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Books - जीवन की दिशाधारा और उसका सार्थक सुनियोजन

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Language: HINDI
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चिन्तन का स्तर एवं प्रवाह सही दिशा में चले

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मोटर की ठीक प्रकार साज संभाल न रखी जाय तो मजबूत और कीमती होने पर भी कुछ ही दिन में उसका कचूमर निकल जाता है। अच्छे खासे शरीरों की भी दुर्गति इसी कारण होती देखी गयी है। यही बात हर उपकरण, प्राणी, पदार्थ आदि पर लागू होती है। वे सभी अपने सदुपयोग और रख रखाव पर पूरा ध्यान रखे जाने की मांग करते हैं। उपेक्षा या अतिक्रमण के शिकार होने पर वे अपनी क्षमता गंवा बैठते हैं और अन्ततः कष्टदायक बनते हैं।
मस्तिष्क मानवी सत्ता का सबसे अधिक महत्वपूर्ण भाग है। समूचे शरीर पर उसी का शासन है। पेट, हृदय, गुर्दे आदि तो श्रमजीवी मात्र हैं उनका सूत्र संचालन एवं नियमन तो मस्तिष्क द्वारा ही होता है। यह निर्वाह की बात हुयी। उत्थान पतन में भी उसी के निर्धारणों को श्रेय दिया जाता है। राज्याधिकारी को मुकुट पहनाया जाता है। प्रतिष्ठा सिर की होती है। नियति ने जीवधारी को मस्तिष्क रूपी मुकुट प्रदान किया है। यह उसकी मर्जी है कि यथास्थान रखे या पैरों तले कुचले। पैरों तले कुचलने से तात्पर्य है—उसकी क्षमता को अविकसित स्थिति में पड़े रहने देना अथवा दुष्प्रयोजनों में प्रयुक्त करना। भाग्य विधान ललाट पर लिखा होता है, की उक्ति से यही तात्पर्य निकलता है कि विचार क्षेत्र के ऊपर ही यह अवलम्बित है कि व्यक्ति पिछड़ा अभागा उपेक्षित तिरस्कृत होकर जिये, भर्त्सना और प्रताड़ना का पात्र बने अथवा अनुकरणीय, अभिवन्दनीय, श्रेय समुन्नत एवं गौरवान्वित सुसम्पन्न होकर जिये।
इस महत्वपूर्ण अवयव को प्रदान करते समय सृष्टा ने उसकी भी जिम्मेदारी मनुष्य को सौंप दी है और अधिकार दिया है कि जो जब चाहे जिस तरह उपयोग करे। उसके पीछे एक अनुबन्ध भी है कि उसका भला बुरा प्रयोग करने पर तदनुरूप प्रतिफल वहन करने के लिए भी बाधित होना पड़ेगा।
शरीर के साथ अनाचार करने वाले ही आमतौर से दुर्बल, रुग्ण रहते हैं। स्वयं कष्ट सहते और साथियों को त्रास देते हैं। ठीक यही बात मस्तिष्क पर भी लागू होती है। विचारणा की भी एक विद्या और मर्यादा है। पटरी पर चलने वाली रेल की तरह ही उसकी भी दिशाधारा होनी चाहिए। नदियां जब किनारों का अतिक्रमण करके उफनने लगती हैं तो बाढ़ के रूप में अपनी विकरालता का परिचय देती हैं। रेल भी पटरी छोड़कर बेहिसाब किधर को ही चल पड़े तो उससे होने वाले दुष्परिणाम की कल्पना कोई भी कर सकता है।
विचारों की शक्ति असीम है इस संसार पर अदृश्य शासन करने वाले दैत्य दानवों की पौराणिक मान्यता को यदि प्रत्यक्ष देखना हो तो एक शब्द में उस समूचे परिवार को विचार प्रवाह कह सकते हैं। यही क्षेत्र है जिसका स्तर मनुष्य के उत्थान-पतन का आधार भूत कारण माना जाता है। आम आदमी का मस्तिष्क सम्बद्ध वातावरण के अनुरूप ढलता पाया गया है। किन्तु यह पत्थर की लकीर नहीं है, कोई चाहे तो उसका परिपूर्ण परिशोधन और उपयुक्त नव निर्धारण कर सकने में भी समर्थ हो सकता है। आदिवासी वन प्रदेशों में रहते हैं पर उन पर कोई ऐसा प्रतिबन्ध नहीं है कि वे नगरों में प्रवेश नहीं कर सकते या वहां जाकर कोई काम धन्धा नहीं कर सकते। गाड़ियां लुहार जहां-तहां भटकते और लोहा पीटकर गुजारा करने के अभ्यस्त हैं। पीढ़ियों से