• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • सत्य की अकूत शक्ति पर विश्वास कीजिए।
    • सद्ज्ञान का संचय करो।
    • देवता, मनुष्य और राक्षस
    • आसुरी प्रगति
    • मनुष्यता ही धर्म है।
    • लक्ष के लिए बढ़ो! जीवन को सफल बनाओ।
    • दुनिया में एकता पैदा करो।
    • प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं।
    • सब कुछ ब्रह्ममय है।
    • Quotation
    • मानसिक व्यभिचार से बचिए।
    • Quotation
    • पाप कर्म क्या क्या हैं?
    • उदार दृष्टिकोण की आवश्यकता
    • Quotation
    • स्वामी दयानंद का गायत्री प्रेम
    • आत्म-विकास का प्रथम सोपान
    • Quotation
    • आप भी समाधि लगा सकते हैं।
    • सम्मिलित कुटुम्ब के लाभ
    • Quotation
    • आम्र-कल्प
    • प्रत्यक्ष फलदायिनी योग की गुप्त शिक्षाएं
    • अवसर को मत चूकिए।
    • मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये
    • मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1947 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


लक्ष के लिए बढ़ो! जीवन को सफल बनाओ।

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 5 7 Last
जातो जायते सुदिनत्वे अन्हाँ समर्य आ विदये वर्धमानः। पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा देवया विप्र उदियर्ति वाचम्॥

-ऋग्वेद 3/8/5

(जातः) जीव (अन्हाम्) दिनो की (सुदिनत्वे) सुदिन करने के निमित्त (जायते) उत्पन्न होता है। वह (समर्ये) जीवन संग्राम के निमित्त (विद्थे) लक्ष प्राप्ति के निमित्त (आ) सब प्रकार से (वर्धमानः) बढ़ता है। (धीरः) धीर पुरुष (मनीषा) बुद्धि से (आपसः) कर्मो को (पुनन्ति) पवित्र करते हैं। और (विप्रः) सुधी ब्राह्मण (देवया) दिव्य कामना से (वाचम्) वाणी को (उत इर्यति) उच्चारण करता है।

जिन्दगी के दिन तो पशु−पक्षी भी काटते हैं। मौत के दिन तो कीट पतंग भी पूरे करते हैं, मनुष्य इस प्रकार दिन काटने के लिए यहाँ नहीं आया है। उसके जीवन का एक एक दिन अमूल्य है। इन दिनों को सुदिन, उत्तम दिन, महान दिन, महत्वपूर्ण दिन, बनाने के लिए वह उत्पन्न होता है, जीवन धारण की सफलता दिनों को सुदिन बनाने में है। जो दिन महान कार्य करने में, आत्मोन्नति में, धर्माचरण में, परमार्थ में, कर्त्तव्य पालन में, लोक सेवा में व्यतीत हो जाते हैं वही सुदिन हैं। जैसे वायु, सुगंधित और दुर्गन्धित पदार्थों के संसर्ग से बुरी भली कहलाती है। उसी प्रकार दिन भी, सुन्दर, उत्तम कर्मों के द्वारा सुदिन और बुरे कर्मों के कारण दुर्दिन बन जाते हैं। मनुष्य अपने जीवन दिनों को सुदिन बनाने के उद्देश्य से उत्पन्न होता है।

सुदिन किस प्रकार बने। इसका उत्तर वेद ने ‘समर्य’ और ‘विदथे’ शब्दों में दिया है लक्ष स्थिर करके और उसके लिए संघर्ष करके जीवन को सफल बनाया जा सकता है। बिना लक्ष का जीवन वैसा ही है जैसे बिना सवार का छुट्टल घोड़ा, बिना पतवार की नाव, बिना डोरी की पतंग, परिस्थितियों के झोंके इन्हें चाहे जिधर उड़ा ले जाते हैं। जिस पथिक का लक्ष स्थिर नहीं, कभी पूरब को चलता है तो कभी पश्चिम को लौट पड़ता है, कुछ दूर उत्तर को चलता है फिर दक्षिण की ओर मुड़ पड़ता है, ऐसा रास्तागीर भला किसी स्थान पर किस प्रकार पहुँच सकेगा? उसकी यात्रा का क्या परिणाम निकलेगा? हर बुद्धिमान पथिक चलना आरम्भ करने से पूर्व यह निश्चय कर लेता है कि मेरा लक्ष्य किस स्थान पर पहुँचना है। इस निश्चय से ही वह दिशा नियत करता है, रास्ता मालूम करता है और बिना इधर उधर भटके निश्चित गति से उस राह पर चला जाता है और नियत स्थान तक पहुँच जाता है। मनुष्य को भी पहले अपना लक्ष स्थिर करना आवश्यक है। मुझे अमुक तत्व प्राप्त करना है, यह निश्चय जब भली भाँति हो जाता है तभी एक निश्चित कार्यक्रम बनता है अन्यथा कभी यह, कभी वह पाने के लिए उछल-कूद होती रहती है। बन्दर एक डाली से दूसरी पर उचकता फिरता है उसी प्रकार लक्षहीन मनुष्य कभी यह, कभी वह चाहता है, इसे छोड़ता है, उसे पकड़ता है। पर जिसने लक्ष स्थिर कर लिया है वह बन्दूक की गोली की तरह सनसनाता हुआ अपने निशाने पर जा पहुँचा है। उछलने कूदने वाले का जीवन दुर्दिनों में, निष्फलता में व्यतीत होता है पर लक्ष वाला अपने जीवन को सुदिन बना लेता है।

