भारतीय मानवों से
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(श्री राजबहादुर ‘विकल’)
मत अंगार बिखेरो, वसुधा आज माँगती पानी।
अभी अभी पागलपन ने थी, गाई मृत्यु-प्रभाती
जलती हुई दिशाओं की, शीतल न हो सकी छाती
मानवता को अब न अधिक तुम, शोणित से नहलाओ
पशुता के मरघट में अपने गौरव को न जलाओ
क्रौंच-रुदन को सुनकर सहसा कवि बल जाने वालो-
सुन न रहे क्यों ‘तपसा-तट’ से दलित विश्व की वाणी
भौतिकता के मद में मत दो निज संस्कृति को पीड़ा,
मनु की संतानों के शोणित से न करो अब क्रीड़ा
रक्तपान से भला समझ लो अपने आँसू पीना
पावन बन कर सफल विश्व में दो दिन का भी जीना
बीज-रूप में सृष्टि बचा कर, प्रलय काल से खेले
आज उसी के ध्वंस हेतु क्यों, तुमने भृकुटी तानी
‘गौतम’ जागो अखिल विश्व में छाया घोर अँधेरा
‘महावी’ चल पड़ो तपस्या को हिंसा ने घेरा
थकी समर से वसुधा रोती इसका भार सम्हालो
कालकूट लख काँप उठेगी, मुख में अमृत डालो
भौतिकता के आवेशों में बापू को ही खोया-
दिल्ली के आँगन में बिखरी, शोणित बन नादानी
तुम उनकी संतान, अनल में हंस कर जलने वाले
रक्तपात से ऊब हिमालय पर चढ़, गलने वाले
उस मिट्टी की सुत हो, जिसका रहा अमृत से नाता
जिनका अस्थि जाल ही, नभ के लिए वज्र बन जाता
राज पाट को त्याग घूमते भगवा चीवर डाले-
तप की ज्वाला में ही निखरा करती उठी जवानी
घृणा द्वेष के बीज न बोओ, वेदों के अनुगामी
पशुता से क्यों प्यार कर रहे, उपनिषदों के स्वामी
नवल उषा की लाली लख कर, सामगान फिर गूँजे
हो न कहीं वैषम्य आज मानव मानव को पूजे
काल-सर्प के फन पर बैठी संस्कृति अमृत बाँटे-
अखिल-विश्व चरणों पर झुक कर ही बन जाये ज्ञानी
-दीपक
*समाप्त*

