संस्कृति की पृष्ठभूमि
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हिन्दू धर्म के आचार-विचार ऐसे ही हैं। उनका निर्माण मनुष्य जीवन की सुख सुविधायें बढा़ने के लिये विशुद्ध विअज्ञानिक दृष्टि से ही किया गया है। आज उन नियमों में कुछ विकृतियाँ आ गई हैं जिन्हें सुधार कर उसको मूल रूप में उपस्थित करने की आवश्यकता है। साथ ही उन तथ्यों को समझने और समझाने की व्यवस्था न रहने के कारण उन पर लोगों की जो अरूचि एवं उपेक्षा वृत्ति उत्पन्न हो रही है उसे ठीक करने की आवश्यकता है। यदि हिन्दू जीवनयापन पद्धति के रहस्यों को जनसाधारण के समक्ष वैज्ञानिक एवं बुद्धिसंगत रीति से तर्क, प्रमाण, उदाहरण के साथ उपस्थित किया जाय तो निस्सन्देह उन महान् तथ्यों से हम सब फिर पहले की भाँति लाभान्वित हो सकते हैं।
वर्णाश्रम धर्म को ही लीजिये यह सामजिक सुव्यवस्था की सर्वोत्तम पद्धति है। हर व्यक्ति दूसरों की सुख सुविधा का अधिक और अपनी तृष्णा एवं सुखेच्छा का कम ध्यान रखे तभी समाज में प्रेम, सहयोग, सदभाव, सुव्यवस्था और सुख समृद्धि सम्भव है। यदि हर कोई अपने मतलब को प्रधानता देने लगे और दूसरों की सुविधा का विचार न करे तो समाज में घोर क्लेश और संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। इस अव्यवस्था से बचने के लिये चार वर्ण बनाये गये। यह कहा गया कि जो द्विज है वस्तुत: वही मनुष्य है। द्विजत्व से रहित व्यक्ति तो घृणास्पद हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म। एक जन्म जो माता पिता के रज वीर्य से सभी का होता है वह शूद्र जन्म है। जब मनुष्य गायत्री मातारूपी सद्बुद्धि ऋतम्भरा प्रज्ञा तथा पितारूपी संयम और त्याग को अपना अभिवावक मान लेता है तब वह द्विज बनता है। यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, गुरूदीक्षा नाम से द्विजत्व ग्रहण करने का समारोह संस्कार धूम-धाम के साथ होता है, ताकि वह व्यक्ति उस प्रतिज्ञा को, लक्ष्य की, वस्तुस्थिति को भली प्रकार समझे। द्विज का कर्तव्य है कि जीवन धारण योग्य वस्तुएँ अपने लिये लेकर शेष योग्यता, सामर्थ्य, शक्ति, क्रिया और भावना को समाज की भलाई के लिये लगावे।
ब्राह्मण अत्यन्त तप और त्यागपूर्ण जीवन जीता है। अपना उज्ज्वल आदर्श ऐसा रखता है जिससे अन्य वर्ण उसका अनुकरण कारके अधिक संयमी जीवन बितावें। वह अपना सारा समय सदज्ञान के संग्रह में लगाता है और उस ज्ञान को जनता में बिना मूल्य वितरण करता है। इस प्रकार हर आदमी को ज्ञान शोध का महान श्रम न करते हुए भी उसका लाभ अनायास ही प्राप्त हो जाता है। वेदों में सन्निहित अनेकों विद्याओं की शोध, उनका प्रकटीकरण, प्रयोग, उपदेश, आदि के द्वारा यह वर्ग जनता की भारी सेवा करने में संलग्न रहता है। दूसरा वर्ण क्षत्रिय है। इसका काम है समाज में जो आसुरी तत्व उभरें उन्हें न उभरने दें। चोर, डाकू, लुटेरे, हत्यारे, बेईमान गुण्डे, व्यभिचारी, अन्यायी तत्वों के आतंक से प्राय: हर कोई अलग-अलग होकर आत्मरक्षा नहीं कर सकता। इसलिये यह वर्ण संगठित रूप से अपनी शक्ति को बढा़ता है। और उसका उपयोग केवल अनीति के