लक्ष स्थिर करने में मनुष्य स्वतंत्र है। अज्ञानी मनुष्य मन की, इन्द्रियों की, भूख बुझाने में प्रसन्न रहते हैं। और ज्ञानी आत्मोन्नति के लिए, आत्मा की क्षुधा पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। अज्ञानी दृष्टि कोण के द्वारा चिन्ता, शोक, क्लेश, अशान्ति एवं पाप के दुर्दिन सामने खड़े रहते हैं और अज्ञानी दृष्टिकोण के द्वारा निर्भयता, प्रसन्नता शान्ति, यह दो ही मार्ग हैं एक प्रेय दूसरा श्रेय। एक प्रिय लगने वाला है दूसरा कल्याण देने वाला है। हिरण्यकश्यप, रावण, कंस, दुर्योधन, सरीखे प्रेय को लक्ष बनाते हैं, हरिश्चंद्र, शिवि, दधीच, मोरध्वज, प्रहलाद, ध्रुव, ईसा, गाँधी जैसे महापुरुष श्रेय को अपना लक्ष बनाते हैं। दोनों में से जो पसन्द हो उसे मनुष्य चुन सकता है। पर वेद भगवान उसी लक्ष को स्थिर करने की सलाह देते हैं जिससे दिनों को सुदिन बनाया जा सके। ऐसा लक्ष- श्रेय ही हो सकता है। श्रेय को अपनाने में ही कल्याण है, बुद्धिमानी है।

किसी भी वस्तु की प्राप्ति के लिए श्रम करना पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है। यदि नवजात बालक रोना चिल्लाना, और हाथ पाँव फेंकना छोड़ दे तो वह अपाहिज हो जाता है, उसका विकास रुक जाता है और शक्तियाँ बिदा हो जाती हैं। पथिक दिन भर मार्ग से लड़ता है, एक के बाद दूसरा कदम लगातार उठाता धरता रहता है तब कहीं आगे बढ़ पाता है। विद्यार्थी, बलार्थी, धनार्थी, यशार्थी, स्वार्थी, सभी को प्रयत्न, परिश्रम एवं संघर्ष करना पड़ता है। धरती का पेट चीर कर किसान अन्न उपजाता है, गहरा गड्ढा खोदने से पानी निकलता है, धातु को तपाने और कूटने से बर्तन आदि बनाते हैं। जीवन भी संघर्ष से बढ़ता है, जीवन विकास के लिए प्रयत्न और परिश्रम आवश्यक है। आत्म कल्याण के लक्ष को पूरा करने के लिए श्रम करना पड़ता है, कठिनाइयों से लड़ना पड़ता है। समुद्र मंथन से जैसे चौदह रत्न निकले थे श्रम द्वारा जीवन मंथन करने से भी भौतिक सम्पत्तियाँ और दैवी सम्पदाएं उपलब्ध होती हैं। इन सम्पन्नताओं के द्वारा मनुष्य बहुत आगे बढ़ जाता है, सफलता का मार्ग बहुत आसान हो जाता है।

लक्ष प्राप्ति के लिए यह संघर्ष किस प्रकार किया जाय? इस प्रश्न के उत्तर में श्रुति कहती है ‘पुनन्ति धीरा अपसो मनीषा’ धीरे पुरुष विवेक पूर्वक कर्मों को पवित्र कर लेते हैं। साधारण कर्मों को पवित्र कर्म बना लेना यह धीर पुरुषों के विवेक का कौशल है।

