• News
  • Blogs
  • Gurukulam
English हिंदी
×

My Notes


  • TOC
    • शास्त्र-मंथन का नवनीत
    • आदर्श जीवन
    • आदर्श जीवन
    • ब्रह्मचर्य पर देववाणी
    • ब्रह्म की सर्वव्यापकता
    • भारतीय दर्शन-शास्त्र का उद्देश्य
    • Quotation
    • आत्म विस्तार में ईश्वर का साक्षात्कार
    • Quotation
    • महापुरुषों द्वारा गायत्री महिमा का गान
    • Quotation
    • जीवन संग्राम की तैयारी कीजिए।
    • कोरी बात नहीं, कुछ काम भी कीजिए।
    • मनुष्य का जीवनोद्देश्य कैसे प्राप्त हो?
    • Quotation
    • आपका मानसिक स्वास्थ्य ठीक है या नहीं?
    • गरीब देश की अमीर सरकार!
    • जीवन विधिपूर्वक जीना चाहिए।
    • VigyapanSuchana
    • भक्ति प्राप्ति की सात साधनाएं?
    • प्राण घातक क्षय रोग
    • व्यापारियों के लिए कुछ काम की बातें
    • महात्मा गाँधी की अमर वाणी
    • भारतीय मानवों से
    • भारतीय मानवों से
  • My Note
  • Books
    • SPIRITUALITY
    • Meditation
    • EMOTIONS
    • AMRITVANI
    • PERSONAL TRANSFORMATION
    • SOCIAL IMPROVEMENT
    • SELF HELP
    • INDIAN CULTURE
    • SCIENCE AND SPIRITUALITY
    • GAYATRI
    • LIFE MANAGEMENT
    • PERSONALITY REFINEMENT
    • UPASANA SADHANA
    • CONSTRUCTING ERA
    • STRESS MANAGEMENT
    • HEALTH AND FITNESS
    • FAMILY RELATIONSHIPS
    • TEEN AND STUDENTS
    • ART OF LIVING
    • INDIAN CULTURE PHILOSOPHY
    • THOUGHT REVOLUTION
    • TRANSFORMING ERA
    • PEACE AND HAPPINESS
    • INNER POTENTIALS
    • STUDENT LIFE
    • SCIENTIFIC SPIRITUALITY
    • HUMAN DIGNITY
    • WILL POWER MIND POWER
    • SCIENCE AND RELIGION
    • WOMEN EMPOWERMENT
  • Akhandjyoti
  • Login





Magazine - Year 1949 - Version 2

Media: TEXT
Language: HINDI
SCAN TEXT


जीवन संग्राम की तैयारी कीजिए।

Listen online

View page note

Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
×

Add Note


First 11 13 Last
(अनु.- श्री रामखेलावन चौधरी बी.ए.)

मनुष्य का बचपन सावन की हरियाली है। उसमें चिंता नहीं, विकार नहीं और कर्त्तव्य का बंधन भी नहीं। बचपन का अंत मानो फूलों की सेज पर शयन करने के आनन्द की समाप्ति है। युवावस्था आते ही- मैं क्या बनूँगा?- यह एक प्रश्न दिन-रात प्रत्येक युवक की आँखों के सामने घूमा करता है। उसके माता-पिता और अभिभावकों के आगे यह समस्या आ जाती है कि- हम उसको क्या बनाये? युवावस्था को ‘मस्ती’ जैसे शब्दों की व्याख्या करना एक भयानक भूल है- संसार के निष्ठुर सत्य का सामना इसी समय करना पड़ता है। युवावस्था एक संग्राम है और युवक की एक भूल असफलता का कारण बन सकती है। युवावस्था शतरंज के खेल की भाँति ‘खेल’ कही जा सकती है पर यह याद रखना चाहिए कि एक गलत चाल से ही ‘जान’ का खतरा भी पैदा हो जाता है।

सम्भव है इस बात की गम्भीरता का अनुभव लक्ष्मी के कुछ वरद पुत्र न कर सकें। उनका ऐसा करना कुछ अनुचित भी नहीं मगर साधारण करोड़ों युवकों के लिए इसके महत्व को हृदयंगम कर लेना अति आवश्यक है। संग्राम में उतरने के पूर्व युद्ध कौशल के तत्वों की जानकारी आने वाली पराजय को विजय बना सकती है।

