हल्का—फुल्का मस्ती भरा जीवन
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जिन्दगी हलके फुलके ढंग से जिये जाने के लिये मिली है। आये दिन का घटना क्रम सीधा सरल ही रहता हो, सो बात नहीं है। उसमें कितने ही ज्वार भाटे न सही, लहरों जैसे उतार-चढ़ाव तो आते ही रहते हैं। यहां सब कुछ सीधा सरल नहीं है। बहुत कुछ टेढ़ा-मेढ़ा और ऊबड़-खाबड़ भी है। उससे सर्वथा बच निकलना किसी के लिए भी संभव नहीं हो सकता। दिन रात की तरह अनुकूलता और प्रतिकूलता अपना-अपना रंग दिखाती रहती है। सम्पर्क क्षेत्र के व्यक्ति कभी सीधे चलते हैं कभी उलटे शरीर कभी नरम रहता है तो कभी गरम। सफलता और असफलता संयोग-वियोग, नफा—नुकसान जैसे न जाने कितने उतार चढ़ाव आते जाते रहते हैं। यह सहज स्वाभाविक है। यह दुनिया हमारे ही लिए नहीं बनी है और परिस्थितियों पर अपना परिपूर्ण नियन्त्रण नहीं है। सब लोग हमारी मर्जी के अनुरूप ही व्यवहार करें, यह भी संभव नहीं। यहां सब कुछ मीठा ही नहीं बहुत कुछ कड़ुआ भी है। ऐसी दशा में जूझते निपटते, सहते संजोते हुये ही दिन काटने पड़ते हैं। ऐसा होता नहीं कि अपने को जो अनुकूल-उपयुक्त लगता है, वैसा ही माहौल बना रहे। ऐसी दशा में एक ही उपाय रह जाता है कि तालमेल बिठाकर चलने जैसी स्थिति बनाई जाय। ऐसा रास्ता निकाला जाय जिसमें सांप मरे न लाठी टूटे। नियति व्यवस्था के अनुरूप परिस्थितियों की उलट-पुलट में भी संतुलन बना रहे। मुस्कान हाथ से न जाने पाये। धैर्य टूटे नहीं और निराशा, खीज, उद्विग्नता का शिकार न बनना पड़े।
हलकी फुलकी जिन्दगी जीने वाले ही शान्ति से रहते और चैन सन्तोष के दिन काटते हैं। जीवन को एक खेल जैसा माना जाना चाहिए और उसे हार जीत की बहुत परवाह किये बिना विनोद मनोरंजन के लिए बहुत हुआ तो उसमें प्रवीणता पाने के लिए—मंडली में फुर्तीला अनुभव किये जाने की दृष्टि से खेला जाना चाहिए। नाटक के अभिनेता जैसा दृष्टिकोण भी सही है। कभी राजा कभी रंक बनने में पात्र को न कोई संकोच लगता है और न असमंजस होता है। वह अपनी निजी हैसियत और प्रदर्शन की खोखली वास्तविकता को समझता है। इसलिए सिंहासन हार जाने और मुकुट उतर जाने पर भी चेहरे पर मलीनता नहीं आने देता। रात को चादर तानकर गहरी नींद सोता है। वैसी ही मनःस्थिति अपनी भी होनी चाहिए। दिन में क्या किया? कितना सोचा था, कितना पूरा हो सका, कल के लिए क्या जीवन क्रम निर्धारित किया है, इतना पर्यवेक्षण तो सोने से पूर्व अवश्य कर लिया जाय। परन्तु विगत की घटनाओं, दिन में किसी के साथ किये गए दुर्व्यवहार के चिन्तन-बदला आदि लेने की भावना के विचार सोते समय मन पर कतई न आने दिए जावें। मन हल्का रहे। कुछ घटा भी है, इसकी छाया मात्र भी मस्तिष्क पटल पर आने न दी जाय यही सच्ची जीवनयापन शैली है। तनाव रहित मन तुरन्त निद्रा देवी का आह्वान करता है। ऐसी हल्की फुल्की जिन्दगी की निरोग काया की जन्मदात्री बनती है। एकान्त सेवन, गुहा-प्रवेश, गर्भकाल की स्थिति जैसी मानसिकता यदि बनायी जा सके तो कोई कारण नहीं कि आये दिन के संकटों से जूझने योग्य सामर्थ्य मनुष्य में विकसित न हो सके। मन को साधकर अनुकूल दिशा में मोड़ लेना ही सच्चे अर्थों में जिन्दगी जीना है।
बड़ी से बड़ी आशा रखें किन्तु बुरी से बुरी संभावना के लिए तैयार रहें। मनुष्य के हाथ में कर्तव्य करना भर है। यदि उसे ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ निभाया गया हो तो गर्व गौरव अनुभव किया जा सकता है। सफलता में असफलता का उत्तरदायित्व भी प्रत्यक्षतः कर्त्ता के सिर पर ही लदता है, यह नहीं समझना चाहिए कि परिस्थितियों का कुछ प्रभाव होता ही नहीं। कई बार जागरूक और सुयोग्य तक चपेट में आ जाते हैं जबकि अंधे के हाथ बटेर लगती भी देखी गयी है। हाथ के काम में पूरी तत्परता और तन्मयता बरतें और उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर पूरी जिम्मेदारी के साथ सम्पन्न करें इतने पर भी समय का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह कहा नहीं जा सकता जो अपने बस की बात नहीं उसके लिए क्यों तो सिर पटका जाय और क्यों उछलने कूदने का बचकानापन प्रदर्शित किया जाय?
