर्धारण उद्देश्यपूर्ण था। जाग्रत आत्माओं को अपनी वरिष्ठता बकवास से नहीं सेवा साधना से प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सिद्ध करनी चाहिये। स्वउपार्जित धन और ईश्वर प्रदत्त समय के दोनों ही वैभव ऐसे हैं जिन्हें धरोहर माना जाय और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए सदाशयता पूर्वक वापिस लौटाया जाये। संक्षेप में यही है—प्रज्ञा परिवार की सदस्यता की पात्रता और वफादारी सिद्ध करने के लिए अनुदान प्रस्तुत करते रहने में आना-कानी न की जाये। परिणाम चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो पर उसका संकल्प तो उठे, अभ्यास तो बने, स्मरण तो रहे, उदारता की कली तो खिले, योगदान की उमंग तो जगे।
अब समय बहुत आगे बढ़ गया। सैंतीस वर्ष पुराने उन संकल्प शिशुओं में प्रौढ़ता प्रकट होनी चाहिये। और अनुदान का स्तर बढ़ना चाहिये दस पैसा मांगने वाला नवजात शिशु अब एक महीने में एक दिन की आजीविका से कम में अपनी आवश्यकता की पूर्ति नहीं देखता। यह आर्थिक कठिनाई का नहीं आस्था की प्रौढ़ता का प्रश्न है। उन्तीस दिन की कमाई में भी महीना कट सकता है। इस कटौती में तीन प्रतिशत का अंशदान निकलता है। प्राचीन काल में प्रत्येक भावनाशील अपनी आजीविका का दशांश पुरोहित के हाथ में धर्म-प्रयोजन के लिए निकालता था। और उसमें कृपणता को किसी भी कारण व्यवधान उत्पन्न नहीं करने देता था। अब आवश्यकता तो हरिश्चन्द्र और भामाशाहों जैसी उदारता की है पर उतना न बढ़ने पर तीन प्रतिशत की बात तो सोचना ही चाहिये अन्यथा अब सृजन की इतनी विशाल काय योजना जिसके साथ 450 करोड़ मनुष्यों का भाग्य और भविष्य जुड़ा है किस प्रकार अपने लक्ष्य तक पहुंच सकेगी। स्मरण रहे, ध्वंस से सृजन महंगा पड़ता है। सर्वतोमुखी नव निर्माण में भी तो आखिर कुछ न कुछ लगेगा ही। उसकी पूर्ति कहीं अन्यत्र न होते देखकर जाग्रत आत्माओं को ही अपनी रोटी पर कैंची चलानी चाहिये और उस बचत की श्रद्धांजलि युग चेतना की झोली में प्रस्तुत करना चाहिये।
सृजनात्मक प्रवृत्तियों में सद्भाव सम्पन्नों का श्रम समय प्रचुर मात्रा में लग सके इसका प्रबन्ध बिना देर लगाये इन्हीं दिनों होना चाहिये। प्रतीक टोकन—की तरह एक घण्टा आरम्भिक स्थापना में अब कई गुनी अभिवृद्धि होनी चाहिये। बीस घण्टे में निर्वाह साधन जुटाये जा सकते हैं। बचत के 4 घण्टे इस निमित्त नियोजित होने चाहिये कि उस आधार पर लोकमानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन से सम्बन्धित अनेकानेक रचनात्मक कार्यों का बीजारोपण ‘‘परिपोषण’’ अभिवर्धन सम्भव हो सके। भागीरथी, तप-साधना से ही स्वर्गस्थ गंगा को भूमि पर बहने और संव्याप्त पिपासा और शीतलता सरलता से परितृप्त करने का सुयोग बना था। इन दिनों फिर से विश्वकर्माओं की जरूरत पड़ रही है टूटी सुदामापुरी को भव्य भक्तों में बदलें।