इसी तरह रहते हैं। फिर भी उनका स्वेच्छा निर्धारण ही कहा जायेगा। वे चाहें तो अन्य नागरिकों की तरह अपने निवास निर्वाह में बिना किसी कठिनाई के स्थायित्व भी ला सकते हैं। विचारणा के सम्बन्ध में भी यही बात है। यों वह बनती और पकती तो वातावरण के चाक और आवे में ही है। फिर भी मनुष्य मिट्टी नहीं है वह घोंसले के पक्षी की तरह किसी भी दिशा में कभी भी उड़ सकता है और दायरे-क्षेत्र में असाधारण परिवर्तन कर सकने के लिए स्वतन्त्र है। हमें अपना वर्तमान सुधारने की जब उमड़ उठे तो सर्वप्रथम इन मनःक्षेत्र का ही निरीक्षण परीक्षण करना चाहिए और उसकी दिशाधारा में—स्तर एवं अभ्यास में तदनुरूप परिवर्तन करना चाहिए।
जंक्शन पर गाड़ियां एक लाइन में खड़ी होती हैं। इनमें से किसे, किस दिशा में दौड़ाना है, कहां पहुंचाना है इसका निर्धारण प्वाइंट मैन, लीवर गिरा कर करता है। वह दो पटरियों को इस प्रकार मिला देता है कि गाड़ी की दिशा बन सके। एक ही लाइन में खड़ी दो गाड़ियां साथ-साथ छूटती हैं पर उनकी दिशा अलग होने के कारण एक मुम्बई पहुंचती है तो दूसरी कलकत्ता। दोनों के बीच भारी दूरी है। यह क्यों कर बन गयी? इसका उत्तर लीवर गिराकर पटरियां जोड़ने वाला प्वाइंट मैन हर किसी को आसानी से समझा सकता है कि एक समय के उस छोटे से निर्धारण ने कैसा कमाल कर दिया। यह उदाहरण विचारणा को दिशाधारा मिलने के सम्बन्ध में पूरी तरह लागू होता है।
मनुष्य जिस स्तर की विचारणा अपनाना चाहे उसे वैसे चयन की परिपूर्ण स्वतन्त्रता है। तर्क और तथ्य तदनुरूप ढेरों के ढेरों इकट्ठे किए जा सकते हैं। मित्र सम्बन्धी साथ नहीं देंगे, परिस्थितियां प्रतिकूल बनेंगी, घाटा पड़ेगा और भविष्य अंधकार में घिरा रहेगा। इस स्तर की निराशाजनक कल्पना के पक्ष में अनेकों तर्क सोचे जा सकते हैं संगति बिठाने वाले ढेरों ऐसे उदाहरण भी मिल सकते हैं जिनमें कल्पित निराशा का समर्थन करने वाले घटना क्रम घटित हुये हों। निराशा को अंगीकार करने वाला अपने पक्ष को पुष्ट करने के लिए अनेकानेक कारण ढूंढ़ सकता है। साथ ही जोर देकर कह भी सकता है कि उसने जो सोचा है गलत नहीं है।
रुख बदलते ही दूसरे प्रकार के तर्कों और उदाहरणों का पर्वत खड़ा हो जायेगा। आशा और उत्साह की उमंगें उठें, उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास जमे तो फिर उस स्तर के तर्कों की कमी न रहेगी। हेय परिस्थितियों में जन्मे और पले व्यक्तियों में से कितनों ने असाधारण प्रगति की और आशाजनक सफलता प्राप्त की है, इसके उदाहरणों से न केवल इतिहास के पृष्ठ भरे पड़े हैं वरन् वैसे उदाहरणों से अपना समय एवं सम्पर्क क्षेत्र भी सूना नहीं मिलेगा। वैसा अपने लिए क्यों नहीं हो सकता? जो काम एक कर सका उसे दूसरा क्यों नहीं कर सकता? इस प्रकार के विधेयक विचारों का सिलसिला यदि मनःक्षेत्र में चल पड़े तो न केवल वैसा विश्वास बंधेगा वरन् प्रयत्न भी चल पड़ेगा और असम्भव न रहेगा कि उत्कर्ष की जो साध-संजोयी थी वह समयानुसार होकर रहे।
कहा जाता है कि शरीर बल, सूझ-बूझ, साधन और सहयोग से कठिनाईयों का हल निकालता है और प्रगति का द्वार खुलता है। यह कथन जितना सही है उससे भी अधिक सही यह है कि मनोबल बाजी जीतता है। वही सबसे बड़ा बल है। शरीर के दुर्बल और साधनों की दृष्टि से अभाव ग्रस्त होते हुए भी कितने ही व्यक्ति महत्वपूर्ण सफलतायें प्राप्त कर सकने में समर्थ हुये हैं। इसमें उनके मनोबल ने ही प्रमुख भूमिका निभाई है। मनोबल को बढ़ाने और अक्षुण्य रखने के लिए आवश्यक यह है कि आशा भरे सपने देखे जायें। रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाकर वर्तमान परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का ऊंचा उठने का ढांचा खड़ा किया जा सकता है। और उस उत्साह भरे पराक्रम के सहारे सफलता के स्तर तक पहुंचा जा सकता है।