अपने से बड़ों को देखकर उन जैसे वैभव की अभिलाषा जागना भी अनुपयुक्त है इस संसार में एक से एक बड़े पड़े हैं। किस-किस से तुलना की जाय और किस-किस की समता का मनोरथ किया जाय? तुलना ही करनी हो तो अपने से छोटों के साथ करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि अपने को अपेक्षाकृत कितना अधिक सौभाग्य मिला हुआ है। अपंगों, दरिद्रों, अशिक्षितों, रोगियों, असहायों की तुलना में जब अपनी स्थिति कहीं अधिक अच्छी है तो उस पर संतोष व्यक्त करने में क्या हर्ज है। ऐसे भी असंख्यों हो सकते हैं कि उसके लिए भी तरसते हों जो अपने हिस्से में आया है। जिसे दोनों समय भोजन मिल जाता है, अपने पैरों खड़े रहने का अवसर है उसे संतोष की सांस लेनी चाहिए और भगवान को हजार बार धन्यवाद देना चाहिए, कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
प्रगति पथ पर अग्रसर होने में हर्ज नहीं। भौतिक और आत्मिक उन्नति करते रहने से साहस बढ़ता है और सम्मान मिलता है। सुविधा साधन भी अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उपलब्ध होते हैं। फिर भी स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि वैभव का संग्रह न किया जाय और उसे कुटुम्बीजनों के लिए छोड़ मरने की बात न सोची जाय। सदुपयोग से हाथ रोककर फिर कभी के लिए जमा करते रहने पर वह संग्रह अनेकानेक दुर्व्यसनों और विग्रहों का सृजन करता है। मुफ्त का माल भले ही उत्तराधिकारियों को ही क्यों न मिले। दुष्परिणाम ही उत्पन्न करेगा। हराम का माल किसी को भी नहीं पचता, कच्चे पारे की तरह बदन फोड़कर निकलता है। अच्छा हो उससे उत्तराधिकारियों को बचायें और परिजनों को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनने भर का कर्तव्य पालें। ऐसा मन और इतना निर्धारण बन पड़े तो समझना चाहिए उद्विग्नता उत्पन्न करने वाला आधा जंजाल कट गया।
न अशुभ सोचें न दोष ढूंढ़ें, न अन्धकार में भटकें। उज्ज्वल भविष्य की आशा रखें। प्रकाश की ओर चलें। छाया के पीछे न दौड़ें। प्रकाश की दिशा में चलने वाले के पीछे-पीछे छाया चलती है। जबकि छाया पकड़ने के लिए दौड़ने वाले के हाथ थकान और निराशा ही लगती है। महानता प्रकाश है और अमीरी छाया। श्रेष्ठता, शालीनता और उदारता अपनाने वाले सामान्य स्तर का निर्वाह करते हुये भी गौरवास्पद बनते हैं जबकि सम्पदा के पीछे उतावले लोग उन सब श्रेय सौभाग्यों से वंचित ही बने रहते हैं जो उन जैसी स्थिति, योग्यता वालों को सहज की मिल सकते थे। व्यक्तित्व को गरिमा सम्पन्न बना सकना ऐसा ही है जिस पर कुबेर की अमीरी न्यौछावर की जा सकती है। गुण, कर्म, स्वभाव की वरिष्ठता सम्पादित करने के लिए किया गया पुरुषार्थ हाथों हाथ फल देता है जबकि सोने की लंका खड़ी करने की इच्छा करने वाले सिवाय हैरान होने और हैरान करने के कुछ पाते नहीं। महत्वाकांक्षाएं महामानवों जैसे उच्च स्तर तक पहुंचने की तो ठीक है पर जब वह तृष्णा, वासना और अहंता की दृष्टि से इन्द्रासन पाने के लिए मचलती हैं तो समझना चाहिए, सर्वनाश के दिन निकट आ गये। ललक लिप्सा के लिए आतुर व्याकुल कमाते कम और गंवाते अधिक हैं।
