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Magazine - Year 1947 - Version 2

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सम्मिलित कुटुम्ब के लाभ

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First 19 21 Last
मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसे दूसरों के साथ साथ रहना स्वभावतः पसंद है। जेलखाने में जाकर भी कुछ अपराध करने वालों को कुछ समय ‘एकान्तवास’ की सजा दी जाती है। अकेला रहने पर कैदी बड़ा कष्ट अनुभव करता है और उस कष्ट के डर से फिर वैसा नहीं करता। हम देखते हैं मेले ठेले, उत्सव, समारोह देखने के लिए स्त्री-पुरुष, बाल-वृद्ध, सभी उत्सुक रहते हैं। हम देखते हैं कि देहाती लोग देहात छोड़ छोड़ कर शहर में बसते जा रहे हैं। इन सब बातों से पता चलता है कि अधिक लोगों के समूह के साथ रहना मनुष्य को स्वभावतः प्रिय है। सामूहिक प्रार्थना, संकीर्तन, संगीत, सेना, बरात, जुलूस, उत्सव, प्रीतिभोज आदि अधिक व्यक्तियों के सम्मिलित कार्य में साथ रहने की इच्छा लोगों के मन में स्वयमेव उठा करती है। इस जन्म जात प्रकृति से प्रेरित होकर ही मानव जाति सामूहिक रूप से रहने के लिए तैयार हुई। दूर-दूर झोंपड़े बनाने की बजाय पास-पास घर बनाकर ग्राम या नगर बसाने की प्रणाली को इसीलिए स्वीकार किया गया। पास-पास रहने, साथ-साथ रहने का सिद्धान्त मानव प्रकृति के सर्वथा अनुकूल है।

इसी प्रकृति प्रेरणा से प्रेरित होकर सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा का प्रचलन हुआ है। एक साथ मिलजुल कर रहने से कुटुम्ब के हर एक सदस्य का व्यक्तिगत लाभ भी है और सामूहिक लाभ भी। आर्थिक दृष्टि से, धार्मिक दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा लाभदायक ही है।

आर्थिक दृष्टि से विचार कीजिए तो धन की किफायत होती है और सम्पन्नता बढ़ती है। अलग-अलग रहने पर अलग-अलग चूल्हे जलते हैं, दीपक जलते हैं, बुहारी, कंघे, शीशे, चौके के बर्तन, आदि की अलग-अलग आवश्यकता होती है, पर साथ रहने से एक से ही काम चल जाता है। चार भाई एक मकान में रहें तो एक मकान में काम चल सकता है पर अलग रहने पर चार मकान चाहिए। चार कमरे, चार बैठक, चार जोड़ी फर्नीचर, फर्श तथा तस्वीरें चाहिए। अतिथियों के लिए फालतू पलंग, बिस्तर फिर सबको अलग-अलग रखने पड़ते हैं। कहार, मेहतर, रसोइया, चौकीदार आदि का खर्च भी बढ़ जाता है। चार भाइयों के सम्मिलित रहने में यदि दो सौ रुपया मासिक खर्च होता था तो अलग हो जाने पर चार सौ रुपया मासिक जरूर हो जायगा। कितनी ही फिजूल खर्ची जो सम्मिलित होने पर रुकी रहती थी, अलग होने पर बढ़ने लगती है। ‘जो मैं चाहता हूँ वह सबको भी होना चाहिए-सब के लिए वह व्यवस्था करने में बहुत खर्च पड़ेगा, केवल मेरे लिए ही वह वस्तु होने पर दूसरों को बुरा लगेगा’ यह सोचकर घर के सब लोग अपनी आवश्यकताएं कम रखते हैं पर यह नियंत्रण उठते ही खुले हाथों खर्च होने लगता है।

