भारतीय दर्शन-शास्त्र का उद्देश्य
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(श्री पं. धर्मदेव शास्त्री, केशरी दर्शन)
उपनिषद् के ऋषि ने कहा है “सत्य का मुख सोने के पात्र से ढ़का है, हे प्रभो, उस ढक्कन को हटाओ जिससे सत्य धर्म का दर्शन हो सके” दर्शन का शब्दार्थ अपरोक्ष अनुभव है जिससे संसार का मर्म और रहस्य देखा जा सके, जिससे मानव और उसके मन का और सब से बढ़कर स्वयं अपना दर्शन हो उस शास्त्र को ही दर्शन शास्त्र कहा जा सकता है। दर्शन ऐसी आँख है जिससे दृष्टा होने पर भी अदृश्य सत्य का दर्शन होता है। इसी प्रकार के एक दार्शनिक ने कहा है-
“पराँचि खानि व्यत्रिणत् स्वयं भूः तस्मात्
पराड् पश्यति नान्तरात्मन् कश्चिद्धीरः
प्रत्यगात्मान मैक्षत आवृत चक्षुः अमृत्व मिच्छन”
“स्वयं भू भगवान ने इन्द्रियों की रचना ऐसी की है कि वह बाहर दूर के पदार्थों को देख सकती है, इसलिए साधारण मनुष्य चर्म-चक्षु से बाहरी दृश्य को ही देख सकता है। ‘अपने आप को देखने वाला कोई विरला ही होता है जो अंतर्मुख नेत्र से आत्म दर्शन करता है’ वस्तुतः मनुष्य सब को देखता है अपने आपको देखने का उसने कभी प्रयत्न नहीं किया, सबके साथ उसका संयोग हुआ आत्मा के साथ जिस दिन संयोग होगा, उसी दिन उसे पूर्णता की प्राप्ति होगी, अल्पता में सुख नहीं सुख पूर्णता में है, इसी पूर्णता की प्राप्ति में ही मानव प्रयत्नशील है, दर्शन शास्त्र इस सम्बन्ध में मनुष्य का मार्गदर्शक है।
“प्रदीप सर्वं विद्यानाम् उपायः सर्वकर्मणाम्”
सत्य अथवा पूर्णता का दर्शन कोरे पुस्तक ज्ञान से नहीं हो सकता। दर्शन शास्त्र आध्यात्मिक प्रयोगों के आधार पर बना है, छान्दोग्योपनिषद् में कथा आई है- नारद सनत्कुमार के पास गये और सीखने के लिए प्रार्थना की सनत्कुमार ने पूछा- जो तुम सीख चुके हो वह बताओ उसके आगे मैं कहूँगा। नारद ने कहा-
“चारों वेद, इतिहास, पुराण, गणित, ज्योतिष आदि सभी विद्याओं को मैंने पढ़ा है परन्तु मुझे ऐसा लगता है कि मैंने बहुत सारे शब्दों को ही पढ़ा है। आत्मा को- अपने आपको- मैंने नहीं पहचाना। क्योंकि आप जैसे अनुभवियों के मुख से मैंने सुना है कि आत्मा को पहचानने वाला शोक और दुख से रहित हो जाता है। परन्तु मैं तो शोक में पड़ा हुआ हूँ कृपया शोक सागर से मुझे पार कीजिये” इसके बाद सनत्कुमार ने नारद को उपदेश किया है।
याज्ञवलक्य ने योग द्वारा आत्म दर्शन को ही परम धर्म कहा है-
“अयं तु परमोधर्मः यद् योगेनात्य दर्शनम्...
हृदय की गाँठ तभी खुलती है और शोक तथा संशय तभी दूर होते हैं जब एक सत्य का दर्शन होता है जो बात नारद ने सनत्कुमार से कही है वह अध्यात्म शास्त्र के सभी जिज्ञासुओं ने स्वीकार की है, आत्म दर्शन अनुभवगम्य है भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है-
“जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्माति वतैत।”
शाब्दिक-जबानी-ब्रह्म चर्चा करने वाले व्यक्ति से ब्रह्म प्राप्ति के उपाय योग का जिज्ञासु व्यक्ति श्रेष्ठ है।
भारतीय दर्शन सत्य का साक्षात्कार करने वाले ऋषियों की आध्यात्मिक प्रयोगशाला में लिखे गये हैं। हमारा यह विश्वास है ऋषियों ने जो कुछ अनुभव के आधार पर कहा है उसे अनुभव के बिना झुठलाया नहीं जा सकता। हमारे देश का पतन इसी कारण हुआ कि भारतीय समाज और भारतीय दर्शन का सम्बन्ध टूट गया है भारतीय दर्शन का महान सूत्र है भेद में अभेद दर्शन।
सर्व भूतस्थमात्मानं सर्व भूतानि चात्मानि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र सम दर्शनः
यों माँ पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति,
तस्याहं न प्रणश्यामि स च में न प्रणश्यति
“यदा भूत पृथक भावमेकस्थ मनुपश्यति,
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते सदा”
-गीता