औसत भारतीय स्तर का निर्वाह जिन्हें पर्याप्त लगता है वे ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की तरह न्यूनतम निर्वाह में काम चलाते और अपनी कमाई का अधिकांश भाग परमार्थ में लगाते रहते हैं। ऐसों को यह पश्चाताप करते नहीं देखा गया कि वे गरीबी में दिन गुजारते हैं। बुरी तो कंगाली है जो आलसियों या अपव्यय विलासताओं पर ललक लिप्सा बन कर छायी रहती है। गरीबी ब्राह्मण की शान है। गांधी जी प्राचीनकाल के सन्तों की तरह अपरिग्रही जीवन जीते थे। जनक हल चलाकर पेट भरते थे। इनसे उनकी गरिमा घटी नहीं। भर्त्सना के भाजन तो लालची होते हैं जो पेट भरा रहने पर भी अधिक की रट लगाये रहते हैं और उसे बटोरने के लिए अनीति अपनाने का कुकर्म करने तक से नहीं चूकते।
इस दुनिया में कुरूपता तो है पर इतनी नहीं जो सौन्दर्य से अधिक अनुपात में तौली जा सके। इस दुनिया में अन्धेरा भी है, अभाव और अनाचार भी किन्तु वे इतने नहीं जो प्रकाश के वैभव की शालीनता से भी भारी सिद्ध हो सकें। भ्रष्टों और दुष्टों की कमी नहीं किन्तु यह धरती सज्जनता और उदारता के सहारे ही टिकी हुई है। हम निकृष्ट पर ही दृष्टि जमाकर उद्यान में पाये जाने वाले गुबरीले का उदाहरण क्यों बनें? फलों पर मंडराने वाले और भाग्य की सराहना करने वाले भौरों जैसा दृष्टिकोण क्यों अपनायें। जब श्रेष्ठता से सम्बन्ध जोड़ते हैं तो वह खिंचती हुई अपने पास चली आती है। जिन्हें निकृष्टता के बीच रहना, वैसा ही सोचना और उन्हीं में जुड़ना सुहाता है वे ही अपने को नरक में घिरा देखते हैं। चिन्तन उलट जाने पर बाल्मीक बिल्व, मंगल, अंगुलिमाल, अजामिल जैसों का काया कल्प हो गया तो फिर कोई कारण नहीं जो अपने भाग्य का नया निर्माण अपने हाथों न करें।
स्वर्ग और नरक मनुष्य के दांये बांये हाथों में विधाता ने सुनियोजित ढंग से संजोकर रखे हुये हैं। मनुष्य चाहे जिस मुट्ठी को खोलकर अपने लिए अभीष्ट परिस्थितियों का सृजन कर सकता है। इस सम्बन्ध में अड़चन एक ही है कि निषेधात्मक चिन्तन के साथ जुड़े हुए पतन पराभव एवं विधेयात्मक विचारणाओं के साथ अविच्छिन्न रूप से जोड़े गये उत्थान को अलग नहीं किया जा सकता। यह दोनों युग्म जुड़वा भाइयों की तरह उत्पन्न होते हैं और अपने साथी को लेकर ही गतिशील रहते हैं।
कहते हैं कि विधाता मनुष्य का भाग्य ललाट के ऊपर लिखता है। यह सत्य भी है और तथ्य भी। जो जैसा सोचेगा वह वैसा बनेगा। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस उक्ति की संगति इसी प्रकार बैठती है कि क्रिया का शुभारम्भ चिन्तन क्षेत्र से होता है। हाथ पैर तो बहुत बाद में भीतर की खिचड़ी पक कर तैयार हो जाने के बाद अपना काम प्रारम्भ करते हैं। कर्त्ता कौन? इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में देना हो तो कहना चाहिए कि मस्तिष्क। वही अपनी गतिविधियों—विचारणाओं के सहारे वर्तमान का ही नहीं, भविष्य का निर्माण करता है।
जो घटिया सोचते रहे वे घटिया बनकर रहे। जिनने उद्धत विचारा, वे पतन पराभव के गर्त में जा गिरे। जिनने ऊंचा सोचा ऊंचा निर्णय किया ऊंचे प्रयासों में हाथ डाला, वे ही ऊंचे उठे और महामानवों के लिए निर्धारित महानता के उच्च शिखर पर जा विराजे। अभिवंदनीय और अनुकरणीय बने। कृतकृत्य होकर रहे यह मनुष्य का अपना रुझान और चुनाव है कि चौराहे से फटने वाली श्रेष्ठता और निकृष्टता के दो रास्तों में से किसे चुने और किस पर कितनी तत्परता के साथ कदम बढ़ायें।