निवारण और न्याय की रक्षा में करता है। इस प्रकार जनता को दुष्टता के आतंक से छुटकारा पाकर निर्भयतापूर्वक अपने-अपने कामों में लगने का अवसर मिलता है यह क्षत्रिय लोग समाज हित के लिए अपनी जान को हर वक्त हथेली पर रखते हैं और ब्राह्मण के समान ही त्यागी, संयमी, उदार तथा दर्यार्द भावनाओं से ओत-प्रोत होते हैं। जिस प्रकार ब्राह्मण अज्ञान का, क्षत्रिय अशक्ति का निवारण करने के लिये अपना जीवन उत्सर्ग करते हैं उसी प्रकार वैश्य समाज के अनेक अभावों को दूर करके उनकी आवश्यकताओं का सामान जुटाने में संलग्न रहते हैं। कृषि, गो रक्षा, वाणिज्य के द्वारा जनता में अन्न, दूध, घी, वस्त्र, औशधि, धातु आदि पदार्थों को जन जन के लिए उपलब्ध कराने में प्रयत्नशील रहते हैं। शुद्ध, उत्तम, उपयोगी वस्तुएँ उचित मूल्य पर जुटाते रहना इनका कार्यक्रम होता है। इस रीति से यदि कुछ धन संग्रह भी हो जाय तो उसे समाज की आवश्यकता के लिए मुक्त हस्त से दान करके अपने को ब्राह्मण क्षत्रिय से किसी भी प्रकार कम त्यागी सिद्ध नहीं होने देते।
इस प्रकार जो लोग संसार में दु:खों के तीन प्रधान कारण अज्ञान, अशक्ति और अभाव को दूर करने के लिए-व्यक्तिगत सुख सुविधाओं को तिलांजलि देकर-संलग्न हैं वे द्विज माने गये हैं। ऐसे लोग जिस समाज में भरे हुए हों वह देश निस्सन्देह देवताओं का वर्ग होता है। जो लोग उपर्युक्त प्रकार के त्याग न कर सके वे शूद्र ठहराये गये। उस पर भी यह प्रतिबन्ध रहा कि वे अपनी शारीरिक, मानसिक शक्तियों को केवल समाज की सेवा में ही लगावें। सेवा ही अपना धर्म मानें। इन नियमों से बँधा हुआ चातुर्वर्ण निस्सन्देह समाज रचना का उत्तम आधार था। आज वह आधार टूट रहा है। लोग अपने कर्तव्यों को भूल कर केवल जन्म मात्र से जाति मानने लगे हैं और व्यर्थ ही एक-दूसरे से ऊँच-नीच बनते हैं। इन विकृतियों को सुधार करके यदि प्राचीनकाल जैसा वर्ण-धर्म, प्रतिष्ठापित हो जाय तो निश्चय ही सब लोग प्रसन्नता दायक स्थिति का रसास्वादन कर सकते हैं। अपने-अपने व्यवसाय को लोग पैतृक परम्परा के साथ पकडे़ रहें तो उसमें आसानी से बहुत चतुरता एवं सफलता प्राप्त करकेअपनी उत्कृष्टताएवं विशेषज्ञता से राष्ट्र को लाभ पहुँचा सकते हैं। हर पीढी़ पर पेशा बदलना एक सामाजिक अव्यवस्था का कारण ही बनता है।
आश्रम-धर्म भी इसी प्रकार महत्वपूर्ण है। यौवन के समुचित विकास तक ब्रह्मचर्य, वीर्य-रक्षा होने से शरीर का रक्त माँस नसें, हड्डियाँ परिपुष्टि होकर रोग निवारिणी और दीर्घजीवन दायिनी शक्ति उत्पन्न हो जाती है। बल, बुद्धि विद्या, ओज एवं मानसिक और आत्मिक विकास का पर्याप्त समय मिल जाता है तथा भावी संतति उन्नतिशील होती है। गृहस्थ धर्म में प्रवेश करके नव निर्माण में अपना मतवपूर्ण पार्ट अदा करना भी आवश्यक है। इसके उपरान्त जब आयु ढ़लने लगे नवीन वीर्य का उत्पन्न होना बन्द हो जाय तो वानप्रस्थ लेकर, घर की जिम्मेदारी बडे़ बच्चों को सौंपनी चाहिये और अपनी देख रेख में ही उन्हें सुयोग्य बना देना चाहिये। साथ ही जीवन के अन्तिम भाग में परमार्थ साधना के लिये तैयार आरम्भ कर देनी चाहिये। जीवन के