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Magazine - Year 1947 - Version 2

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प्रसन्न रहने से सब दुख दूर हो जाते हैं।

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प्रसादे सर्व दुःखानाँ हानि रस्योपजायते।

प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धि पर्यवतिष्ठते॥ गीता ॰ 2 /65

अर्थात्- चित्त प्रसन्न रहने से उसके सब दुख दूर होते हैं और प्रसन्न चित्त होने से उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

प्रसन्न चित्त रहने से दो लाभ हैं (1) सब दुख दूर हो जाते हैं और (2) बुद्धि स्थिर होती है। सुखी आदमी का चित्त प्रसन्न रहता है। इसी बात को हम यों भी कह सकते हैं कि प्रसन्न चित्त मनुष्य सुखी होते हैं। सुख और चित्त की प्रसन्नता का आपस में अनन्य सम्बन्ध है। कई आदमी सोचते हैं कि जिसके पास साधन है वह सुखी रहता है और सुखी रहने से उसे प्रसन्नता होती है। पर सही बात यह है कि प्रसन्न रहने से सुख मिलता है और सुखी के पास साधनों की कमी नहीं रहती।

हंसोड़ आदमी मोटे देखे जाते हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि मोटे होने की खुशी में हंसी आती है। पर सच्ची बात यह है कि वे हंसते स्वभाव के कारण मोटे हो जाते हैं। प्रसन्नता एक जादू भरी साधना है उसमें चतुर्मुखी सिद्धियाँ मिलती हैं। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक, चारों प्रकार के दुख दूर करने में और इन चारों दिशाओं में उन्नति एवं समृद्धि प्राप्त करने में प्रसन्नता एक अचूक ब्रह्मास्त्र है।

नस नाड़ियों में खून का दौरा भली प्रकार होता है, गर्मी पर्याप्त मात्रा में रहती है। माँस पेशियों में चैतन्यता और फुर्ती भरी रहती है। हंसते रहने से जबड़े, कंठ, श्वांस नाड़ियों और फेफड़े का और पेट का अच्छा व्यायाम होता रहता है। विशेष व्यायामों में तो किन्हीं अंगों पर थोड़ी देर के लिए बहुत दबाव पड़ता है पर हंसने से धीरे धीरे मालिश की तरह भीतरी अंगों का हलका व्यायाम होता रहता है। फलतः उनकी शक्ति बढ़ती है। हंसोड़ आदमियों के फेफड़े, जिगर तिल्ली एवं गुर्दे विशेष रूप से मजबूत पाये जाते हैं। साधारण साँस लेने से फेफड़े का आधा भाग क्रियाशील रहता है आधा भाग निष्क्रिय पड़ा रहता है। इस निष्क्रिय भाग में खाँसी, श्वांस, क्षय आदि के रोग कीटाणु घुस जाते हैं और निर्विरोध रूप से अपनी वंशवृद्धि करते हुए उस व्यक्ति को मृत्यु के मुँह में घसीट ले जाते हैं। परन्तु हंसने से फेफड़ों का समस्त भाग हिलता है, इस हलचल से उनकी सफाई भली प्रकार हो जाती है जिसमें उन रोग कीटों की दाल नहीं गलने पाती। अप्रसन्न, निराश, दुखी, शोकग्रस्त, क्रोधी, ईर्ष्यालु स्वभाव के मनुष्यों का स्वास्थ भट्टी में पड़ी हुई लकड़ी की भाँति जल जाता है पर जो प्रसन्न चित्त हैं, वे इस विपत्ति से बचे रहते हैं। सही कारण है कि खुश मिज़ाज आदमी प्रायः दीर्घ जीवी होते हैं। बीमारी और अकालमृत्यु उन्हें परास्त करने में प्रायः बहुत ही कम सफल होती है।

