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Books - जीवन की दिशाधारा और उसका सार्थक सुनियोजन

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Language: HINDI
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महत्वाकांक्षी तो बनें, पर श्रेष्ठता के

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मनुष्य की एक मौलिक विशेषता है—महत्वाकांक्षा। वह ऊंचा उठना चाहता है आगे बढ़ना चाहता है। प्रगति के लिए उत्सुक और श्रेय पाने के लिए आतुर रहता है। इस मौलिक प्रवृत्ति को तृप्त करने के लिए कौन, क्या रास्ता चुनता है, किस निर्णय पर पहुंचता है और किन प्रयासों का आश्रय लेता है? यह उसकी अपनी सूझ-बूझ पर निर्भर करता है।
यहां कहा जा रहा है कि प्रवृत्ति को ऐसे सत्प्रयोजनों के साथ नियोजित किया जाय, जिनमें अपना और दूसरों का समान रूप से हित साधन होता हो। प्रतिद्वंदिता आवश्यक नहीं। यदि उसके बिना काम न चलता हो तो स्वस्थ प्रतियोगिता में उतारा जा सकता है और सामान्यजनों की तुलना में अपने को श्रेष्ठ, उत्कृष्ट एवं वरिष्ठ सिद्ध किया जा सकता है। यह क्षेत्र उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का होना चाहिए। चोर की तुलना में डाकू बनकर वरिष्ठता सिद्ध करना ही हुआ कि कोई पैरों को कुल्हाड़ी से काटे तो उसकी तुलना में दूसरा अग्नि में जलकर अपने बढ़े-चढ़े पराक्रम का परिचय दे। अधिक विनाश करना, अधिक गहरे पतन के गर्त में गिरना नहीं, प्रतिस्पर्द्धा का स्वतन्त्र कार्य क्षेत्र है—सृजन और उत्थान के अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करना। इसी से प्रतिशोध शमन होता और सौजन्य बढ़ता है।
किसी भी प्रगति क्षेत्र में कदम बढ़ाने से पूर्व यह सोचा और देखा जाना चाहिए। कि इस प्रयास की आरम्भिक उपलब्धियां आकर्षक होते हुए क्या उसकी अन्तिम परिणति भी श्रेयस्कर है? तात्कालिक लाभ के लिए भविष्य को गंवा देना अदूरदर्शिता है। अदूरदर्शिता भी एक अपराधी दुष्प्रवृत्ति है, जिसका परिणाम राजदण्ड के रूप में न सही, आत्म दण्ड या ब्रह्म दण्ड के रूप में भुगतना पड़ता है। तात्कालिक लाभ के लिए दूरगामी हित अनहित का विचार छोड़ देने वाले प्रायः ऐसे कृत्य करते देखे गये हैं, जिनसे वे न केवल स्वयं विपत्ति में फंसते हैं, वरन् स्वजन सम्बन्धियों को भी साथ में ले डूबते हैं, इसलिए समग्र सौभाग्य का प्रतीक प्रतिनिधि विवेक को माना गया है। विवेक अर्थात् दूरगामी प्रतिफल का सही अनुमान और तदनुरूप किसान—विद्यार्थी जैसा व्यवस्था निर्धारण। इन कार्यों में आरम्भिक हानि को बीजारोपण जैसी अनिवार्य आवश्यकता माना जाता है और उसके लिए किसी प्रकार का खेद-असमंजस न करते हुए सुखद परिणति को ध्यान में रखा जाता है। यह भूल ही समस्त भूलों की जननी है। इस केन्द्र के साथ गुथी हुई चूक ऐसी है, जो पग-पग पर चूक कराती जाती है। फार्मूला गलत हो, अंक गणित, बीजगणित, रेखागणित का एक प्रश्न हल नहीं हो सकता, परिश्रम निरर्थक चला जायेगा और दूसरों के सम्मुख उपहासास्पद बनना पड़ेगा। इस लिए गणित प्रयोजनों को हाथ में लेने से पूर्व हल करने में प्रयुक्त होने वाले फार्मूले सही कर लेने चाहिए।
प्रगति का क्रम स्तर एवं प्रतिफल सही सुखद हो। इसके लिए—हर  प्रयोजन के लिए दूरगामी परिणामों पर विचार करना चाहिए और आतुरता से विरत रह कर यह  अनुमान लगाना चाहिए कि अन्तिम परिणति क्या होगी चासनी में पंख फंसाकर बेमौत मरने वाली मक्खी का नहीं, पुष्प का सौन्दर्य विलोकन और रसास्वादन करने वाले भौंरे का अनुकरण करना चाहिए। पक्षी नया घोंसला बनाती और परिवार सहित सुखपूर्वक रहती है। मकड़ी कीड़े फंसाने को जाल बनाती और खुद ही उलझ कर मरती है। हमारी विचारणा दूरदर्शी विवेकशीलों जैसी होनी चाहिए, किसी भी दिशा में प्रयास करने से पूर्व उसकी मध्यवर्ती स्थिति ओर पहुंचने की परिणति का भली भांति पर्यवेक्षण कर लेना चाहिए। आकर्षण में मोहान्ध होकर कुछ भी करने लगना भेड़िया धंसान में आंखें बन्द करके चल पड़ना, लगता तो सरल है किन्तु इस मानसिक आलस्य का प्रतिफल अगले ही दिनों दुष्परिणाम प्रस्तुत करने लगता है। जो इस सम्बन्ध में जागरूक हैं उन्हें बुद्धिमान कहना चाहिए। जो पत्ते की तरह प्रवाह में बहते हैं वे क्रमशः नीचे उतरते-गिरते और अन्ततः खारी समुद्र में जा पहुंचते और दुर्गति पर पश्चात्ताप करते है। यही कारण है कि विवेक को सर्वोपरि सौभाग्य माना गया है। कहा गया है कि जिसे वह प्राप्त है, उसके लिए इस संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं है। भगवान् का यही प्रमुख वरदान है स्वर्ग लोक की अधिष्ठात्री महाप्रज्ञा गायत्री इसी को कहा गया है। एक शब्द में इसे उत्कृष्टता की पक्ष धर दूसरी विवेकशीलता कहा जा सकता है। जिसे यह उपलब्ध है, उसे भौतिक क्षेत्र की सिद्धियां और मनःक्षेत्र की ऋद्धियां अनायास ही प्रचुर परिमाण में उपलब्ध होती रहती हैं महत्वाकांक्षा की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दिया जाय और प्रगति के उच्च शिखर तक पहुंचने का गौरव अर्जित किया जाय। शर्त एक ही है कि उस निर्धारण में दूरदर्शी विवेकशीलता का समन्वय गम्भीरतापूर्वक किया जाय।
आमतौर से दो ललक सामान्य जनों पर छाई रहती हैं— एक सम्पन्नता की, दूसरी कामुकता की। प्रायः इन्हीं दो प्रयोजनों में जीवन सम्पदा की समूची पूंजी खप जाती है। इतना कुछ बचता ही नहीं जिससे पुण्य परमार्थ जैसी विभूतियों को कमाया और उसके सहारे अपना तथा समाज का गौरव बढ़ाया जा सके। देखा जाना चाहिए कि क्या सम्पन्नता और कामुकता की उतनी ही महत्ता है, जितनी कि दिग्भ्रान्त दृष्टिकोण द्वारा आंकी जाती है। क्या उनके सहारे उस सुख सुविधा का रसास्वादन किया जा सकता है, जिनकी कल्पना भ्रान्त धारणाओं के आधार पर संजोई गई है।