चतुर्थ अध्याय में पारिवारिक जिम्मेदारियों से छुटकारा पाकर अपने परिपक्व ज्ञान और अनुभव को जनता में फैलाने के लिये तथा अपनी वासनाओं को परिमार्जित करने के लिए संयास ले लेना चाहिए। आयु का यह विभाजन कितना वास्तविक, बुद्धिमत्तापूर्ण एवं उपयोगी है इसका अनुभव वे ही कर सकते हैं जो इसे क्रिया रूप में लाते हैं। आज तो जब तक वासना का उदय नहीं होता तब से लेकर मृत्यु पर्यन्त मनुष्य वासना और तृष्णा में ही कण्ठ तक डूबा रहता है। यह प्रवृत्ति स्वास्थ्य, सुसन्तति, समाज व्यवस्था तीनों ही दृष्टियों से हानिकारक है। यदि यह विकृति दूर हो जाय तो मनुष्य जीवन सब प्रकार व्यवस्थित एवं सुविधाजनक बन सकता है।
कृतज्ञता हिन्दू धर्म का प्रधान आचार है। जो भी जड़ चेतन हमारे साथ में उपकार करते हैं उसके प्रति कृतज्ञ होना, अपनी कृतज्ञता की भावना की किसी-न-किसी रूप में समारोहपूर्वक अभिव्यक्ति करके अपने मन पर उस प्रकार के संस्कारों को सुदृढ़ बनाना, हमारे समाज की एक प्रधान विशेषता है। तुलसी, पीपल आंवला, वट आदि पेड़, गौ, बैल, घोडा़, कुत्ता आदि पशु, चील, कौए आदि पक्षी ही नहीं पूजे जाते, निर्जीव वस्तुओं में चूल्हा, चक्की, कुआ घूरा, कुम्हार का चाक, हल मूसल, कलम, दवात, रूई, पट्टी, बही, तलवार, तराजू आदि वस्तुओं की पूजा समय-समय पर होती है। इसका तात्पर्य यह है कि जिन भी जीवों या वस्तुओं से हमें सहायता मिलती है उनके लिए हम कृतज्ञ होते हैं, उनका उपकार मानते हैं। यह भावना यदि स्थिर्तापूर्वक मन में जम जावे तो मौन्ष्य अपने को समाज का ऋणी समझे और उस ऋण को चुकाने के लिये, प्रत्युपकार के लिए उत्तम कार्य ही करता रहे। जीवित गुरूजनों की सेवा सुश्रूषा, चरण वन्दन तथा स्वर्गीय पितरों का श्राद्ध तर्पण, सन्तानों की कृतज्ञता के प्रतीक हैं।इनसे एक ऐसी भावना की पुष्टि होती है जिससे नई सन्ततियाँ पितृभक्त बनती हैं। आज तो इनकी चिह्न पूजा मात्र रह गई है, पर यदि पूजा का वास्तविक रहस्य समझकर भावनापूर्वक उपयोग करें तो वह पार्थिव पूजा मनुष्य के अन्त:करण को कृतज्ञता की दिव्य भावना से अभिप्रेत करके उसे निरन्तर संसार का प्रत्युपकार करने के लिये प्रेरित कर सकती है।
गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्त, नाम्करण, अन्न्प्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास, अन्त्येष्टि आदि १६ संस्कारों द्वारा समय-समय पर एक विशेष प्रभाव मनुष्य पर डाला जाता है। वेदमन्त्र की शक्ति द्वारा, तपस्वी वेदपाठी विद्वान अपनी व्यक्तिगत आत्म-शक्ति का प्रयोग करते हुए यज्ञ एवं देवाव्हान द्वारा उस व्यक्ति पर एक सूक्ष्म प्रभाव डालते हैं जिसका संस्कार होता है। इस प्रभाव के कारण उसकी मनोभूमि में कुछ विशेष तत्वों का बीज वपन होता है और वह बीज कालान्तर में परिपुष्टि होकर उस व्यक्ति को महापुरूष बनाने के लिए अग्रसर करता है। सोलाह संस्कारों में से एक-एक की महत्ता ऐसी अदभुत है कि यदि आर्य-प्रणाली से संस्कार कराने वाले और करने वालेमिल जावें तो निश्चय ही गीली मिट्टी की तरह मनुष्य को कुछ-से-कुछ ढाला जा सकता है। संस्कारों का शास्त्रोक्त