विशाल जनशक्ति और विपुल धनशक्ति
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भारतवर्ष में ५६७१६१ गाँव और २६९० शहर हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या ६ लाख होती है, इनमें हर जगह एक मंदिर का हिसाब तो मानना ही चाहिए। मामूली गाँवों और कस्बों में कई-कई संप्रदाय के कई देवताओं के कई -कई मंदिर होते हैं। बड़े शहरों में तो उनकी संख्या सैकड़ों होती है, फिर भी औसतन हर गाँव के पीछे एक का औसत मान लिया जाए तो इनकी संख्या भी ६ लाख हो जाती है।
हर मंदिर के पीछे कई-कई कर्मचारी होते हैं, पुजारी, महंत, मुनीम, चौकीदार, माली आदि। कितने ही बड़े मंदिरों में तो सैकड़ों कर्मचारी काम करते हैं। दो-दो तीन-तीन तो हजारों में होंगे, फिर भी न्यूनतम एक पुजारी हर मंदिर के पीछे मानना ही होगा। इस प्रकार ६ लाख मंदिरों में ६ लाख पुजारी हो गए। ये सब गृहस्थ होते हैं। अन्य उद्योगों में लगे हुए व्यक्तियों के घर वाले भी अपने काम-धंधों में सहायक होते हैं। किसान, जुलाहे, धोबी, पशु-पालक आदि प्राय: सभी उद्योगों में उनके परिवार का भी श्रम-सहयोग रहता है। पुजारियों के परिवार में चार-छह व्यक्ति हो सकते हैं, पर कम से कम एक व्यक्ति तो ऐसा मानना ही चाहिए जो उनके कार्य में थोड़ा सहयोग दे सके। इस प्रकार ६ लाख वे सहायक यों हो जाते हैं। यदि परिवार का व्यक्ति सहायता न भी करे तो भी यह मानना होगा कि बड़े मंदिर में एक ही व्यक्ति नहीं कई-कई भी होते हैं। ६ लाख मंदिरों के पीछे १२ लाख व्यक्तियों का श्रम लग जाता है।
यों साधारण श्रमिकों की अपेक्षा भोजन, वस्त्र, दक्षिणा, वेतन, मुफ्त निवास आदि का प्रबंध रहने से पुजारी का खरच कहीं अधिक होता है, पर औसतन खरच का हिसाब लगाना चाहिए। इसमें पूजा-उपकरण, भोग-प्रसाद, पुजारी का वेतन, फूल, दीपक आदि मान लिया जाए तो यह रकम कितनी होगी? ६ लाख मंदिरों में कितना वार्षिक खरच बैठता है। वस्तुत: कई गुना अधिक होता होगा, क्योंकि पूरे देश के मंदिरों में से कई का खरच लाखों रुपया महीना है। ऐसे-ऐसे हजारों मंदिर देश में मौजूद हैं। ६ लाख मंदिरों की इमारती लागत कितनी होती है?
मंदिरों का खरच चलाने के लिए स्थायी फंड सर्वत्र हैं। किसी मंदिर से कृषि लगी हुई है, किसी से मकान-जायदाद, किसी के पास नकदी के रूप में स्थिर कोष है। यह पूँजी कितनी होगी? यह रकम भी निर्माण पूँजी के बराबर ही हो जाती है। मंदिरों का इमारती मूल्य और स्थिर पूँजी दोनों को मिलाकर कितना धन हो जाता है? यदि इसका हिसाब लगाया जाए तो धनराशि खरबों में जाएगी।
हर मंदिर के पीछे कई-कई कर्मचारी होते हैं, पुजारी, महंत, मुनीम, चौकीदार, माली आदि। कितने ही बड़े मंदिरों में तो सैकड़ों कर्मचारी काम करते हैं। दो-दो तीन-तीन तो हजारों में होंगे, फिर भी न्यूनतम एक पुजारी हर मंदिर के पीछे मानना ही होगा। इस प्रकार ६ लाख मंदिरों में ६ लाख पुजारी हो गए। ये सब गृहस्थ होते हैं। अन्य उद्योगों में लगे हुए व्यक्तियों के घर वाले भी अपने काम-धंधों में सहायक होते हैं। किसान, जुलाहे, धोबी, पशु-पालक आदि प्राय: सभी उद्योगों में उनके परिवार का भी श्रम-सहयोग रहता है। पुजारियों के परिवार में चार-छह व्यक्ति हो सकते हैं, पर कम से कम एक व्यक्ति तो ऐसा मानना ही चाहिए जो उनके कार्य में थोड़ा सहयोग दे सके। इस प्रकार ६ लाख वे सहायक यों हो जाते हैं। यदि परिवार का व्यक्ति सहायता न भी करे तो भी यह मानना होगा कि बड़े मंदिर में एक ही व्यक्ति नहीं कई-कई भी होते हैं। ६ लाख मंदिरों के पीछे १२ लाख व्यक्तियों का श्रम लग जाता है।
यों साधारण श्रमिकों की अपेक्षा भोजन, वस्त्र, दक्षिणा, वेतन, मुफ्त निवास आदि का प्रबंध रहने से पुजारी का खरच कहीं अधिक होता है, पर औसतन खरच का हिसाब लगाना चाहिए। इसमें पूजा-उपकरण, भोग-प्रसाद, पुजारी का वेतन, फूल, दीपक आदि मान लिया जाए तो यह रकम कितनी होगी? ६ लाख मंदिरों में कितना वार्षिक खरच बैठता है। वस्तुत: कई गुना अधिक होता होगा, क्योंकि पूरे देश के मंदिरों में से कई का खरच लाखों रुपया महीना है। ऐसे-ऐसे हजारों मंदिर देश में मौजूद हैं। ६ लाख मंदिरों की इमारती लागत कितनी होती है?
मंदिरों का खरच चलाने के लिए स्थायी फंड सर्वत्र हैं। किसी मंदिर से कृषि लगी हुई है, किसी से मकान-जायदाद, किसी के पास नकदी के रूप में स्थिर कोष है। यह पूँजी कितनी होगी? यह रकम भी निर्माण पूँजी के बराबर ही हो जाती है। मंदिरों का इमारती मूल्य और स्थिर पूँजी दोनों को मिलाकर कितना धन हो जाता है? यदि इसका हिसाब लगाया जाए तो धनराशि खरबों में जाएगी।