एक नवयुवक साहसी व्यक्ति को अपनी सफलता के लिए अपने शरीर और मन के स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए वह जान लेना जरूरी है कि वह जितना बड़ा बोझ अपने कंधों पर उठाने जा रहा है, उसके ढोने की शक्ति उसकी है या नहीं। बोझा ढोने में मनुष्य की लगन बड़ी सहायक होती है। चींटी अपने से बीसियों गुना भार उठा ले जाती है, क्योंकि उसमें सच्ची लगन है और अध्यवसाय है। वकील बनने की क्षमता रखने वाला, यदि रसायन शास्त्री बनने का प्रयत्न करे, तो इसे अपनी प्रतिभा का नष्ट करना ही कह सकते हैं। एक जन्मजात गायक कभी भी शेयर बाजार में सफल नहीं हो सकता। जिसमें अदम्य साहस है, जो प्रत्येक स्थिति पर काबू पा लेता है और जो बिखरी शक्तियों को एक में समन्वित कर लेता है, वह दैनिक जीवन में चमक सकता है। इस बात में सभी विद्वान सहमत हैं कि यदि सूर्य के रथ को खींचने वाले द्रुतगामी घोड़ों को बैलगाड़ी में जोत दिया जाय, तो इससे बढ़कर मूर्खता की दूसरी बात हो ही नहीं सकती। इसलिए युवक को चाहिए की वह अपनी आत्मा को पहचाने और संरक्षकों तथा माता-पिता का सबसे बड़ा काम यही है कि उसे केवल इतनी सहायता दे जिसमें उसे अपनी शक्तियों का बोध अच्छी तरह हो जाय। अभिभावकों की अदूरदर्शिता और अति प्रेम के कारण कितनी ही प्रतिभाओं का विकास न हो सका।

अपनी शक्ति को पहचानने में भी बहुत बड़े धोखे हो जाते हैं। ‘पसंद’ और ‘प्रतिभा’ दो अलग अलग चीजें है और ‘पसंद’ को ‘प्रतिभा’ समझ लेना बड़ी भारी भूल है। यदि किसी को कविता सुनने में आनन्द आता है तो उसे वह न समझ लेना चाहिए कि वह कालिदास और भवभूति बन सकता है। पसंद और प्रतिभा में विवेक कर लेना कठिन भी है पर उसे इस प्रकार समझा जा सकता है। ‘प्रतिभा’ मनुष्य के हृदय के भीतर निरंतर जलने वाली ज्वाला है, वह उसकी महत्वाकाँक्षा को प्रतिफल भोजन देकर जीवित रखती है। दिन-रात, सोते-जागते और उठते-बैठते, स्पष्ट या अस्पष्ट रूप से मनुष्य एक बड़ी भारी कमी अपने में महसूस करता है। उसे पूरा करने के लिए उसका हृदय तड़पता रहता है और उसी के चिंतन में उसे शान्ति मिलती है, बस प्रतिभा यही है। प्रतिभा केवल एक होती है, पसन्द अनेक होती हैं। गायिका के जमघट में बैठकर और संगीत का आनन्द लाभ करके जब यह इच्छा होती है कि कितना अच्छा हो यदि मुझे भी गाना आ जाये और उस समय यह भी सोच ले कि हम भी गीत का अभ्यास करेंगे मगर उस गोष्ठी से दूर हट कर वही इच्छा लुप्त हो जाती है और यदि महीनों उस संगति में न जाये तो उस ओर ध्यान भी नहीं जाता, वही स्थिति पसन्द का बोध कराती है। पसंद क्षणिक है, वह मन को केवल अस्थायी शान्ति देती है। मनुष्य परिवर्तन चाहता है ‘पसंद’ केवल इसमें सहायता देती है। यदि पसंद पूरी न हो तो मनुष्य को कोई दुख विशेष नहीं होता। एक औंस ‘प्रतिभा’ हजारों मन ‘पसंद’ से ज्यादा कीमती है। इसलिए राख के अन्दर छिपी हुई चिंगारी की तरह अपनी प्रतिभा को खोज निकालो।