मनुष्य का निर्वाह अत्यधिक स्वल्प साधनों से हो सकता है। उतना उपार्जन कुछ ही घण्टे के सामान्य श्रम से हर किसी के लिए सम्भव है। फिर सम्पन्नता अर्जित करने के लिए मनोयोग और श्रम पराक्रम में इस कदर क्यों खपा दिया जाय, जिससे मानवी गरिमा के निर्वाह एवं विभूतियों के सम्पादन का सुयोग ही न बन सके। समय हर किसी के पास सीमित है, उसे किसी भी प्रयोजन के लिए लगाया जा सकता है। ललक में दोष यह है कि वह जिस निमित्त  लगती है, उसी में सराबोर रहती है। भौतिक आकर्षणों में दोष यही हैं सम्पन्नता और कामुकता का नशा जिस पर भी छाया रहेगा, उसका मनोरथ एवं श्रम समय ऐसे प्रयोजनों के लिए न तो बचेगा ही और न लगेगा ही, जिससे उत्कृष्टता का श्रेय सम्पादन सम्भव हो सके। कौड़ी मोल हीरा गंवा देना, इसी को कहते हैं।
शरीर यात्रा के लिए निर्वाह साधनों को जुटाने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। संकट धन कुबेर बनने में खड़े होते हैं। सोने की लंका खड़ी करने में रावण को क्या नहीं करना पड़ा था। हिरण्यकश्यप, वृत्रासुर, जरासन्ध, सिकन्दर जैसे पराक्रमी भी इस क्षेत्र में सन्तोषजनक अर्जन न कर सके और हाथ मलते चले गये। सोचा जाना चाहिए कि औसत नागरिक की तरह निर्वाह साधनों को पर्याप्त मानकर सम्पन्नता की ललक से पीछा क्यों न छुड़ाया जाय? कसौटी में जो समय श्रम बचता है, उसे उच्चस्तरीय महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पुण्य परमार्थ में क्यों न लगाया जाय।
स्मरण रहे, औसत निर्वाह से अतिरिक्त संपदा संचय अगणित विग्रहों को जन्म देता। दुर्गुण दुर्व्यसन उन्हीं के खेत में पनपते हैं, जिनने आवश्यक धनराशि जमा कर रखी है। कम में खर्च चलाने और बचत को ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की तरह परमार्थ के लिए हाथों-हाथ लगाते चलने की नीति ही सर्वोत्तम है। ठाट-बाट बनाने से ईर्ष्या भड़केगी और असंख्य विग्रह खड़े होंगे। उत्तराधिकारियों को मुफ्तखोरी के लिए विपुल धनराशि छोड़ मरने का सीधा साधा अर्थ है उन्हें हर दृष्टि से तबाह कर देना। परिवार को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाने का कर्तव्य पालन ही पर्याप्त है। मोहवश उन्हें विलासी बनाना अथवा बैठे-ठाले गुलछर्रे उड़ाने की लानत लाद देना प्रकारान्तर से अपंग या विक्षिप्त बना कर रख देने की कुचेष्टा है। यह स्नेह प्रदर्शन नहीं, उनका भविष्य बिगाड़ देने वाला अभिशाप ही सिद्ध होता है।
कामुकता की दिशा में बढ़ती हुई महत्वाकांक्षा, अनेकानेक के साथ सम्पर्क साधने के लिए मचलती है। वर्तमान समाज अनुशासन, गृहस्थ निर्धारण के अन्तर्गत यह सम्भव नहीं। पशु वर्ग में भी मादा के प्रस्ताव पर ही उत्साह उभरता है। फिर उनमें बलिष्ठता की प्रमुखता रहती है। ऐसे अनेक कारण हैं, जिससे स्वेच्छा रमण किसी नर-नारी के लिए सम्भव नहीं। आतुर कामनाओं की पूर्ति न बन पड़ने पर निराशा और खीझ उत्पन्न होती है, जिनके कारण तनाव बढ़ता है, मन उचाट रहता है, स्वेच्छाचारी चिन्तन अपनाने पर अन्यान्य नैतिक सामाजिक मर्यादाओं का अनुशासन शिथिल पड़ता है फलतः अवांछनीय कृत्यों अपराधों के लिए रुझान बढ़ता है। बहिन-भाई पिता-पुत्र, माता-बच्चों के पवित्र सम्बन्धों का व्यक्तिक्रम करने पर व्यभिचारी चिन्तन को छूट मिलती है। जब कि देव संस्कृति में ग्रहणी को भी धर्म-पत्नी, सहचरी, सहधर्मिणी आदि नामों से सम्बोधित किया गया है।