विधान ऐसी ही रहस्यमय शक्तियों एवं संभावनाओं से भरा हुआ है। इन संस्कारों के समय जो प्रियजन, परिजन उपस्थित होते हैं उनकी उपस्थिति से उस समय दी गई शिक्षाओं को चरितार्थ करने का जो संकल्प यजमान लेता है उसका भी मन पर प्रभाव पड़ता है और कई बार तो वह स्वयं ही नहीं उपस्थित जनसमूह भी सन्मार्गगामी होता है। साधारण समय की शिक्षाओं की अपेक्षा संस्कार समारोह के समय गी हुई शिक्षाएँअधिक प्रभावपूर्ण होती हैं। यदि कोई पुरोहित ठीक प्रकार विवाह संस्कार करा सके तो प्रतिज्ञापूर्वक यह कहा जा सकता है कि इनका दाम्पत्य जीवन सदा सुखमय एवं प्रेमपूर्ण रहेगा। आज तो टकापन्थी पण्डित औरकई बार तो वह स्वयं ही नहीं उपस्थित जनसमूह भी सन्मार्गगामी होता है। साधारण समय की शिक्षाओं की अपेक्षा संस्कार समारोह के समय गी हुई शिक्षाएँअधिक प्रभावपूर्ण होती हैं। यदि कोई पुरोहित ठीक प्रकार विवाह संस्कार करा सके तो प्रतिज्ञापूर्वक यह कहा जा सकता है कि इनका दाम्पत्य जीवन सदा सुखमय एवं प्रेमपूर्ण रहेगा। आज तो टकापन्थी पण्डित और अश्रद्धालु यजमान इन संस्कारों को एक समारोह मात्र मानकर कुछ मनोरंजन या लकीर पीटना मात्र कर लेते हैं। पर यदि इनमें प्राचीनकाल जैसा सुधार हो सके तो मनोभूमि को उत्तम दिशा में विनिर्मित करने का एक महत्वपूर्ण कार्य हो सकता है। हर वर्ष जन्म तिथि मान कर हर व्यक्ति अपने विगत जीवन की आलोचना तथा भावी जीवन के निर्माण का विशेष उपकरण प्रस्तुत कर सकता है।
व्रत, त्यौहारों के आयोजन एक प्रकार से समाज के सामूहिक संस्कार है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति के समय-समय पर सोलह संस्कार किये जाते हैं और उस पर व्यक्तिगत रूप से उत्तम भावनाओं की छाप डाली जाती है उसी प्रकार सामूहिक जन-समाज के मनों पर जमते रहने वाली विकृतियों को मांज धोकर शुद्ध करने एवं नवीन संस्कार जमाने के लिये त्यौहार मनायें जाते हैं। श्रावणी, कृष्णाष्टमी, अनन्त चतुर्दशी, पितृ पक्ष नव दुर्गा, विजया दशमी, धन तेरस, दिवाली, गोवर्धन, भैया दूज, गोपाष्टमी, देवोत्थान, शरद पूर्णिमा, मार्गश्री, मकर संक्रान्ति, बसन्त पंचमी, शिवरात्रि, होली, धूलि, सम्वत्सर, रामनवमी, गंगा दशहरा, देव शयनी, व्यास पूर्णिमा, हरियाली तीजादि त्यौहारों को यदि प्राचीनकाल की भांति सामूहिक रूप से मनाया जाय तथा इनसे सम्बन्धित, कथाओं, शिक्षाओं सन्देशों, विधानों का भली प्रकार विवेचन किया जाय तो इनके आधार पर समाज में उत्पन्न होती रहने वाली विकृतियाँ इन उत्सवों के भावावेश पूर्ण प्रवाह में उसी प्रकार बह जा सकती हैं, जैसे आँधी में तिनके उड़ जाते हैं। जन-समाज के सामूहिक विचार प्रवाह को सही दिशा में प्रवाहित करने के लिये त्यौहारों के आयोजन बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकते हैं। आज केवल पकवान मिठाई खाने और उत्सव मनाने तक ही यह त्यौहार सीमित हैं पर ऊनको प्राचीन रीति से मनाया जाय तो निस्सन्देह समाज का जीर्णोद्वार हो सकता है।