मन का, मस्तिष्क का नाश करने में अप्रसन्नता से बढ़कर और कोई घातक वस्तु नहीं है। जिसका चित्त किसी न किसी कारण से दुखी ही बना रहता है, जो आशंका, भय, असफलता से चिन्तित रहते हैं, जिन्हें द्वेष, कुढ़न, शोक, आवेश, उद्वेग घेरे रहते हैं, जो अहंकार से गरदन फुलाये रहते हैं, सीधे मुँह किसी से बात करना जिन्हें सुहाता नहीं, ऐसे बदमिजाज आदमी अपने दुःस्वभाव के कारण अपनी मानसिक शक्तियों का सत्यानाश करते रहते हैं। उनमें से अधिकाँश को तरह तरह की सनक सवार हो जाती है। कितने अर्ध विक्षिप्त होते हैं और कई तो बिल्कुल पागल हो जाते हैं। ऐसे लोगों को अनिद्रा, मधुमेह, बवासीर दस्त साफ न होना, जिगर बढ़ जाना, मुँह से बदबू आना, दांतों में मवाद जाना, रक्त की कमी, दिल की धड़कन, खुश्की, खुजली, मुँह में छाले जैसे रोग हो जाते हैं और कितना ही इलाज करने पर भी जड़ से नहीं जाते। मानसिक उद्वेगों के कारण रक्त के श्वेत कीटाणु अशक्त हो जाते हैं। फलस्वरूप शरीर की रोग निरोधक शक्ति में शिथिलता आ जाती है। हड्डियों के भीतर की मज्जा सूख जाती है, नसें सख्त पड़ जाने के कारण पैरों में हड़फूटन होती रहती है।

अप्रसन्न, रहने वाले, मानसिक अशान्ति से घिरे रहने वाले लोगों का वीर्य निःस्वत्व हो जाता है। उन्हें सुसंतति प्राप्त करने का सौभाग्य नहीं मिलता या तो संतान होती ही नहीं, होती है तो निर्बल, रोगग्रस्त, अपूर्ण होती है। इनमें भी पुत्र की अपेक्षा कन्याएं ही अधिक होती हैं। इन बालकों को सूखा, पीलिया, दस्त अधिक होना, पेट बढ़ जाना, आँखें दुखना जैसे निर्बलता जन्य रोग घेरे रहते हैं। वे बहुत दिन में खड़े होने और बोलने की सामर्थ्य प्राप्त कर पाते हैं। ऐसे बालक बहुधा बचपन में ही मर जाते हैं, अगर किसी प्रकार माता मसानी पर से बच भी गये तो बड़े होने पर मूर्खता, आलस्य, व्यसन आदि दुर्गुणों से घिरे रहते हैं। चिन्ताग्रस्त, खिन्न मानस, माता पिता को सुसंतति से प्रायः वंचित ही रहना पड़ता है।

इस प्रकार मानसिक असंतुलन में अपना शरीर घुलता है और भावी संतति का ह्रास होता है। परन्तु जो लोग प्रसन्न रहते हैं, हंसमुख एवं खुशमिज़ाज रहते हैं वे सहज ही इन आपत्तियों से बच जाते हैं। इतना ही नहीं उनका स्वास्थ्य दिन दिन अच्छा होता रहता है। एक आदमी एक एक गज रोज नीचे उतरे और दूसरा आदमी एक एक गज रोज ऊपर चढ़े तो उन दोनों में नित्य की चाल की अपेक्षा दूना अन्तर होता जायगा। अप्रसन्न रहने वालों और प्रसन्न रहने वालों के बीच में नित्य दूना अन्तर पड़ता जाता है। एक दिन दिन नीचे गिरता है, दूसरा दिन दिन ऊपर चढ़ता है। प्रसन्न रहने वाले की मानसिक शक्तियाँ-जिज्ञासा, कल्पना, इच्छा, व्यवस्था, आशा एवं श्रद्धा शनैः शनैः मजबूत होती जाती है और वह प्रतिदिन अधिक मनस्वी बनता जाता है।

