सांस्कृतिक पुनरूत्थान
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भारतीय संस्कृति कितने वैज्ञानिक आधारों पर खड़ी है और कितनी उपयोगी जीवन- विद्या का प्रतिपादन करती है, यह स्पष्ट हो चुका है ।। मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की दिशा में यही हमें अग्रसर करती है ।। इससे जीवन की सम्पूर्ण गतिविधियों का सुसंचालन होता है ।। मनुष्य के अन्तरंग को ठीक मार्ग पर आरूढ़ कराने की शक्ति इसी पद्धति में है ।। मनुष्य की पशुता का शमन करके उसे देवत्व की ओर अग्रसर करने का मार्ग यही पद्धति है ।। मनुष्य की व्यक्तिगत तथा सामूहिक सुख- शान्ति, सच्चरित्रता, सद्भावना और सहकारिता पर निर्भर है ।। इन तीनों महान तत्वों का उद्गम स्थान अन्तरात्मा है ।। उस केन्द्र को प्रभावित कर कुमार्ग से घृणा और सन्मार्ग में प्रेरणा उत्पन्न की जा सकती है ।। यह कार्य इस पुस्तक में वर्णित भारतीय संस्कृति के द्वारा ही हो सकता है ।। भारतीय तत्वज्ञानियों ने हजारों वर्षों के प्रयोगों और परिश्रमों के बाद जिन रहस्यों का उद्घाटन किया था, उनका समावेश इस संस्कृति में आ गया है ।। पहले पहल इस जीवन पद्धति का आविष्कार और क्रियात्मक प्रयोग भारत में होने के कारण इसका नाम ''भारतीय संस्कृति' रखा गया, वस्तुतः- सिद्धांतों का प्रयोग किया जाय, तो शान्ति, सौहार्द और विश्व बन्धुत्व स्थापित हो सकता है ।।
यह बड़े दुःख का विषय है ।। कि भारतीय विचारधारा और जीवन- यापन पद्धति आज बहुत विकृत, अव्यवस्थित, उपेक्षित और अस्त- व्यस्त दिशा में पड़ी हुई है ।। उसे ठीक तरह न समझ सकने के कारण हम विदेशी संस्कृतियों से प्रभावित होते जा रहे हैं ।।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान दो प्रकार से होना चाहिए, एक तो भारतीय संस्कृति के लिए व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में सुव्यवस्थित कार्य प्रणाली का होना आवश्यक है ।। आज भारतीय धर्म, दर्शन, तत्त्वज्ञान, कर्मकाण्ड एवं आचार- विचार का जो रूप सामने उपस्थित है, वह लम्बे अज्ञानान्धकार में गुजरने के कारण, विकृत, अव्यवस्थित और अनुपयोगी हो गया है ।। इस स्थिति में हमें अपनी प्राचीन प्रतिगामी बन गया है ।। इस स्थिति हमें अपनी प्राचीन संस्कृति के वास्तविक एवं विशुद्ध रूप को सर्वसाधारण के सम्मुख उपस्थित करना होगा और बताना होगा कि यह रूढ़िवाद, प्रतिगामिता, भ्रमजाल, संकीर्णता एवं साम्प्रदायिकता नहीं, वरन् एक अत्यन्त ही उपयोगी, बुद्धि संगत, विज्ञान सम्मत, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र समाज व्यवस्था एवं मानवता की दृष्टियों से यह सर्वोत्कृष्ट प्रक्रिया हैं ।। तभी हम आज के बुद्धिवादी युग में भारतीय संस्कृति के महत्व को स्वीकार करने एवं उसे आचरण में लाने के लिए किसी को सहमत कर सकेंगे ।।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान का महान कार्य पूरा करने के लिए हमें विशाल पैमाने पर कार्यक्रम बनाना और फैलाना होगा ।। तभी इतने बड़े देश की इतनी बड़ी जनसंख्या में उन सुसंस्कृत तथ्यों की स्थापना संभव हो सकेगी ।। जितने अंशों में हम इसे आगे बढ़ाने में सफल होंगे, उतना ही सहयोग और सद्भाव प्राप्त कर सकेंगे ।। एक बार अच्छी तरह इसकी उपयोगिता समझ लेने के उपरान्त इस गति- विध को देश व्यापी और फिर विश्वव्यापी बनाना कठिन न होगा ।। हमारी योजनाएँ इस प्रकार हैं :-
