मंदिर और उनका मूल प्रयोजन
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मंदिरों के निर्माण का प्रमुख उद्देश्य जनमानस में धार्मिकता को, निष्ठा को जमाने और बढ़ाने में योग देना ही था। ईश्वर भक्ति का मतलब इतना ही नहीं है कि कुछ मंत्र जप लिए जाएँ कुछ पाठ कर लिया जाए देवदर्शन कर लिया जाए और प्रतिमाओं को भोग-प्रसाद चढ़ाकर कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाए और इतने से ही यह आशा लगा ली जाए कि यह थोड़ा सा क्रियाकृत्य ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त है। ईश्वर भक्ति का मतलब अपने अंदर भरे हुए कुविचार और कुकर्मों का, दुर्भावों और दुष्प्रवृत्तियों का शमन करना है। यह जितनी ही बढ़ती है उतना ही हमारा आत्मिक स्तर बढ़ता है और इस बढ़ोत्तरी के अनुपात से ही ईश्वर के निकट पहुँच सकना संभव होता है। सुसंस्कृत, विकसित, व्यवस्थित होना ही ईश्वर की कृपा-अनुकंपा का एकमात्र चिह्न है। विवेक के रूप में ही ईश्वरीय प्रकाश को अपने अंत: करण में प्रकाशवान होते हुए हम अपने भीतर देख सकते हैं। मान्यताओं को जनसाधारण के अंत: करण में जाग्रत रखना, व्यक्ति को कर्तव्यपरायण, आदर्शवादी और सुविकसित व्यक्तित्व का बनाए रहना मंदिरों का उद्देश्य है। प्राचीनकाल में जब उनका निर्माण आरंभ किया गया था, तब ऋषियों के मस्तिष्क में एक ही प्रयोजन था कि इन धर्म संस्थाओं के माध्यम से जनमानस में धर्म धारणा का जागरण एवं अभिवर्द्धन होता रहे।
प्राचीनकाल में मंदिरों में देव-पूजन मात्र ही नहीं होता था वरन वे समस्त रचनात्मक प्रवृत्तियाँ भी पलती थीं जो जन-कल्याण के लिए आवश्यक थीं। मंदिर एक प्रकाश स्तंभ की तरह होते थे। अपने क्षेत्र में मानवीय उत्कर्ष एवं कल्याण के सभी संभव आयोजन करते रहते थे। पुजारी का, महंत का एकमात्र उद्देश्य जन-जीवन में सत्प्रेरणाएँ उत्पन्न करने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना ही था।
प्राचीनकाल में मंदिरों में देव-पूजन मात्र ही नहीं होता था वरन वे समस्त रचनात्मक प्रवृत्तियाँ भी पलती थीं जो जन-कल्याण के लिए आवश्यक थीं। मंदिर एक प्रकाश स्तंभ की तरह होते थे। अपने क्षेत्र में मानवीय उत्कर्ष एवं कल्याण के सभी संभव आयोजन करते रहते थे। पुजारी का, महंत का एकमात्र उद्देश्य जन-जीवन में सत्प्रेरणाएँ उत्पन्न करने के लिए निरंतर प्रयास करते रहना ही था।

