आत्म-विकास का प्रथम सोपान
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(प्रोफेसर रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
सत्य की खोज के प्रारंभ में अनेक जिज्ञासु स्वीकृतियों (Affirmations) का उचित प्रयोग नहीं कर पाते। बाह्य जगत की घटनाओं को देखकर वे उन्हीं के अनुसार स्वयं बनते जाते हैं। यह नहीं कि अपनी आन्तरिक मनोदशा के अनुसार बाह्य वातावरण को बदलते जायं।
दृढ़ निश्चयी साधक वही है, जो अपनी मनोदशा के अनुकूल क्रमशः बाह्य वातावरण को बदलता जाता है। उसकी इच्छाएं तथा अभिलाषाएं फैल कर सुन्दर एवं मनोरम सृष्टि करती हैं। वह जैसा सोचता है, परिस्थितियाँ वैसी ही बनती जाती हैं। वह जिस वस्तु, तत्व, या सत्य का अनुभव या प्राप्ति करना चाहता है उसे अपनी आन्तरिक सृष्टि में स्वीकार करता है, इन स्वीकृतियों (Denials) और अस्वीकृतियों द्वारा वह क्रमशः आध्यात्म पथ पर आगे बढ़ता है।
मुझे स्वयं स्मरण है कि किस प्रकार मैंने कौन-2 सी स्वीकृति से कार्य लिया था। मेरा शरीर ऐसा रुग्ण था कि पुनः स्वस्थ होने की बहुत कम आशा रह गई थी। मुझे ऐसा प्रतीत होने लगा था, जैसे ईश्वर भी मुझे विस्मृत कर रहे हों। मेरी प्रार्थना भी छूट सी गई थी।
एक दिन अचानक मुझे स्वीकृति के महान सत्य का ज्ञान हुआ। हम जिस तत्व को प्राप्त करना चाहते हैं, यदि उसे मिला हुआ समझ कर चलें, तो मन तथा शरीर में अद्भुत शक्ति का संचार होता है। मेरी प्रथम स्वीकृति यह थी -
“मैं आन्तरिक प्रसन्नता और दैवी आह्लाद से परिपूर्ण हूँ। मेरा निकट सम्बन्ध दैवी स्वास्थ्य, दैवी तत्व, दैवी जीवन से है। परमेश्वर का स्वास्थ्यप्रद, कल्याणकारी, अकलुष, सजीवता प्रदान करने वाला तत्व मेरे रोम रोम में प्रवाहित हो रहा है। मेरा शरीर, मन, आत्मा, कण-कण दैवी जीवन से ओत प्रोत हो रहा है।”
एक आध्यात्म वेत्ता का विचार है- “जब तक तुम्हें कोई भी स्वीकृति पूर्ण रूप से अभिभूत न कर ले, तुम उसे पूरी तौर से हृदयगत न कर लो, तब तक उसी पर विचार करो, उस पर मनन करो, उसी में निरन्तर रमण करते रहो।”
यही उस दिन हुआ। मैं लगातार इन्हीं शब्दों पर विचार करता रहा। मैंने उन्हें याद करने की चेष्टा न की, बल्कि इन शब्दों से अपने आन्तरिक जगत् का रोम-2 रंग लिया, मस्तिष्क ने उन्हें दृढ़ता से जकड़ लिया। मैं इन शब्दों को गाता रहा। “मैं दैवी प्रसन्नता से परिपूर्ण हूँ। मैं स्वस्थ हूँ, दैवी कल्याणकारी तत्व तमाम रोग शोक मुझमें से निकाल रहा है।” यह परमोषधि निरन्तर मेरे रोगों को दूर करती रही। सत्य मुझे उत्तमोत्तम दवाई मिली।
“मैं दैवी स्वास्थ्य, प्रसन्नता, आह्लाद से युक्त हूँ।” यह बात पुनः पुनः दोहराना, बार-बार उन्हें विविध रूप में उच्चारण करना हास्यास्पद लगता था। प्रारंभ में मन ने इन्हें स्वीकार न किया। पर बार-बार उन्हीं में रमण करने से एक दिन मुझे आन्तरिक आह्लाद का आभास मिला। मैं धीरे धीरे स्वस्थ और प्रसन्न होने लगा। मैंने कुछ और स्वीकृतियाँ इस प्रकार बनाई-
“मैं आनन्द हूँ, सदैव आनन्द में ही रमण करता हूँ”
“मैं स्वस्थ हूँ सदैव स्वास्थ्य, सुख, प्रसन्नता से ही मेरा संबन्ध है।”
“मैं प्रेम हूँ, समस्त जीव जन्तु प्राणी मात्र से मैं प्रेम करता हूँ। मेरा कोई शत्रु नहीं। सभी मित्र एवं हितैषी हैं।”
पुनः पुनः इन्हीं संकेतों में मग्न रहने लगा। मेरे आन्तरिक मन ने उन्हें ग्रहण कर लिया। मैंने वैद्य का आश्रय छोड़ा अधिकाधिक दृढ़ विश्वास से उक्त स्वीकृति को पकड़ता गया। उस विश्वास में कैसा अद्भुत आनन्द था। मैं परमेश्वर से प्रार्थना करता। मेरी प्रार्थना में स्वीकृतियाँ होती। मेरा शरीर निर्विकार हो गया।
यह जीवन-परिवर्तन का एक पहलू था। दूसरा पहलू ‘अस्वीकृतियाँ’ था। जिन चीजों, अवस्थाओं, परिस्थितियों को मैं नहीं चाहता था, उन्हें मैंने, मेरे अन्तर ने, अस्वीकार किया। मैंने दृढ़ता से कहा -
‘मैं बीमार नहीं हूँ। मुझमें किसी प्रकार की कमजोरी नहीं। मेरे शरीर में कोई भी विकार नहीं ठहर सकता। मुझमें जरा भी निर्बलता नहीं है।’
प्रारंभ में अंतर्मन ने हीलाहवाला किया किन्तु दीर्घकालीन अभ्यास से मनोदशा बदलने लगी। ठीक अवस्था में विकास होते-2 अब वह दशा है कि अभद्र बातें मन स्वीकार ही नहीं करता। अपने विषय में कोई भी निर्बलता की बात में स्वीकार नहीं करता। मैं अपने विषय में शुभ ही स्वीकृत करता हूँ। अशुभ को दृढ़ता से अस्वीकृत करता हूँ। अपने व्यक्तित्व के विषय में कोई भी अभद्र बात मुझे रुचिकर नहीं। सत्य की अन्वेषणा में यह मेरा प्रथम अनुभव था। अब मुझे ज्ञात होता है कि अपने व्यक्तित्व के विषय में दूसरे व्यक्तियों की अभद्र स्वीकृतियाँ कैसा अन्धेर करती हैं।
अनेक स्वार्थी व्यक्ति कमजोरी के संकेत दुर्बल मन में प्रविष्ट करा देते हैं जिनसे मनुष्य हीनत्व की भावना का शिकार होकर अपने विषय में ऊल जलूल बाते मान बैठता है और अपना सत्यानाश कर लेता है।
हम उन्हीं बातों या संकेतों को स्वीकार करें, जो हमारे लाभ की हैं। अहितकर संकेतों को अस्वीकार कर देने में ही भला है।

