भारतीय संस्कृति की रक्षा कीजिए
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जैसे कोई विशालकाय जहाज, अपने मल्लाह की इच्छा और प्रेरणा के अनुसार अपनी दिशा और गति का निर्माण करता हुआ वहाँ जा पहुँचता है जहाँ नाविक को अभीष्ट होता है ।। उसी प्रकार जीवन का सुसज्जित जहाज भी उसी दिशा में उसी गति से अग्रसर होता है, जिसके लिये अन्तः प्रदेश की प्रेरणा होती है ।। एक व्यक्ति का आदर्श लक्ष्य एवं कार्यक्रम एक प्रकार का है तो दूसरे का उससे सर्वथा भिन्न, सर्वथा विपरीत दिशा में अग्रसर होता दिखाई पड़ता है ।। इस भिन्नता का मूल कारण उन दोनों की अंतःप्रेरणा की भिन्नता ही है ।।
जीवन की नीति निर्धारण करने वाली अन्तः प्रेरणा को संस्कृति कहते हैं ।। यह किसी में जन्म जात नहीं होती वरन समीपवर्ती वातावरण, अनुकरण, शिक्षण, चिन्तन के आधार पर विनिर्मित होती है ।। मनुष्य जिसकी बात में सहानुभूति की मान्यता बना लेता है, उसी ओर उसका मन ललचाता है और अपने समस्त साधनों के साथ उधर ही उन्मुख होता है ।। मनुष्य का अन्तःकरण कुछ मूलभूत आदर्श, भावनाओं और मान्यताओं से अनुप्राणित होता है ।। इन आधारों पर हमारा भावना क्षेत्र जैसा बन जाता है वैसा ही जीवन क्रम बनता है और समाज के सामने हम उसी रूप में उपस्थित होते हैं ।।
यों मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह एक पशु है । थोड़ी बुद्धि अधिक रहने से वह अपेक्षा कृत कुछ अधिक सुख- साधन प्राप्त कर सकता है, इतना ही सामान्यतः उसे बुद्धि विशेषता का लाभ है ।। पर यदि उसकी अन्तःप्रेरणा उच्च भावनाओं, आदर्श एवम् आकांक्षाओं से अनुप्राणित हुई तो वह असामान्य प्रकार का, उच्चकोटि को सत्पुरुषों जैसा जीवन- यापन करता है हुआ न केवल स्वयं सच्ची सुख शान्ति का अधिकारी बनता है वरन् दूसरे अनेकों को भी आनंद और सन्तोष की परिस्थितियों तक ले पहुँचने में सहायक होता है ।। यदि वह अन्तःप्रेरणाएँ निकृष्ट कोटि की हुई तो न केवल स्वयं रोग, शोक, अज्ञान, दरिद्र, चिन्ता, भय, द्वेष, दुर्भाव, अपकीर्ति एवम् नाना प्रकार के दुःखों का भागी बनता है वरन् अपने से सम्बद्ध लोगों को भी दुर्मति एवम् दुर्गति का शिकार बना देता है ।। जीवन में जो कुछ श्रेष्ठता या निकृष्टता दिखाई देती है, उसका मूल आधार उसकी अंतःप्रेरणा ही है ।। इसी को 'संस्कृति' के नाम से पुकारते हैं ।।
जिस प्रकार कोई पौधा अपने आप उगे और बिना किसी के संरक्षण के बढ़े तो वह जंगली किस्म का कुरूप हो जाता है पर यदि वही पौधा किसी चतुर माली की देख- रेख में अच्छी जमीन, अच्छे खाद पानी एवम् संरक्षण के साथ बढ़ाया जाय, समय- समय पर काटा- छाँटा या सुधारा जाय तो बहुत ही सुन्दर एवं सुविकसित हो सकता है ।। मानव जीवन की स्थिति भी इसी प्रकार की है, उसे उचित दिशा में उचित रीति से विकसित करने की, जो वैज्ञानिक पद्धति है उसे 'संस्कृति' कहा जाता है ।।
भारतीय संस्कृति- मानव संस्कृति है ।। उसमें मानवता के सभी सद्गुणों को भली प्रकार विकसित करने वाले सभी तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं ।। जिस प्रकार काश्मीर में पैदा होने वाली केशर, कश्मीरी केशर के नाम से अपनी जन्मभूमि के नाम पर प्रसिद्ध है ।। इस नाम के अर्थ यह नहीं है कि उसका उपयोग केवल काश्मीर निवासियों तक ही सीमित है ।। भारतीय संस्कृति नाम भी इसीलिए पड़ा कि वह भारत में पैदा हुई वस्तुतः वह विश्व संस्कृति है ।। मानव संस्कृति है ।। सारे विश्व के मानवों की अंतःप्रेरणा को श्रेष्ठ दिशा में प्रेरित करने की क्षमता उसमें कूट- कूट कर भरी हुई है ।। इस संस्कृति को साम्प्रदायिकता या संकीर्णता कहना वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित होना ही है ।।