इस प्रकार जहाँ खर्च में किफायत होती है वहाँ सम्पन्नता बढ़ती है। किफायत वाले रुपये बचते हैं। सम्मिलित श्रम में लाभ भी अधिक होता है। घर के विश्वस्त आदमी मिलकर कारोबार में जितना लाभ कर सकते हैं उतना नौकरों द्वारा नहीं हो सकता। सब की कमाई इकट्ठी जमा होने से पूँजी बढ़ती है। अर्थशास्त्र का अकाट्य नियम है, “अधिक पूँजी से अधिक लाभ” जैसे किसी काम में एक हजार रुपये की पूँजी लगाई जाती है तो दस प्रतिशत लाभ होता है पर यदि उसी में दस हजार की पूँजी लगा दी जाय तो पन्द्रह प्रतिशत लाभ होने लगेगा। सबकी कमाई एक जगह जमा होने से परिवार की सम्पन्नता निश्चित रूप से बढ़ जाती है।

मानसिक दृष्टि से विचार कीजिए तो एक साथ रहने में मनोरंजन रहता है, तबीयत लगी रहती, चित्त ऊबता नहीं बच्चों की तोतली बोली, माता का वात्सल्य, भाई बहिनों का सौहार्द, पत्नी का प्रेम, जैसे विविध भावों का एक रुचिकर थाल सामने आता है जिसे खाकर मानसिक क्षुधा तृप्त हो जाती है। पत्नी को लेकर अलग हो जाने वाले लोग इन षट्रस मानसिक व्यंजनों से वंचित रह जाते हैं। छोटे बच्चों का खेलना, बड़े बच्चों का पढ़ना, लड़कियों का काढ़ना बुनना, स्त्रियों का गाना बजाना, गृह कार्य करना, गृहपति का आगन्तुकों से वार्तालाप, वृद्धाओं की धर्मचर्चा एवं कहानियाँ, किसी में प्रेम, किसी में चख चख, यह सब मिलकर अपना कुटुम्ब एक अच्छा मनोरंजन गृह बन जाता है।

आपत्ति से सुरक्षा के लिए सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा एक बहुत बड़ी गारंटी है। स्त्रियों के शील सदाचार की रक्षा के लिए यह एक ढाल के समान है। बीमार पड़ जाने पर इतने आदमी तीमारदारी के लिए तैयार रहते हैं और रोग मुक्ति का उपाय करते हैं। वृद्धावस्था आराम से कट जाने का संतोष रहता है। अपाहिज या अशक्त हो जाने पर भी इस आश्रय का विश्वास रहता है। मृत्यु हो जाने पर स्त्री, बच्चों का पालन पोषण हो जाने की निश्चिन्तता रहती है। विधवाओं का जीवन ऐसे भरे पूरे घरों में आसानी से कट जाता है। क्या यह सब सुविधाएं पृथक रहने की दशा में संभव हैं?

बच्चे साथ-साथ खेलते कूदते हैं, हंसते बात करते हैं, खाते-पीते हैं, उनका शारीरिक और बौद्धिक स्वास्थ्य दिन दिन बढ़ता है। परिवार का हर सदस्य अपने से बड़े से कुछ न कुछ सीखता है। यह कारण है कि भरे पूरे कुटुम्बों की, अच्छे खानदान की लड़कियाँ प्रायः चतुर सुलक्षणी, सभ्य और व्यवहार कुशल निकलती हैं। माँ बाप की अकेली संतान, खासतौर से लड़की यदि बड़े परिवार से पृथक प्रायः अकेली माँ बाप के साथ रहती है तो वह गृह संचालन में प्रायः बहुत ही कम सफल होती है। नयी उम्र के पति−पत्नी अकेले रहने की दशा में फिजूल खर्ची असंयम आदि दोषों में फंस जाते हैं और उनकी दिनचर्या में वैसी ही नीरसता आ जाती है जैसी केवल मिठाई या केवल नमक खाने पर आती है।