श्रम समय के नियोजन से ही संसार का वह स्वरूप बना है जैसा कि सामने है। इसे विकृत बनाने में तथाकथित बलिष्ठों और विशिष्ठों ने कोई कमी नहीं रहने दी है। अपने युग में समर्थों, सुयोग्यों की यही देन है। नई बारी उनकी है जो प्रतिभा के धनी नहीं हैं। किन्तु विश्व मानव की सुसंस्कारिता अक्षुण्य रखने के लिए प्रयत्नशील हैं। ऐसे भाव-निष्ठों को अपने समय में कटौती करनी चाहिए। आपत्तिकाल में खाना, सोना छोड़कर भी दुर्घटनाओं से निपटने में जुटा जाना है। इन दिनों इसी स्तर की उदार तत्परता बरती जानी चाहिए। जो जितना समय बचा सके उसे इसी सृजन प्रयोजन के लिए प्रस्तुत करे। जो सच्चे न से इसके लिए प्रयत्नशील होंगे वे बीस घण्टे अपने लिए और चार घण्टे युगधर्म के लिए निकाल ही सकेंगे, इसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं है।
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*समाप्त*
सर्वोपरि महत्व की समस्या एक ही है। उसी पर पूरी तरह अपना वर्तमान और भविष्य अवस्थित है। वह है—जीवन की सम्पदा का सही सदुपयोग करा सकने वाला निर्धारण। जिसने इस गुत्थी को सुलझा लिया, समझना चाहिए कि उसकी प्रायः सभी साधारण समस्यायें अनायास ही हल हो गयीं। जीवन अजस्र सौभाग्य की तरह मिला है। इसका महत्व समझा जाना चाहिए। यों फिजूल खर्ची और बर्बादी हर वस्तु की बुरी मानी जाती है पर यदि जीवन सम्पदा के बारे में उस मूर्खता का उपयोग हुआ तो समझना चाहिए कि अनर्थ ही हो गया। ऐसा अनर्थ, जिसका भूल सुधार समय निकल जाने के उपरान्त किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता।
मनुष्य इस सृष्टि का मुकुट मणि है। तदनुरूप ही उसे गौरव और वर्चस्व भी मिला है। उसके उपकरण एवं साधन न केवल असीम हैं वरन् उच्चस्तरीय भी हैं। इनका उपयोग भी यदि उसी प्रक्रिया से होता रहे जिसे कृमि कीट अनायास ही सम्पन्न करते रहते हैं, तो फिर समझना चाहिए कि हीरा घुमची के बदले बेच दिया गया, चन्दन को जलाऊ लकड़ी की तरह प्रयुक्त किया गया। पेट और प्रजनन का तानाबाना बुन लेने जितनी कुशलता क्षुद्र स्तर के जीवधारियों को भी प्राप्त है। इसी कोल्हू में यदि मनुष्य भी पिसता रहा तो समझना चाहिए कि राजगद्दी के समय वनवास मिलने जैसी दुर्घटना घटित हो गई। यदि मनुष्य इतनी छोटी परिधि में जिये इसी कुचक्र में कोल्हू का बैल बना रहे तो समझना चाहिए कि उपलब्ध गरिमा का श्राद्ध तर्पण हो गया।
मनुष्य महान् है। महान का ज्येष्ठ पुत्र—युवराज है। इसलिए स्वभावतः उसका उत्तरदायित्व भी महान है। उनकी उपेक्षा-अवज्ञा इसलिये नहीं होनी चाहिए कि लोभ-मोह के जाल-जंजाल में उलझे रहने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। महान प्रयोजनों की ओर ध्यान दिया ही नहीं जाता। हेय योनियों के ऊपर उठकर मनुष्य स्तर तक पहुंचने पर मंजिल पूरी नहीं हो जाती। अभी महामानवों ऋषियों, सिद्ध पुरुषों, देवात्माओं और अब तारों की पदोन्नति के अनेकों अवसर विद्यमान हैं, उन सबसे मुख मोड़कर ललक लिप्सा की कीचड़ ही नहीं चाटते रहना चाहिये।
विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य, समुन्नत, सुव्यवस्थित बनाने की जिम्मेदारी मात्र मनुष्य की है। आदिम युग से लेकर अब तक के इतिहास में उसी की गरिमा का बोलबाला है। ऊबड़-खाबड़—खाई खड्डों वाली इस कानी कुबड़ी धरती को चित्र जैसी सुन्दर कलाकृति के रूप में परिणति करने में उसकी सूझ-बूझ और तत्परता ने महती भूमिका निभाई है। पर आगे समग्र प्रयोजन पूरा कहां हुआ, जो करना शेष है, जितना कराना बाकी है वह कहीं अधिक है। विगत की तुलना में आगत अधिक भारी है। उस जिम्मेदारी का वहन भी उसी को करना पड़ेगा।
मनुष्य भी स्वभावतः वनमानुषों की बिरादरी का है। मानवी चेतना के विकास की अगणित मंजिलें पूरी हुई हैं। आदिम काल में न भाषा थी न लिपि, न वस्त्र थे न उद्योग। शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, संचार, शिल्प विज्ञान कला जैसे प्रसंगों से नर वानरों का भला क्या सम्बन्ध रहा होगा। यह मानवी सूझ-बूझ ही है कि उसने परिवार संस्थान, समाज और शासन का ढांचा खड़ा कर दिया। नीति, दर्शन, आचरण और अनुशासन का ऐसा तन्त्र खड़ा किया कि मनुष्य को सभ्यता का दावेदार और सुसंस्कारिता का धनी कहा जा सकता है। इसमें ईश्वर की अनुकम्पा के उपरान्त यदि किसी की सराहना हो तो इसके लिये मनुष्य द्वारा चेतना क्षेत्र में प्रस्तुत की गई भूमिका को ही श्रेय दिया जायेगा।
सुविधा सम्वर्धन और भावनात्मक परिष्कार के दो रचनात्मक क्षेत्र तो मानवी पुरुषार्थ को भाव भरे निमन्त्रण देते हैं। समय की चुनौती भी वरिष्ठता को झकझोरती है। इसके अतिरिक्त संव्याप्त विकृतियों की गन्दगी भी कम विषमता उत्पन्न नहीं कर रही है। अनाचार का प्रदूषण वातावरण में इतनी घुटन भर रहा है कि सांस लेते न बन पड़े। इससे जूझना एक तीसरा मोर्चा है, जिसमें लड़ने के लिए भी मनुष्य को ही प्रत्यंचा चढ़ानी और तुम्वीर की फेंट बांधनी पड़ेगी। सर्वनाश की विषम विभीषिका में इस महाभारत के लिए गाण्डीवधारी को नियति ने आह्वान भेजा है। युगधर्म के निर्वाह से इन्कार करने की बात उनसे नहीं बन पड़ेगी जिनमें मानवी गरिमा के अनुपम ओजस विद्यमान है।
मनुष्य पेड़ नहीं है। उसकी सत्ता शिश्न के लिए समर्पित नहीं हो सकती। निर्वाह का तिल, लालच का पर्वत बन पड़े ऐसा भी क्या? परिवार एक हंसता-हंसाता उद्यान है उसे भव बन्धन मानकर क्यों रखा जाये? समाज के साथ जुड़कर उदात्त विशालता का अभ्यास किया जाता है। उनमें भेड़ियों जैसा परस्पर फाड़ खाने का प्रचलन क्यों बढ़े? करने योग्य वह नहीं है जो किया जा रहा है, सोचने योग्य वह नहीं है जो सोचा जा रहा है। मानवी गरिमा का न अस्त होना चाहिये और न अन्त होने जैसी विपन्नता से आक्रान्त होना चाहिए।