(समस्त विश्व का अजस्र अनुदान पृ.सं.1.25(- 51)
जीवन की नीति निर्धारण करने वाली अन्तः प्रेरणा को संस्कृति कहते हैं ।। यह किसी में जन्म जात नहीं होती वरन समीपवर्ती वातावरण, अनुकरण, शिक्षण, चिन्तन के आधार पर विनिर्मित होती है ।। मनुष्य जिसकी बात में सहानुभूति की मान्यता बना लेता है, उसी ओर उसका मन ललचाता है और अपने समस्त साधनों के साथ उधर ही उन्मुख होता है ।। मनुष्य का अन्तःकरण कुछ मूलभूत आदर्श, भावनाओं और मान्यताओं से अनुप्राणित होता है ।। इन आधारों पर हमारा भावना क्षेत्र जैसा बन जाता है वैसा ही जीवन क्रम बनता है और समाज के सामने हम उसी रूप में उपस्थित होते हैं ।।
यों मनुष्य भी अन्य प्राणियों की तरह एक पशु है । थोड़ी बुद्धि अधिक रहने से वह अपेक्षा कृत कुछ अधिक सुख- साधन प्राप्त कर सकता है, इतना ही सामान्यतः उसे बुद्धि विशेषता का लाभ है ।। पर यदि उसकी अन्तःप्रेरणा उच्च भावनाओं, आदर्श एवम् आकांक्षाओं से अनुप्राणित हुई तो वह असामान्य प्रकार का, उच्चकोटि को सत्पुरुषों जैसा जीवन- यापन करता है हुआ न केवल स्वयं सच्ची सुख शान्ति का अधिकारी बनता है वरन् दूसरे अनेकों को भी आनंद और सन्तोष की परिस्थितियों तक ले पहुँचने में सहायक होता है ।। यदि वह अन्तःप्रेरणाएँ निकृष्ट कोटि की हुई तो न केवल स्वयं रोग, शोक, अज्ञान, दरिद्र, चिन्ता, भय, द्वेष, दुर्भाव, अपकीर्ति एवम् नाना प्रकार के दुःखों का भागी बनता है वरन् अपने से सम्बद्ध लोगों को भी दुर्मति एवम् दुर्गति का शिकार बना देता है ।। जीवन में जो कुछ श्रेष्ठता या निकृष्टता दिखाई देती है, उसका मूल आधार उसकी अंतःप्रेरणा ही है ।। इसी को 'संस्कृति' के नाम से पुकारते हैं ।।
जिस प्रकार कोई पौधा अपने आप उगे और बिना किसी के संरक्षण के बढ़े तो वह जंगली किस्म का कुरूप हो जाता है पर यदि वही पौधा किसी चतुर माली की देख- रेख में अच्छी जमीन, अच्छे खाद पानी एवम् संरक्षण के साथ बढ़ाया जाय, समय- समय पर काटा- छाँटा या सुधारा जाय तो बहुत ही सुन्दर एवं सुविकसित हो सकता है ।। मानव जीवन की स्थिति भी इसी प्रकार की है, उसे उचित दिशा में उचित रीति से विकसित करने की, जो वैज्ञानिक पद्धति है उसे 'संस्कृति' कहा जाता है ।।
भारतीय संस्कृति- मानव संस्कृति है ।। उसमें मानवता के सभी सद्गुणों को भली प्रकार विकसित करने वाले सभी तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं ।। जिस प्रकार काश्मीर में पैदा होने वाली केशर, कश्मीरी केशर के नाम से अपनी जन्मभूमि के नाम पर प्रसिद्ध है ।। इस नाम के अर्थ यह नहीं है कि उसका उपयोग केवल काश्मीर निवासियों तक ही सीमित है ।। भारतीय संस्कृति नाम भी इसीलिए पड़ा कि वह भारत में पैदा हुई वस्तुतः वह विश्व संस्कृति है ।। मानव संस्कृति है ।। सारे विश्व के मानवों की अंतःप्रेरणा को श्रेष्ठ दिशा में प्रेरित करने की क्षमता उसमें कूट- कूट कर भरी हुई है ।। इस संस्कृति को साम्प्रदायिकता या संकीर्णता कहना वस्तुस्थिति से सर्वथा अपरिचित होना ही है ।।
(समस्त विश्व का अजस्र अनुदान पृ.सं.1.25(- 51)

