विद्या और ज्ञान का प्रकाश
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हरेक मंदिर में एक पुस्तकालय आसानी से चल सकता है। स्थान की इसके लिए वहाँ कमी है ही नहीं, जहाँ कुछ कमी हो वहाँ एक-दो अलमारियों की व्यवस्था बड़ी आसानी से बन सकती है। उत्तम प्रेरणाप्रद, जीवन-विकास में सहायता करने वाली पुस्तकें ही वहाँ रहें। जैसे शुद्ध दूध में एक बूँद विष या घृणित वस्तु डाल दी जाए तो वह सारा ही अशुद्ध हो जाता है, उसी प्रकार अश्लील, वासनाएँ भड़कने वाली, ऊट-पटांग, भ्रम-जंजाल उत्पन्न करने वाली पुस्तकें भी पुस्तकालय का उद्देश्य ही नष्ट नहीं करतीं वरन उलटी घातक सिद्ध होती हैं। इसलिए उस पुस्तकालय में भले ही थोड़ी पुस्तकें हों, पर हों सभी चुनी हुई, एक से अधिक प्रेरणाप्रद, सुलझे हुए विचारों की। आरंभ में मंदिर के समीपवर्ती क्षेत्र के सुशिक्षित सत्पुरुषों से दान या उधार के रूप में ऐसी पुस्तकें माँगी जा सकती हैं। दो-तीन व्यक्ति योजना बनाकर निकल पड़े और उस क्षेत्र के सुशिक्षितों के पास घूमा जाए तो बहुत सी पुस्तकें इसी प्रकार इकट्ठी कर सकते हैं। पाँच रुपए महीने का बजट भी इस कार्य के लिए रखा जाए तो अच्छी पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएँ मँगाने का एक ढर्रा आसानी से बन सकता है और एक छोटा सा ज्ञानमन्दिर पुस्तकालय भी उस मंदिर के साथ-साथ ही चलने लग सकता है।

