ईश्वर प्रदत्त सम्पदा को कौड़ी के मोल न गंवाएं
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कौशल, मनोयोग और श्रम का अमुक गति से अमुक समय तक उपयोग करने की विद्या ही समयानुसार सम्पदा बनकर सामने आती है। इस तथ्य को समझ लेने पर इस तथ्य का रहस्योद्घाटन होता है कि समय का— सुनियोजन ही धन है। भ्रष्ट प्रचलनों ने जो अपवाद खड़े किये हैं वे मान्यता प्राप्त नहीं कर सकते। उन्हें तो बुहार फेंकने में ही गति है। यह प्रक्रिया आज नहीं तो कल सम्पन्न करनी ही है। अर्थ क्षेत्र की विकृतियां तो मानवी गरिमा सम्भावना और सौजन्य की सभ्यता को ही जड़मूल से उखाड़ देंगी। इसलिए जहां उस परिमार्जन की तैयारी करनी चाहिये, वहां उसके सम्बन्ध में कम से कम अपने चिन्तन और निर्धारण में समय रहते सुधार परिवर्तन कर ही लेना चाहिये।
धन की आवश्यक ललक पर अंकुश लग सके और उसके उपार्जन में अपना तथा कुटुम्बियों का अधिक श्रम, मनोयोग लग सके तो समझना चाहिये कि अर्थ-समस्या का समाधान हुआ और एक ऐसा बड़ा व्यवधान हटा, जो किसी उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए समय, श्रम और मनोयोग लग सकने जैसी स्थिति ही नहीं बनने देता। समझना चाहिये कि समय ईश्वर प्रदत्त ऐसा अनुदान है जिसे श्रम के साथ संयुक्त कर देने के उपरान्त अपनी क्षमता प्रकट करता है। वह क्षमता ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति सामर्थ्य है। उसके बदले किसी भी दिशा में चला जा सकता है और किसी भी लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। मनुष्य को सर्वसमर्थ कहा गया है। वह सच्चे अर्थों में अपना भाग्य विधाता और भविष्य निर्धारक है पर यह तथ्य साकार तभी होता है जब समय के साथ श्रम और मनोयोग का समन्वय करे अभीष्ट प्रयोजन में संकल्पपूर्वक नियोजित किया जाये।
कौन कितना जिया? इसका लेखा-जोखा वर्ष, महीने या दिनों को गिनकर नहीं करना चाहिये वरन् देखा यह जाना चाहिये कि जीने वाले ने उस अवधि को किन प्रयोजनों में कितनी तत्परतापूर्वक नियोजित किया। हो सकता है कि कम समय जीने वाला शंकराचार्य और विवेकानन्द की तरह अपने अविस्मरणीय पद चिन्ह छोड़े और सराहनीय कृतियों के पर्वत खड़े करे। साथ ही यह भी हो सकता है कि कोई शतायु होकर मरे किन्तु निरर्थक दिन बिताये और असंतोष उगाये।
बहुमूल्य मानव जीवन का एक-एक क्षण अनमोल है। हर सांस को हीरे-मोतियों से तोला जा सकता है। जिसने इस तथ्य को जाना, समझना चाहिये उसने जो सबसे अधिक महत्व का था उसे जान लिया। बुद्धिमत्ता की प्रशंसा तब है जब समय के सदुपयोग का उच्चस्तरीय निर्धारण बन सके। जिसकी भी प्रज्ञा ने इस प्रकार अनुग्रह प्रदान किया है उसे सच्चे अर्थों में भाग्यवान कहना चाहिये। अन्यथा लोग ऐसे ही नर वानरों की तरह जीते और ज्यों-त्यों करे दिन गुजारते हैं।
ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदाओं को कौड़ी मोल गंवा देने वाले तीन भूल करते हैं— एक यह कि आलस्य प्रमाद विलास विनोद में समय काटते हैं। दूसरे ललक लिप्सा की पूर्ति के लिए धन बटोरने में लगे रहते हैं। आम आदमी का अधिकांश समय नियोजन प्रायः इन्हीं दो कामों के लिए होता है। तीसरे स्तर के कुछ उद्धत प्रकृति के ऐसे भी होते हैं जो विनाश विध्वंस में लगे रहते हैं अथवा दर्प दिखाने, ठाठ बनाने के लिए, प्रशंसा सुनने के लिए ऐसे कृत्य करते हैं जिसमें प्रवंचना और विडम्बना के अतिरिक्त और कोई सार तत्व नहीं होता।
