प्रवासी भारतीय इतना तो करें
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इस प्रयोजन में विश्व के कोने-कोने में फैले हुये प्रवासी भारतीयों की स्थिति अत्यन्त महत्त्व की है ।। वे सौभाग्यवश संसार के कोने-कोने में फैले हैं ।। जिन कार्यों में वे लगे हैं वे भी महत्त्वपूर्ण हैं ।। उनका व्यक्तित्व एवं प्रभाव भी है ।। जिन कार्यों में हाथ डाले, सफल बन सकें ।। इतना कौशल भी उनमें हैं, अपनी संस्कृति की गरिमा से वे अवगत भी हैं और श्रद्धालु भी ।। इतने पर भी उन्हें यह सुझाया नहीं गया है कि जिन देशों में वे निवास करते हैं, उनकी अन्य प्रकार की सेवा- साधना करते हुये वे एक प्रयास यह भी करें कि उस क्षेत्र के जन समुदाय को देव- संस्कृति का परिचय एवं अपनाने का उत्साह उपलब्ध हो सके ।। यदि वह तथ्य ध्यान में आया होता तो निश्चय ही अब तक उनकी प्रतिभा की परिणति अत्यन्त सुखद हो चुकी होती और उससे शालीनता संवर्धन के सदुद्देश्य की पूर्ति में असाधारण योगदान मिला होगा ।।
यहाँ इस तथ्य को भली भाँति समझ लिया जाना चाहिये कि धर्म परिवर्तन वाले हथकण्डे अब उतने आकर्षक एवं उत्साहवर्धक नहीं रहे, जितने पहले कभी थे ।। अब यह सोचना बेकार हो चला है कि एक सम्प्रदाय के अनुयायी यदि दूसरे सम्प्रदाय में प्रवेश पा लें तो उनका स्तर बदल जायेगा ।। लेबल बदल देने से बोतल में भरे पदार्थ का स्वरूप नहीं बदलता ।। आवश्यकता उस पदार्थ को बदलने की है, जो बोतल में भरा हुआ है ।। सम्प्रदाय और संस्कृति में जमीन- आसमान जितना अन्तर है ।। देव- संस्कृति मनुष्य मात्र के लिये हैं और उसे अपनाया जाना परम्परागत सम्प्रदाय में बने रहकर भी हो सकता है ।। अगले दिनों समस्त विश्व को, समूचे मानव समाज को, एक राष्ट्र, एक धर्म, एक व्यवस्था और एक भाषा के माध्यम से नये आधार पर गठित होना है तो सम्प्रदाय परिवर्तन के लिये व्यर्थ की दौड़- धूप करने की उपयोगिता रह नहीं जाती ।। जिनका दृष्टिकोण पिछले स्तर का हो, वे अधिक उत्साह दिखा भी सकते हैं, पर देव संस्कृति के विस्तार की बात सोचने वालों को अपनी योजना का स्वरूप बिना सम्प्रदाय परिवर्तन को महत्त्व दिये गये चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करने भर तक सीमित रखना है ।।
देव संस्कृति के विश्व विस्तार में प्रवासी भारतीयों की विशेष स्थिति है ।। अस्तु उनकी भूमिका भी विशेष हो सकती है ।। वस्तुस्थिति से उन्हें अवगत और उत्तरदायित्वों का स्मरण कराया जा सके तो निश्चय ही वे बहुत कुछ कर सकने की स्थिति में होंगे ।। उसे करने में वे आनाकानी भी नहीं करेंगे ।।
(समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान पृ.सं.1.244- 245)
यहाँ इस तथ्य को भली भाँति समझ लिया जाना चाहिये कि धर्म परिवर्तन वाले हथकण्डे अब उतने आकर्षक एवं उत्साहवर्धक नहीं रहे, जितने पहले कभी थे ।। अब यह सोचना बेकार हो चला है कि एक सम्प्रदाय के अनुयायी यदि दूसरे सम्प्रदाय में प्रवेश पा लें तो उनका स्तर बदल जायेगा ।। लेबल बदल देने से बोतल में भरे पदार्थ का स्वरूप नहीं बदलता ।। आवश्यकता उस पदार्थ को बदलने की है, जो बोतल में भरा हुआ है ।। सम्प्रदाय और संस्कृति में जमीन- आसमान जितना अन्तर है ।। देव- संस्कृति मनुष्य मात्र के लिये हैं और उसे अपनाया जाना परम्परागत सम्प्रदाय में बने रहकर भी हो सकता है ।। अगले दिनों समस्त विश्व को, समूचे मानव समाज को, एक राष्ट्र, एक धर्म, एक व्यवस्था और एक भाषा के माध्यम से नये आधार पर गठित होना है तो सम्प्रदाय परिवर्तन के लिये व्यर्थ की दौड़- धूप करने की उपयोगिता रह नहीं जाती ।। जिनका दृष्टिकोण पिछले स्तर का हो, वे अधिक उत्साह दिखा भी सकते हैं, पर देव संस्कृति के विस्तार की बात सोचने वालों को अपनी योजना का स्वरूप बिना सम्प्रदाय परिवर्तन को महत्त्व दिये गये चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश करने भर तक सीमित रखना है ।।
देव संस्कृति के विश्व विस्तार में प्रवासी भारतीयों की विशेष स्थिति है ।। अस्तु उनकी भूमिका भी विशेष हो सकती है ।। वस्तुस्थिति से उन्हें अवगत और उत्तरदायित्वों का स्मरण कराया जा सके तो निश्चय ही वे बहुत कुछ कर सकने की स्थिति में होंगे ।। उसे करने में वे आनाकानी भी नहीं करेंगे ।।
(समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान पृ.सं.1.244- 245)