कल क्या होने जा रहा है यह किसी को भी विदित नहीं है। न वैसा कुछ नियति निर्धारण है। मनुष्य स्वयं ही किसी रास्ते का चयन करते हैं, अपने ही पैरों चलते हैं और अपनाये गये मनोरथ के अनुरूप किसी लक्ष्य तक पहुंचते हैं। कौन किस स्तर का चयन करे? किसके पैर किस राह पर चलें यह उसका अपना फैसला है। दूसरे तो हर बुरे-भले काम में साथ देते और रोक-टोक करते देखे गये हैं। उनमें से किन्हें महत्व दिया जाय, किन्हें न दिया जाय यह फैसला अपना ही होता है।
यह सोचना व्यर्थ है कि परिस्थितियों या सम्बन्धियों ने उन्हें दबाया और ऐसा करने को विवश किया जैसा कि मन नहीं था। यह बात मात्र दुर्बल मनोबल वालों पर ही लागू होती है। मनस्वी जानते हैं कि कोई किसी को बाधित नहीं कर सकता। मनुष्य की संरचना इतनी दुर्बल नहीं है कि  उस पर दूसरों के फैसले लद सकें और अपरिहार्य बन सकें। एक समय की भूल दूसरे समय सुधर भी सकती है। आज की सहमति को कल की असहमति में भी बदला जा सकता है। परिवर्तन काल की उथल-पुथल में कुछ अड़चन असुविधा तो होती है पर नया रास्ता बन जाने की भी संगति मुड़-तोड़ कर बैठ ही जाती है।
दोष जिस-तिस को देने और गुण इस-उस के गाने से सिर्फ मन हलका होता है। मूलतः चयन अपने ही रुझान का होता है। साथी और समर्थ तो बुरे से बुरे मार्ग पर चलने वालों को भी मिल जाते हैं और श्रेय पथ पर चलने वालों की कहां हर किसी का समर्थन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी ढेरों लोग मूर्ख बनाते और रास्ते में रोड़े अटकाते हैं। अस्तु दूसरों को महत्व देना हो  तो उतना ही देना चाहिए कि उनका अस्तित्व तो है, पर इतना नहीं कि किसी को उनके पीछे चलने के लिए विवश ही होना पड़े। आखिर स्वतन्त्र चिन्तन भी तो कोई वस्तु है। मस्तिष्क तो अपना है। उस पर अपना अधिकार नहीं। संकल्प बल से विचारों को दिशा नहीं दी जा सकती है और जो चल रहा है उसमें परिवर्तन प्रत्यावर्तन की सम्भावना नहीं है, ऐसा मानकर नहीं चलना चाहिए।
विचारणा में जिस स्तर का अभ्यास पड़ गया है, एक बार उसके खरे-खोटे होने पर नये सिरे से पर्यवेक्षण करना चाहिए और जिन अनुपयुक्त अभ्यासों का कूड़ा-कचरा भरा पाया उसे साहस पूर्वक बुहार फेंकना चाहिए। लौट-लौट कर आने की कठिनाई तो घर में चमगादड़ों का घोंसला हटाने पर भी आती है। भगा देने पर भी वे लौटकर आती हैं। फिर भी वे इतनी प्रबल नहीं हैं कि गृह स्वामियों के निश्चय को पलट सकें, उन्हें झक-मारकर अपना घोंसला अन्यत्र बनाना पड़ता है। कुविचारों की जड़ तभी तक जमी रहती है जब उन्हें उखाड़ने-उजारने का कोई अन्तिम निर्णय नहीं होता। असमंजस का लाभ सदा विपक्षी को मिलता है। संशोधन के निश्चय और परिवर्तन के संकल्प में ही दुर्बलता हो— किसी अन्तिम निर्णय पर पहुंचना न बन पड़ रहा हो तो बात दूसरी है।