प्रसन्न रहने से सामाजिक उन्नति भी होती है। हंसता चेहरा एक प्रकार का फूल है जिसे देखकर दर्शकों का मन अनायास ही उस ओर खिंच जाता है। उसके संपर्क में आने के लिए, उसकी मित्रता पाने के लिए, सभी का मन ललचाता है। कहते हैं कि हंसने वाले के मुँह से मोती झड़ते हैं और फूल बरसते हैं। इस दैवी उपहार को समेटने का लोभ भला कौन संवरण कर सकता है? जिससे थोड़ी देर भी उसकी बातें हो जाती हैं वही उसका स्नेही बन जाता है। अनेक व्यक्तियों की सहानुभूति, घनिष्ठता में भी एक बहुत बड़ा बल है जिनके द्वारा साधारण मनुष्य बड़ी उन्नति कर जाते हैं। बिना दूसरों की सहायता के केवल मात्र अपने पुरुषार्थ से हमारी जीवन यात्रा आगे नहीं बढ़ सकती। समृद्धि की शिला सामाजिक सहयोग पर रखी होती है। दूसरों का सहयोग प्राप्त करने के साधनों में प्रसन्न रहना, सबसे महत्वपूर्ण कारण है। हंसमुख को बिना माँगी सहायताएं प्राप्त होती रहती हैं।

प्रसन्नमुख मुद्रा, प्रमाणिकता की साक्षी देती हैं। जो स्थिर चित्त है, जो सुखी है, जो सफल है, जो संतुष्ट है वह प्रसन्न रहेगा अथवा जो प्रसन्न रहेगा उसमें यह चारों बाते होंगी। यह चारों सम्पदाएं जिनके पास हैं वह निश्चय ही बुद्धिमान, गम्भीर, विश्वसनीय, साहसी, कुशल एवं सुयोग्य समझा जाता है। प्रसन्न रहना देखने में मामूली बात है पर उसके पीछे अनेकों मौन रहस्य छिपे होते हैं। यह रहस्य सामने वाले के ऊपर अपनी छाप छोड़े बिना नहीं रहते। इन तथ्यों के आगे सामने वाले को नत मस्तक होना पड़ता है, यही कारण है कि प्रमुदित रहने वाले से शत्रुता रखने वाले मुश्किल से ही कहीं दृष्टिगोचर होते हैं। घर में, दफ्तर में, देश में, परदेश में, बाजार में, राजदरबार में, विद्वानों में, मूर्खों में हर जगह उसका आदर होता है। हर जगह उसे सहयोग मिलता है। वह अपने आप नेता होता है, उसके प्रभाव से अनेकों को उसका अनुयायी बनना पड़ता है।

शारीरिक, मानसिक और सामाजिक मजबूती होने का फल आर्थिक उन्नति के रूप में अपने आप सामने आता है। जो शरीर से कड़ी मेहनत कर सकता है, जो शान्त चित्त से एकाग्रतापूर्वक सही बात सोच सकता है, जिसे दूसरे लोग प्यार करते हैं और सहयोग देते हैं उसकी आर्थिक उन्नति होनी अवश्यम्भावी है। ऐसा आदमी, व्यापार, नौकरी, उत्पादन, जो भी अर्थ उपार्जन का मार्ग अपनावेगा उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। जो सुयोग्य है, उसे भूखों न मरना पड़ेगा। कोई आपत्ति भी आ जाय तो अपनी योग्यताओं द्वारा वह उसे हटाकर पुनः खोये हुए वैभव को प्राप्त कर लेगा। जब सब लोग हंसमुख का सहयोग करते हैं तो फिर भली लक्ष्मी सहयोग क्यों न करेगी?

गीता का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि प्रसन्न रहने से सब प्रकार के दुखों का नाश हो जाता है। शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक सब प्रकार के दुःखों का इस एक ही ब्रह्मास्त्र से नाश हो जाता है। इसलिए जो लोग दुःखों से छुटकारा प्राप्त करके सुखी रहना चाहते हैं उन्हें उचित है कि अपने स्वभाव को हंसमुख बनावें। यह सोचना भूल है कि जिसके पास, धन, स्त्री, पुत्र, विद्या, स्वास्थ्य आदि साधन हैं, जो सम्पन्न है वह प्रसन्न रहेगा। हम देखते हैं कि इन सम्पदाओं से भरे पूरे असंख्यों मनुष्य मौजूद हैं पर उन्हें इन वस्तुओं के कारण सुख मिलने के कारण दूनी चिन्ताएं आ घेरती हैं। अनेकों नई समस्याएं, नई अड़चनें, नई बाधायें उनके सामने आती रहती हैं, एक जब तक गई नहीं कि दूसरी नई दस गुत्थियाँ सामने आ जाती हैं। इस प्रकार उसकी अशान्ति, अप्रसन्नता अपेक्षाकृत और भी अधिक बढ़ जाती हैं।