चासनी में पर फैला कर बेमौत मरने वाली मक्खी की दुर्गति अनेकों ने देखी और सुनी है। इतने पर भी यह भुला दिया जाता है कि लिप्सा लालसा की कभी शान्त न हो सकने वाली आग में क्यों कूदा जाय। किनारे पर बैठकर थोड़ा-थोड़ा चखने वाली मक्खी नफे में रहती है। पेट भी भर लेती है और जोखिम से भी बची रहती है। हलकी फुलकी जिन्दगी इसी को कहते हैं। अमीरों जैसी ललक यदि हावी न हो और औसत नागरिकों जैसा निर्वाह पर्याप्त लगे तो फिर ऊंचा सोचने और ऊंचा करने का अवसर भी मिल सकता है। समझदारी इसी को कहते हैं कि चिन्तन की श्रेष्ठता अपनाने के लिए तानाबाना बुनने दिया जाय। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए भगवान से प्रार्थना करनी पड़ती है—
‘‘साईं इतना दीजिए, जिसमें कुटुम्ब समाय।
आप नहीं भूखा रहै, साधु न भूखा जाय॥’’
दूरदर्शी कामना में उस अंकुश को सजग पाया जा सकता है जो भौतिक लिप्साओं की मर्यादाओं में रहने के लिए प्रतिबन्ध लगाता है। निर्वाह भर में संतोष करता है। और बचत को, द्वार पर खड़े साधु को देने के लिए दबाव डालता है। इस अनुशासन में रहने वाले न केवल हंसती-हंसाती जिन्दगी जी सकते हैं। वरन् अपने वैभव, उपार्जन, पराक्रम को मिलजुल कर बांट खाने की उदारता भी चरितार्थ कर सकते हैं। इसके विपरीत जिसकी लिप्सा समुद्र जितनी गहरी है और जिन्हें उसे पाटने की उतावली मची है, उनके लिए अनीति पर उतारू और कुकर्मरत रहने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। निष्ठुरता अपनाये बिना कोई इतना नहीं कमा—बचा सकता जिसके सहारे अमीरों जैसे ठाठ बाट बनाकर रहा जा सके। अपव्यय की फुलझड़ी जलाकर विलास का तमाशा देखने वाले सिर्फ वे ही हो सकते हैं। जिन्हें अनुपयुक्त संग्रह की उद्धत अपव्यय की लगन लगी हो यह अर्धविक्षिप्तों जैसी गहरी छानने वालों गुलाबी पीने वालों जैसी मनःस्थिति है जिसमें संग्रह और विलास के लिए अनुपयुक्त उपार्जन के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। ऐसी स्थिति से तो समस्याएं और आ खड़ी होती हैं। व्यक्ति स्वयं तो अन्त में त्रास पाता ही है अन्यों का शोषण कर भर्त्सना का पात्र भी बनता है। यह अदूरदर्शिता यदि समय रहते उलट दी जाय और समझदारी से जीने की बात मन में जड़ें जमा सके तो समझना चाहिए मनुष्य को नया जन्म मिल गया। अच्छा हो, ऐसी समझदारी जल्दी ही साथ दे और समय रहते इस प्रचलन प्रवाह में बहने न देने के लिए रोकथाम लगाये, खींच घसीट कर किनारे पर लगाये। जिसे ऐसा सुयोग मिलेगा उसी के लिए यह संभव होगा कि हंसती हंसाती जिन्दगी जिये और हिल मिलकर सुख चैन के दिन बिताये।
साथ ही अपनी मनमर्जी के अनुसार अपनी गति-विधियों का- आदतों का निर्माण करे। अपने जैसा ही सोचे यह कल्पना आदि से अन्त तक गलत है। इस संसार में हर किसी की आकृति अलग है। किसी का चेहरा किसी से नहीं मिलता। ठीक इसी प्रकार प्रकृति में भी अन्तर रहता है। जन्म जन्मान्तरों के संचित संस्कारों और वर्तमान अपनाये गये अनेकानेक प्रभावों के कारण हर मनुष्य का चिन्तन और स्वभाव भिन्न-भिन्न है। इसे इतनी जल्दी नहीं बदला जा सकता कि वह चुटकी बजाते ही अपना सब कुछ छोड़कर हमारा आज्ञानुवर्ती बने और वही करे जो हम कहें। मशीनों को पशुओं को इच्छानुरूप चलाया जा सकता है किन्तु मनुष्य के सम्बन्ध में वैसा नहीं सोचा जाना चाहिए। कुटुम्बियों के सम्बन्ध में भी मौलिक भिन्नता को मान्यता देते हुए तर्क, तथ्य, प्रमाण प्रस्तुत करते हुये स्नेह सद्भाव के सहारे किसी को औचित्य अपनाने की बात कहने में तो हर्ज नहीं फिर भी किसी को स्वतन्त्र निर्णय देने की गुंजाइश तो रखनी ही होगी। जिसके साथ जितनी पटरी बैठे उतना तालमेल बिठाकर चलना ही बुद्धिमत्ता है जिसे अपनाने वाले हर परिस्थिति में हंसती-हंसाती जिन्दगी जीते देखे गये हैं।
हलकी फुलकी जिन्दगी जीने वाले ही शान्ति से रहते और चैन सन्तोष के दिन काटते हैं। जीवन को एक खेल जैसा माना जाना चाहिए और उसे हार जीत की बहुत परवाह किये बिना विनोद मनोरंजन के लिए बहुत हुआ तो उसमें प्रवीणता पाने के लिए—मंडली में फुर्तीला अनुभव किये जाने की दृष्टि से खेला जाना चाहिए। नाटक के अभिनेता जैसा दृष्टिकोण भी सही है। कभी राजा कभी रंक बनने में पात्र को न कोई संकोच लगता है और न असमंजस होता है। वह अपनी निजी हैसियत और प्रदर्शन की खोखली वास्तविकता को समझता है। इसलिए सिंहासन हार जाने और मुकुट उतर जाने पर भी चेहरे पर मलीनता नहीं आने देता। रात को चादर तानकर गहरी नींद सोता है। वैसी ही मनःस्थिति अपनी भी होनी चाहिए। दिन में क्या किया? कितना सोचा था, कितना पूरा हो सका, कल के लिए क्या जीवन क्रम निर्धारित किया है, इतना पर्यवेक्षण तो सोने से पूर्व अवश्य कर लिया जाय। परन्तु विगत की घटनाओं, दिन में किसी के साथ किये गए दुर्व्यवहार के चिन्तन-बदला आदि लेने की भावना के विचार सोते समय मन पर कतई न आने दिए जावें। मन हल्का रहे। कुछ घटा भी है, इसकी छाया मात्र भी मस्तिष्क पटल पर आने न दी जाय यही सच्ची जीवनयापन शैली है। तनाव रहित मन तुरन्त निद्रा देवी का आह्वान करता है। ऐसी हल्की फुल्की जिन्दगी की निरोग काया की जन्मदात्री बनती है। एकान्त सेवन, गुहा-प्रवेश, गर्भकाल की स्थिति जैसी मानसिकता यदि बनायी जा सके तो कोई कारण नहीं कि आये दिन के संकटों से जूझने योग्य सामर्थ्य मनुष्य में विकसित न हो सके। मन को साधकर अनुकूल दिशा में मोड़ लेना ही सच्चे अर्थों में जिन्दगी जीना है।
बड़ी से बड़ी आशा रखें किन्तु बुरी से बुरी संभावना के लिए तैयार रहें। मनुष्य के हाथ में कर्तव्य करना भर है। यदि उसे ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ निभाया गया हो तो गर्व गौरव अनुभव किया जा सकता है। सफलता में असफलता का उत्तरदायित्व भी प्रत्यक्षतः कर्त्ता के सिर पर ही लदता है, यह नहीं समझना चाहिए कि परिस्थितियों का कुछ प्रभाव होता ही नहीं। कई बार जागरूक और सुयोग्य तक चपेट में आ जाते हैं जबकि अंधे के हाथ बटेर लगती भी देखी गयी है। हाथ के काम में पूरी तत्परता और तन्मयता बरतें और उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर पूरी जिम्मेदारी के साथ सम्पन्न करें इतने पर भी समय का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह कहा नहीं जा सकता जो अपने बस की बात नहीं उसके लिए क्यों तो सिर पटका जाय और क्यों उछलने कूदने का बचकानापन प्रदर्शित किया जाय?