वंश वृद्धि की प्रकृति प्रेरणा से यौनाचार में आकर्षण तो है, पर वैसा उत्साह उभरना मात्र प्रजनन का निमित्त कारण होना चाहिए, उसे कौतूहल या मनोरंजन की तरह प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। अतिवाद बरता जायगा तो शारीरिक मानसिक दुर्बलता बढ़ेगी और असमय बुढ़ापे का अनुभव होगा।
नर-नारी में यौन संरचना की दृष्टि से राई-रत्ती अन्तर तो हैं, पर वह ऐसा नहीं, जिसके कारण किसी को किसी का वशवर्ती होना और नागरिक अधिकारों से वंचित रहना पड़े। दोनों मनुष्य हैं। दोनों को मनुष्य के समान कर्तव्य उत्तरदायित्व निबाहने चाहिए और मिल-जुलकर प्रगति के साधन जुटाने चाहिए। इस स्वाभाविकता को कामुकता बेतरह नष्ट-भ्रष्ट करती है। विलास साधनों की तरह समर्थ का अपने कब्जे में असमर्थ पक्ष को खींच कर रखने की आवश्यकता मन माने उपभोग के लिए पड़ती है। यह विशुद्ध अवांछनीयता है। यौनाचार की अतिवादिता के फलस्वरूप अधिक बच्चे उत्पन्न होते हैं, जो आज की स्थिति में हर दृष्टि से अवांछनीयता है।
कामुकता एक प्रकार का मानसिक उन्माद है, जिसमें प्रतिफल की मांसलता एवं रमण चेष्टा की कुकल्पनायें मस्तिष्क में आवेश बन कर भ्रमण करती रहती है। फलस्वरूप वह तन्त्र इस प्रकार अस्त-व्यस्त हो जाता है, जिसमें किसी उच्चस्तरीय चिन्तन के लिए आवश्यक एकाग्रता जुट सकने जैसी स्थिति ही नहीं रहती। कामुक चिन्तन से उत्पन्न चंचलता एक आदत बन जाती है। फलतः उस स्तर के व्यक्ति विज्ञान, साहित्य, शोध जैसे गम्भीर चिन्तन से सम्बन्धित कार्यों के लिए मानसिक तीक्ष्णता गंवा बैठते हैं। कामुकता भड़कने वाले चित्र छाप कर व्यवसाय-विज्ञापन का प्रयोजन पूरा करना बुरी बात है। विशेषतया नारी समाज का इसमें प्रत्यक्ष अपमान है। इस प्रकार उसकी स्वाभाविक गरिमा छीनी और कामिनी रमणी की कुत्सा थोपी जाती है।
शालीनता के रहते हर परिवार में युवा नर-नारी भी साथ-साथ रहते हैं। उनके बीच पवित्र रिश्ते निभते हैं। फिर क्या कारण है कि घर के बाहर की बात सोचते ही उन मर्यादाओं का व्यतिक्रम होने लगे। नैतिक अतिक्रमण की दिशा में उठने वाले चरण एक के बाद दूसरे का क्रम अपनाते हुए, अन्ततः उस अनुशासन की जड़ें खोखली करते हैं, जिन पर कि मानवी गरिमा, प्रगति और सुख-शान्ति के आधार खड़े हुए हैं। अच्छा हो हमारी प्रवृत्ति कामुकता की ओर से मुड़े और पारिवारिकता से जुड़े। पारिवारिकता और कलाकारिता की दो उच्चस्तरीय सरसतायें ऐसी हैं, जिनका रसास्वादन यदि मिलने लगे तो कामुकता की ललक सहज ही शिथिल पड़ने लगेगी। जिस प्रकार सम्पदा की लिप्सा से विरत होकर मनुष्य नीतिवान् एवं परमार्थी बन सकता है उसी प्रकार कामुकता पर नियन्त्रण होते ही उदार शालीनता निखरने लगती है।