कोई भी काम न तो अपने आप में अच्छा है न बुरा। उसे जिस भावना से किया जाता है उसी के अनुसार वह भला बुरा बन जाता है। पानी रंग रहित है उसमें जैसा भी रंग डाल दिया जाय वह वैसे ही रंग का बन जाता है। इसी प्रकार समस्त कर्म, करने वाले की भावना के अनुसार भले बुरे बनते हैं। कई बार सदुद्देश्य के लिए विवेकपूर्वक, सद्भावना के साथ हिंसा, चोरी, असत्य, छल, व्यभिचार तक बुरे नहीं ठहरते। भगवान कृष्ण के तथा अन्य महापुरुषों के जीवन में इस प्रकार की घटनाएं मिल सकतीं हैं जब कि अनुचित कहे जाने वाले कर्मों को अपनाया गया हो, इसी प्रकार अविवेकपूर्वक या बुरे उद्देश्य से किये गये सत्कर्म भी बुरे हो जाते हैं। आततायी पर दया करना, हिंसक बधिक के पूछने पर पशु−पक्षियों का पता बताने का सत्य बोलना, कुपात्रों को दान देना आदि कार्यों से उलटा पाप लगता है। इसलिए कर्म के स्थूल रूप पर अधिक ध्यान न देकर उसकी सूक्ष्म गति पर विचार करना चाहिए।

दैनिक कामकाज जिन्हें आमतौर से सब लोग किया करते हैं, यदि उन्हें ही सद्भावना से, उच्च विचार से किया जाय तो वे ही यज्ञ रूप हो सकते हैं। परिवार का भरण पोषण यदि इस भावना के साथ किया जाय कि “भगवान ने इतने प्राणियों की सुरक्षा, उन्नति एवं व्यवस्था का भार मेरे ऊपर सौंपा है, इस ड्यूटी को सच्चे वफादार भक्त की तरह पूरी ईमानदारी से पूरा करूंगा। परिवार के किसी व्यक्ति को अपनी सम्पत्ति न समझूँगा बदले की किसी से कोई आशा न रखूँगा”। तो इसी उच्च भावना के कारण वह कुटुम्ब पालन, उतना ही पुण्य फल दायक बन जाता है, जितना कि उतने ब्राह्मणों का नित्य भोजन कराना, उतने अनाथों का पालन-पोषण करना, उतने निराश्रितों की सेवा करना, उतने अशिक्षितों का शिक्षित बनाना। चूँकि प्राणी भगवान की चलती फिरती प्रतिमा है। इसलिए इतने प्राणियों की सेवा व्यवस्था, देव मंदिर में भगवान की पूजा करने से किसी प्रकार कम महत्व की नहीं होती।

यही कुटुम्ब पालन यदि स्वार्थ की, मालिकी की, खुदगर्जी की, बदला प्राप्त होने की, अहंकार पोषण की भावना से होता है तो वह स्वार्थ साधन कहा जायगा और भावना की तुच्छता के कारण उसका फल भी वैसा ही होता है। व्यापार, कृषि, नौकरी, शिल्प, युद्ध, उपदेश, आदि व्यवसायों को यदि यह सोचकर किया जाय कि “इन कार्यों से संसार की सुख शान्ति में वृद्धि हो, सात्विकता बढ़े, मेरे कार्य, नर नारायण को प्रसन्न करने वाले और सन्तोष देने वाले हों” तो इन भावनाओं के कारण ही वह साधारण कार्य, पुण्यमय, यज्ञ रूप बन जाते हैं।

केवल कल्पना करने, या झूठ मूठ मन समझा लेने या किन्हीं शब्दों को मन ही मन दुहरा लेने को भावना नहीं कहते। सच्चा संकल्प, पक्का दृष्टिकोण और अटूट विश्वास मिलकर भाव बनता है। उच्च भाव से किये हुए कार्य उच्च, अच्छे, लाभदायक, सुदृढ़ एवं सात्विक होते हैं। उच्च भावना के साथ जिस कुटुम्ब का पालन किया गया है, उसमें राजा हरिश्चन्द्र के से स्त्री पुत्र निकलेंगे। व्यभिचारिणी स्त्री और अवज्ञाकारी पुत्र वहाँ मिलेंगे जहाँ कुटुम्ब पोषण तुच्छ विचारधाराओं के साथ किया जाता है। उच्च दृष्टिकोण वाला ब्राह्मण यजमान को ठगने की, मीन मेख लड़ाने की हिम्मत नहीं करता, उच्च दृष्टिकोण वाला क्षत्रिय किसी निर्बल या निरपराध की तरफ त्यौरी नहीं चढ़ा सकता। उच्च भावना वाला वैश्य घी में वेजीटेबल नहीं मिला सकता और न तमाखू की, गंदी पुस्तकों की, माँस मदिरा की दुकान खोल सकता है। जालसाजी से भरी हुई, कमजोर, नकली, मिलावटी, हानिकारक चीजें वह कितने ही बड़े प्रलोभन के बदले नहीं बेच सकता। अपने लाभ को वह ग्राहक के लाभ से अधिक महत्व नहीं दे सकता। शूद्र श्रम में चोरी नहीं कर सकता, हराम का पैसा उसे विष के समान कडुआ लगता है। खरी मजूरी देने में दूसरे लोग ढील करें इसे तो वह किसी प्रकार सहन कर सकता है पर चोखा काम में जरा भी ढील देकर वह अपनी आत्मा को कलंकित नहीं कर सकता। इस प्रकार उच्च दृष्टिकोण के साथ किये हुए काम, संसार के लिए बड़े लाभदायक होते हैं, उनसे लोक में सुख शान्ति की वृद्धि होती है। जिसका पुण्य, फल उन उच्च दृष्टिकोण वालों को मिलता है।