अपने से बड़ों को देखकर उन जैसे वैभव की अभिलाषा जागना भी अनुपयुक्त है इस संसार में एक से एक बड़े पड़े हैं। किस-किस से तुलना की जाय और किस-किस की समता का मनोरथ किया जाय? तुलना ही करनी हो तो अपने से छोटों के साथ करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि अपने को अपेक्षाकृत कितना अधिक सौभाग्य मिला हुआ है। अपंगों, दरिद्रों, अशिक्षितों, रोगियों, असहायों की तुलना में जब अपनी स्थिति कहीं अधिक अच्छी है तो उस पर संतोष व्यक्त करने में क्या हर्ज है। ऐसे भी असंख्यों हो सकते हैं कि उसके लिए भी तरसते हों जो अपने हिस्से में आया है। जिसे दोनों समय भोजन मिल जाता है, अपने पैरों खड़े रहने का अवसर है उसे संतोष की सांस लेनी चाहिए और भगवान को हजार बार धन्यवाद देना चाहिए, कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।
प्रगति पथ पर अग्रसर होने में हर्ज नहीं। भौतिक और आत्मिक उन्नति करते रहने से साहस बढ़ता है और सम्मान मिलता है। सुविधा साधन भी अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में उपलब्ध होते हैं। फिर भी स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि वैभव का संग्रह न किया जाय और उसे कुटुम्बीजनों के लिए छोड़ मरने की बात न सोची जाय। सदुपयोग से हाथ रोककर फिर कभी के लिए जमा करते रहने पर वह संग्रह अनेकानेक दुर्व्यसनों और विग्रहों का सृजन करता है। मुफ्त का माल भले ही उत्तराधिकारियों को ही क्यों न मिले। दुष्परिणाम ही उत्पन्न करेगा। हराम का माल किसी को भी नहीं पचता, कच्चे पारे की तरह बदन फोड़कर निकलता है। अच्छा हो उससे उत्तराधिकारियों को बचायें और परिजनों को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनने भर का कर्तव्य पालें। ऐसा मन और इतना निर्धारण बन पड़े तो समझना चाहिए उद्विग्नता उत्पन्न करने वाला आधा जंजाल कट गया।
न अशुभ सोचें न दोष ढूंढ़ें, न अन्धकार में भटकें। उज्ज्वल भविष्य की आशा रखें। प्रकाश की ओर चलें। छाया के पीछे न दौड़ें। प्रकाश की दिशा में चलने वाले के पीछे-पीछे छाया चलती है। जबकि छाया पकड़ने के लिए दौड़ने वाले के हाथ थकान और निराशा ही लगती है। महानता प्रकाश है और अमीरी छाया। श्रेष्ठता, शालीनता और उदारता अपनाने वाले सामान्य स्तर का निर्वाह करते हुये भी गौरवास्पद बनते हैं जबकि सम्पदा के पीछे उतावले लोग उन सब श्रेय सौभाग्यों से वंचित ही बने रहते हैं जो उन जैसी स्थिति, योग्यता वालों को सहज की मिल सकते थे। व्यक्तित्व को गरिमा सम्पन्न बना सकना ऐसा ही है जिस पर कुबेर की अमीरी न्यौछावर की जा सकती है। गुण, कर्म, स्वभाव की वरिष्ठता सम्पादित करने के लिए किया गया पुरुषार्थ हाथों हाथ फल देता है जबकि सोने की लंका खड़ी करने की इच्छा करने वाले सिवाय हैरान होने और हैरान करने के कुछ पाते नहीं। महत्वाकांक्षाएं महामानवों जैसे उच्च स्तर तक पहुंचने की तो ठीक है पर जब वह तृष्णा, वासना और अहंता की दृष्टि से इन्द्रासन पाने के लिए मचलती हैं तो समझना चाहिए, सर्वनाश के दिन निकट आ गये। ललक लिप्सा के लिए आतुर व्याकुल कमाते कम और गंवाते अधिक हैं।