कुविचारों में निषेधात्मक विचारों का एक बहुत बड़ा परिवार है। इनमें से कुछ ऐसे हैं जो व्यक्तित्व को दबोचे रहते हैं और दलदल में से उबरने ही नहीं देते। कुछ ऐसे हैं जो व्यवहार को विकृत उद्धत बनाकर साथियों से पटरी नहीं बैठने देते, कुछ ऐसे हैं जो दिशाधारा को प्रभावित करते हैं और कटीली झाड़ियों में भटकाते हैं। इन सभी की अपनी-अपनी मण्डली  और बिरादरी है। वे एक के साथ एक जुड़े रहते हैं। रेलगाड़ी से जुड़े डिब्बे की तरह, जंजीर की कड़ियों की तरह चींटी, दीमकों और टिड्डियों की तरह उन्हें झुण्ड बनाकर साथ-साथ चलते देखा जा सकता है। किन्तु साथ ही यह बात भी है कि रानी मक्खी के उड़ जाने के उपरान्त छत्ते की अन्य मधु मक्खियां भी इच्छा या अनिच्छा से अपनी अधिष्ठात्री के साथ चली जाती हैं इसी प्रकार विचारों के परिकर भी जड़ जमाते और सिर पर पैर रखकर उलटे पावों पलायन करते भी देखे जाते हैं। निज के व्यक्तित्व को गर्हित करने वालों में निराशा, आलस्य, प्रमाद, भय, चिन्ता, कायरता, लिप्सा स्तर की दुष्प्रवृत्तियों की गणना होती है। दूसरों से सम्बन्ध बिगाड़ने में क्रोध, आवेश, अहंकार, अविश्वास, लालच, अनुदारता जैसी आदतों को प्रमुख माना जाता है। भविष्य को बिगाड़ने में चटोरेपन, प्रदर्शन, बड़प्पन, दर्प, अविवेक, अनौचित्य जैसी उद्दण्डताओं का परिकर आता है। मर्यादाओं की अवज्ञा करने और अनाचार पर उतारू होने वाले लोग प्रायः वे होते हैं जिन पर विलास, लालच, संग्रह, अहंता के उद्धत, प्रदर्शन का भूत सवार है। अनास्था या नास्तिकता इसी मनःस्थिति को कहते हैं। ईश्वर सद्भावना, सद्विचारणा एवं सद्प्रवृत्ति के समुच्चय को कहते हैं। उसी के सम्मिलित स्वरूप की एक ऐसे व्यक्ति विशेष रूप में अवधारणा की गयी है कि जो न्याय निष्ठ है और अपनी वरिष्ठता का उपयोग अनुशासन बनाये रहने के लिए करता है। न उसका कोई प्रिय और न अप्रिय, न किसी से लगाव न पक्षपात न विद्वेष। कर्म और उसका प्रतिफल ही ईश्वरीय नियति है। मानवोचित गौरव गरिमा का निर्वाह ही उसकी वास्तविक अर्चना है। इससे विमुख व्यक्तियों को नास्तिक कहा जा सकता है। शास्त्रों में जिन नास्तिकों की भर्त्सना की गयी है वे उस समुदाय में नहीं आते जो पूजा अर्चा से आना-कानी करते हैं। वरन् वे हैं जो उत्कृष्टता के प्रति अनास्था व्यक्त करते हैं।
आस्था अनास्था को परख किसी के चिन्तन के स्तर एवं प्रवाह की कसौटी पर ही हो सकती है। भगवान् को मस्तिष्क में विराजमान माना गया है। शेषशायी विष्णु का क्षीर सागर वही है। कैलाशवासी शिव का निवास इसी मानसरोवर के मध्य में है। कमल पुष्प पर विराजमान ब्रह्माजी का ब्रह्मलोक यही है। तिलक चन्दन इसी पर लगते हैं। आशीर्वाद वरदान के लिए उसी का स्पर्श किया जाता है। विधाता को जो भाग्य में लिखना होता है उसी पटल पर लिखते हैं। विचार तन्त्र की गरिमा जितनी अधिक गाई जाय उतनी ही कम है। इसे ब्रह्माण्ड की- विराट ब्रह्म की अनुकृति कहा गया है। जिसने मनःसंस्थान का परिशोधन परिष्कार कर लिया, समझना चाहिए कि उसने तपश्चर्या और योगाभ्यास की आत्मा से सम्पर्क साध लिया। वह सिद्ध पुरुष बनेगा, स्वर्ग में रहेगा और जीवन मुक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होकर हर दृष्टि से कृत-कृत्य बनेगा।
स्मरण रहे शरीर के समस्त अंग अवयवों का जितना महत्व है उसके संयुक्त स्वरूप की तुलना में अकेले मस्तिष्क की महत्ता कहीं अधिक है। मस्तिष्क को सही और स्वस्थ रखने का तात्पर्य है उसकी विचार प्रक्रिया को सही दिशा प्रदान करना। पागलों और अविकसित मस्तिष्क वालों की जिन्दगी निरर्थक होती है और वे ज्यों त्यों करके दिन काटते हैं। उलटी विचारणा अपनाने वाले—भ्रान्तियों और विकृतियों में ग्रसित होकर अनुपयुक्त सोचते रहने वाले उससे भी अधिक घाटे में रहते हैं। अनजान की तुलना में वे अधिक दुःख पाते और दुःख देते हैं जो उलटा सोचते और उलटे रास्ते चलते हैं।
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