प्राण घातक क्षय रोग
Listen online
View page note
Please go to your device settings and ensure that the Text-to-Speech engine is configured properly. Download the language data for Hindi or any other languages you prefer for the best experience.
(श्री लक्ष्मीनारायण जी टंडन, संपादक “खत्री हितैषी”)
यो तो संसार में प्रायः कोई ऐसा स्थान नहीं जहाँ इस भयंकर रोग का कम-ज्यादा प्रकोप न हो, किंतु भारतवर्ष में इसका प्रधान अड्डा है। अनेक देशों में इस रोग से मृत्यु-संख्या घट रही है किंतु इस अभागे देश में उस में वृद्धि हो रही है। कहा जाता है कि युक्त प्रान्त के कानपुर नगर में संसार भर में सब से अधिक क्षय का प्रकोप है।
कमजोरों को सभी सताते हैं और भारतीयों का स्वास्थ्य बहुत गिरा हुआ है और गिर रहा है। अतः क्षय के क्या, प्रत्येक रोग के कीटाणु उसके शरीर पर सफलता पूर्वक आक्रमण करते हैं। बहुधा निमोनिया, डायबिटीज, प्लूरेसी, इनफ्लुऐजा, ब्रोनकाइरिस के बाद क्षय होने का बड़ा खतरा रहता है। प्राण-शक्ति या जीवनी-शक्ति की कमी वीर्य नाश, मानसिक क्षोभ बहुत गंभीर, चिंतायुक्त, दुखी रहना, हरदम सोच-विचार में पड़े रहना, बलवर्द्धक भोजनों के अभाव या आकस्मिक दुखद घटनाओं के धक्कों से भी क्षय हो जाता है। शक्ति से अधिक परिश्रम करना, धूल, सीलन, दूषित वायु, अस्वास्थ्य कर आदतें, हार्दिक क्लेश, सूर्य के प्रकाश की कमी, अनुपयुक्त भोजन, क्षय पीड़ित पशुओं के दूध का सेवन आदि भी इस रोग के कारण होते हैं तथा सहन शक्ति की कमी खसरा, कुकुर खाँसी आदि भी।
मानव-मात्र के लिए अज्ञानता से बढ़ कर कोई अभिशाप नहीं है। इस रोग के विषय में अज्ञान होना ही इस रोग ही उत्पत्ति, बुद्धि तथा भयंकर दुष्परिणामों का कारण है। अज्ञानता द्वारा ही इसका समाज में फैलाव होता है। अतः रोग अच्छा करने से कहीं ज्यादा उत्तम है, हम रोग को होने ही न दें और यह तभी संभव है जब हम अपने शत्रु के विषय में पूर्णरूप से जान लें कि यह क्या है, कैसे आता है, क्या करने से नहीं आता, आ जाने पर इससे कैसे युद्ध करना चाहिए और भगा देने पर क्या और कैसे सतर्क रहना चाहिए।
बाजी दफे तो जानते-बूझते हुए भी आदमी इस रोग के चंगुल में फंस जाते हैं। गरीबी, अशिक्षित तथा स्वास्थ्य के नियमों से अनभिज्ञ सम्बन्धी तथा न दूर की जाने वाली कुपरिस्थितियाँ भी इस रोग का अनिवार्य कारण बनती हैं। यदि घर में एक अशिक्षित तथा उत्तरदायित्व शून्य स्त्री या पुरुष क्षय से पीड़ित है और वह मना करने पर भी इधर-उधर थूकता है या सब एकमएक करता है, या एक जिम्मेदार-समझदार क्षयी इच्छा होते हुए भी गरीबी के कारण दूसरे स्थान पर नहीं जा सकता, बाल बच्चों के साथ रहता है तो फिर घर के अन्य पुरुषों का ईश्वर ही रक्षक है।
इसके कीटाणु खाँसने पर मुँह से निकलते हैं और उस समय बहुत शक्तिशाली होते हैं। बलगम के साथ भी यह निकलते हैं और बलगम के सूख जाने पर यह हवा में उड़कर लोगों तक पहुँचते हैं। धूप, खुली हवा में यह नष्ट या निर्बल हो जाते हैं। पर सीलन और अँधेरे में यह बरसों जीते हैं और कड़ी धूप में तो पाँच-मिनट में मर जाते हैं।
