आपका मानसिक स्वास्थ्य ठीक है या नहीं?
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(श्रीमती रत्नेशकुमारी जी नीराँजना, मैनपुरी)
शारीरिक स्वास्थ्य के विषय में प्रायः सभी शुभचिंतक जिज्ञासा करते हैं, परन्तु मानसिक स्वास्थ्य के विषय में पूछना तो दूर अनेक व्यक्ति तो मानसिक अस्वस्थता की पहचान भी नहीं कर पाते, पर इसके लिए कोई निराली कसौटी नहीं है, जिन लक्षणों से शारीरिक स्वस्थता की पहचान होती है, उन्हीं से इसकी भी हो सकती है।
शारीरिक स्वस्थता के चिह्न ये होते हैं- शरीर में स्फूर्ति रहे, थोड़े ही श्रम से थकान न आ जाये, जाड़ा, गर्मी, बरसात इत्यादि को शरीर सहन कर सके शरीर की सन्तुलित अवस्था (वात, पित्त, कफ आदि का अपनी मर्यादा के अन्दर रहना) न नष्ट हो जाये। मानसिक-स्वास्थ की पहचान भी इससे बहुत कुछ मिलती-जुलती है। मन उत्साहपूर्ण रहे, साधारण मानसिक परिश्रम से ही मन और मस्तिष्क क्लाँत न हो जाये, कष्ट, मर्माघातों, कठिनाइयों और विपदाओं में हृदय अधीर किंकर्तव्यविमूढ़ होकर अथवा अशाँति और निराशा का क्रीड़ा-स्थल बन कर अपनी सन्तुलित-अवस्था (क्रोध, भय, निराशा, शोक आदि मन पर अधिकार न जमा बैठें। मन शाँत, विकार रहित और कर्त्तव्याकर्त्तव्य का पक्षपात रहित निर्णय कर सकने की योग्यता) को न खो बैठे।
शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु जिस-जिस प्रकाश पथ्य और परहेज अत्यावश्यक हैं उसी प्रकार मानसिक स्वास्थ्य के हेतु सद्विचार और आत्म-संयम है। मानसिक-स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु ये दोनों अनिवार्य हैं मानसिक-स्वस्थता का आनन्द, कह कर नहीं बताया जा सकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, शोक, अहंकार, ईर्ष्या, घृणा आदि मनोविकारों से रहित जब आपका मन अकारण ही स्वाभाविक रूप से प्रसन्न तथा शाँत रहता है तो बस वही मन की स्वस्थता की अवस्था है। क्या ऐसी सहज प्रसन्नता सदैव के लिए पा लेना प्रलोभनीय नहीं है?
अहर्निश मनोविकारों से क्षुब्ध होते रहना ही क्या जीवन का लक्ष है? दया, संवेदना, प्रेम की भी गणना मनोविकारों में ही की जा सकती है पर वे त्याज्य नहीं है क्योंकि वे हमको आत्म-विकार की ओर, मनुष्य मात्र के सत्य जीवन लक्ष्य विश्व प्रेम की ओर अग्रसर करते हैं। भाव तो जो भी हृदय के अन्तरतम से निकलेंगे दर्शकों और श्रोताओं पर अवश्यमेव थोड़ा बहुत प्रभाव डालेंगे ही, पर जैसे वे सुविचार या कुविचार होंगे प्रभाव भी उसी के अनुसार पुण्यमय अथवा गर्हित होगा। दुर्भावनाओं तथा सद्भावनाओं से उत्पन्न क्षोभों में एक और भी भिन्नता है, कुभावनाओं से उत्पन्न क्षोभ के मिट जाने पर भी मन में ग्लानि पश्चाताप असंतोष अथवा सूनापन सा छा जाता है। जिस प्रकार तीव्र ज्वर उतर जाने पर भी शरीर पर अपना प्रभाव शिथिलता और निर्बलता के रूप में छोड़ जाता है।
प्रश्न यह उठ सकता है कि क्या ये क्रोध आदि कुभाव सम्पूर्ण रूप से त्याज्य ही हैं? इसके बिना भी क्या गृहस्थ धर्म निभ सकता है? मैं कहती हूँ कि इनकी उलझन में पड़ने की आवश्यकता नहीं, जैसे वात, पित्त, कफ शरीर में मर्यादित रहे तभी कुशल है इसी प्रकार काम क्रोध आदि को भी हम संतुलित मात्रा में रखें तभी भला है। उनका अमर्यादित हो जाना ही त्याज्य है और उसी के अति मर्यादा के नियंत्रण को मनोविकारों का दमन कहते हैं।