इन प्रयोजनों की परिणति पर ध्यान दिया जाये और महामानवों द्वारा अपनाई गई गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो प्रतीत होगा कि दोनों के मध्य जमीन आसमान जितना अन्तर है। दोनों की उपलब्धियों में इतना अन्तर है। जिन्हें कांच और हीरे जैसा कहा जा सके।
आलसी, प्रमादी, अनगढ़, पिछड़ी परिस्थितियों में पड़े हैं। तृष्णातुर उद्यमी तो होते हैं पर उनकी योग्यता उस अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग में लग जाती है जिसकी निरर्थकता को सहज समझा जा सकता था और देखा जा सकता था कि ललक में जिस सुखोपभोग की आशा की गई थी उसकी छाया ही दिवास्वप्न ही तरह लुभाती रही। पल्ले खीज और थकान के अतिरिक्त और कुछ लगा नहीं बड़प्पन और दर्प की विडम्बना और भी अधिक उपहासास्पद है। इस नक्कार खाने में तूती की क्या बिसात। एक से एक प्रतापी, कठपुतली जैसा नाच दिखाकर बाजीगर की झोली में घुस गये। यहां कौन किसका बड़प्पन मानता है। अपनी चिन्ता समस्याओं से फुरसत नहीं फिर कौन किसका दर्प देखे और किसलिए, किस किस समय किसको सराहे। अपनी ओर ध्यान खींचने और चकाचौंध उत्पन्न करने की लिप्सा को बचकानी बाल क्रीड़ा के अतिरिक्त और कुछ कहते ही नहीं बनता। यहीं हैं वे ललक लिप्सायें जिसमें जिन्दगी का बहुमूल्य अवसर ऐसे ही गुम जाता है। विदाई के दिनों ईश्वर प्रदत्त अनुदान को किस निमित्त उपयोग किया यह सोचने का अवसर मिलता है तो प्रतीत होता है कि भूल ही भूल में उस वैभव को गंवा दिया गया जिसके सही सदुपयोग की बाद यदि सूझ पड़ी होती तो सार्थकता का स्वरूप ही दूसरा होता।
दूरदर्शी विवेकशीलता—महाप्रज्ञा यदि किसी बड़भागी पर अनुग्रह करे तो उसका स्वरूप एक ही होना चाहिये कि वह जीवन सम्पदा की गरिमा समझे और उसके सदुपयोग की बात सोचे। इस चिन्तन से एक ही निष्कर्ष उभरकर ऊपर आता है कि समय को प्रत्यक्ष सौभाग्य माना जाये और इसके उपयोग का जो सर्वश्रेष्ठ निर्धारण सम्भव हो उसे कर गुजरने का साहस अपनाया जाये।
महामानवों के पराक्रम का उपयोग दो प्रयोजनों के निमित्त होता रहा है। एक में उनने अपनी क्षमता एवं वरिष्ठता का अभिवर्धन किया है और दूसरे में उनने विश्व वसुधा के साथ जुड़े हुये उत्तरदायित्वों को संकल्पपूर्वक निभाया है। इन्हीं दो कार्यों को आत्म कल्याण और विश्व कल्याण के नाम से जाना जाता है। कोई चाहे तो उसे आत्मा और परमात्मा को प्रसन्नता उपलब्ध कराने वाली साधना भी कह सकता है। उनमें से एक स्वार्थ है और दूसरा परमार्थ। इनके समन्वय से ही मनुष्य जन्म सार्थक और कृत-कृत्य होता है।
आत्म कल्याण का तात्पर्य है—व्यक्तित्व का निखार परिष्कार। इसके लिए आन्तरिक संघर्ष करना पड़ता है और गुण, कर्म, स्वभाव की वरिष्ठता सम्पादित करने वाले निर्धारणों का जीवनचर्या में समावेश करना पड़ता है। संचित कुसंस्कारों का एक पहाड़ हर किसी के सामने है। प्रचलन, वातावरण, स्वजन और आदतों का एक ऐसा जाल-जंजाल है जिसके रहते न कुछ उच्चस्तरीय सोचते बनता है और न करते-धरते। इससे बाहर निकल सकना परम पुरुषार्थ है। जीवन से सम्बन्धित समस्याओं का स्वरूप सही अर्थों में समझ सकना आत्मबोध है। इसी को सत्य या ईश्वर की प्राप्ति कहते हैं। आत्म साक्षात्कार भी यही है। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए वर्तमान चिन्तन प्रवाह को एक प्रकार से उलटना ही पड़ता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन जैसी उच्चस्तरीय पुरुषार्थों में मन को बलपूर्वक नियोजित करना पड़ता है। साधना उपासना भी इसी एक प्रयोजन के लिए की जाती है। यह अध्यात्म क्षेत्र का मानसिक पराक्रम हुआ। जिसके लिए समय भी लगाना पड़ता है और श्रम भी करना पड़ता है।