अतः क्षयी के बलगम को फिनाइल डालकर अलग बर्तन में रखें। उसका पैखाना, पेशाब दूर फेंका जाय, उसका बलगम जला दिया जाय, उसके खाने के बर्तन, पहनने और ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र, सोने-बैठने का स्थान अलग रखा जाए, बिना आवश्यकता उससे अधिक संपर्क न रखा जाय, यह चीजें तो स्वयं सिद्ध हैं। जिन रोगियों के बलगम में क्षय के कीड़े न मिलें, वह रोगी छूत नहीं दे सकते, लेकिन एहतियात रखना तो अच्छी ही बात है।
वह रोगी जिनका रोग तीव्र होता है उसमें रोग जल्दी बढ़ता है और खतरा भी अधिक होता है, किन्तु यदि रोग मंद हो जाता है तो पूरा फेफड़ा खराब होने में 10 से 30 वर्ष लग जाते हैं- कभी-कभी इससे भी अधिक।
प्रकृति से क्षय के कीड़े बहुत शान्ति- प्रिय होते हैं। यह शरीर में पहुँच कर भी विशेष नुकसान न पहुँचायें किन्तु शरीर के अन्दर रुधिर के श्वेत कीड़े इनसे लड़ने लगते हैं क्योंकि बाहरी कीड़ों को नाश कर देना ही उन की प्रकृति है, तब यह क्षय के कीड़े भी अपनी सुरक्षा के जहर छोड़ते है। इसी से टी.बी. होती और बढ़ती है। कहते हैं कि दस हजार कीड़े एक पंक्ति में सुई के छेद में सरलता से कबड्डी खेल सकते हैं। तात्पर्य यह है कि यह इतने छोटे होते हैं कि तेज खुर्दबीन के इनका दिखाई देना संभव नहीं और आश्चर्य की बात यह है कि इनके हड्डी, बाल गोश्त आदि सब होते हैं। प्रकृति भी शक्ति की बलिहारी है। यह कीटाणु एक इंच का हजारवाँ भाग लंबे और लम्बाई के चौथाई चौड़े होते हैं। मनुष्यों या जानवरों के बाहर यह नहीं रह सकते। इनकी भीतर तेजी से वृद्धि होती है और इनका विष अपने चारों ओर के पास कणों या को कोषाणुओं का नाश करता है। यह जान कर आश्चर्य होता कि मनुष्य के फेफड़े का क्षेत्र काफी होता है और 5-6 फेफड़े के कोषाणुओं के नाश होने पर भी मनुष्य जीवित रह सकता है। पहले प्रायः फेफड़े के निचले भाग से ही रोग का आरम्भ होता है।
इस रोग में मृत्यु संख्या 1 से 2 वर्ष आयु तक बहुत अधिक रहती है। बच्चों को सूखा रोग भी प्रायः क्षय ही होता है। इसे 15 वर्ष की आयु तक मृत्यु संख्या गिर जाती है। फिर 16 से 20 आयु तक मृत्यु-संख्या में वृद्धि रहती है। 45 आयु बाद इस रोग का खतरा कम हो जाता है। 18 से 30 वर्ष की आयु में यह रोग अत्यधिक होता है क्योंकि इसी आयु में अनेक प्रकार के अत्यधिक परिश्रम मनुष्यों को करने पड़ते हैं। यही जवानी का समय उसके जीवन-संग्राम में कूदने, भविष्य के बनाने की चिन्ता का है- इसी में अनेक बुराइयों और बुरी आदतों का भी वह शिकार हो जाता है।
याद रखिये जब मनुष्य निस्तेज, उत्साह-रहित, पीला पड़ने लगे, उसे खाँसी, सीने में दर्द, जल्द थकावट, खाँसी, कभी-कभी बुखार या सर्दी हल्की हरारत रहने लगे, उसका वजन कम होने लगे, उसकी भूख मारी जाय आदि तो यह चिह्न प्रकृति की ओर से मनुष्य के सतर्क हो जाने के हैं। क्षय के प्रारम्भ में यही चिह्न दृष्टिगोचर होते हैं।
याद रखिये (क्षयी के) रोगियों के छींकने या सूखे कफ से 92 प्रतिशत, गाय के दूध या भोजन पर मक्खी बैठने आदि से 8 प्रतिशत रोग होता है। पानी आदि के द्वारा भी रोग हो सकता है।
वैद्यक, हिकमत, होमियोपैथिक तथा एलोपैथिक कोई भी इलाज दावे के साथ रोगी को अच्छा नहीं कर सकता। पर अधिकतर लोग एलोपैथिक इलाज ही करते हैं। क्षय के कारण फेफड़े में घाव हो जाते हैं। और भीतर के घावों पर किसी प्रकार की दवा लगाना संभव नहीं। साथ ही हम जानते हैं कि फेफड़े निरंतर काम करते रहते हैं और घाव को यदि विश्राम नहीं दिया जाएगा तो उनका अच्छा होना दुःसाध्य है। यही कारण है कि क्षय रोग प्रायः असाध्य माना जाता है।