“योगी पुरुष सब भूतों में आत्मा को सब भूतों को आत्मा में देखता है, जो ‘मैं’ में सबको और सब में मैं को देखता है उसका नाश नहीं होता, जब मनुष्य जगत के पृथकत्व को एक में स्थित देखता है तब ब्रह्म भाव प्राप्त कर लेता है। भेद में अभेद का यह दर्शन जब तक भारतीय समाज का और भारतीयों के वैयक्तिक जीवन का आधार रहा तब तक भारत प्रगति करता रहा। इसी दर्शन के आधार पर भारतीयों में सहिष्णुता, समानता और समन्वय-बुद्धि का विकास हुआ। यम-नियम और योग के अन्य सब अंग जब तक भारतीय दर्शन व्यावहारिक क्षेत्र में है, तब तक भारतीय समाज उन्नत और आदर्श समझा जाता था परन्तु जब से उक्त सूत्र जीवन के क्षेत्र से दूर और बहुत दूर हो गये हैं तभी से भारतीय दर्शन की प्रतिज्ञा कम हो गई है और भारतीय समाज पंगु हो गया है। सब में आत्मा को देखने वाला दर्शन आज उन लोगों के हाथ में है जो अपने ही जैसे मनुष्य को छूने से अपवित्र बन जाते हैं। जो दर्शन प्रयोग और केवल प्रयोग के आधार पर चलता है आज उसके उत्तराधिकारी अकर्मण्य और दीर्घसूत्री तथा श्रम की उपेक्षा करने वाले हैं हमारे कथन का इतना ही अभिप्राय है कि दर्शन शास्त्र के प्रणेताओं का गुणगान करने से और दर्शन शास्त्र की ऊंची-2 बातों को कहने से हमारा कुछ उपकार होने वाला नहीं है।
विज्ञान ने आज देश और काल की दूरी बहुत हद तब हटा दी है हजारों मील की दूरी को आज विज्ञान ने कुछ ही घंटों में तय करने का साधन प्रस्तुत कर दिया है। आँख और कान के लिए आज बहुत हद तक दूर और समीप का भेद नहीं रहा परन्तु यह तथ्य है कि देश और काल की दूरी पर विजय पाने वाला मानव दूसरे मानव से पहले की अपेक्षा अधिक दूर होता जा रहा है, इस दूरी को हटाने की क्षमता विज्ञान में नहीं दर्शन में है। भारतीय दार्शनिक मानव और मानव में ही नहीं प्राणी मात्र में और उससे भी आगे पदार्थ मात्र में एक समान अविनाशी परम पुरुष को देखने का निर्देश कर गये हैं। ऊँचे-2 सिद्धाँतों के निर्माण की अपेक्षा आज मानव निर्माण पर ध्यान देने की आवश्यकता है। मानव निर्माण का अर्थ है मानव को भेद में अभेद मूलक दर्शन के आधार पर समानता, सहिष्णुता और सहृदयता को सोचने का अभ्यासी बनाना। मानव जाति अपने क्रमिक विकास के साथ पूर्णता की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करती जा रही है। पूर्णता की प्राप्ति पूर्ण दर्शन के बिना असम्भव है पूर्णता और अमरता पर्यायवाची शब्द हैं, भगवान बुद्ध जब 29 वर्ष की उम्र से आधी रात को अपनी प्रिय पत्नी यशोधरा और चि. राहुल को छोड़ कर घर से बाहर निकलें तब उन्होंने प्रतिज्ञा की थी।
“जननमरण यो दृष्टपारः न पुनरहं कपि हिवयं प्रवेष्टा।
“जन्म और मृत्यु का रहस्य पता लगाये बिना मैं कपिलवस्तु में प्रवेश नहीं करूंगा” बुद्ध भगवान ने जिस रहस्य का पता लगाया यह अपने तक सीमित नहीं रखा। मनुष्य मात्र को दुःख से छुड़ाने की इच्छा ही उनके लिए मोक्ष था। भागवत पुराण में नारायण के प्रति प्रह्लाद ने जो कहा है वह भक्तों के मनन योग्य है प्रह्लाद के शब्द हैं।
प्रायेण देव मुनयः स्वविमुक्ति कामः,
स्वार्थ चरन्ति बिजने न परार्थ निष्टाः।
नेतान् विहाय कृपलान् विमुक्ष एकः,
नाम्यं त्वदस्य शरणं प्रमत्तौऽनुपश्य।
“हे देव! प्रायः मुनि लोग एकान्त जंगल में अपनी ही मुक्ति के लिए कामना करते हैं वह स्वार्थ साधना है, इसमें कोई महत्व नहीं। संसार के चक्र में घूमते हुए इन दयनीय व्यक्तियों को छोड़ कर में अकेला मोक्ष नहीं चाहता, आपको छोड़कर कोई शरण नहीं कृपया उपाय बताइए।”
केवल अपने ही मोक्ष की इच्छा भक्त प्रह्लाद के शब्दों में स्वार्थ साधना है। आदि विद्वान कपिल ने साँख्य शास्त्र की रचना मनुष्य जाति को विविध दुःखों से छुड़ाने के लिए की है। प्राचीन शब्दों से पता चलता है कि कपिल अपनी मुक्तावस्था में से निर्वाण, शरीर द्वारा उक्त उपदेश की पूर्ति के लिए अवतीर्ण हुए। साँख्य दर्शन का पहला सूत्र है।
“अथ त्रिविध दुःखात्यन्तनिवृत्तिः अत्यन्त पुरुषार्थः॥”
‘आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक इन तीन दुःखों की अन्तिम निवृत्ति परम पुरुषार्थ है।’ दर्शन की उत्पत्ति का कारण क्या है इस सम्बन्ध में पूर्व और पाश्चात्य दार्शनिकों में मतभेद है। प्राच्य दर्शनकार मुक्ति अथवा निःश्रेयस को दर्शन का कारण बतलाते हैं। प्रारम्भ से ही मनुष्य के सामने जरा, मृत्यु और दुख लाइलाज रहे हैं। दुख से आत्यन्तिक छुटकारे का ही नाम मोक्ष है। जरा, मृत्यु और दुःख से छूटने के लिए ही भारत और विश्व के महान दार्शनिकों ने विविध प्रयोग किये हैं। यही भारतीय दर्शन का उद्देश्य है।

