अध्यात्म-चेतना के विस्तार में नियोजन हो
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साथियो! मंदिरों के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपए की संपत्ति को ऐसे ही पड़ा रहने दें, यह कैसे हो सकता है! इस संपत्ति को ठीक तरीके से इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके लिए समझदार लोगों को, धार्मिक लोगों को आगे आना चाहिए और इस आवश्यकता को महसूस करना चाहिए कि यदि धर्म को जिंदा रहना है तो वह ढोंग के रूप में नहीं जिएगा। वह केवल कर्मकाण्ड के रूप में जिंदा नहीं रहेगा। बेशक धर्म के साथ में कर्मकाण्डरूपी कलेवर जिंदा रहे, लेकिन कर्मकाण्डों के साथ-साथ उन सत्प्रवृत्तियों को भी जीवित रखा जाना चाहिए जिनसे लोकमंगल की और समाज की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। धर्म केवल कर्मकाण्ड नहीं है। धर्म केवल आडम्बर नहीं है। धर्म केवल पूजा-पाठ की प्रक्रिया नहीं है, वरन इस पूजा-पाठ की प्रक्रिया और धार्मिक क्रियाकृत्यों के पीछे और साथ-साथ में एक महती आवश्यकता जुड़ी हुई है कि हम व्यक्ति के अंतरंग को, उसकी भावनाओं को कैसे ऊँचा उठाएँ? समाज के अंदर फैली हुई धार्मिक वृत्तियों को कैसे बढ़ाएँ? ये सारे के सारे क्रिया-कलाप जिस माध्यम से और जिस आधार पर पूरे किए जा सकते हैं, उसके लिए कोई केंद्र या एक स्थान होना ही चाहिए। उस जगह हमारे मंदिर ही हो सकते हैं।
इन मंदिरों में पुजारी के रूप में सिर्फ लोकसेवियों की नियुक्ति हो, जिनके मन में समाज के लिए दरद है और जो समाज को ऊँचा उठाना चाहते हैं। जो मनुष्य के भीतर धर्मवृत्तियाँ पैदा करना चाहते हैं, उसी तरह के पुजारी वहाँ रहें। वे अपने पूजा-पाठ का एक दो घंटा पूरा करने के बाद, अपने गुजारे की व्यवस्था करने के बाद जो समय उनके पास बच जाता है, उसका इस्तेमाल इस तरह से करें, जिससे कि हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय एवं व्यक्तिगत चरित्र की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। मंदिरों में जहाँ दूसरी तरह के खरच होते हैं-कभी बँगले बनते हैं, कभी उत्सव होते हैं, कभी झाँकी बनती है, कभी क्या बनता है और उसी में लाखों रुपए खरच हो जाता है। उन सारे के सारे क्रिया-कलापों में आंशिक किफायत की जा सकती है और इससे जो पैसा बचता है, उसको लोकमंगल की अनेक प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है और करना भी चाहिए। इस तरीके से धन की आवश्यकता, इमारतों की आवश्यकता, जनसहयोग की आवश्यकता मंदिरों के आधार पर ठीक तरीके से पूरी की जा सकती है।
इन मंदिरों में पुजारी के रूप में सिर्फ लोकसेवियों की नियुक्ति हो, जिनके मन में समाज के लिए दरद है और जो समाज को ऊँचा उठाना चाहते हैं। जो मनुष्य के भीतर धर्मवृत्तियाँ पैदा करना चाहते हैं, उसी तरह के पुजारी वहाँ रहें। वे अपने पूजा-पाठ का एक दो घंटा पूरा करने के बाद, अपने गुजारे की व्यवस्था करने के बाद जो समय उनके पास बच जाता है, उसका इस्तेमाल इस तरह से करें, जिससे कि हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय एवं व्यक्तिगत चरित्र की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके। मंदिरों में जहाँ दूसरी तरह के खरच होते हैं-कभी बँगले बनते हैं, कभी उत्सव होते हैं, कभी झाँकी बनती है, कभी क्या बनता है और उसी में लाखों रुपए खरच हो जाता है। उन सारे के सारे क्रिया-कलापों में आंशिक किफायत की जा सकती है और इससे जो पैसा बचता है, उसको लोकमंगल की अनेक प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है और करना भी चाहिए। इस तरीके से धन की आवश्यकता, इमारतों की आवश्यकता, जनसहयोग की आवश्यकता मंदिरों के आधार पर ठीक तरीके से पूरी की जा सकती है।