खान-पान की पवित्रता में मानवीय विद्युत शक्ति के चमत्कार का भारी तत्व-ज्ञान छिपा पडा़ है। यह बात विज्ञान सम्मत है कि भोजन बनाने या परोसने वाले व्यक्ति की मनोवृत्तियों, गुण कर्म स्वभावों की च्हाप उस खाद्य पदार्थ पर पड़ती है और जो कोई खाता है उस पर वे संस्कार प्रभाव डालते हैं। इसलिये भोजन देने वाले, बनाने वाले, परोसने वाले, व्यक्ति के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेना और उपयुक्त व्यक्तियों को ही इस कार्य के लिये स्वीकार करना उचित है। माँस, मदिरा, अण्डे, मछली, मिर्च, मसाले जैसे उत्तेजक और तमोगुणी पदार्थ बुद्धि को आसुरी बनाते हैं इसलिये उन्हें अभक्ष माना गया है। भोजन की पवित्रता, सात्विकता का पूरा ध्यान रखना धर्म सम्मत इसलिये माना गया हैकि इसी के द्वारा हमारा रस रक्त का, मन बुद्धि का आचार-विचार का निर्माण होता है।
यह साम्प्रदायिकता का नहीं भोजन विज्ञान का प्रश्न है। इस सम्बंध मेंआज जो धाँधली बरती जा रही है उसमें सुधार होने की आवश्यकता है।
हमारी वेश-भूषा, पोशाक इस देश के जलवायु तथा शील के उपयुक्त है। हलके, ढी़ले, कम, सादे, सफेद, कपडे़ भारत जैसे उष्ण प्रदेश तथा सतोगुणी प्रकृति के लिये उचित है। हर पोशाक के साथ हजारों वर्षों के भावों के साथ एक संस्कार भी संबद्ध हो जाता है। जो जैसी पोशाक पहनता है वह अज्ञात रूप से उस पोशाक के साथ छिपी हुई संस्कृति को भी अपनाता है। धोती-कुर्ता पहनने वाले के मन में सदा भारतीयता का भाव रहेगा पर अंग्रेजी पोशाक धारण किये हुये व्यक्ति अनायास ही अंग्रेजी मान्यताओं और विचारधाराओं को अपनाने लगेगा। योरोपीय ठण्डे देशों की पोशाक वहाँ के जलवायु तथा उन लोगों की कार्यप्रणाली के उपयुक्त हो सकती है पर भारतीय यदि अपने को हीन और योरोपियनों को महान मानकर उनकी पोशाकों को धारण करें तो अपने मन की ओर उनकी उपेक्षा एवं तिरस्कार वृत्ति बढे़गी। साथ ही विदेशीपन से उनकी मनोभूमि भरने लगेगी। जातीय गौरव को भूल जाना एक प्रकार से सांस्कृतिक पराधीनता स्वीकार करना है। उसके परिणाम भी बौद्धिक क्षेत्र में वैसे ही होते हैं जैसे आर्थिक क्षेत्र में राजनैतिक गुलामी के होते हैं। लड़के और लड़कियाँ आज योरोपियन पोशाक की ओर बहुत आकर्षित हो रहे हैं। फलस्वरूप उनके आचार-विचार भी वैसे ही बनते जा रहे हैं। भारतीयता में छिपी हुई महानता की रक्षा के ल्ये भाषा, वेश, और भाव की रक्षा करना आवश्यक है।उसके बिना हम अपनी सभी विशेषताओं एवं परम्पराओं से धीरे-धीरे रहित होते चले जायेंगे।
तीर्थों में प्राचीनकाल के महान व्यक्तियों, ऋषियों, उनके कार्यों तथा वहाँ की भूमिगत विशेषताओं के कारण सिद्ध पीठ जैसे तत्व पाये जाते थे। वहाँ अनेक महापुरूषों का सत्संग लाभ होता था।जलवायु उत्तम थी। वहाँ के निवासी यज्ञ आदि के द्वारा उस प्रदेश के शान्तिदायक वायुमण्डल को बढा़ते रहते थे। लोग पैदल यात्रा करके देशाटन से ज्ञान और स्वास्थ्य की वृद्धि करते थे और तीर्थ स्थानों में पहुँचकर वहाँ के वातावरण तथा सत्संग से शांति लाभ करते थे। आज वैसा वातावरण नहीं रहा। धूर्तता, और लूट-खसूट का बोलबाला है पर निराशा की कोई बात नहीं। तथ्य मजबूत है। मनस्वी लोग उनमें परिवर्तन करके वहाँ पुन: प्राचीन वातावरण उत्पन्न