चिन्तन और आचरण के समन्वय से ही व्यक्तित्व बनता है। स्वभाव संस्कार इसी प्रक्रिया को अपनाने से विनिर्मित होते हैं। इसके लिए अपनी कार्य पद्धति इस प्रकार की निर्धारित करनी होती है जिसमें आदर्शवादी गति-विधियों में संलग्न रहना पड़े। साथ ही निर्वाह का उपक्रम भी बनता रहे। क्षमता संवर्धन—भी इसी प्रक्रिया का एक अंग है। शारीरिक और मानसिक योग्यतायें जितनी बढ़ती हैं। उसी अनुपात के कुछ अधिक महत्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं। इस दृष्टि से आत्मनिर्माण के लिए परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी विधि-व्यवस्था बनानी पड़ती है जिसमें उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के लिए उपयुक्त अवसर नियमित रूप से मिलता रहे।
ईश्वर ने जिस आकांक्षा से इतनी बड़ी धरोहर सौंपी है उसका निर्वाह भी परमार्थ प्रयोजनों के सहारे ही सधता है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में दान पुण्य ही काम आता है। इन्हीं की परिणति सुयोग सौभाग्य के रूप में सामने आती है। इसी प्रकार सीमित ‘स्व’ को असीम ‘ब्रह्म’ के साथ जुड़ने की परम सिद्धि विराट् के साधन से ही संभव होती है। वसुधैवकुटुम्बकम् और आत्मवत् सर्वभूतेषु की दो कसौटियों पर खरा सिद्ध होने के लिये मनुष्य को परमार्थ परायण बनना पड़ता है। गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात बढ़ाते चलने के लिये सेवाधर्म अपनाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। ऐसे-ऐसे अनेक कारण हैं जो जीवन-क्रम में आत्मोत्कर्ष की तरह लोकमंगल का समुचित समावेश करने के लिये बाधित करते हैं।
उपरोक्त दोनों ही उच्चस्तरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए मात्र सोचते या पढ़ने सुनते रहने से ही काम नहीं चलता। भजन भाव से भी उसकी आंशिक पूर्ति ही होती है। समग्रता तब मिलती है जब उन्हें दिनचर्या में सम्मिलित किया जाय और विधि-व्यवस्था ऐसी बनाई जाये जिसमें निर्वाह प्रयोजनों के साथ-साथ इन महान् निर्धारणों का भी सुयोग बनता रहे। स्पष्ट है कि इसके लिये समय और श्रम लगाना पड़ेगा। व्यक्ति और समाज की, आत्मा और परमात्मा की मध्यवर्ती कड़ी—परिवार है। यह जब छोटा रहता है तो उसे कुटुम्ब कहते हैं और जब बढ़ता है तब विश्व परिवार के रूप में सुविस्तृत बनकर सामने आता है। परिवार की वह प्रयोगशाला-पाठशाला एवं कर्मशाला है जिसमें पौरुष को प्रकट करने और अभ्यासों को परिपक्व करने का अवसर मिलता है। अस्तु उत्कृष्टता की साधना के निमित्त ऐसी गति-विधियों का निर्माण करना पड़ता है। जिनमें समय के साथ श्रम और मनोयोग का समन्वय सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगा रहे। इसके लिए निजी जीवनचर्या, में एक समन्वित कार्यपद्धति का निर्धारण करना पड़ता है।