संस्कृति का परिमार्जित रूप जनता के सम्मुख रखना चाहिए ।। अभी तक भारतीय संस्कृति का कोई परिमार्जित रूप जनता के सामने मौजूद नहीं है ।। अनेक भ्रान्त विचार, आदर्श और रीति- रिवाज मध्यकाल की विभिन्न परिस्थितियों के कारण इसमें मिल गये हैं ।। लोग इन्हीं को परम्परागत धर्म मनाने लगे हैं ।। जिस प्रकार सोना, ताँबा, और पीतल की मिलावट को चतुर सुनान शोध कर पृथक−पृथक कर देता है और विदेशी आक्रमणों, स्वार्थी तत्वों तथा समय की रफ्तार के कारण आई हुई विकृतियों को दूर करना चाहिए ।। रूढ़ियों की अशुद्धता को अलग छाँट दिया जाय । संस्कृति और विकृति के भेद को स्पष्ट कर जनता से पालन करने योग्य ग्राह्य तत्वों को अपनाने और अकर्तव्यों का मोह त्यागने के लिए कहा जाय ।।
सांस्कृतिक जीवन के आदर्श और व्यवहार को अपनाने पर मनुष्य को जो सुविधाएँ, सुख- शान्ति, समृद्धि एवं सफलताएँ मिल सकती हैं, उनको तर्क, प्रमाण, उदाहरण, तथ्य आदि के आधार पर भली- भाँति सिद्ध किया जाय ।। उन निष्कर्षों को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया जाय, साथ ही उन सांस्कृतिक आदर्शों की अवहेलना पर जो कठिनाइयाँ और परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, उनका भी बुद्धिसंगत प्रतिपादन किया जाय ।। इस प्रकार पुस्तक, लेख, भाषण आदि द्वारा जनता को समझाया जाय कि उनकी व्यक्तिगत एवं सामूहिक उन्नति के लिए हमारी संस्कृति कितनी उपयोगी एवं आवश्यक है ।।
हमारी संस्कृति में जो शास्त्रों के परस्पर विरोधी सिद्धांत तथा आदर्श पाये जाते हैं, उनको ऐसे सुव्यवस्थित रूप में रखा जाय कि वे एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक प्रतीत हों ।। दार्शनिक और धार्मिक मतभेदों के कारणों को बताते हुए उनका समन्वय किया जाय ।।
हमारी पौराणिक अलंकरण गाथाओं का जो पक्ष कहीं- कहीं असंगत और अनैतिक भी दीखता है उसका गूढ़ार्थ स्पष्ट कर जनता में फैले हुए उन भ्रमों को दूर किया जाय, जिनके कारण धार्मिक अविश्वास और सन्देह बढ़ते हैं ।।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए स्थान- स्थान पर अनेक संगठन बने तथा अनेक सम्मेलन, आयोजन करते रहने की आवश्यकता है, ताकि जनसाधारण की मनोभूमि पर सांस्कृतिक छाप गहराई तक डालने में प्रगति हो ।।
(भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व पृ.सं. ५.१)
यह बड़े दुःख का विषय है ।। कि भारतीय विचारधारा और जीवन- यापन पद्धति आज बहुत विकृत, अव्यवस्थित, उपेक्षित और अस्त- व्यस्त दिशा में पड़ी हुई है ।। उसे ठीक तरह न समझ सकने के कारण हम विदेशी संस्कृतियों से प्रभावित होते जा रहे हैं ।।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान दो प्रकार से होना चाहिए, एक तो भारतीय संस्कृति के लिए व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में सुव्यवस्थित कार्य प्रणाली का होना आवश्यक है ।। आज भारतीय धर्म, दर्शन, तत्त्वज्ञान, कर्मकाण्ड एवं आचार- विचार का जो रूप सामने उपस्थित है, वह लम्बे अज्ञानान्धकार में गुजरने के कारण, विकृत, अव्यवस्थित और अनुपयोगी हो गया है ।। इस स्थिति में हमें अपनी प्राचीन प्रतिगामी बन गया है ।। इस स्थिति हमें अपनी प्राचीन संस्कृति के वास्तविक एवं विशुद्ध रूप को सर्वसाधारण के सम्मुख उपस्थित करना होगा और बताना होगा कि यह रूढ़िवाद, प्रतिगामिता, भ्रमजाल, संकीर्णता एवं साम्प्रदायिकता नहीं, वरन् एक अत्यन्त ही उपयोगी, बुद्धि संगत, विज्ञान सम्मत, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र समाज व्यवस्था एवं मानवता की दृष्टियों से यह सर्वोत्कृष्ट प्रक्रिया हैं ।। तभी हम आज के बुद्धिवादी युग में भारतीय संस्कृति के महत्व को स्वीकार करने एवं उसे आचरण में लाने के लिए किसी को सहमत कर सकेंगे ।।