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Magazine - Year 1949 - Version 2

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आत्म विस्तार में ईश्वर का साक्षात्कार

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(कुमारी कृष्णा सरीन एम. ए.)

ईश्वर के सत् स्वरूप का साक्षात्कार अथवा स्पष्टीकरण ही धर्म का प्रधान उद्देश्य है। इस रहस्यपूर्ण सृष्टि से विस्मित होकर मनुष्य को उसके रचियता ईश के रहस्य को जानने की जिज्ञासा सृष्टि के आरम्भ से ही रही है। प्रभु का साक्षात्कार करने तथा उसके सत् स्वरूप को समझने का प्रयत्न प्रत्येक युग में प्रत्येक स्थान पर थोड़ा बहुत हुआ है। लेकिन भारतीय ऋषियों ने इस और जितना प्रयत्न किया है उतना अन्यत्र नहीं मिलता। पग-पग पर उसकी असीम सत्ता का अनुभव करके वे इस परिणाम पर पहुँचे कि पत्ती-पत्ती में, अणु-परमाणु में और प्रत्येक जीवधारी के व्यक्तित्व के विकास में वही सत् स्वरूप समाया हुआ है।

जीवन के सभी क्षेत्रों में विकास का एक ही प्राकृतिक नियम कार्य करता है। जिस प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थी एक श्रेणी से उत्तीर्ण होकर दूसरी श्रेणी में बढ़ता है ठीक उसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति के लिए मनुष्य को धर्म की सीढ़ियाँ पार करनी पड़ती हैं। धर्म की वे सीढ़ियां गृह-धर्म कुल-धर्म समाज-धर्म देश-धर्म और विश्व-धर्म या पूर्ण-धर्म हैं।

ईश्वर के सत्-स्वरूप का साक्षात्कार परिवार तथा समाज के छोटे क्षेत्र से होकर समस्त भू-मंडल में किया जाता है। देखिये! जब परिवार का कोई बच्चा बीमार पड़ जाता है तो गृह स्वामी और गृहस्वामिनी पूजा, अर्चना, प्रार्थना, वंदना और उसके उपचार के रात-दिन एक कर देते हैं। बच्चे के स्वस्थ होने पर वे ईश्वर को कोटि-कोटि धन्यवाद देते हैं और ईश्वर में उसका विश्वास एवं श्रद्धा बढ़ती है। समाज प्रेमी समाज के किसी अंग को सड़ा हुआ देखकर दुःख से व्याकुल हो जाता है और तुरन्त उसके उपचार में लग जाता है। विधवाओं की दशा को देखकर उसका मन रो पड़ता है। यही कारण था कि राजा राम मोहन राय ने एक विधवा को चिता में जलते हुए देखकर सती-प्रथा बन्द करने का बीड़ा उठाया। स्त्रियों की अज्ञानता से ऋषि दयानन्द के मन पर चोट लगी और उन्होंने नारी जाति के उद्धार के लिए कन्या गुरुकुल खुलवाकर उन्हें शिक्षित बनाया। आधुनिक शिक्षित नारी उन्हीं के प्रयत्न का फल है। हरिजनों की शोचनीय दशा ने गाँधी जी को व्याकुल कर दिया, और समाज के इस अंग को सड़ने से बचाने के लिए उन्होंने हरिजनोद्धार में अपने जीवन का अधिकाँश भाग लगाया। उसी के फलस्वरूप आज हरिजन प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति कर रहे हैं।

मनुष्य के जीवन का जितना विकास होता है, सृष्टि के साथ उसका जितना सम्बन्ध होता है उतने ही क्षेत्र के भीतर वह ईश्वर का साक्षात्कार करता है। समाज प्रेमी सत् का साक्षात्कार समाज की रक्षा और उसके सुख में करता है। समाज के प्रत्येक मनुष्य के साथ सम्बन्ध न होने पर भी उसकी सहानुभूति समाज के छोटे बड़े सभी प्राणियों के साथ होती है। वह प्रत्येक व्यक्ति के भीतर सत् का प्रकाश देखता है। इसी प्रकार देश-धर्म का पालक देश के शासन प्रबन्ध की प्रत्येक बुराई को दूर करना अपना कर्त्तव्य समझता है। राष्ट्र को समुन्नत बनाने तथा उसकी रक्षा करने में उसकी ईश्वरानुभूति होती है। देश प्रेमी देशवासियों को अपने सम्बन्धी जैसा समझता है। डॉ. खान अब्दुल गफ्फार खाँ हजारा की घटनाओं से प्रभावित होकर वहाँ क्यों पहुँचे थे? बिहार की भयानक दशा से पं. जवाहर लाल नेहरू अधीर क्यों हो उठे हैं! यह हाथों में शासन सत्ता होने की बात नहीं, हृदय में पीड़ा अनुभव करने की बात है। बंगाल में जब शरणार्थियों की सेवा के लिए अपील हुई तो वे ही स्त्री-पुरुष प्राणों का मोह छोड़कर आगे आये जिन्होंने देश प्रेम को हृदय में उमड़ता पाया। देश के बच्चे-बच्चे में ईश की विभूति एवं सत्ता दृष्टि आई। साराँश यह है कि जब मनुष्य शनैः शनैः जीवन पुष्प को विकसित करता है तो उसकी ईश्वरानुभूति का क्षेत्र भी विस्तृत होता जाता है। वह परिवार समाज और देश जैसे सीमित क्षेत्र से निकल कर समस्त भूमण्डल में ईश्वर का साक्षात्कार करता है। वह विश्व के कल्याण, रक्षा, समृद्धि तथा सुख की अभिलाषा करता है। ईसा, बुद्ध और गाँधी ऐसे ही महान पुरुषों में से थे जो विश्व को सुखी देखकर सन्तुष्ट होते थे और उसकी हीन दशा से दुखित विश्व का बच्चा-बच्चा उनकी सहानुभूति प्राप्त करता था। उन्होंने विश्व के प्रत्येक प्राणी की अंतरात्मा में ईश्वर की सच्ची प्रतिमा देखी।

मनुष्य सत् का जितना साक्षात्कार करता है, उतना ही वह धर्म को समझता है। एक ओर ईश्वर में उसका प्रेम, विश्वास, श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है, तो दूसरी ओर प्राणीमात्र के लिए उसका प्रेम सहानुभूति और कष्ट निवारण का क्षेत्र विस्तृत होता है। मनुष्य जीवन का अन्तिम लक्ष्य व्यक्तित्व का पूर्ण विकास है, जिसको प्राप्त करने पर विश्व के साथ उसके हृदय का तादात्म्य हो जाता हैं। उसका व्यक्तित्व विश्व के व्यक्तित्व में मिल जाता है। मानव समाज से पृथक उसका कोई अस्तित्व नहीं रहता। विश्व की आत्मा उसकी आत्मा हो जाती है। उसे कोई स्थान ईश्वर से रिक्त दृष्टि नहीं आता। उस अवस्था में मनुष्य सब प्रकार के बंधनों से मुक्त हो जाता है। इसी को भारतीय धर्म ग्रन्थों में मुक्तावस्था कहा गया है। आज महात्मा गाँधी विश्व के हृदय में गहरे क्यों पैठ गये हैं? चारों दिशाओं में उनकी आवाज क्यों गूँज रही है? प्रत्येक प्राणी की जिह्वा पर उनकी चर्चा क्यों है? इसलिए कि वे अपने व्यक्तित्व को मिला कर सब को उसका थोड़ा-थोड़ा अंश दे गये अथवा सबको अपने आप में लय कर गये। वृहदारण्यक उपनिषद् में “आत्मलय” करने को जीवन का मुख्य लक्षण बतलाया गया है। जिसे साम अर्थात् अपने समान बना लेना कहते हैं। अखिल विश्व के बीच जब मनुष्य का चित सत् का साक्षात्कार करता है, तभी वह सच्चिदानंद भगवान को समझता और प्रतिपल उसकी समीपता का अनुभव करता है। उस समय उसको सच्चे आनन्द की प्राप्ति होती है।

प्रेम, श्रद्धा, भक्ति और सहानुभूति धर्म के अंग हैं। हृदय को विकास होने पर प्राणी भगवान के प्रेममय स्वरूप को समझ कर चराचर जगत को प्रेम मय देखता है। श्रद्धा भक्ति सहानुभूति आदि गुण उसके हृदय में स्वभावतः उद्दीप्त होते हैं। ईसा, बुद्ध और गाँधी के जीवन पर दृष्टि डालने से यह बात स्पष्ट हो जाती है? ईश्वर के साथ हमारा जितना सम्बन्ध होगा हमारे धर्म और प्रेम की परिधि भी उतनी ही विस्तृत होगी। हम ईश्वर से जितना प्राप्त करते हैं उतना ही प्राणियों को दे सकते हैं। ईश्वर भक्त सबको अपने में और अपने को सब में देखने लगता है। यही आत्मा को पहचानना या आत्म साक्षात्कार है।

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