तब करना क्या? इसका उत्तर एक ही है कि हममें से हरेक मानवी गरिमा का स्मरण करे। देखे कि उसके लिए गूलर का भुनगा, कुएं का मेढ़क बनकर संकीर्णता की चारदीवारी में बैठा रहना ही पर्याप्त है या इससे आने की भी कुछ बात हो सकती है। विचार की आवश्यकता ही न समझी जाय तो बात दूसरी है अन्यथा गहराई में उतरने पर हर सीढ़ी एक भाव-भरी प्रेरणा प्रस्तुत करती दिखाई देगी। नव परिवर्तन के प्रभात पर्व पर उसे विशेष रूप से अपने महान उत्तरदायित्वों का स्मरण करना चाहिये। और जो सम्भव हो उसके लिए अधिकाधिक साहस जुटाना चाहिये।
कौन क्या करे? यह निर्धारण अति सरल है। अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुसार नवसृजन की त्रिवेणी की किसी भी धारा में स्नान अवगाहन करने लगे। सुव्यवस्था स्वच्छता और शालीनता के तीन मोर्चों में से किसी पर भी तीनों पर भी जूझने का उपक्रम बन सकता है। अभाव अज्ञान और अनाचार के त्रिविध असुर—महिषासुर, भस्मासुर और वृत्रासुर की तरह आलस्य, अहंकार और अनाचार की तरह अपनी दुर्दान्त दुष्टता का परिचय दे रहे हैं। ऐसे आपत्तिकाल में किसी भी जीवन्त को मूकदर्शक बनाकर हाथ-पर-हाथ रखकर बैठे रहना अशोभनीय होगा। तिनके की आड़ में पर्वत नहीं छिपाना चाहिये। मनुष्य न विवश है, न पराधीन, न दुर्बल। आत्म-विस्मृति ही उस पर अभिशाप की तरह चढ़ दौड़ती है और राजा को रंक जैसी अनुभूति कराती है। जिस कच्चे धागे में गजराज को बांध रखा है वह लोहे का रस्सा नहीं है। पूंछ हिलाने, कान फड़फड़ाने भर से इधर-उधर किया जा सकता है।
इस प्रयास का शुभारम्भ कैसे हो? इसके लिए पट्टी पूजन की तरह छोटा श्री गणेश भी किया जा सकता है और एकाकी बड़ा साहस न बन पड़ने पर बच्चे की भांति उंगली पकड़कर चलना भी सीखा जा सकता है। सब कुछ या कुछ नहीं वाली अतिवादिता कोई रास्ता नहीं निकालती वरन् असमंजस खड़ा करती है।
युग निर्माण की सदस्यता में न्यूनतम शर्त जुड़ी हुई है कि नित्य नियमित रूप से दस पैसा ज्ञानघट में डाले जायें और एक घण्टा समय जन-सम्पर्क द्वारा युगान्तरीय चेतना के आलोक वितरण में लगाया जाये। ईमानदार सदस्यों में से प्रत्येक उस का निर्वाह नियमित रूप से कर रहा है। आलसी और अश्रद्धालु ही आना-कानी करते हैं। यह निर्धारण उद्देश्यपूर्ण था। जाग्रत आत्माओं को अपनी वरिष्ठता बकवास से नहीं सेवा साधना से प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सिद्ध करनी चाहिये। स्वउपार्जित धन और ईश्वर प्रदत्त समय के दोनों ही वैभव ऐसे हैं जिन्हें धरोहर माना जाय और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए सदाशयता पूर्वक वापिस लौटाया जाये। संक्षेप में यही है—प्रज्ञा परिवार की सदस्यता की पात्रता और वफादारी सिद्ध करने के लिए अनुदान प्रस्तुत करते रहने में आना-कानी न की जाये। परिणाम चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो पर उसका संकल्प तो उठे, अभ्यास तो बने, स्मरण तो रहे, उदारता की कली तो खिले, योगदान की उमंग तो जगे।