इस प्रक्रिया को कौन किस प्रकार सम्पन्न करे यह व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर ही एक सुनियोजित कार्यक्रम बन सकता है। जीवन साधना का तात्पर्य ही यह है कि दिशाधारा रीति-नीति में, उत्कृष्टता का समावेश करना और ऐसी दिनचर्या बनाना जिसमें उपरोक्त तथ्यों का समुचित समन्वय हो सके। इसमें व्यक्तिगत दुर्बलताओं और अस्त-व्यस्ता को हटाने और उसके स्थान पर प्रगतिशील विधि व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। आजीविका के औचित्य एवं स्तर को नये सिरे से निर्धारित करना होता है। परिवार में जो परम्परा चल रही है उसके ढर्रे में आवश्यक परिवर्तन करने होते हैं। साथ ही लोक साधना के लिये नये सिरे से अधिक समय लगाने की गुंजाइश निकालनी होती है। ये सभी ऐसे काम हैं जो उथली कल्पना करते रहने से नहीं बन पड़ते वरन् अवांछनीयताओं के उन्मूलन और सत्परम्पराओं के प्रचलन परिपोषण के लिए ऐसा ताना-बाना बुनना पड़ता है मानो कोई बड़ा उद्योग व्यवसाय खड़ा करने के लिए योजना बनाने, पूंजी जुटाने, शिल्पियों को कार्यरत करने तथा उत्पादन को खपाने का सरंजाम खड़ा किया जा रहा हो। राष्ट्रीय बचत की पंचवर्षीय योजनाओं का ढांचा खड़ा करने में जैसे कौशल की आवश्यकता पड़ती है प्रायः वैसी ही सूझ-बूझ प्रगतिशील जीवन के अभिनय निर्धारण के लिए आवश्यक होती हैं। इससे कम में बात ही नहीं बनती यहां जादू चमत्कार जैसा कुछ है नहीं। जिसे जो कुछ उपलब्ध हुआ है वह उसके नियोजन, निर्धारण और पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है। इसका समन्वय ही दैवी वरदान के नाम से जाना जाता है।
जीवनचर्या में परिवर्तन कायाकल्प है दृष्टि और प्रयास में घुसी हुई अवांछनीयता को हटाकर उसके स्थान पर उत्कृष्टता को प्रतिष्ठापित किया जा सके तो समझना चाहिये कि महानता का श्रेय साधन हस्तगत हो गया। पर यह हो कैसे? इसका एक ही उत्तर है कि उच्चस्तरीय निर्धारणों को कार्यान्वित करने के लिये समय सम्पदा का नियोजन किया जाये। उसके साथ श्रम और मनोयोग को भी संयुक्त रखा जाये। इससे बिना समुन्नत जीवन क्रम का श्रेय साधन सम्पन्न कर सकने का कोई मार्ग नहीं।
अभीष्ट प्रयोजन के लिये समय निकालें कैसे? मनोयोग जुड़े कैसे? श्रम संलग्नता बने कैसे? इन समस्याओं का समाधान एक ही है कि जिन ललक लिप्साओं में इतने दिनों अपनी क्षमतायें संलग्न रही हैं, उन्हें वहां से विरत किया जाये। वैराग्य इसी का नाम है। जिस त्याग संन्यास की चर्चा अध्यात्म क्षेत्र में होती रहती है उसका तात्पर्य कर्तव्यों उत्तरदायित्वों को छोड़ बैठना नहीं वरन् यह है कि अवांछनीय ललक लिप्साओं से अपने समय, श्रम को बचाने छुड़ाने का प्रयास किया जाये ताकि उस बचत को सत्प्रयोजनों में लगाकर प्रगति के उच्च शिखर तक पहुंच सकना बन पड़े।
उत्थान और पतन के दो सर्वविदित राजमार्ग है। तृष्णा ग्रसित होकर वैभव, विलास और अहंता की परितृप्ति के प्रयास में संलग्न रहा जा सकता है। इसमें न समय बचने वाला है न श्रम न मनोयोग। इस मिट्टी को जितना प्रज्वलित किया जायेगा उतनी ही ऊंची लपटें उठेंगी और उतना ही अधिक ईंधन मांगेंगी। इस स्तर की लालसा यदि आतुरता स्तर तक जा पहुंचे तो फिर उनका समाधान दो ही उपायों से सूझता है। जिसमें एक है आत्महत्या दूसरा है ब्रह्महत्या। आत्महत्या का तात्पर्य है अपने स्तर और व्यक्तित्व को गिराकर हेय परिस्थितियों में प्रवेश करना और उनके साथ जुड़ी हुई नरक यन्त्रणाओं को निरन्तर सहन करना। दूसरा मार्ग इससे भिन्न है उसमें लिप्साओं पर नियन्त्रण रखना और संयम साधना होता है। निर्वाह को सादा, सरल और सौम्य बनाना होता है ताकि सीमित समय, श्रम में उसी पूर्ति हो सके और बची हुई क्षमता उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लग सके।
