बौद्ध धर्म का उदय
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जिन दिनों भारतीय वर्चस्व अधोपतन के गर्त में आँधे मुँह गिर पड़ा था और उसकी दुर्दशा से दूरवर्ती क्षेत्रों में विविध विश्व नारकीय विकृतियों उत्पन्न हो रही थीं, उन्हीं दिनों एक महान् क्रान्ति का अवतरण हुआ । यह क्रान्ति भगवान बुद्ध के नेतृत्व में प्रकट हुई । स्थिति को बदला जाना आवश्यक था । ऐसी व्यापक आवश्यकताओं की पूर्ति सुसंगठित क्रान्तियाँ ही सम्पन्न करती हैं । उसका नेतृत्व श्रेय किसी को भी क्यों न मिले पर वस्तुतः उस परिवर्तन अभियान में जन-भावना का उभार ही काम करता है । यह अलग बात है कि उसे उभारने वालों की अग्रिम पंक्ति में कौन था? नेतृत्व किसने किया और श्रेय किसे मिला?
यह आवश्यकता अनुभव हुई कि प्रतिगामी परिस्थितियों को बदला जाय । भारत के प्राचीन वर्चस्व और कर्तव्य का पुनरुद्धार किया जाय । संव्याप्त विकृतियों और विपत्तियों का निराकरण किया जाय । इसके लिये आँधी-तूफान जैसे परिवर्तन अभियान की आवश्यकता थी वह भगवान बुद्ध के अन्तःकरण में सर्व प्रथम एक चिनगारी के रूप में फूटी और देखते-देखते सुविस्तृत दावानल के रूप में प्रखन एवं प्रचण्ड हो गयी ।
समय की पुकार ने एक सामान्य स्थिति और सामान्य स्तर के राजकुमार का अन्तःकरण छुआ । इस भाव-विभोर ने ठान ठानी कि वह वैयक्तिक सुख-सुविधाओं का त्याग करेगा, अपने परिवार को भी कठिनाईयाँ सहने को बाध्य करेगा और उस कष्ट मार्ग पर चलेगा जिस पर चलते हुए बीज गलता है और अपने अस्तित्व को दूसरों की सुख-सुविधा के लिये अभिनव वृक्ष के रूप में परिणित कर देता है । इसी भाव व साहसिक संकल्प का नाम भगवान बुद्ध का अवतरण है । यों बाहर बुद्ध-चरित्र एक व्यक्ति विशेष का विशिष्ट र्कत्तव्य दिखा पड़ता है, पर वस्तुतः तात्विक दृष्टि से उसे एक विद्रोह ही कहना चाहिये, जिसने तात्कालिक विकृतियों का उन्मूलन करने वाली एक ज्वाला के रूप में जन्म लिया था । समय-समय पर भगवान के अवतार भी इसी प्रयोजन के लिये होते रहते हैं । धर्म की स्थापना का दूसरा पक्ष अधर्म का उन्मूलन है । दोनों पक्षों को मिलाकर एक पूरी बकात बनती है । भगवान बुद्ध ने सामयिक विकृतियों के प्रति विद्रोह एवं संघर्ष खड़ा किया, साथ ही ऐसी भावनात्मक नव-निर्माण की आधार शिला भी रखी जिस पर मानवी गरिमा का सुदृढ़ दुर्ग पुनः स्थापित किया जा सके । इस उभय पक्षीय अभियान का नाम ही बुद्ध भगवान का अवतरण है भारतीय इतिहास में इस अवतरण को असामान्य और अति महत्त्वपूर्ण माना जाता रहेगा ।
अन्धकार युग की विकृतियों के कारण उत्पन्न हुए असंतुलन का निराकरण करने के लिये अतीत की अगणित महाक्रान्तियों की तरह अब से कोई ढाई हजार वर्ष पूर्व एक क्रान्ति भगवान बुद्ध के नेतृत्व में हुई । उन्होंने तत्कालीन अनाचार को ध्यानपूर्वक देखा, उसके दुष्परिणामों को समझा और प्रवाह को बदलने के लिये अपनी सम्पूर्ण साहसिकता एवं सद्भावना प्रयुक्त करते हुए जुट गये सुउद्देश्य के लिये जब कोई प्रामाणिक व्यक्ति आगे आता है, अपनी निःस्वार्थ परमार्थ निष्ठा एवं दूरदर्शितापूर्ण रूपरेखा से जनमानस को प्रभावित करता है, तो अगणित साथी, अनुयायी कदम से कदम, कन्धे से कन्धे मिलाकर साथ चलने के लिये तैयार हो जाते हैं । भगवान बुद्ध चले तो अकेले पर उन्हें साथियों, अनुयायियों की कमी नहीं रही ।
भगवान बुद्ध के अवतरण युग में सर्वत्र अवांछानीयता का बोलबाला था । धर्म का आडम्बर ओढ़कर अधर्म का नग्न नर्तन चल रहा था । भारतीय धर्म अपना मानव धर्म जैसा शाश्वत स्वरूप खो चुका था । अन्धविश्वासों और रूढ़ियों को ही धर्म का पर्यायवाची माना जाने लगा था । गुण, कर्म स्वभाव के आधार पर विनिर्मित वर्ण-व्यवस्था के स्थान पर जन्म जाति की ऊँच-नीच छूतछात पनप गयी थी । जातियों-उपजातियों के नाम पर देश के सहस्रों टुकड़े होकर बिखरे रहे थ । जातियों के लिये अलग-अलग कानून और अधिकार सुविधा और प्रतिबंध ऐसे बने थे जिनमें न्याय और औचित्य की बेतरह अवज्ञा की गयी थी । ब्राह्मण अत्यधिक सुविधा और सम्मान के पात्र थे । क्षत्रियों को हर तरह की मनमानी करने की छूट थी । शूद्रों और अछूतों के अधिकार लगभग पशुओं जितने ही सीमित रह गये थे । साधना के नाम पर स्वेच्छाचारी तांत्रिक वाममार्ग का बोलबाला था । यज्ञ का पवित्र धर्मकृत्य निरीह पशुओं को भून खाने की भट्टी मात्र रह गया था । अविवेक और अनाचार की दिशा में बहते हुए इस प्रवाह ने नीति, न्याय और औचित्य का गला घोंट दिया था । ऐसे समय में भगवान बुद्ध जन्मे । चारों ओर छाये इस सघन अन्धकार को देखा उनकी आत्मा छटपटाने लगी । निश्चय किया । व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और महत्वकांक्षाओं को तिलांजलि देने के बाद ही मनुष्य किन्हीं महान् आदर्शोंक को पूरा कर सकने में समर्थ होता है । बुद्ध ने उसी शाश्वत मार्ग को अपनाया, वे अपने राज-वैभव और पारिवारिक सुख को ठुकराकर युग की पुकार को पूरा करने के लिये घर छोड़कर निकल पड़े और निश्चय किया कि वे अपने लिये, अपने छोटे पविार को लिये नहीं जियेंगे, लोक-मंगल के लिये ही उनका समग्र समर्पण होगा ।
दूसरा कदम भगवान बुद्ध ने यह उठाया कि अपने को महान् प्रयोजन की पूर्ति के लायक क्षमता सम्पन्न बनाने में जुटा दिया । उन्होंने तप किया, अपने उन दोष-र्दुगुणों को धोया जिनके रहते सार्वजनिक सेवा विषाक्त हो जाती है और हित साधन करने का उद्देश्य उल्टा अहितकर परिणाम प्रस्तुत करता है । ज्ञान की साधना परमार्थ परायण व्यक्ति के लिये आवश्यक है । आत्म-निरीक्षण, आत्मा सुधार और आत्मा- विकास की चतुर्वििध तपश्चर्या से ही आत्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाया जा सकता है । इस प्रकार आत्मिक दृष्टि से ऊँचा उठा हुआ व्यक्ति ही स्वपर कल्याण कर सकने में समर्थ होता है । बुद्घ इस महासत्य को जानते थे इसलिये वे गृह त्याग के उपरान्त बोधि गया में बोधि द्रुम के नीचे बैठकर सत्य का प्रकाश पाने के लिये साधनारत हो गये । यहाँ उन्हें बुधत्व प्राप्त हुआ । वे राजकुमार गौतक से बदलकर भगवान बुद्ध बन गये ।