अधिक साधन होने से कोई सुखी नहीं हो सकता। सुख का हेतु दूसरा है जो गीता के उपरोक्त श्लोक के अन्तिम भाग में बता दिया गया है। प्रसन्न चित्त होने से तत्क्षण बुद्धि स्थिर हो जाती है। इसी को यों भी कह सकते हैं कि बुद्धि स्थिर होने से तत्क्षण मनुष्य प्रसन्न चित्त रहने लगता है। बुद्धि को, संसार की पंचभौतिक, नश्वर चीजों के लोभ में उछलने, कूदने से रोककर आत्म परायणता में लगा देने से वह स्थिर हो जाती है और इस स्थिरता के साथ ही प्रसन्नता का अजस्र स्त्रोत प्रवाहित होने लगता है। आत्मा के लाभ के जीवन का एकमात्र लाभ समझकर कर्त्तव्य परायण होने से हर कार्य में एक अद्भुत आनन्द आने लगता है। अस्थिर बुद्धि वाला, साँसारिक, अस्थिर पदार्थों को भोगने एवं जाम करने के फेर में पड़ा रहता है और पानी की लहरें पकड़ने के समान बार बार असफलता पर खीजता रहता है, पर स्थिर बुद्धि वाला, केवल मात्र अपने कर्त्तव्य पर ध्यान देता है, अपने धर्म को, उत्तरदायित्व को पूरी सावधानी के साथ निवाहता है। इस कार्य प्रणाली में सफलता हर घड़ी अपने हाथ में रहती है। मैं अपना कर्त्तव्य ठीक प्रकार पालन कर रहा हूँ, इस सफलता पर वह हर घड़ी प्रसन्न रहता है, हर घड़ी आत्म सन्तोष का अनुभव करता है।

परमात्मा के पुनीत उद्यान में, संसार में खेलने का जिसे अवसर मिला हुआ है, उसे हर घड़ी प्रसन्न रहना चाहिए। काले-सफेद, भले-बुरे, प्रिय-अप्रिय तथ्यों से भरा हुआ संसार कितना सुन्दर है इसे देखकर उसका हृदय कमल खिल जाता है। अच्छाइयों का मधुर स्पर्श करना और बुराइयों से लड़ना यह उभय पक्षीय कार्यक्रम सामने रखकर मानों भगवान ने मीठे और तीखे षट्रस व्यंजन हमारे जीवन थाल में परोसे हैं, उनके विविध स्वादों का विविध प्रकार का अनुभव करते हुए हमें उसी प्रकार आनंदित होना चाहिए जैसे स्वादिष्ट षट्रस व्यंजनों का आस्वादन करते हुए हम प्रसन्न होते हैं। सुख-दुख, गरीबी-अमीरी, आनन्द-क्लेश, भाव-अभाव अपने-अपने ढंग के व्यंजन हैं। यही सभी अपने अपने ढंग से स्वादिष्ट हैं। एक से दूसरे का महत्व है। विरोधी भाव न हो तो हर एक वस्तु नीरस हो जाय। दिन का महत्व रात के कारण होता है यदि रात न हो तो दिन के आनन्द का अनुभव ही न हो, इसी प्रकार सुख का आनंद दुख से है। दुख न हो तो जिन बातों में आज सुख समझा जाता है, फिर न समझा जा सकेगा। संसार की, जीवन की, हर स्थिति हमारे लिए मंगलमयी, आनंददायक है। स्थिति के अनुकूल अपने को बदलकर हर अवस्था में अपने को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

गीता कहती है सम्पूर्ण दुखों के निवारण का उपाय, प्रसन्न रहना है। हर वक्त, हर स्थिति में मुस्कुराते रहिए, निर्भय रहिए, निश्चित रहिए, कर्त्तव्य करते रहिए और प्रसन्न रहिए। पाठकों! बुद्धि को स्थिर करो और प्रसन्न रहो।

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