विचारों को उच्च बनाकर, भावनाओं को परमार्थमयी रखकर धीर पुरुष, विवेक द्वारा कर्मों को पवित्र कर लेते हैं। ऐसे पुरुषों के विचार और कार्य तो महान होते ही है साथ ही वे सुधी, उत्तम बुद्धि वाले, ब्रह्मपरायण, वाणी को भी दिव्य कामना से ही उच्चारण करते हैं। वाणी से कडुआ वचन, असत्य वचन, घमंड भरा वचन वे कदापि नहीं बोलते। जिस बात से विरोध, द्वेष, कलह, क्लेश, क्षोभ होता है, पाप करने को उत्तेजन मिलता हो, निराशा उत्पन्न होती हो, भय, भ्रम या लोभ बढ़ता हो, ऐसा वचन वे नहीं बोलते। किसी को ऐसी सलाह नहीं देते जिससे उसे तुरन्त तो कुछ क्षणिक लाभ हो जाय पर अन्त में दुख उठाना पड़े। सुधी लोग अपनी वाणी पर संयम रखते हैं। बेकार कतरनी सी जीभ चलाकर निष्प्रयोजन बकवास वे नहीं करते। भावना में जैसी शक्ति है वैसी ही शक्ति शब्द में भी है। इसलिए वे सोच समझकर मुँह खोलते हैं। निन्दा, चुगली से दूर रहते हैं। उनकी वाणी में प्रेम, प्रोत्साहन विनय, नम्रता, मधुरता, सरलता, सच्चाई एवं हित कामना भरी रहती है। थोड़ा बोलते हैं पर मधुर बोलते हैं। उनके मुँह से मोती झड़ते हैं, फूल बरसते हैं। सुनने वाले के कानों में मिश्री सी घुलती है। अमृत सा टपकता है। सुकरात कहा करते थे कि मुँह खोलते ही मनुष्य के अन्तः करण का भेद खुल जाता है। सचमुच वाणी के उच्चारण में पता चल जाता है कि बोलने वाला किस आत्मिक धरातल का है। जो महान आत्मा है, उसके मुख से नीच वचन नहीं निकल सकते।

पाठको फिर सुनो! वेद भगवान कहते हैं, मनुष्यों, तुम जीवन के दिनों को सुदिन बनाने के लिए उत्पन्न हुए हो, लक्ष स्थिर करो और उसकी प्राप्ति के लिए श्रम करो। उच्च भावनाएं रखकर अपने कर्मों को पवित्र बनाओ और दिव्य कामना से वाणी बोलो।

First 5 7 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • सत्य की अकूत शक्ति पर विश्वास कीजिए।
  • सद्ज्ञान का संचय करो।
  • देवता, मनुष्य और राक्षस
  • आसुरी प्रगति
  • मनुष्यता ही धर्म है।
  • लक्ष के लिए बढ़ो! जीवन को सफल बनाओ।
  • दुनिया में एकता पैदा करो।
  • प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं।
  • सब कुछ ब्रह्ममय है।
  • Quotation
  • मानसिक व्यभिचार से बचिए।
  • Quotation
  • पाप कर्म क्या क्या हैं?
  • उदार दृष्टिकोण की आवश्यकता
  • Quotation
  • स्वामी दयानंद का गायत्री प्रेम
  • आत्म-विकास का प्रथम सोपान
  • Quotation
  • आप भी समाधि लगा सकते हैं।
  • सम्मिलित कुटुम्ब के लाभ
  • Quotation
  • आम्र-कल्प
  • प्रत्यक्ष फलदायिनी योग की गुप्त शिक्षाएं
  • अवसर को मत चूकिए।
  • मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये
  • मनुष्य का शरीर है परोपकार के लिये
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj