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Magazine - Year 1949 - Version 2

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आदर्श जीवन

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तुम किसे रिझाते रे! निर्जन वन में करके नर्तन मयूर

चिर रम्य मनोरम चंद्रराशि फैलाते मद में चूर-चूर

कोकिल! नीरव तरु डाली पर स्वर्गीय स्वरों में गाती हो

री, अरी बावली वहाँ कौन जिसको यह गान सुनाती हो

ठहरो-ठहरो ओ सरित! तनिक, क्यों यह कल-कल ध्वनि का गुँजन

गिरि पर किससे कहती फिरती- गतिमय, परिवर्तनमय जीवन

हे सूर्य! सतत रह जागरुक, सिखलाते हो कर्त्तव्य-ज्ञान

किस स्वार्थ हेतु सर्वदा किया करते जग को जीवन प्रदान

हे सुमन! तुम्हीं बतला दो ना, अपने परमल का प्रिय पराग

तुम लुटा रहे क्यों जगती को, हे चिर-सुन्दर! हे वीतराग

बोलो! हाँ शशि! बोलो बोलो! हे शीतलता के अमर स्त्रोत

करते हो क्यों जग को सदैव अमृत-वर्षा से ओत-प्रोत

सब के स्वर मिल कर गूँज उठे- ‘जीवन का केवल एक ध्येय’

निष्काम कर्म! निष्काम कर्म!! निष्काम कर्म!!! ही प्रेय श्रेय

जीवन अनादि! जीवन अनन्त! संचरण और जागृति जीवन

चेतना पूर्ण संघर्ष! प्रगति! उत्थान! विजय! सच्चा जीवन

-कर्मयोग

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