सम्मिलित कुटुम्ब सामाजिक दृष्टि से अधिक प्रतिष्ठित माना जाता है। चार आदमियों की सम्मिलित जनशक्ति को देखकर दुश्मन डरते हैं, मित्र आकर्षित होते हैं। प्रतिष्ठा बढ़ती है। सम्मिलित शक्ति के स्वामित्व का बल घर के हर सदस्य को रहता है। हर सदस्य समझता है कि किसी ने मेरा अपमान किया तो समस्त परिवार की जनशक्ति उससे बदला चुका लेगी। बीस आदमियों के कुटुम्ब की सब शक्ति का अन्दाज मान लीजिए एक मन है तो वैसे प्रथक पृथक हर एक का बल एक एक मन समझा जाता है इस प्रकार हर एक को बीस गुनी शक्ति का लाभ अनायास ही मिल जाता है। पृथक रहने पर तो मनुष्य की जो वास्तविक शक्ति होती है उससे भी कम जंचने लगती है। दूसरे आदमी समझते हैं कि “अपनी निजी आवश्यकताओं से इसके पास समय, बल तथा धन कम ही बचता होगा। इसके द्वारा वह किसी को हानि−लाभ न पहुंचा सकेगा।” इस मान्यता के आधार पर वह व्यक्ति वास्तविक स्थिति से भी छोटा समझा जाने लगता है। ऐसी स्थिति में देश या समाज की सेवा के लिए, कोई बड़ा त्याग करने के लिए भी वह व्यक्ति तत्पर नहीं हो पाता यदि हो भी उसे स्वयं तो बड़ी चिन्ता रहती है और उसके आश्रितों की कठिनाई का ठिकाना नहीं रहता।

धार्मिक दृष्टि से- माता, पिता, बड़े भाई, सास, ननद, जिठानी आदि के प्रति जो कर्त्तव्य है वह सम्मिलित कुटुम्ब में रहकर ही निभाया जा सकता है। बड़े का सत्कार, सेवा, आदर तभी तो हो सकता है जब उनके साथ रहें। बड़े भी अपने अनुभवों का लाभ छोटों को उसी दशा में दे सकते हैं। जिन बड़ों ने एक बालक को गोदी में खिलाया और एक युग तक बड़ी बड़ी आशाएं रखीं, वह समर्थ होते ही अलग हो जाता है तो उन्हें आघात लगता है, यह एक कृतघ्नता है। ऐसी कृतघ्नता को अपनाने पर मनुष्य अपने सहज धर्म लाभ से, कर्त्तव्य पालने से वंचित रह जाता है। परिवार को अपना धर्म क्षेत्र, कर्म क्षेत्र मानकर जो उसके द्वारा प्रभु पूजा करते हैं वे आत्म लाभ कर सकते हैं। हम अपनी “गृहस्थ योग“ पुस्तक में सविस्तार बता चुके हैं कि कुटुम्ब को परमात्मा का सौंपा हुआ एक बगीचा मान कर उसकी रखवाली, उन्नति तथा समृद्धि के लिए जो व्यक्ति एक ईमानदार माली की तरह अपना कर्त्तव्य पालन करते हैं वे एक प्रकार की योग साधना ही करते हैं और योग के फल को प्राप्त करते हैं। अपने निजी सीमित स्वार्थ की दृष्टि को विस्तृत करके जब मनुष्य उसे स्त्री, पुत्र, पौत्र, परिजन आदि में फैलाता है, तब वह अहंभाव का विस्तार द्रुतगति से होने लगता है। फिर ग्राम, देश, विश्व से बढ़कर वसुधैव कुटुम्बकम् की उसकी दृष्टि हो जाती है और सब कुछ अपना-आत्मा का, परमात्मा का दीखने लगता है, यही जीवन मुक्ति है।

इस प्रकार सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा में हर प्रकार लाभ ही लाभ हैं। पर खेद के साथ हमें स्वीकार करना पड़ता है आज अधिकाँश सम्मिलित कुटुम्ब कलह और मनोमालिन्य के घर बने हुए हैं- इसके कारण और निवारण पर अगले अंक में विचार करेंगे।

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