अहंता का परिपोषण शोभा अमीरी, बलिष्ठता या आतंक प्रदर्शन के माध्यम से होता है। यह जंजाल बहुत महंगा और प्रवंचनापूर्ण है। चकाचौंध उत्पन्न करने के लिए अकारण छद्म बरतने और पाखण्ड रचने पड़ते हैं। अहंता जताने में ईर्ष्या भड़कती है। दूसरों को छोटा या मूर्ख सिद्ध किया जाने पर वह अपना अपमान अनुभव करता है और अवसर मिलते ही प्रतिशोध का डंक मारता है। सजधज पर व्यभिचार का और वैभव पर बेईमानी का आरोपण होता है। जिस प्रकार अनावश्यक सम्पदा जमा करने पर हजार विग्रह खड़े होते हैं, ठीक उसी प्रकार अहंकारी के अकारण शत्रु बढ़ते जाते हैं।
उदर पूर्ति एवं परिवार व्यवस्था पर जितना समय और धन खर्च होता है। औसतन उतना ही अकारण अहंकार प्रदर्शन में खर्च हो जाता है। शादियों, पार्टियों में होने वाले खर्च को इसी मद में जोड़ा जाना चाहिए। फैशन तो विशुद्ध रूप से इसी विडम्बना की देन है। दूसरों की वाहवाही लूटने के लिए बुने गए जाल जंजाल से यदि पर्दा उघाड़ कर देखा जाये तो व्यंग्य उपहासों से भरा होता है। ऐसे लोग ओछे, बचकाने, छोटे, उद्धत समझे जाते हैं और ललक के सर्वथा विपरीत विज्ञजनों की आंखों में गिरते  चले जाते हैं। उनकी उपयोगिता एवं प्रामाणिकता तक संदिग्ध होती चली जाती है। इन तथ्यों से यदि कोई गम्भीरता पूर्वक अवगत हो सके, तो ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की नीति ही बुद्धिमत्ता पूर्ण प्रतीत होगी।
आम आदमी की तीन चौथाई सामर्थ्य सम्पन्नता, कामुकता एवं अहंता की खाई खोदते और पाटते रहने में ही खप जाती है। तथ्यतः यह तीनों अनावश्यक ही नहीं अहितकर भी हैं। इनमें शक्तियों का अपव्यय ही नहीं, वरन् ऐसी अनुपयुक्त प्रतिक्रियायें भी उत्पन्न होती हैं, जिनमें भौतिक हानि और आन्तरिक ग्लानि असाधारण मात्रा में सहन करनी पड़ती है। जिस ओछी वाहवाही की अपेक्षा की गई थी, वस्तुतः वह और भी अधिक दूर हटती जाती है। इस भूल को यदि सुधारा जा सके, संयम और सादगी की शालीनता को अविच्छिन्न अंश माना जा सके, तो इतने भर से विपन्न दिखने वाली परिस्थितियों का कुहासा पूरी तरह छट सकता है।
वितृष्णा और व्यामोह के भव-बन्धनों से यदि छुटकारा मिल सके, तो दृष्टिकोण में स्वर्ग तैरता दिखाई पड़ेगा। इन्हीं तीन दुष्प्रवृत्तियों को हथकड़ी बेड़ी और तौक के नाम से भवबन्धन के रूप में चित्रित किया गया है। इनसे छुटकारा मिल सके तो समझना चाहिए जीवित रहते ही मुक्ति मिल गई। इसी स्थिति को सन्त कबीरदास जी ने सहज समाधि कहा है।
दूरदर्शी विवेकशील इन त्रिविध नाग-पाशों से छुटकारा पाने और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण करने के लिए पुण्य परमार्थ के निमित्त परिपूर्ण उत्साह संकल्प और साहस के साथ अग्रसर होते हैं। ऐसे लोग ही धरती के देवता हैं उनकी उच्चस्तरीय महत्वाकांक्षाओं में से हर एक पूर्ण होकर रहती हैं। फलतः वे सदा सुखी सन्तुष्ट दिखाई पड़ते हैं।
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