कर सकते हैं। पण्डे, पुजारी, पुरोहित, साधु, भिकारी आदि की ५६ लाख मुफ्तखोर सेना हमारे देश के लिये भार बनी हुई है और नाना प्रकार की भ्रान्तियाँ तथा बुराई फैलाती है। इसलिए इनके प्रति जनजागरण में दुर्भावनाएँ उत्पन्न होना उचित ही है। पर प्राचीनकाल में यह लोग ऐसे न होते थे। वे राष्ट्र के लिये घोर परिश्रम करते थे और अपना सर्वस्व होम कर रोटी मात्र पर गुजारा करते हुए अपने महान ज्ञान से जनता को लाभ पहुँचाते थे। उसी प्राणी को जाग्रत करने का अब समय आ गया है।
पेटू, निठल्ले अयोग्य लोगों को सामाजिक बहिष्कार या राजदण्ड द्वारा इस पवित्र कार्य से हटा दिया जाय और केवल सच्चे त्यागी, सन्त, लोकसेवीलोग ही इस मार्ग में रहें तो यह साधू संस्था राष्ट्र की सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, शिक्षा सम्बन्धी, स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं को हल करने का बहुत भारी कार्य कर सकती है। गौ पालन, गौ संवर्धन, सहयोग समितियाँ, वनश्री की वृद्धि, सार्वजनिक श्रमदान, साक्षरता प्रचार आदि अनेक राष्ट्र निर्माण के कार्य जिन्हें सरकार नहीं कर पा रही है, उन्हें यह जनसेवी, पुरोहितों की सेना अपने प्रभाव एवं उदाहरण से जनता द्वारा आसानी से पूरा करा सकती है। सन्त पुरोहितों की पद्धति बुरी नहीं है। प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों ने जनहित के महत्वपूर्ण प्रयोजनों को पूरा करने के लिए ही इनका प्रचलन किया था। मन्दिर-देवालयों में करोड़ों रूपयों की चल-अचल सम्पत्ति जमा है। ऐसी सम्पत्ति धर्म प्रचार के लिए भक्त लोग ईश्वरार्पण किया करते थे, उस धन से अनेकों धार्मिक योजनाएँ पूरी की जाती थी, पर आज तो वह केवल मूर्तियों के राज भोग, श्रृंगार्में या मठाधीशों के मौज मजे में खर्च होता है। यह धर्म-धन यदि धर्म प्रसार के लिये ही खर्च होने लगे तो सांस्कृतिक पुनरूत्थान का बहुत कार्य हो सकता है।
प्राचीनकाल में विद्वान लोग एकत्रित होकर उस समय परिस्थितियों के अनुसार यह निर्णय करते थे कि इन दिनों किस प्रकार के धार्मिक कार्यक्रमों की आवश्यकता है। धर्म साधन का उद्देश्य आत्मा की उन्नति और सामाजिक सुव्यवस्था ही है। चूँकि समय-समय पर परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, अनेक नई विकृतियाँ और समस्याएँ उत्पन्न होती रहती हैं। उनका समाधान करने के लिये मनीषी लोग स्वयं उस प्रकार के कार्यक्रम में प्रवृत्त होते हैं और जनता को उसी मार्ग पर अग्रसर करते हैं। आज उस प्रकार की व्यवस्था लुप्त होती जा रही है। प्राचीनकाल की परिस्थितियों के अनुसार कार्यक्रम जनता के सामने रखे गये थे पर वे अब वैसा वातावरण न रहने के कारण निरर्थक हो गये हैं और नई समस्याएँ उत्पन्न हो जाने के कारण नये कार्यक्रम आवश्यक हो गये हैं। परन्तु वे मनीषी अब दिखाई नहीं देते जो देश, काल, पात्र, समय, परिस्थिति और आवश्यकता का ध्यान रखते हुए तदनुसार धार्मिक भावना का पथ प्रदर्शन कर सकें। आज तो "लकीर का फकीर" बनने की कहावत ही चरितार्थ हो रही है। आज अनेक रीति-रिवाज, विधान, प्रयोजन आदि में भारी हेर-फेर किये जाने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है ताकि धर्म भावना का युग-धर्म के साथ मेल बिठाया जा सके। संस्कृति निर्जीव नहीं है, जो सदा अचल रहे। वह गतिशील, प्रवाहशील, चैतन्य तत्त्वों की भांति अपने में आवश्यक हेर-फेर करती रहती है। आज के समय के अनुकूल हेर-फेर करने वाले तत्त्वज्ञानी, सूक्ष्मदर्शी मनीषियों को इस दिशा में बहुत काम करने की आवश्यकता है।
