अनाचार एवं अज्ञान के केंद्र हैं ये
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मित्रो! वह अनावश्यक धन, हराम का धन जब उन लोगों के पास आया तो उन्होंने क्या-क्या किया? आप नहीं जानते, मैं जानता हूँ। पंडा-पुजारियों, महंतों और मठाधीशों की हकीकत मुझे मालूम है, आपको नहीं मालूम है। आप तो केवल उनकी बाहर की शक्ल जानते हैं। मुझे उनके पास रहने का मौका मिला है। मैं जानता हूँ कि समाज में खराब से खराब किस्म के तबके अगर हैं तो उनमें से एक तबका इन लोगों का भी है, जो धर्म का कलेवर या धर्म का दुपट्टा ओढ़े हुए हैं। धर्म का झंडा गाड़े हुए हैं और धर्म का तिलक लगाए हुए हैं। धर्म की पोशाक और धर्म का बाना पहने हुए बैठे हैं। ये क्या-क्या अनाचार फैलाते हैं और क्या-क्या दुनिया में खुराफातें पैदा करते हैं, आप जरा भी नहीं जानते। इन लोगों का पोषण करने के लिए इनके निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए आज का धर्मतंत्र है-मदिर।
तो क्या मंदिर सिर्फ इसी काम के लिए हैं? क्या इन परिस्थितियों को बदला नहीं जाना चाहिए? हो अगर हमको समाज में ढोंग, अनाचार और अज्ञान फैलाना हो तो मंदिरों का यही रूप बना रहने देना चाहिए। अगर हमारा यह खयाल है कि जनता का इतना धन, जनता की इतनी श्रद्धा, जनता का इतना पैसा-इन सब चीजों का ठीक तरीके से उपयोग किया जाए तो आज के जो मंदिर हैं, उनकी व्यवस्था पर नए ढंग से विचार करना पड़ेगा। जिन लोगों के हाथ में उनका नियंत्रण है, उनको समझाना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि जनता की उपयोगिता के लिए आप इनका इस्तेमाल क्यों नहीं करते? ट्रस्टियों को समझाया जाना चाहिए। अगर उनकी समझ में यह बात आ जाए कि मंदिर में जितना धन लगा हुआ है, इसमें से थोड़े पैसे से भगवान की पूजा आसानी से की जा सकती है। एक पुजारी ने आधा घंटे सुबह और आधा घंटे शाम को पूजा कर ली। एक घंटे के बाद तेईस घंटे बच जाते हैं। नहीं साहब! तेईस घंटे पुजारी पंखा लिए खड़े रहेंगे। जब भगवान सो जाएँगे तो वे वहाँ से हटेंगे और जब भगवान उठ जाएँगे तो फिर पंखा डुलाते रहेंगे, यह कोई तरीका है?
तो क्या मंदिर सिर्फ इसी काम के लिए हैं? क्या इन परिस्थितियों को बदला नहीं जाना चाहिए? हो अगर हमको समाज में ढोंग, अनाचार और अज्ञान फैलाना हो तो मंदिरों का यही रूप बना रहने देना चाहिए। अगर हमारा यह खयाल है कि जनता का इतना धन, जनता की इतनी श्रद्धा, जनता का इतना पैसा-इन सब चीजों का ठीक तरीके से उपयोग किया जाए तो आज के जो मंदिर हैं, उनकी व्यवस्था पर नए ढंग से विचार करना पड़ेगा। जिन लोगों के हाथ में उनका नियंत्रण है, उनको समझाना पड़ेगा और कहना पड़ेगा कि जनता की उपयोगिता के लिए आप इनका इस्तेमाल क्यों नहीं करते? ट्रस्टियों को समझाया जाना चाहिए। अगर उनकी समझ में यह बात आ जाए कि मंदिर में जितना धन लगा हुआ है, इसमें से थोड़े पैसे से भगवान की पूजा आसानी से की जा सकती है। एक पुजारी ने आधा घंटे सुबह और आधा घंटे शाम को पूजा कर ली। एक घंटे के बाद तेईस घंटे बच जाते हैं। नहीं साहब! तेईस घंटे पुजारी पंखा लिए खड़े रहेंगे। जब भगवान सो जाएँगे तो वे वहाँ से हटेंगे और जब भगवान उठ जाएँगे तो फिर पंखा डुलाते रहेंगे, यह कोई तरीका है?

