यह सामर्थ्य व्यर्थ नष्ट न हो
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इतनी विशाल जनशक्ति और इतनी विशाल धनशक्ति का यदि राष्ट्रीय पुनरुत्थान में ठीक तरह उपयोग हो तो उसका परिणाम जादू जैसा हो सकता है। मंदिरों की शक्ति भौतिक विकास में खरच नहीं की जानी चाहिए, न की जाए, पर बौद्धिक, भावनात्मक सांस्कृतिक एवं नैतिक कार्यक्रम भी क्या कम हैं? देश को इन दिशाओं में भी अभी बहुत काम करना है। देश जिस आर्थिक एवं भौतिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ है उससे अधिक भावनात्मक दृष्टि से पीछे रह गया है। शिक्षा का घोर अभाव है, मनुष्य के बौद्धिक दिमाग से कम से कम साक्षरता की आवश्यकता तो पूरी करनी ही होगी। सामाजिक कुरीतियों ने हमें नैतिक दृष्टि से खोखला एवं दिवालिया बनाकर रख दिया है। स्वास्थ्य जर्जर हो रहे हैं, भावनाओं में न उल्लास है और न उत्साह। आर्थिक आडम्बर तो जाल -जंजाल की तरह फैलता जा रहा है, पर धार्मिक कर्तव्यों से विरक्ति दिन-दिन बढ़ रही है। हमारी मानसिक स्थिति ही नहीं, सामाजिक स्थिति हर दिशा में जर्जरित हो रही है। इसके सुधार एवं पुनर्निर्माण में, मंदिरों में लगी हुई विशाल जनशक्ति को यदि सुनियोजित किया जा सके तो हमारा कायाकल्प ही हो सकता है। भौतिक विकास की योजनाएँ सरकार बनाए यह कार्य उसका है। पर मानसिक एवं भावनात्मक निर्माण तो धर्मतंत्र के माध्यम से ही हो सकता है। भौतिक विकास तभी पूर्ण होगा, जब लोग भावनात्मक दृष्टि से परिष्कृत हो चलें। यदि भाग्यवाद, पलायनवाद, आलस्य, अकर्मण्यता, अनुत्साह, संकीर्णता, स्वार्थपरता, सामाजिक असहयोग जैसे दुर्गुणों से मनोभूमि ग्रसित बनी रही तो भौतिक उन्नति के सारे प्रयास निष्फल चले जाएँगे। जो कमाई बढ़ेगी वह दुर्गुणों में खरच कर दी जाएगी, फिर कैसे गरीबी दूर होगी? असंयमी लोग दवा-दारू का अधिक प्रबंध होने पर भी रोगग्रस्त रहेंगे, इसलिए राष्ट्रीय विकास के लिए जहाँ भौतिक प्रयत्नों की आवश्यकता है, वहाँ यह भी कम आवश्यक नहीं कि जनमानस का भावनात्मक परिष्कार किया जाए और यह प्रयोजन सरकार नहीं वरन धर्म संस्थाएँ ही पूर्ण कर सकती हैं। मंदिर संस्थाओं में लगी हुई जनशक्ति और धनशक्ति को यदि इस कार्य में लगाया जा सके तो महत्त्वपूर्ण आवश्यकता सहज ही पूरी हो सकती है।