जीवन कभी भी शाँत, सुखी और सफल नहीं हो सकता, जब तक उसका समन्वय प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा के साथ न हो। एक विद्वान कहता है कि-”बालक जो चाहता है, युवक उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता है और पूर्ण मनुष्य उसे प्राप्त करता है।” सच्चा और स्वतः परिश्रम प्रतिभा से पैदा होता है। नेलसन ने जल युद्ध में अद्वितीय सफलता इसलिए प्राप्त की कि वह बचपन में जहाज का खिलौना खेला करता था। चन्द्रगुप्त मौर्य भारत सम्राट इसीलिए बना कि वह बचपन में खेलने कूदने में राजा का अभिनय किया करता था। यदि सच्ची प्रतिभा है तो जरा सा बल मिलने और मार्ग प्रदर्शन करने पर पूर्ण सफलता प्राप्त करा देती है।

प्रतिभा को पहचान लेने के बाद, उसके समुचित विकास में अनेक बातों का सहारा लेना पड़ता है। घरेलू परिस्थितियों का इस सम्बन्ध में बहुत अधिक महत्व है क्योंकि मनुष्य जिस माता के गर्भ से जन्म लेता है और जिस पिता के प्यार से पलता है, उसके प्रभाव से उसकी प्रतिभा अछूती नहीं रह सकती। इन्हीं कारणों से प्रायः सभी विद्वानों ने मातृ-प्रभाव को मुक्त कंठ से स्वीकार किया है। वह युवक बड़े भाग्यवान हैं और उनकी सफलता निश्चित है जिन्हें अच्छी माता और अच्छे पिता का संरक्षण प्राप्त है।

घरेलू प्रभाव के बाद मनुष्य की प्रतिभा पर सबसे अधिक प्रभाव ‘मित्र’ का पड़ता है। इस प्रकार के कुप्रभाव से बचना मनुष्य के हाथ में है। अच्छी संगति की महिमा इसीलिए बार-बार गाई है कि मनुष्य के जीवन का निर्माण उसके मित्रों के सहयोग से होता है। एक लेखक ने कहा है कि एक सच्चा मित्र मनुष्य की सुरक्षा का सबसे बड़ा साधन है और जिसको ऐसा मित्र मिल गया, उसे मानो एक बड़ा खजाना मिल गया। एक सच्चा मित्र जीवन की दवा है। अपनी प्रतिभा के अनुकूल ही अपने मित्र बनाने चाहिए। अंग्रेजी कवि वायरन के काव्य का अध्ययन करने से स्पष्ट पता चलता है कि उसकी प्रतिभा पर उसके मित्रों के विचारों का रंग खूब चढ़ा हुआ है। शेली के संग में रह कर ही उसने भावों की कोमलता और प्रकृति के प्रति असीम अनुराग प्राप्त किया। अपने अध्ययन काल में पोले बड़ा आलसी था। रात भर सोने के बाद भी वह दिन चढ़े तक सोया करता था। एक दिन उसका मित्र आया और उसको बिस्तर पर पड़े देखकर बोला- “तुम्हारे बारे में सोचते-सोचते मैं रात भर न सो सका। मैं सिर्फ यही सोचता रहा तुम कितने बेवकूफ हो। मेरे पास इतने साधन है कि मैं जितना चाहूँ आराम कर लूँ, जितना चाहूँ आलस करूं, पर तुम गरीब हो, और आलस्य तुम्हें उचित नहीं। मैं शायद संसार में कुछ भी नहीं कर दिखा सकता अगर कोशिश भी करूं, पर तुम सब कुछ कर सकने में समर्थ हो। मुझे रातभर सिर्फ यह सोच कर नींद नहीं आई कि तुम बड़े मूर्ख हो और अब मैं तुमको गंभीरता पूर्वक सावधान करने और चेतावनी देने आया हूँ। अगर वास्तव में तुम इसी तरह आलसी बने रहे तो मैं तुम्हारा साथ हमेशा के लिए छोड़ दूँगा।”

यह प्रेम की ताड़ना थी। पोले के बाद का जीवन ‘मित्र’ के महत्व का सबसे बड़ा साक्षी है। अज्ञान और आलस्य के गहन अंधकार को मित्र का प्रकाश ही दूर कर सकता है।