तीसरा कदम बुद्ध का था-धर्म-चक्र परिवर्तन । लोग मानस में छाई काली घटाओं को निरस्त करने के लिये सद्ज्ञान की ज्योति जलाना अनिवार्य होता है । वहीं उन्हें भी करना पड़ा घर-घर जाकर जन-जन से सम्पर्क बनाना भिक्षावृत्ति अपनाकर ही हो सकता है सो उन्होंने उसी वृत्ति को धारण किया । अपने को भिक्षु श्रेणी में जा बिठाया । ज्ञान प्रसार का कार्य एकांगी भी नहीं हो सकता था, इसलिये उन्होंने शिष्य, अनुयायी बनाये । जिन्हें परिपक्व पाया उन्हें सद्ज्ञान का आलोक सर्वत्र फैलाने के लिये परिव्राजक बनाया । यही धर्म चक्र प्रवर्तन अभियान था । भावनात्मक जड़ता की मृत-मूर्छित स्थिति से उबारकर सजग और सक्रिय बनाने के लिये आत्मदानी व्यक्तियों को समग्र निष्ठा से जुटना पड़ता है । बुद्ध ने अपने शिष्य इसीलिये बनाये । इसी प्रयोजन को जीवन-लक्ष्य की पूर्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन बनाया । उनके प्रभाव और परामर्श के प्रकाश में सहस्रों नर-नारी आगे आये और एक स्थान पर रहकर नहीं देश-देशान्तरों में ज्ञान का प्रकाश फैलाने को कटिबद्ध हो गये । धर्म-चक्र का अभियान अग्रगामी हुआ और वह धर्म विजय के रूप में सुविस्तृत बन गया । भूतकाल में प्रतापी राजा देश-विजय के लिये निकलते थे । अपना आधिपत्य सुदूर क्षेत्रों में स्थापित करते थे । बुद्ध का अभियान इससे भिन्न था । उन्होंने देश विजय के स्थान पर धर्म विजय की योजना बनायी और उसे किसी देश धर्म तक सीमित न रखकर विश्वव्यापी बनाने का कार्यक्रम निर्धारित किया ।
(समस्त विश्व का अजस्र अनुदान पृ.सं.३.३)
यह आवश्यकता अनुभव हुई कि प्रतिगामी परिस्थितियों को बदला जाय । भारत के प्राचीन वर्चस्व और कर्तव्य का पुनरुद्धार किया जाय । संव्याप्त विकृतियों और विपत्तियों का निराकरण किया जाय । इसके लिये आँधी-तूफान जैसे परिवर्तन अभियान की आवश्यकता थी वह भगवान बुद्ध के अन्तःकरण में सर्व प्रथम एक चिनगारी के रूप में फूटी और देखते-देखते सुविस्तृत दावानल के रूप में प्रखन एवं प्रचण्ड हो गयी ।
समय की पुकार ने एक सामान्य स्थिति और सामान्य स्तर के राजकुमार का अन्तःकरण छुआ । इस भाव-विभोर ने ठान ठानी कि वह वैयक्तिक सुख-सुविधाओं का त्याग करेगा, अपने परिवार को भी कठिनाईयाँ सहने को बाध्य करेगा और उस कष्ट मार्ग पर चलेगा जिस पर चलते हुए बीज गलता है और अपने अस्तित्व को दूसरों की सुख-सुविधा के लिये अभिनव वृक्ष के रूप में परिणित कर देता है । इसी भाव व साहसिक संकल्प का नाम भगवान बुद्ध का अवतरण है । यों बाहर बुद्ध-चरित्र एक व्यक्ति विशेष का विशिष्ट र्कत्तव्य दिखा पड़ता है, पर वस्तुतः तात्विक दृष्टि से उसे एक