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Magazine - Year 1947 - Version 2

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देवता, मनुष्य और राक्षस

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हमारे धर्मग्रन्थों में देवता, मनुष्य और राक्षसों का वर्णन मिलता है। उनका चित्र इस प्रकार खींचा गया है जिससे यह प्रतीत होने लगता है कि यह तीनों एक दूसरे से भिन्न जातियाँ हैं। देवताओं और राक्षसों का आकार प्रकार, निवास स्थान, बल-पुरुषार्थ तथा विचार कार्य मनुष्यों से भिन्न प्रकार का होने का उल्लेख मिलता है। इससे ऐसा लगता है कि यह कोई पृथक जातियाँ होंगी।

पर वस्तुतः ऐसा नहीं है। कवि ने अपनी कवित्वमयी भाषा में उनका वर्णन किया और चित्रकारों ने अपनी कल्पनाशीलता का अलंकारिक उपयोग करके उन्हें चित्रित किया है। देवताओं की असाधारण सूरत उनके आत्मिक सौंदर्य का प्रतिबिम्ब है और राक्षसों की आन्तरिक शैतानी को उनके चेहरे कुरूप, भयानक एवं घृणास्पद बनाकर उनकी बुरी शक्लें बनाई गई हैं।

वास्तव में यह तीनों ही मनुष्य होते हैं। गुण कर्म और स्वभाव के भेद से उन्हें तीन श्रेणियों में रख दिया गया है। चतुवर्ण्य वर्ण व्यवस्था की भाँति यह आदिकाल की वैदिक वर्ण व्यवस्था है। जब सामाजिक जीवन का अधिक विस्तार नहीं हुआ था तो व्यवसाय बाँटने की जरूरत न थी। सभी लोग प्रायः एक जैसे कार्यक्रम रखते थे। एक ही परिवार या एक ही व्यक्ति चारों वर्णों का काम कर लेता था, पर जब सामाजिक जीवन अधिक विस्तृत हो गया, जनसंख्या की वृद्धि, साधनों की अधिकता एवं वैज्ञानिक उन्नति की वृद्धि के कारण जब अनेकों समस्याएं, अनेकों काम बढ़ गये तो सुव्यवस्था की दृष्टि से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के काम अलग अलग वर्गों में बाँटने पड़े। इससे पूर्व जब इस प्रकार का विभाजन नहीं हुआ था, तो विचार एवं कार्यों के अनुसार मनुष्यों की श्रेणी होती थीं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे वंश परम्परा से होते थे। जैसे चोर, शराबी, व्यभिचारी, दयालु, दानी, विद्वान किसी नियत वंश में नहीं होते उसी प्रकार देवता, मनुष्य और राक्षस भी किसी विशेष वंश के नहीं होते थे, गुण, कर्म और स्वभाव के कारण अपने आप यह वर्गीकरण हो जाता था। उनमें परिवर्तन होने पर वह वर्ग भी बदल जाते थे।

देवता वे होते हैं जो दिया करते हैं। जिनका स्वभाव सात्विक होता है, जिन्हें सात्विक विचार एवं कार्य पसंद होते हैं। परोपकार, सेवा, सहायता, ज्ञानदान, सत्कर्मों की वृद्धि, गिरों को उठाना, सबको अपना समझना, प्राणिमात्र पर प्रेम करना, अपनी शक्तियों को अपने लिए कम से कम लाभ लेकर अधिकाँश को दूसरों को दे देना, लोक कल्याण में, जन सेवा में, दत्त-चित्त रहना, आत्मशुद्धि, संयम, तप, ईश्वराधन में अधिक रुचि रखना, भीतर और बाहर सुख शान्ति की वृद्धि करना यह देवताओं का काम था। अच्छे काम करने वालों पर वे आकाश से पुष्प बरसाते हैं इसका तात्पर्य यह है कि वे उन्हें प्रोत्साहन देते हैं। जीवित देवता शुभ कर्म करने वालों को मौखिक प्रोत्साहन एवं क्रियात्मक सहयोग देते हैं और स्वर्गीय-मरे हुए देवता-आकाश से, उनमें प्रेरणा एवं प्रोत्साहन भरते हैं। इस प्रकार के गुण कर्म स्वभाव वाले व्यक्ति देवता कहलाते हैं।

मनुष्य वह है जो अपनी मर्यादा पर स्थिर है जिसे अपनी आन, बान, शान का ज्ञान है। जो आत्म गौरव की, आत्म सम्मान की रक्षा के लिए नीच कामों में हाथ नहीं डालता, वचन पूरा करना, प्रतिज्ञा निबाहना, धर्म मर्यादा की रक्षा करना जिसे प्राणप्रिय होता है। पुरुषार्थ द्वारा जो समृद्धि उपार्जित करता है, साहस द्वारा जो यशस्वी बनता है, जो स्वयं निर्भय रहता है और दूसरों को अभय प्रदान करता है वह मनुष्य है। रजोगुण प्रधान होते हुए भी उसकी प्रगति सतोगुण की ओर होती है। मनुष्यता को कलंकित करने वाले विचारों, कार्यों और व्यक्तियों से लड़ने के लिए वह सदा तत्पर रहता है। एकता मेलजोल, सबकी बढ़ोतरी उसे पसंद होती है। इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ जिसमें प्रधान हों उसे मनुष्य कहते हैं।

असुर वे हैं-जिनको अपना स्वार्थ ही सर्वोपरि है। अपने लाभ के लिए जो दूसरों की हानि की परवा नहीं करते, कभी कभी तो अपना लाभ न होते हुए भी अकारण दूसरों को सताते हैं, हिंसा, हत्या, निष्ठुरता, क्रूरता, शोषण, उत्पीड़न, अन्याय, एवं अत्याचार करने में जिन्हें आनन्द आता है। अहंकार में डूबे रहते हैं। आलस्य, प्रमाद एवं मनोरंजन में जिन्हें प्रीति होती है। कामवासना की असीम तृष्णा में जो रात दिन डूबे रहते हैं। जिह्वा का चटोरापन बेकाबू होता है। वे भक्ष अभक्ष की परवा न करके स्वाद को प्रधानता देते हैं। धर्म की ओर, आत्मचिन्तन की ओर, स्वाध्याय सत्संग की ओर जिनकी जरा भी रुचि नहीं होती। बड़ों की अवज्ञा करना जिन्हें सुहाता है। कृतघ्नता, छल, विश्वासघात, मलीनता, दुष्टता उनकी विशेषता होती है। न स्वयं चैन से बैठते हैं और न दूसरों को चैन से बैठने देते हैं। तमोगुण के अज्ञानान्धकार में उनका अन्तःकरण सदा अच्छादित रहता है। धन संचय करके सोने की लंका बनाने की धुनि उन्हें सताती रहती है।

उपरोक्त तीन प्रकार के मनुष्यों को देवता, मनुष्य और राक्षस कहा गया है। यह श्रेणियाँ प्राचीन समय में भी होती थीं और आज भी हैं। पूर्वकाल में राक्षस थोड़े थे, उन्हें खदेड़ते खदेड़ते भारत के अन्तिम कोने लंका में-पहुँचा दिया था। पर आज तो चारों ओर राक्षस ही राक्षस फैले दीखते हैं। हमें चाहिए कि असुरत्व का विनाश कर मनुष्यता की स्थापना करें और देवत्व को बढ़ावें।

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