यों मनुष्य अन्य पशुओं की अपेक्षा शारीरिक दृष्टि से काफी पीछे है पर उसकी बौद्धिक विशेषता ऐसा है जिसने इसे सृष्टि का मुकुटमणि बना दिया। यह मन:क्षेत्र जब जितना ऊर्ध्वगामी या अधोगामी हो जाता है तब उतनी ही मात्रा में वह मनुष्य उतना ही पशु, मनुष्य एवं देवता के रूप में बनता और बदलता रहता है। जिस व्यक्ति, समाज या राष्ट्र के विचार ऊँचे रहते हैं वह बढ़ता है, सुदृढ़ रहता है, फलता-फूलता है और सुख शांति प्राप्त करता है। इसके विपरीत जहाँविचार क्षेत्र में संकीर्णता, स्वार्थपरता, विलासिता आदि दुष्प्रवृत्तियों का समावेश हुआ वहीं सर्वतोमुखी अध:पतन प्रारम्भ हो जाता है और दु:ख-शोक की घटाएँ घुमड़ने लगती है।
भारतीय संस्कृति के पुनरूत्थान के लिए जो प्रधान कार्य हाथ में लेना है वह यह है कि लोगों को कुविचारों और दुष्प्रवृत्तियों की हानि तथा सदविचारों एवं सत्प्रवृत्तियों के लाभ समझाने के लिये जनता में घुल-मिलकर भारी कार्य किया जाय। भारत में सफल राजनैतिक क्रान्ति हो चुकी, आर्थिक क्रान्ति के क्षेत्र में काफी काम हो रहा है। केवल सामाजिक और भावना क्षेत्र ऐसा ही है जो सबमें महत्वपूर्ण होते हुए भी सबमें पिछडा़ हुआ है। इस क्षेत्र में काम करने के लिए लोगों में दिलचस्पी पैदा करने एवं सुव्यवस्थित योजना देने की दिशा में गायत्री परिवार ने सुव्यवस्थित कदम उठाया है।
गायत्री परिवार के तीन कार्यक्रम हैं- (१) बडी़ संख्या में प्रभावशाली, उच्च चरित्र के धर्म प्रचारक तैयार करना और उनके द्वारा जनता को सुलझे हुए विचार देना, सभा-सम्मेलनों, पर्व-उत्सवों, यज्ञों एवं सांस्कृतिक सम्मेलनों का आयोजन करना। वाणी की शक्ति से जनमानस की सुप्त सदभावनायें जगाना। ऐसे सस्ते साहित्य का निर्माण करना जो बौद्धिक, आध्यात्मिक, सामाजिक एवं चारित्रिक क्रान्ति की आवश्यकता पूरी करे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पत्र-पत्रिकाएँ निकालना, वर्तमान पत्रों में लेख छपाना, सस्ती पुस्तकें तैयार करना, बौद्धिक क्रान्ति करने वाले ज्ञान मन्दिरों (पुसकालयों) की व्यापक क्षृंखला फैलाना, भारी मात्रा में वितरण साहित्य, पर्चे, पोस्टर, आदर्शवाक्य, चित्र आदि तैयार करना एवं उन्हें लाखों की संख्या में बँटवाना, लेखनी द्वारा हो सकने वाला सभी प्रचार कार्य करना।
(३) जनता के साथ घुल-मिलकर उसकी कठिनाइयों को सरल बनाने में व्यावहारिक सहायता देना। चिकित्सालय, विद्यालय, सेवा समितियाँ, कुरीति निवारक योजनाएँ, पारिवारिक सत्संग, जन्मदिन, यज्ञोपवीत, पर्व-त्यौहार आदि मनाने के आकर्षक कार्यक्रम, कुरीतियों को, दुर्व्यसनों को तोड़ने के लिए प्रतिज्ञाएँ लेना, जहाँ संभव हो वहाँ दुष्कर्मों को रोकने के लिए प्रतिरोधक कदम उठाना।
इन तीन कार्यक्रमों की पूर्ति के लिए सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार अनेकों योजनाएँ बनती और कार्य रूप से परिणित होती रहेंगी। बौद्धिक क्रान्ति का यह त्रिसूत्री कार्यक्रम ठोस आधार पर आगे बढे़, इसके लिए गायत्री परिवार की २००० शाखाओं और ६० हजार सदस्यों को इस बात की प्रेरणा की गई है कि वे ज्ञान प्रसार को, ज्ञान यज्ञ को सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म मानें। इसमें ज्ञान रूपी ईश्वर की प्रत्यक्ष पूजा एवं प्रसन्नता अनुभव करें। सत साहित्य का स्वाध्याय भी अपने नित्य जप के समान आवश्यक समझें। तीर्थ यात्रा देवस्थानों की परिक्रमा के समान ही ज्ञान प्रचार के लिए की हुई धर्म फेरी का पुण्य मानें। नित्य नियमित रूप से जब भी सुविधा हो, छुट्टी के दिन या जिस प्रकार भी बन पडे़, अपना थोडा़-बहुत समय लोगों को सन्मार्ग पर लगाने के लिए ज्ञान सेवा के लिए अवश्य लगाते रहें। इसी प्रकार प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है कि वह नित्य ही कुछ दान अपने क्षेत्र में ज्ञान प्रसार करने के लिए करता रहे, चाहे वह एक पैसा रोज ही क्यों न हो। गायत्री परिवार का एक भी सदस्य ऐसा न हो जिसकी कमाई में से कुछ न कुछ दान नित्य ही ज्ञान-यज्ञ के लिए न हो। भिक्षुक को एक मुट्ठी अन्न देने की तरह घरों में धर्म घट रखकर भी यह दान प्रथा चलाई जा सकती है। किसी भी प्रकार हो यह ज्ञान-दान करने में कोई सदस्य कृपणता न दिखावे। कुछ-न-कुछ नियमित रूप से अवश्य करें। इस पैसे से सत्साहित्य मँगाना, अपने घर में ज्ञान मन्दिर (पुस्तकालय) की स्थापना करना, प्रचार साहित्य वितरण करना आदि कार्य होते रहने चाहिए। अपने घर की पुस्तकें पडो़सियों को पढ़ने देते रहना और वापिस लाना, सदस्यों का धर्म कर्तव्य है। देखने में यह कार्य छोटे हैं तो भी राष्ट्र की बौद्धिक क्रान्ति का महान कार्य इसी प्रक्रिया में संपन्न होगा। समय, श्रम, सहयोग, देकर ही सांस्कृतिक पुनरुत्थान योजना को आगे बढाया जा सकता है। प्रत्येक धर्म प्रेमी को गायत्री उपासना की परिवार पूरी प्रेरणा देगा।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान योजना को सफल बनाने के लिए, अतीत के खोये हुए गौरव को प्राप्त करने के लिए, संसार में सच्ची सुख-शान्ति की स्थापना करने के लिए ऐसे लोगों की भारी आवश्यकता है जो निस्वार्थ भाव से, उत्साह और परिश्रम के साथ जनता का पथ प्रदर्शन करने, धर्म एवं ज्ञान की सेवा करने के लिए तत्पर हों। जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं आई हैं, या जो पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हैं तथा जिनमें समाज सेवा की क्षमता है, संस्कृति की भारी सेवा कर सकते हैं। ऐसे नर-नारियों का गायत्री तपोभूमि सादर आह्वान करती है। उनकी शिक्षा एवं आवश्यक निर्वाह की व्यवस्था प्रसन्नतापूर्वक की जायेगी। गृहस्थ एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों से बँधे हुए लोग भी अपना थोडा़ समय नित्य देकर बहुत काम कर सकते हैं।