क्षमता का तात्पर्य है—ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा का उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए नियोजन। इसी आधार पर क्षमता बढ़ती है और महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति में समर्थ होती है। दुष्प्रयोजनों में समय और श्रम लगा रहे तो उसे क्षमता की सार्थकता नहीं दुर्गति एवं विकृति ही कहा जायेगा।
धन की आवश्यक ललक पर अंकुश लग सके और उसके उपार्जन में अपना तथा कुटुम्बियों का अधिक श्रम, मनोयोग लग सके तो समझना चाहिये कि अर्थ-समस्या का समाधान हुआ और एक ऐसा बड़ा व्यवधान हटा, जो किसी उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए समय, श्रम और मनोयोग लग सकने जैसी स्थिति ही नहीं बनने देता। समझना चाहिये कि समय ईश्वर प्रदत्त ऐसा अनुदान है जिसे श्रम के साथ संयुक्त कर देने के उपरान्त अपनी क्षमता प्रकट करता है। वह क्षमता ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति सामर्थ्य है। उसके बदले किसी भी दिशा में चला जा सकता है और किसी भी लक्ष्य तक पहुंचा जा सकता है। मनुष्य को सर्वसमर्थ कहा गया है। वह सच्चे अर्थों में अपना भाग्य विधाता और भविष्य निर्धारक है पर यह तथ्य साकार तभी होता है जब समय के साथ श्रम और मनोयोग का समन्वय करे अभीष्ट प्रयोजन में संकल्पपूर्वक नियोजित किया जाये।
कौन कितना जिया? इसका लेखा-जोखा वर्ष, महीने या दिनों को गिनकर नहीं करना चाहिये वरन् देखा यह जाना चाहिये कि जीने वाले ने उस अवधि को किन प्रयोजनों में कितनी तत्परतापूर्वक नियोजित किया। हो सकता है कि कम समय जीने वाला शंकराचार्य और विवेकानन्द की तरह अपने अविस्मरणीय पद चिन्ह छोड़े और सराहनीय कृतियों के पर्वत खड़े करे। साथ ही यह भी हो सकता है कि कोई शतायु होकर मरे किन्तु निरर्थक दिन बिताये और असंतोष उगाये।
बहुमूल्य मानव जीवन का एक-एक क्षण अनमोल है। हर सांस को हीरे-मोतियों से तोला जा सकता है। जिसने इस तथ्य को जाना, समझना चाहिये उसने जो सबसे अधिक महत्व का था उसे जान लिया। बुद्धिमत्ता की प्रशंसा तब है जब समय के सदुपयोग का उच्चस्तरीय निर्धारण बन सके। जिसकी भी प्रज्ञा ने इस प्रकार अनुग्रह प्रदान किया है उसे सच्चे अर्थों में भाग्यवान कहना चाहिये। अन्यथा लोग ऐसे ही नर वानरों की तरह जीते और ज्यों-त्यों करे दिन गुजारते हैं।
ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदाओं को कौड़ी मोल गंवा देने वाले तीन भूल करते हैं— एक यह कि आलस्य प्रमाद विलास विनोद में समय काटते हैं। दूसरे ललक लिप्सा की पूर्ति के लिए धन बटोरने में लगे रहते हैं। आम आदमी का अधिकांश समय नियोजन प्रायः इन्हीं दो कामों के लिए होता है। तीसरे स्तर के कुछ उद्धत प्रकृति के ऐसे भी होते हैं जो विनाश विध्वंस में लगे रहते हैं अथवा दर्प दिखाने, ठाठ बनाने के लिए, प्रशंसा सुनने के लिए ऐसे कृत्य करते हैं जिसमें प्रवंचना और विडम्बना के अतिरिक्त और कोई सार तत्व नहीं होता।
इन प्रयोजनों की परिणति पर ध्यान दिया जाये और महामानवों द्वारा अपनाई गई गतिविधियों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाये तो प्रतीत होगा कि दोनों के मध्य जमीन आसमान जितना अन्तर है। दोनों की उपलब्धियों में इतना अन्तर है। जिन्हें कांच और हीरे जैसा कहा जा सके।
