शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य
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महिलाओं और पुरुषों की प्रौढ़ पाठशालाएँ प्रेरणाप्रद साहित्य का पुस्तकालय-ये दोनों प्रवृत्तियाँ जिन मंदिरों में नियमित रूप से चल पड़े तो समझना चाहिए कि उसकी सार्थकता में चार चाँद लग गए। योगासन, प्राणायाम, सूर्य-नमस्कार, ड्रिल जैसी छोटी शारीरिक उत्थान की प्रक्रियाएँ आसानी से चल सकती हैं।
जहाँ व्यायामशालाओं के लिए सुविधाजनक स्थान हो, वहाँ नवयुवकों के लिए अखाड़े तथा दूसरे उपकरण बनाए जा सकते हैं। कुछ मंदिर तो पूजा करने जितनी जगह में ही बने होते हैं, उनमें तो नहीं पर जो नगर से थोड़े हटकर हैं, जिनमें छोटा बगीचा है, वहाँ व्यायामशालाएँ बड़ी सफलतापूर्वक चल सकती हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा बहुत सरल है। उसके सिद्धांतों की जानकारी तथा चिकित्सा की विधि बहुत ही आसानी से सीखी जा सकती है। '' टब '' आदि उपकरण भी बहुत महँगे नहीं हैं, उनकी व्यवस्था कर सकना किसी के लिए भी कुछ कठिन नहीं है। केवल थोड़ी दिलचस्पी और मेहनत की जरूरत है। पुजारी जी या कोई और सेवाभावी व्यक्ति दो-तीन घंटे समय रोज इसके लिए लगा दिया करें तो देखते-देखते एक छोटा निःशुल्क प्राकृतिक चिकित्सालय चल सकता है। चिकित्सा कराते समय रोगी आरोग्यशास्त्र के सिद्धांतों को सीखते-सुनते भी रह सकते हैं और यदि वे उन्हें अपनाने को तैयार हो जाएँ तो उस बीमारी से तो छूटेगा ही वरन भविष्य में कभी भी बीमार न पड़ने का लाभ लेकर जाएगा।
जहाँ प्राकृतिक चिकित्सा भी न बन पड़े, वहाँ फर्स्ट एड के सामान्य उपकरण रखे जा सकते हैं और घरेलू चिकित्सा के उपयुक्त छोटी-छोटी बीमारियों की बिना खतरे वाली दवाएँ रखी जा सकती हैं। इनसे कितने ही लोग सामयिक लाभ उठाते रह सकते हैं और यह छोटा सा चिकित्सालय किसी कदर अपनी उपयोगिता द्वारा लोकसेवा का कुछ प्रयोजन सिद्ध कर सकता है। स्वास्थ्य शिक्षा सब धी कक्षाएँ भी इस विभाग द्वारा चलाई जा सकती हैं।
जहाँ व्यायामशालाओं के लिए सुविधाजनक स्थान हो, वहाँ नवयुवकों के लिए अखाड़े तथा दूसरे उपकरण बनाए जा सकते हैं। कुछ मंदिर तो पूजा करने जितनी जगह में ही बने होते हैं, उनमें तो नहीं पर जो नगर से थोड़े हटकर हैं, जिनमें छोटा बगीचा है, वहाँ व्यायामशालाएँ बड़ी सफलतापूर्वक चल सकती हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा बहुत सरल है। उसके सिद्धांतों की जानकारी तथा चिकित्सा की विधि बहुत ही आसानी से सीखी जा सकती है। '' टब '' आदि उपकरण भी बहुत महँगे नहीं हैं, उनकी व्यवस्था कर सकना किसी के लिए भी कुछ कठिन नहीं है। केवल थोड़ी दिलचस्पी और मेहनत की जरूरत है। पुजारी जी या कोई और सेवाभावी व्यक्ति दो-तीन घंटे समय रोज इसके लिए लगा दिया करें तो देखते-देखते एक छोटा निःशुल्क प्राकृतिक चिकित्सालय चल सकता है। चिकित्सा कराते समय रोगी आरोग्यशास्त्र के सिद्धांतों को सीखते-सुनते भी रह सकते हैं और यदि वे उन्हें अपनाने को तैयार हो जाएँ तो उस बीमारी से तो छूटेगा ही वरन भविष्य में कभी भी बीमार न पड़ने का लाभ लेकर जाएगा।
जहाँ प्राकृतिक चिकित्सा भी न बन पड़े, वहाँ फर्स्ट एड के सामान्य उपकरण रखे जा सकते हैं और घरेलू चिकित्सा के उपयुक्त छोटी-छोटी बीमारियों की बिना खतरे वाली दवाएँ रखी जा सकती हैं। इनसे कितने ही लोग सामयिक लाभ उठाते रह सकते हैं और यह छोटा सा चिकित्सालय किसी कदर अपनी उपयोगिता द्वारा लोकसेवा का कुछ प्रयोजन सिद्ध कर सकता है। स्वास्थ्य शिक्षा सब धी कक्षाएँ भी इस विभाग द्वारा चलाई जा सकती हैं।