विद्रोह ही कहना चाहिये, जिसने तात्कालिक विकृतियों का उन्मूलन करने वाली एक ज्वाला के रूप में जन्म लिया था । समय-समय पर भगवान के अवतार भी इसी प्रयोजन के लिये होते रहते हैं । धर्म की स्थापना का दूसरा पक्ष अधर्म का उन्मूलन है । दोनों पक्षों को मिलाकर एक पूरी बकात बनती है । भगवान बुद्ध ने सामयिक विकृतियों के प्रति विद्रोह एवं संघर्ष खड़ा किया, साथ ही ऐसी भावनात्मक नव-निर्माण की आधार शिला भी रखी जिस पर मानवी गरिमा का सुदृढ़ दुर्ग पुनः स्थापित किया जा सके । इस उभय पक्षीय अभियान का नाम ही बुद्ध भगवान का अवतरण है भारतीय इतिहास में इस अवतरण को असामान्य और अति महत्त्वपूर्ण माना जाता रहेगा ।
अन्धकार युग की विकृतियों के कारण उत्पन्न हुए असंतुलन का निराकरण करने के लिये अतीत की अगणित महाक्रान्तियों की तरह अब से कोई ढाई हजार वर्ष पूर्व एक क्रान्ति भगवान बुद्ध के नेतृत्व में हुई । उन्होंने तत्कालीन अनाचार को ध्यानपूर्वक देखा, उसके दुष्परिणामों को समझा और प्रवाह को बदलने के लिये अपनी सम्पूर्ण साहसिकता एवं सद्भावना प्रयुक्त करते हुए जुट गये सुउद्देश्य के लिये जब कोई प्रामाणिक व्यक्ति आगे आता है, अपनी निःस्वार्थ परमार्थ निष्ठा एवं दूरदर्शितापूर्ण रूपरेखा से जनमानस को प्रभावित करता है, तो अगणित साथी, अनुयायी कदम से कदम, कन्धे से कन्धे मिलाकर साथ चलने के लिये तैयार हो जाते हैं । भगवान बुद्ध चले तो अकेले पर उन्हें साथियों, अनुयायियों की कमी नहीं रही ।
भगवान बुद्ध के अवतरण युग में सर्वत्र अवांछानीयता का बोलबाला था । धर्म का आडम्बर ओढ़कर अधर्म का नग्न नर्तन चल रहा था । भारतीय धर्म अपना मानव धर्म जैसा शाश्वत स्वरूप खो चुका था । अन्धविश्वासों और रूढ़ियों को ही धर्म का पर्यायवाची माना जाने लगा था । गुण, कर्म स्वभाव के आधार पर विनिर्मित वर्ण-व्यवस्था के स्थान पर जन्म जाति की ऊँच-नीच छूतछात पनप गयी थी । जातियों-उपजातियों के नाम पर देश के सहस्रों टुकड़े होकर बिखरे रहे थ । जातियों के लिये अलग-अलग कानून और अधिकार सुविधा और प्रतिबंध ऐसे बने थे जिनमें न्याय और औचित्य की बेतरह अवज्ञा की गयी थी । ब्राह्मण अत्यधिक सुविधा और सम्मान के पात्र थे । क्षत्रियों को हर तरह की मनमानी करने की छूट थी । शूद्रों और अछूतों के अधिकार लगभग पशुओं जितने ही सीमित रह गये थे । साधना के नाम पर स्वेच्छाचारी तांत्रिक वाममार्ग का बोलबाला था । यज्ञ का पवित्र धर्मकृत्य निरीह पशुओं को भून खाने की भट्टी मात्र रह गया था । अविवेक और अनाचार की दिशा में बहते हुए इस प्रवाह ने नीति, न्याय और औचित्य का गला घोंट दिया था । ऐसे समय में भगवान बुद्ध जन्मे । चारों ओर छाये इस सघन अन्धकार को देखा उनकी आत्मा छटपटाने लगी । निश्चय किया । व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और महत्वकांक्षाओं को तिलांजलि देने के बाद ही मनुष्य किन्हीं महान् आदर्शोंक को पूरा कर सकने में समर्थ होता है । बुद्ध ने उसी शाश्वत मार्ग को अपनाया, वे अपने राज-वैभव और पारिवारिक सुख को ठुकराकर युग की पुकार को पूरा करने के लिये घर छोड़कर निकल पड़े और निश्चय किया कि वे अपने लिये, अपने छोटे पविार को लिये नहीं जियेंगे, लोक-मंगल के लिये ही उनका समग्र समर्पण होगा ।