अब समय बहुत आगे बढ़ गया। सैंतीस वर्ष पुराने उन संकल्प शिशुओं में प्रौढ़ता प्रकट होनी चाहिये। और अनुदान का स्तर बढ़ना चाहिये दस पैसा मांगने वाला नवजात शिशु अब एक महीने में एक दिन की आजीविका से कम में अपनी आवश्यकता की पूर्ति नहीं देखता। यह आर्थिक कठिनाई का नहीं आस्था की प्रौढ़ता का प्रश्न है। उन्तीस दिन की कमाई में भी महीना कट सकता है। इस कटौती में तीन प्रतिशत का अंशदान निकलता है। प्राचीन काल में प्रत्येक भावनाशील अपनी आजीविका का दशांश पुरोहित के हाथ में धर्म-प्रयोजन के लिए निकालता था। और उसमें कृपणता को किसी भी कारण व्यवधान उत्पन्न नहीं करने देता था। अब आवश्यकता तो हरिश्चन्द्र और भामाशाहों जैसी उदारता की है पर उतना न बढ़ने पर तीन प्रतिशत की बात तो सोचना ही चाहिये अन्यथा अब सृजन की इतनी विशाल काय योजना जिसके साथ 450 करोड़ मनुष्यों का भाग्य और भविष्य जुड़ा है किस प्रकार अपने लक्ष्य तक पहुंच सकेगी। स्मरण रहे, ध्वंस से सृजन महंगा पड़ता है। सर्वतोमुखी नव निर्माण में भी तो आखिर कुछ न कुछ लगेगा ही। उसकी पूर्ति कहीं अन्यत्र न होते देखकर जाग्रत आत्माओं को ही अपनी रोटी पर कैंची चलानी चाहिये और उस बचत की श्रद्धांजलि युग चेतना की झोली में प्रस्तुत करना चाहिये।
सृजनात्मक प्रवृत्तियों में सद्भाव सम्पन्नों का श्रम समय प्रचुर मात्रा में लग सके इसका प्रबन्ध बिना देर लगाये इन्हीं दिनों होना चाहिये। प्रतीक टोकन—की तरह एक घण्टा आरम्भिक स्थापना में अब कई गुनी अभिवृद्धि होनी चाहिये। बीस घण्टे में निर्वाह साधन जुटाये जा सकते हैं। बचत के 4 घण्टे इस निमित्त नियोजित होने चाहिये कि उस आधार पर लोकमानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन से सम्बन्धित अनेकानेक रचनात्मक कार्यों का बीजारोपण ‘‘परिपोषण’’ अभिवर्धन सम्भव हो सके। भागीरथी, तप-साधना से ही स्वर्गस्थ गंगा को भूमि पर बहने और संव्याप्त पिपासा और शीतलता सरलता से परितृप्त करने का सुयोग बना था। इन दिनों फिर से विश्वकर्माओं की जरूरत पड़ रही है टूटी सुदामापुरी को भव्य भक्तों में बदलें।
श्रम समय के नियोजन से ही संसार का वह स्वरूप बना है जैसा कि सामने है। इसे विकृत बनाने में तथाकथित बलिष्ठों और विशिष्ठों ने कोई कमी नहीं रहने दी है। अपने युग में समर्थों, सुयोग्यों की यही देन है। नई बारी उनकी है जो प्रतिभा के धनी नहीं हैं। किन्तु विश्व मानव की सुसंस्कारिता अक्षुण्य रखने के लिए प्रयत्नशील हैं। ऐसे भाव-निष्ठों को अपने समय में कटौती करनी चाहिए। आपत्तिकाल में खाना, सोना छोड़कर भी दुर्घटनाओं से निपटने में जुटा जाना है। इन दिनों इसी स्तर की उदार तत्परता बरती जानी चाहिए। जो जितना समय बचा सके उसे इसी सृजन प्रयोजन के लिए प्रस्तुत करे। जो सच्चे न से इसके लिए प्रयत्नशील होंगे वे बीस घण्टे अपने लिए और चार घण्टे युगधर्म के लिए निकाल ही सकेंगे, इसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं है।
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