आलसी, प्रमादी, अनगढ़, पिछड़ी परिस्थितियों में पड़े हैं। तृष्णातुर उद्यमी तो होते हैं पर उनकी योग्यता उस अनावश्यक संचय और अवांछनीय उपभोग में लग जाती है जिसकी निरर्थकता को सहज समझा जा सकता था और देखा जा सकता था कि ललक में जिस सुखोपभोग की आशा की गई थी उसकी छाया ही दिवास्वप्न ही तरह लुभाती रही। पल्ले खीज और थकान के अतिरिक्त और कुछ लगा नहीं बड़प्पन और दर्प की विडम्बना और भी अधिक उपहासास्पद है। इस नक्कार खाने में तूती की क्या बिसात। एक से एक प्रतापी, कठपुतली जैसा नाच दिखाकर बाजीगर की झोली में घुस गये। यहां कौन किसका बड़प्पन मानता है। अपनी चिन्ता समस्याओं से फुरसत नहीं फिर कौन किसका दर्प देखे और किसलिए, किस किस समय किसको सराहे। अपनी ओर ध्यान खींचने और चकाचौंध उत्पन्न करने की लिप्सा को बचकानी बाल क्रीड़ा के अतिरिक्त और कुछ कहते ही नहीं बनता। यहीं हैं वे ललक लिप्सायें जिसमें जिन्दगी का बहुमूल्य अवसर ऐसे ही गुम जाता है। विदाई के दिनों ईश्वर प्रदत्त अनुदान को किस निमित्त उपयोग किया यह सोचने का अवसर मिलता है तो प्रतीत होता है कि भूल ही भूल में उस वैभव को गंवा दिया गया जिसके सही सदुपयोग की बाद यदि सूझ पड़ी होती तो सार्थकता का स्वरूप ही दूसरा होता।
दूरदर्शी विवेकशीलता—महाप्रज्ञा यदि किसी बड़भागी पर अनुग्रह करे तो उसका स्वरूप एक ही होना चाहिये कि वह जीवन सम्पदा की गरिमा समझे और उसके सदुपयोग की बात सोचे। इस चिन्तन से एक ही निष्कर्ष उभरकर ऊपर आता है कि समय को प्रत्यक्ष सौभाग्य माना जाये और इसके उपयोग का जो सर्वश्रेष्ठ निर्धारण सम्भव हो उसे कर गुजरने का साहस अपनाया जाये।
महामानवों के पराक्रम का उपयोग दो प्रयोजनों के निमित्त होता रहा है। एक में उनने अपनी क्षमता एवं वरिष्ठता का अभिवर्धन किया है और दूसरे में उनने विश्व वसुधा के साथ जुड़े हुये उत्तरदायित्वों को संकल्पपूर्वक निभाया है। इन्हीं दो कार्यों को आत्म कल्याण और विश्व कल्याण के नाम से जाना जाता है। कोई चाहे तो उसे आत्मा और परमात्मा को प्रसन्नता उपलब्ध कराने वाली साधना भी कह सकता है। उनमें से एक स्वार्थ है और दूसरा परमार्थ। इनके समन्वय से ही मनुष्य जन्म सार्थक और कृत-कृत्य होता है।
आत्म कल्याण का तात्पर्य है—व्यक्तित्व का निखार परिष्कार। इसके लिए आन्तरिक संघर्ष करना पड़ता है और गुण, कर्म, स्वभाव की वरिष्ठता सम्पादित करने वाले निर्धारणों का जीवनचर्या में समावेश करना पड़ता है। संचित कुसंस्कारों का एक पहाड़ हर किसी के सामने है। प्रचलन, वातावरण, स्वजन और आदतों का एक ऐसा जाल-जंजाल है जिसके रहते न कुछ उच्चस्तरीय सोचते बनता है और न करते-धरते। इससे बाहर निकल सकना परम पुरुषार्थ है। जीवन से सम्बन्धित समस्याओं का स्वरूप सही अर्थों में समझ सकना आत्मबोध है। इसी को सत्य या ईश्वर की प्राप्ति कहते हैं। आत्म साक्षात्कार भी यही है। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए वर्तमान चिन्तन प्रवाह को एक प्रकार से उलटना ही पड़ता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन जैसी उच्चस्तरीय पुरुषार्थों में मन को बलपूर्वक नियोजित करना पड़ता है। साधना उपासना भी इसी एक प्रयोजन के लिए की जाती है। यह अध्यात्म क्षेत्र का मानसिक पराक्रम हुआ। जिसके लिए समय भी लगाना पड़ता है और श्रम भी करना पड़ता है।