दूसरा कदम भगवान बुद्ध ने यह उठाया कि अपने को महान् प्रयोजन की पूर्ति के लायक क्षमता सम्पन्न बनाने में जुटा दिया । उन्होंने तप किया, अपने उन दोष-र्दुगुणों को धोया जिनके रहते सार्वजनिक सेवा विषाक्त हो जाती है और हित साधन करने का उद्देश्य उल्टा अहितकर परिणाम प्रस्तुत करता है । ज्ञान की साधना परमार्थ परायण व्यक्ति के लिये आवश्यक है । आत्म-निरीक्षण, आत्मा सुधार और आत्मा- विकास की चतुर्वििध तपश्चर्या से ही आत्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाया जा सकता है । इस प्रकार आत्मिक दृष्टि से ऊँचा उठा हुआ व्यक्ति ही स्वपर कल्याण कर सकने में समर्थ होता है । बुद्घ इस महासत्य को जानते थे इसलिये वे गृह त्याग के उपरान्त बोधि गया में बोधि द्रुम के नीचे बैठकर सत्य का प्रकाश पाने के लिये साधनारत हो गये । यहाँ उन्हें बुधत्व प्राप्त हुआ । वे राजकुमार गौतक से बदलकर भगवान बुद्ध बन गये ।
तीसरा कदम बुद्ध का था-धर्म-चक्र परिवर्तन । लोग मानस में छाई काली घटाओं को निरस्त करने के लिये सद्ज्ञान की ज्योति जलाना अनिवार्य होता है । वहीं उन्हें भी करना पड़ा घर-घर जाकर जन-जन से सम्पर्क बनाना भिक्षावृत्ति अपनाकर ही हो सकता है सो उन्होंने उसी वृत्ति को धारण किया । अपने को भिक्षु श्रेणी में जा बिठाया । ज्ञान प्रसार का कार्य एकांगी भी नहीं हो सकता था, इसलिये उन्होंने शिष्य, अनुयायी बनाये । जिन्हें परिपक्व पाया उन्हें सद्ज्ञान का आलोक सर्वत्र फैलाने के लिये परिव्राजक बनाया । यही धर्म चक्र प्रवर्तन अभियान था । भावनात्मक जड़ता की मृत-मूर्छित स्थिति से उबारकर सजग और सक्रिय बनाने के लिये आत्मदानी व्यक्तियों को समग्र निष्ठा से जुटना पड़ता है । बुद्ध ने अपने शिष्य इसीलिये बनाये । इसी प्रयोजन को जीवन-लक्ष्य की पूर्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन बनाया । उनके प्रभाव और परामर्श के प्रकाश में सहस्रों नर-नारी आगे आये और एक स्थान पर रहकर नहीं देश-देशान्तरों में ज्ञान का प्रकाश फैलाने को कटिबद्ध हो गये । धर्म-चक्र का अभियान अग्रगामी हुआ और वह धर्म विजय के रूप में सुविस्तृत बन गया । भूतकाल में प्रतापी राजा देश-विजय के लिये निकलते थे । अपना आधिपत्य सुदूर क्षेत्रों में स्थापित करते थे । बुद्ध का अभियान इससे भिन्न था । उन्होंने देश विजय के स्थान पर धर्म विजय की योजना बनायी और उसे किसी देश धर्म तक सीमित न रखकर विश्वव्यापी बनाने का कार्यक्रम निर्धारित किया ।
(समस्त विश्व का अजस्र अनुदान पृ.सं.३.३)