अपनी सच्ची शक्तियों को पहचान लेने के बाद और उनमें विकास के लिए उचित सहयोग प्राप्त कर लेने के बाद जीवन संग्राम के लिए यात्रा करने का समय आ जाता है। उसी समय यह भी निश्चित कर लेना आवश्यक है कि हम अपने उद्देश्य कभी भी न बदलेंगे और सूत्र से काम लेंगे। प्रारम्भ में कोई भी काम अच्छा नहीं लगता और उसके कारण भी है, चाहे वह नौकरी हो, चाहे व्यापार हो या कला की उपासना, शुरू में ही सारे आयोजन इकट्ठा करने और उपयुक्त वातावरण तैयार करने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लुढ़कते हुए पत्थर पर काई नहीं जमती और ‘रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ”- यह दो कहावतें याद रखनी चाहिए। जीवन में यदि सब्र और शाँति से काम लिया जाय तो असफल होने का कोई कारण नहीं रहता।

कभी-कभी ऐसा होता है कि जिस उद्देश्य को लेकर हम चलना चाहते हैं, दूसरे लोग उसे नीची दृष्टि से देखते हैं। ऐसी स्थिति में अपने मन चाहे काम से घृणा न करने लगना चाहिए। दूसरों को व्यर्थ में प्रसन्न करने और झूठा सम्मान प्राप्त करने के लिए अपनी प्रतिभा की भूख को मार डालना बड़ी बेवकूफी है। हर एक काम को ईमानदारी और सुरुचिपूर्ण ढंग से करके गौरव पूर्ण बनाया जा सकता है। सड़क पर एक गंदा टाट बिछाकर हजारों मक्खियों की भिनभिनाहट के बीच में बैठ कर जूता तैयार करने वाले मोची का व्यवसाय घृणित नहीं है, उसकी क्रिया प्रणाली घृणित है। बाजार में साफ सुथरे ढंग से बैठ कर और अपने ग्राहकों को अच्छा काम देकर वही मोची पूरा सम्मान प्राप्त कर सकता है।

जीवन संग्राम की तैयारी का प्रारंभ यहीं से होता है।

First 11 13 Last


Other Version of this book



Version 1
Type: SCAN
Language: HINDI
...

Version 2
Type: TEXT
Language: HINDI
...


Releted Books


Articles of Books

  • शास्त्र-मंथन का नवनीत
  • आदर्श जीवन
  • आदर्श जीवन
  • ब्रह्मचर्य पर देववाणी
  • ब्रह्म की सर्वव्यापकता
  • भारतीय दर्शन-शास्त्र का उद्देश्य
  • Quotation
  • आत्म विस्तार में ईश्वर का साक्षात्कार
  • Quotation
  • महापुरुषों द्वारा गायत्री महिमा का गान
  • Quotation
  • जीवन संग्राम की तैयारी कीजिए।
  • कोरी बात नहीं, कुछ काम भी कीजिए।
  • मनुष्य का जीवनोद्देश्य कैसे प्राप्त हो?
  • Quotation
  • आपका मानसिक स्वास्थ्य ठीक है या नहीं?
  • गरीब देश की अमीर सरकार!
  • जीवन विधिपूर्वक जीना चाहिए।
  • VigyapanSuchana
  • भक्ति प्राप्ति की सात साधनाएं?
  • प्राण घातक क्षय रोग
  • व्यापारियों के लिए कुछ काम की बातें
  • महात्मा गाँधी की अमर वाणी
  • भारतीय मानवों से
  • भारतीय मानवों से
About Shantikunj

Shantikunj has emerged over the years as a unique center and fountain-head of a global movement of Yug Nirman Yojna (Movement for the Reconstruction of the Era) for moral-spiritual regeneration in the light of hoary Indian heritage.

Navigation Links
  • Home
  • Literature
  • News and Activities
  • Quotes and Thoughts
  • Videos and more
  • Audio
  • Join Us
  • Contact
Write to us

Click below and write to us your commenct and input.

Go

Copyright © SRI VEDMATA GAYATRI TRUST (TMD). All rights reserved. | Design by IT Cell Shantikunj