औसत भारतीय स्तर का निर्वाह जिन्हें पर्याप्त लगता है वे ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की तरह न्यूनतम निर्वाह में काम चलाते और अपनी कमाई का अधिकांश भाग परमार्थ में लगाते रहते हैं। ऐसों को यह पश्चाताप करते नहीं देखा गया कि वे गरीबी में दिन गुजारते हैं। बुरी तो कंगाली है जो आलसियों या अपव्यय विलासताओं पर ललक लिप्सा बन कर छायी रहती है। गरीबी ब्राह्मण की शान है। गांधी जी प्राचीनकाल के सन्तों की तरह अपरिग्रही जीवन जीते थे। जनक हल चलाकर पेट भरते थे। इनसे उनकी गरिमा घटी नहीं। भर्त्सना के भाजन तो लालची होते हैं जो पेट भरा रहने पर भी अधिक की रट लगाये रहते हैं और उसे बटोरने के लिए अनीति अपनाने का कुकर्म करने तक से नहीं चूकते।
इस दुनिया में कुरूपता तो है पर इतनी नहीं जो सौन्दर्य से अधिक अनुपात में तौली जा सके। इस दुनिया में अन्धेरा भी है, अभाव और अनाचार भी किन्तु वे इतने नहीं जो प्रकाश के वैभव की शालीनता से भी भारी सिद्ध हो सकें। भ्रष्टों और दुष्टों की कमी नहीं किन्तु यह धरती सज्जनता और उदारता के सहारे ही टिकी हुई है। हम निकृष्ट पर ही दृष्टि जमाकर उद्यान में पाये जाने वाले गुबरीले का उदाहरण क्यों बनें? फलों पर मंडराने वाले और भाग्य की सराहना करने वाले भौरों जैसा दृष्टिकोण क्यों अपनायें। जब श्रेष्ठता से सम्बन्ध जोड़ते हैं तो वह खिंचती हुई अपने पास चली आती है। जिन्हें निकृष्टता के बीच रहना, वैसा ही सोचना और उन्हीं में जुड़ना सुहाता है वे ही अपने को नरक में घिरा देखते हैं। चिन्तन उलट जाने पर बाल्मीक बिल्व, मंगल, अंगुलिमाल, अजामिल जैसों का काया कल्प हो गया तो फिर कोई कारण नहीं जो अपने भाग्य का नया निर्माण अपने हाथों न करें।
स्वर्ग और नरक मनुष्य के दांये बांये हाथों में विधाता ने सुनियोजित ढंग से संजोकर रखे हुये हैं। मनुष्य चाहे जिस मुट्ठी को खोलकर अपने लिए अभीष्ट परिस्थितियों का सृजन कर सकता है। इस सम्बन्ध में अड़चन एक ही है कि निषेधात्मक चिन्तन के साथ जुड़े हुए पतन पराभव एवं विधेयात्मक विचारणाओं के साथ अविच्छिन्न रूप से जोड़े गये उत्थान को अलग नहीं किया जा सकता। यह दोनों युग्म जुड़वा भाइयों की तरह उत्पन्न होते हैं और अपने साथी को लेकर ही गतिशील रहते हैं।
कहते हैं कि विधाता मनुष्य का भाग्य ललाट के ऊपर लिखता है। यह सत्य भी है और तथ्य भी। जो जैसा सोचेगा वह वैसा बनेगा। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, इस उक्ति की संगति इसी प्रकार बैठती है कि क्रिया का शुभारम्भ चिन्तन क्षेत्र से होता है। हाथ पैर तो बहुत बाद में भीतर की खिचड़ी पक कर तैयार हो जाने के बाद अपना काम प्रारम्भ करते हैं। कर्त्ता कौन? इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में देना हो तो कहना चाहिए कि मस्तिष्क। वही अपनी गतिविधियों—विचारणाओं के सहारे वर्तमान का ही नहीं, भविष्य का निर्माण करता है।
जो घटिया सोचते रहे वे घटिया बनकर रहे। जिनने उद्धत विचारा, वे पतन पराभव के गर्त में जा गिरे। जिनने ऊंचा सोचा ऊंचा निर्णय किया ऊंचे प्रयासों में हाथ डाला, वे ही ऊंचे उठे और महामानवों के लिए निर्धारित महानता के उच्च शिखर पर जा विराजे। अभिवंदनीय और अनुकरणीय बने। कृतकृत्य होकर रहे यह मनुष्य का अपना रुझान और चुनाव है कि चौराहे से फटने वाली श्रेष्ठता और निकृष्टता के दो रास्तों में से किसे चुने और किस पर कितनी तत्परता के साथ कदम बढ़ायें।
