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Magazine - Year 1949 - Version 2

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व्यापारियों के लिए कुछ काम की बातें

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(श्री मोतीलाल जी राँका, व्यावर)

(1) अपना हेतु दूसरों को न मालूम होने देना पाप नहीं है, अपना अनुभव न कहने में अन्याय नहीं है, परन्तु न कहने के बहाने झूठ कहना पाप है।

(2) करार पालना चाहिए। पालना अशक्य हो तो पहले से सूचना देकर माफी माँगना चाहिए। अपने ही सुसूर से बाधायें न आई हों तो वे भी प्रकट करना चाहिए।

(3) लोगों का विश्वास अपने ऊपर से उठ जाय ऐसा कोई काम न करना चाहिए। विश्वासघात करना महापाप है। अपनी ऐसी इच्छा न हो, वास्तविक भूल न हो और विश्वासघात का आरोप आवे तो सप्रमाण अपना निरपराधीपन साबित करना चाहिए।

(4) सरकार व कानून के पेच में न आकर चाहे जिस प्रकार पैसे कमाने का नाम व्यापार है, ऐसी समझ अनीतिपूर्ण है।

(5) लोगों की मूर्खता, भोलापन और विश्वास का बेतरह लाभ उठाना व्यापार-कला नहीं है, लुटेरापन है।

(6) व्यापारी का यह काम है कि वह अपने माल को इस तरह का मनोहर बतलावें कि ग्राहक ललचाया करें, परन्तु झूठ बोलकर ऐसा न करें।

(7) मीठी बोली, शान्त स्वभाव और सहनशील प्रकृति ये गुण व्यापारी के लिए आवश्यक हैं।

(8) व्यापारी को बकबक न करना चाहिए और बोलने की अपेक्षा सुनना ज्यादा चाहिए। सच्चे व्यापारी ज्यादा बोलने वाले नहीं होते।

(9) अपना मतलब किसी को जाहिर न होने देना व्यापार की चतुराई है।

(10) वाणी से मनुष्यों को वश किया जाय, बर्ताव से अपने आदर को बढ़ाया जाय और व्यवहार से अपना विश्वास जमा दिया जाय।

(11) जो व्यापारी क्रय-विक्रय नकद रुपये से नहीं करता या वैसा करने की पद्धति नहीं जारी करता अथवा जल्दी वसूली नहीं करता वह आगे पीछे नाश हुए बिना नहीं रहता।

(12) हिसाब न रखकर लेन-देन करना दूसरों को फायदा करने वाला है।

(13) ज्यादा नफा और कम व्यवहार की अपेक्षा कम नफा और ज्यादा व्यवहार अच्छा है। नुकसान होने का खास साधन बहुत बड़ी आशा है और भारी नफे की लालसा है।

(14) जिस व्यवसाय की लगन हमें न लगे उससे कुछ लाभ नहीं होगा।

(15) जो व्यापारी अपने ग्राहक को प्रसन्न नहीं रख सकता, उसके व्यापार में कभी बरकत नहीं होती।

(16) जिस व्यापार के साधन अपने हाथ में न हों, उसमें बरकत पाकर सुखी होने की आशा करना व्यर्थ है।

(17) निश्चय पूर्वक धैर्य से किये हुए व्यापार में सफलता होती है।

(18) अधूरी पूँजी, अविश्वासी नौकर और अनिश्चित व्यवसाय, ये अपयश के कारण हैं।

(19) अपनी हिम्मत न हो, धरु पूँजी न हो, निजी अनुभव न हो और स्वयं देख−रेख न रखी जा सकती हो तो ऐसे मनुष्य के लिए यही अच्छी सम्मति है कि वह स्वयं अपने जोखिम पर व्यापार न करें।

(20) दोषी कर्मचारी को दोष देना चाहिए परन्तु योग्य की प्रशंसा भी करना आवश्यक है। प्रशंसा, कृतज्ञता और शुभ भावना की उत्पादक है।

(21) अपने अधीनस्थ कर्मचारियों का अध्ययन करना चाहिए। उनके साथ उनके योग्य व्यवहार किया जाना आवश्यक है। नौकर को नौकर ही नहीं बल्कि सहयोगी समझना चाहिए।

(22) छोटी-छोटी बातों के लिए अधिक क्रोधित होकर किसी मनुष्य को डाट-डपट दिखाने के बजाय प्रेम से समझाना अधिक सफल होता है। अर्थात् किसी भी कर्मचारी को समझाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसकी आपके प्रति शुभ भावना व श्रद्धा कम तो नहीं हो रही है।

(23) तुमको जो कुछ करना है मन लगाकर करो। बेपरवाही से काम करने से अपने मन पर अनिष्ट परिणाम होता है। बेपरवाही की आदत एक बार पड़ी कि फिर मनुष्य का कभी उदय नहीं होता है।

(24) नकद दाम देकर जो चीज खरीदी जाती है, वह किफायती पड़ती है। क्योंकि नकद से खरीदने वाला दबैल नहीं रहता।

(25) माल थोड़े नफे से बेचने से बिक्री बढ़ जाती है और बिक्री के बढ़ने से थोड़ा नफा लेने पर भी ज्यादा लाभ हो जाता है।

(26) जो आदमी सब जगह माल तलाश करके जहाँ सस्ता मिलता है वहाँ जाकर स्वयं खरीदता है, उसे अधिक लाभ होता और होशियारी बढ़ती है। परन्तु बाहर इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि ठगी के धोखे और कुसंगति में न फँस जाय।

(27) माल मँगाते समय पहले सब जगह से भाव मंगा लेना चाहिए। फिर जहाँ सस्ता पड़ता और चीज अच्छी हो, वहाँ से ही मंगानी चाहिये।

(28) तेज भाव का, कम बिकने वाला, और जल्दी खराब होने वाला माल ज्यादा नहीं खरीदना चाहिये।

(29) जिस व्यापार में ज्यादा और जल्दी घट बढ़ होती हो, उसमें सोच समझ कर हाथ डालना चाहिये और सट्टे-फाटके से दूर रहना चाहिए।

(30) ऋण (कर्जा-उधार) देते समय इतनी बातों का विचार जरूर करना चाहिए- हैसियत, सम्पत्ति, पूँजी, व्यापार, नफा, नुकसान, क्षेत्र, राज का कानून, चाल, चलन, संगति, साख, शोभा, मेल, परिवार, प्रकृति, काम करने वाली, नीयत इत्यादि इनकी देखभाल करके ही ऋण देना चाहिए।

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