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान का महान कार्य पूरा करने के लिए हमें विशाल पैमाने पर कार्यक्रम बनाना और फैलाना होगा ।। तभी इतने बड़े देश की इतनी बड़ी जनसंख्या में उन सुसंस्कृत तथ्यों की स्थापना संभव हो सकेगी ।। जितने अंशों में हम इसे आगे बढ़ाने में सफल होंगे, उतना ही सहयोग और सद्भाव प्राप्त कर सकेंगे ।। एक बार अच्छी तरह इसकी उपयोगिता समझ लेने के उपरान्त इस गति- विध को देश व्यापी और फिर विश्वव्यापी बनाना कठिन न होगा ।। हमारी योजनाएँ इस प्रकार हैं :-
संस्कृति का परिमार्जित रूप जनता के सम्मुख रखना चाहिए ।। अभी तक भारतीय संस्कृति का कोई परिमार्जित रूप जनता के सामने मौजूद नहीं है ।। अनेक भ्रान्त विचार, आदर्श और रीति- रिवाज मध्यकाल की विभिन्न परिस्थितियों के कारण इसमें मिल गये हैं ।। लोग इन्हीं को परम्परागत धर्म मनाने लगे हैं ।। जिस प्रकार सोना, ताँबा, और पीतल की मिलावट को चतुर सुनान शोध कर पृथक−पृथक कर देता है और विदेशी आक्रमणों, स्वार्थी तत्वों तथा समय की रफ्तार के कारण आई हुई विकृतियों को दूर करना चाहिए ।। रूढ़ियों की अशुद्धता को अलग छाँट दिया जाय । संस्कृति और विकृति के भेद को स्पष्ट कर जनता से पालन करने योग्य ग्राह्य तत्वों को अपनाने और अकर्तव्यों का मोह त्यागने के लिए कहा जाय ।।
सांस्कृतिक जीवन के आदर्श और व्यवहार को अपनाने पर मनुष्य को जो सुविधाएँ, सुख- शान्ति, समृद्धि एवं सफलताएँ मिल सकती हैं, उनको तर्क, प्रमाण, उदाहरण, तथ्य आदि के आधार पर भली- भाँति सिद्ध किया जाय ।। उन निष्कर्षों को बड़े पैमाने पर प्रचारित किया जाय, साथ ही उन सांस्कृतिक आदर्शों की अवहेलना पर जो कठिनाइयाँ और परेशानियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, उनका भी बुद्धिसंगत प्रतिपादन किया जाय ।। इस प्रकार पुस्तक, लेख, भाषण आदि द्वारा जनता को समझाया जाय कि उनकी व्यक्तिगत एवं सामूहिक उन्नति के लिए हमारी संस्कृति कितनी उपयोगी एवं आवश्यक है ।।
हमारी संस्कृति में जो शास्त्रों के परस्पर विरोधी सिद्धांत तथा आदर्श पाये जाते हैं, उनको ऐसे सुव्यवस्थित रूप में रखा जाय कि वे एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक प्रतीत हों ।। दार्शनिक और धार्मिक मतभेदों के कारणों को बताते हुए उनका समन्वय किया जाय ।।
हमारी पौराणिक अलंकरण गाथाओं का जो पक्ष कहीं- कहीं असंगत और अनैतिक भी दीखता है उसका गूढ़ार्थ स्पष्ट कर जनता में फैले हुए उन भ्रमों को दूर किया जाय, जिनके कारण धार्मिक अविश्वास और सन्देह बढ़ते हैं ।।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए स्थान- स्थान पर अनेक संगठन बने तथा अनेक सम्मेलन, आयोजन करते रहने की आवश्यकता है, ताकि जनसाधारण की मनोभूमि पर सांस्कृतिक छाप गहराई तक डालने में प्रगति हो ।।
(भारतीय संस्कृति के आधारभूत तत्व पृ.सं. ५.१)