चासनी में पर फैला कर बेमौत मरने वाली मक्खी की दुर्गति अनेकों ने देखी और सुनी है। इतने पर भी यह भुला दिया जाता है कि लिप्सा लालसा की कभी शान्त न हो सकने वाली आग में क्यों कूदा जाय। किनारे पर बैठकर थोड़ा-थोड़ा चखने वाली मक्खी नफे में रहती है। पेट भी भर लेती है और जोखिम से भी बची रहती है। हलकी फुलकी जिन्दगी इसी को कहते हैं। अमीरों जैसी ललक यदि हावी न हो और औसत नागरिकों जैसा निर्वाह पर्याप्त लगे तो फिर ऊंचा सोचने और ऊंचा करने का अवसर भी मिल सकता है। समझदारी इसी को कहते हैं कि चिन्तन की श्रेष्ठता अपनाने के लिए तानाबाना बुनने दिया जाय। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए भगवान से प्रार्थना करनी पड़ती है—
‘‘साईं इतना दीजिए, जिसमें कुटुम्ब समाय।
आप नहीं भूखा रहै, साधु न भूखा जाय॥’’
दूरदर्शी कामना में उस अंकुश को सजग पाया जा सकता है जो भौतिक लिप्साओं की मर्यादाओं में रहने के लिए प्रतिबन्ध लगाता है। निर्वाह भर में संतोष करता है। और बचत को, द्वार पर खड़े साधु को देने के लिए दबाव डालता है। इस अनुशासन में रहने वाले न केवल हंसती-हंसाती जिन्दगी जी सकते हैं। वरन् अपने वैभव, उपार्जन, पराक्रम को मिलजुल कर बांट खाने की उदारता भी चरितार्थ कर सकते हैं। इसके विपरीत जिसकी लिप्सा समुद्र जितनी गहरी है और जिन्हें उसे पाटने की उतावली मची है, उनके लिए अनीति पर उतारू और कुकर्मरत रहने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। निष्ठुरता अपनाये बिना कोई इतना नहीं कमा—बचा सकता जिसके सहारे अमीरों जैसे ठाठ बाट बनाकर रहा जा सके। अपव्यय की फुलझड़ी जलाकर विलास का तमाशा देखने वाले सिर्फ वे ही हो सकते हैं। जिन्हें अनुपयुक्त संग्रह की उद्धत अपव्यय की लगन लगी हो यह अर्धविक्षिप्तों जैसी गहरी छानने वालों गुलाबी पीने वालों जैसी मनःस्थिति है जिसमें संग्रह और विलास के लिए अनुपयुक्त उपार्जन के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। ऐसी स्थिति से तो समस्याएं और आ खड़ी होती हैं। व्यक्ति स्वयं तो अन्त में त्रास पाता ही है अन्यों का शोषण कर भर्त्सना का पात्र भी बनता है। यह अदूरदर्शिता यदि समय रहते उलट दी जाय और समझदारी से जीने की बात मन में जड़ें जमा सके तो समझना चाहिए मनुष्य को नया जन्म मिल गया। अच्छा हो, ऐसी समझदारी जल्दी ही साथ दे और समय रहते इस प्रचलन प्रवाह में बहने न देने के लिए रोकथाम लगाये, खींच घसीट कर किनारे पर लगाये। जिसे ऐसा सुयोग मिलेगा उसी के लिए यह संभव होगा कि हंसती हंसाती जिन्दगी जिये और हिल मिलकर सुख चैन के दिन बिताये।
साथ ही अपनी मनमर्जी के अनुसार अपनी गति-विधियों का- आदतों का निर्माण करे। अपने जैसा ही सोचे यह कल्पना आदि से अन्त तक गलत है। इस संसार में हर किसी की आकृति अलग है। किसी का चेहरा किसी से नहीं मिलता। ठीक इसी प्रकार प्रकृति में भी अन्तर रहता है। जन्म जन्मान्तरों के संचित संस्कारों और वर्तमान अपनाये गये अनेकानेक प्रभावों के कारण हर मनुष्य का चिन्तन और स्वभाव भिन्न-भिन्न है। इसे इतनी जल्दी नहीं बदला जा सकता कि वह चुटकी बजाते ही अपना सब कुछ छोड़कर हमारा आज्ञानुवर्ती बने और वही करे जो हम कहें। मशीनों को पशुओं को इच्छानुरूप चलाया जा सकता है किन्तु मनुष्य के सम्बन्ध में वैसा नहीं सोचा जाना चाहिए। कुटुम्बियों के सम्बन्ध में भी मौलिक भिन्नता को मान्यता देते हुए तर्क, तथ्य, प्रमाण प्रस्तुत करते हुये स्नेह सद्भाव के सहारे किसी को औचित्य अपनाने की बात कहने में तो हर्ज नहीं फिर भी किसी को स्वतन्त्र निर्णय देने की गुंजाइश तो रखनी ही होगी। जिसके साथ जितनी पटरी बैठे उतना तालमेल बिठाकर चलना ही बुद्धिमत्ता है जिसे अपनाने वाले हर परिस्थिति में हंसती-हंसाती जिन्दगी जीते देखे गये हैं।