चिन्तन और आचरण के समन्वय से ही व्यक्तित्व बनता है। स्वभाव संस्कार इसी प्रक्रिया को अपनाने से विनिर्मित होते हैं। इसके लिए अपनी कार्य पद्धति इस प्रकार की निर्धारित करनी होती है जिसमें आदर्शवादी गति-विधियों में संलग्न रहना पड़े। साथ ही निर्वाह का उपक्रम भी बनता रहे। क्षमता संवर्धन—भी इसी प्रक्रिया का एक अंग है। शारीरिक और मानसिक योग्यतायें जितनी बढ़ती हैं। उसी अनुपात के कुछ अधिक महत्वपूर्ण कार्य बन पड़ते हैं। इस दृष्टि से आत्मनिर्माण के लिए परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी विधि-व्यवस्था बनानी पड़ती है जिसमें उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के लिए उपयुक्त अवसर नियमित रूप से मिलता रहे।
ईश्वर ने जिस आकांक्षा से इतनी बड़ी धरोहर सौंपी है उसका निर्वाह भी परमार्थ प्रयोजनों के सहारे ही सधता है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में दान पुण्य ही काम आता है। इन्हीं की परिणति सुयोग सौभाग्य के रूप में सामने आती है। इसी प्रकार सीमित ‘स्व’ को असीम ‘ब्रह्म’ के साथ जुड़ने की परम सिद्धि विराट् के साधन से ही संभव होती है। वसुधैवकुटुम्बकम् और आत्मवत् सर्वभूतेषु की दो कसौटियों पर खरा सिद्ध होने के लिये मनुष्य को परमार्थ परायण बनना पड़ता है। गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का अनुपात बढ़ाते चलने के लिये सेवाधर्म अपनाने की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है। ऐसे-ऐसे अनेक कारण हैं जो जीवन-क्रम में आत्मोत्कर्ष की तरह लोकमंगल का समुचित समावेश करने के लिये बाधित करते हैं।
उपरोक्त दोनों ही उच्चस्तरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए मात्र सोचते या पढ़ने सुनते रहने से ही काम नहीं चलता। भजन भाव से भी उसकी आंशिक पूर्ति ही होती है। समग्रता तब मिलती है जब उन्हें दिनचर्या में सम्मिलित किया जाय और विधि-व्यवस्था ऐसी बनाई जाये जिसमें निर्वाह प्रयोजनों के साथ-साथ इन महान् निर्धारणों का भी सुयोग बनता रहे। स्पष्ट है कि इसके लिये समय और श्रम लगाना पड़ेगा। व्यक्ति और समाज की, आत्मा और परमात्मा की मध्यवर्ती कड़ी—परिवार है। यह जब छोटा रहता है तो उसे कुटुम्ब कहते हैं और जब बढ़ता है तब विश्व परिवार के रूप में सुविस्तृत बनकर सामने आता है। परिवार की वह प्रयोगशाला-पाठशाला एवं कर्मशाला है जिसमें पौरुष को प्रकट करने और अभ्यासों को परिपक्व करने का अवसर मिलता है। अस्तु उत्कृष्टता की साधना के निमित्त ऐसी गति-विधियों का निर्माण करना पड़ता है। जिनमें समय के साथ श्रम और मनोयोग का समन्वय सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगा रहे। इसके लिए निजी जीवनचर्या, में एक समन्वित कार्यपद्धति का निर्धारण करना पड़ता है।
इस प्रक्रिया को कौन किस प्रकार सम्पन्न करे यह व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के साथ तालमेल बिठाकर ही एक सुनियोजित कार्यक्रम बन सकता है। जीवन साधना का तात्पर्य ही यह है कि दिशाधारा रीति-नीति में, उत्कृष्टता का समावेश करना और ऐसी दिनचर्या बनाना जिसमें उपरोक्त तथ्यों का समुचित समन्वय हो सके। इसमें व्यक्तिगत दुर्बलताओं और अस्त-व्यस्ता को हटाने और उसके स्थान पर प्रगतिशील विधि व्यवस्था अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। आजीविका के औचित्य एवं स्तर को नये सिरे से निर्धारित करना होता है। परिवार में जो परम्परा चल रही है उसके ढर्रे में