प्रत्येक इलाज का ध्येय, चाहे वह एलोपैथिक हो या होमियोपैथिक, यही होता है कि घावों पर माँस के रेशे, ताने-बाने की भाँति बने और धीरे-धीरे घाव भरे। गोल्ड इन्जेक्शन देने से कहते हैं कि Hibrsis बनना प्रारम्भ हो जाते हैं। (यद्यपि आजकल गोल्ड इन्जेक्शन व्यर्थ से माने जाने लगे हैं।) ए. पी. देने से भी घाव विश्राम पाकर भरने लगता है। अतः हमें दो बातें ज्ञात हुई कि क्षय का सच्चा इलाज अधिक से अधिक विश्राम है। साथ ही अच्छा भोजन, कुछ ठंडी जलवायु, स्वच्छ वायु, सूर्य प्रकाश तथा नियमित जीवन है। दवाएं तो बरायनाम होती हैं।
बीमारी का पहला झोंका बड़ा घातक होता है। वर्षा ऋतु भी इस रोग के लिए बहुत बुरी होती है। यदि रोग की तेजी के पहले झोंके में आदमी बच जाय तो ठीक भोजन, विश्राम और गर्मी में पहाड़ों आदि पर जाने से आदमी काफी दिन चल सकता है। परन्तु पहाड़ों पर जाना भी परमावश्यक नहीं है। उचित रीति से प्रबंध होने पर मैदानों में भी गर्मी में बिना किसी हानि के रहा जा सकता है। और प्रत्येक रोगी को प्रत्येक दशा में पहाड़ों पर जाना लाभप्रद नहीं होता- कभी-कभी न जाना ही उचित है। 9-10 महीने बाद अगर हालत रुक जाय और धीरे-धीरे लाभ होने लगे तो रोग जीर्ण एवं मंद हो जाता है। इस रोग में जलवायु परिवर्तन से बहुत लाभ होता है।
रोगी में जीवनी शक्ति प्रायः बहुत कम हो जाने से क्षय अच्छा नहीं हो पाता। जीवनी शक्ति वह शक्ति है जो क्षय से लड़ सके। यह शक्ति जिसमें जितनी अधिक होगी यह उतनी ही शीघ्र अच्छा होगा।
अकसर रोगी जानना चाहते हैं किस करवट सोवें। अच्छा तो यही है कि जिस फेफड़े में रोग हो उस करवट सोने से घाव को विश्राम मिलता है। रात को बाँयी करवट सोना प्राकृतिक-चिकित्सा के अनुसार अच्छा है। पर साधारण तथा जिस करवट रोगी को अच्छा लगे सोये। किसी करवट सोना नुकसान दायक नहीं। हाँ, जिस तरफ बीमारी है उस तरफ करवट न सोने से एक डर हो सकता है कि छूत दूसरी तरफ न पहुँच जाए क्योंकि थूक की नली तो एक ही होती है पर यदि थूक में कीड़े नहीं मिलते तब तो हानि का प्रश्न ही नहीं उठता।
क्षय में यदि मनुष्य का पेट ठीक रहे तो वह क्षय से लड़ कर चंगा हो सकता है और पेट को ठीक रखना प्राकृतिक-चिकित्सा द्वारा ही सरल और सुलभ है। क्षय किसी दवा खाने से नहीं जाता। विश्राम आदि ही इसका इलाज है। चीड़ा-फाड़ी वाला इलाज- सर्जरी- ए. पी. फ्रैनिक और थरकोरलास्री ही एलोपैथी के श्रेष्ठ इलाज हैं।
क्षय होने से उस विष का दौरा सारे शरीर भर में रुधिर द्वारा थोड़ा बहुत होगा ही, इसी से मस्तिष्क, पेट, कलेजा, जिगर, गला आदि भी प्रभावित हो ही जाता है। जब तक रोग रहेगा, प्रत्येक स्थान पर थोड़ा बहुत क्षयजनित-विष का प्रभाव रहेगा। क्षय के दूर होते ही स्वतः धीरे-धीरे सब कष्ट दूर हो जायेंगे।
बुखार रहना क्षय में स्वाभाविक ही है। किंतु बाजी दफे रोग की तीव्रता के कारण बुखार न होकर वह प्राण शक्ति की कमी, कमजोरी, पेट की खराबी या अन्य बातों के कारण भी रह सकता है।
-शेष अगले अंक में