आवश्यक परिवर्तन करने होते हैं। साथ ही लोक साधना के लिये नये सिरे से अधिक समय लगाने की गुंजाइश निकालनी होती है। ये सभी ऐसे काम हैं जो उथली कल्पना करते रहने से नहीं बन पड़ते वरन् अवांछनीयताओं के उन्मूलन और सत्परम्पराओं के प्रचलन परिपोषण के लिए ऐसा ताना-बाना बुनना पड़ता है मानो कोई बड़ा उद्योग व्यवसाय खड़ा करने के लिए योजना बनाने, पूंजी जुटाने, शिल्पियों को कार्यरत करने तथा उत्पादन को खपाने का सरंजाम खड़ा किया जा रहा हो। राष्ट्रीय बचत की पंचवर्षीय योजनाओं का ढांचा खड़ा करने में जैसे कौशल की आवश्यकता पड़ती है प्रायः वैसी ही सूझ-बूझ प्रगतिशील जीवन के अभिनय निर्धारण के लिए आवश्यक होती हैं। इससे कम में बात ही नहीं बनती यहां जादू चमत्कार जैसा कुछ है नहीं। जिसे जो कुछ उपलब्ध हुआ है वह उसके नियोजन, निर्धारण और पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है। इसका समन्वय ही दैवी वरदान के नाम से जाना जाता है।
जीवनचर्या में परिवर्तन कायाकल्प है दृष्टि और प्रयास में घुसी हुई अवांछनीयता को हटाकर उसके स्थान पर उत्कृष्टता को प्रतिष्ठापित किया जा सके तो समझना चाहिये कि महानता का श्रेय साधन हस्तगत हो गया। पर यह हो कैसे? इसका एक ही उत्तर है कि उच्चस्तरीय निर्धारणों को कार्यान्वित करने के लिये समय सम्पदा का नियोजन किया जाये। उसके साथ श्रम और मनोयोग को भी संयुक्त रखा जाये। इससे बिना समुन्नत जीवन क्रम का श्रेय साधन सम्पन्न कर सकने का कोई मार्ग नहीं।
अभीष्ट प्रयोजन के लिये समय निकालें कैसे? मनोयोग जुड़े कैसे? श्रम संलग्नता बने कैसे? इन समस्याओं का समाधान एक ही है कि जिन ललक लिप्साओं में इतने दिनों अपनी क्षमतायें संलग्न रही हैं, उन्हें वहां से विरत किया जाये। वैराग्य इसी का नाम है। जिस त्याग संन्यास की चर्चा अध्यात्म क्षेत्र में होती रहती है उसका तात्पर्य कर्तव्यों उत्तरदायित्वों को छोड़ बैठना नहीं वरन् यह है कि अवांछनीय ललक लिप्साओं से अपने समय, श्रम को बचाने छुड़ाने का प्रयास किया जाये ताकि उस बचत को सत्प्रयोजनों में लगाकर प्रगति के उच्च शिखर तक पहुंच सकना बन पड़े।
उत्थान और पतन के दो सर्वविदित राजमार्ग है। तृष्णा ग्रसित होकर वैभव, विलास और अहंता की परितृप्ति के प्रयास में संलग्न रहा जा सकता है। इसमें न समय बचने वाला है न श्रम न मनोयोग। इस मिट्टी को जितना प्रज्वलित किया जायेगा उतनी ही ऊंची लपटें उठेंगी और उतना ही अधिक ईंधन मांगेंगी। इस स्तर की लालसा यदि आतुरता स्तर तक जा पहुंचे तो फिर उनका समाधान दो ही उपायों से सूझता है। जिसमें एक है आत्महत्या दूसरा है ब्रह्महत्या। आत्महत्या का तात्पर्य है अपने स्तर और व्यक्तित्व को गिराकर हेय परिस्थितियों में प्रवेश करना और उनके साथ जुड़ी हुई नरक यन्त्रणाओं को निरन्तर सहन करना। दूसरा मार्ग इससे भिन्न है उसमें लिप्साओं पर नियन्त्रण रखना और संयम साधना होता है। निर्वाह को सादा, सरल और सौम्य बनाना होता है ताकि सीमित समय, श्रम में उसी पूर्ति हो सके और बची हुई क्षमता उच्चस्तरीय प्रयोजनों में लग सके।
क्षमता का तात्पर्य है—ईश्वर प्रदत्त समय सम्पदा का उच्चस्तरीय उद्देश्यों के लिए नियोजन। इसी आधार पर क्षमता बढ़ती है और महत्वपूर्ण उद्देश्यों की पूर्ति में समर्थ होती है। दुष्प्रयोजनों में समय और श्रम लगा रहे तो उसे क्षमता की सार्थकता नहीं दुर्गति एवं विकृति ही कहा जायेगा।

