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शान्ति तो अन्दर ही खोजनी पड़ती है।

शान्ति की खोज में चलने वाले पथिक को यह जान लेना चाहिए कि अकेले रहने या जंगल पर्वतों में निवास करने से शांति का कोई सम्बन्ध नहीं। यदि ऐसा होता, तो अकेले रहने वाले जीव जन्तुओं को शान्ति मिल गई होती और जंगल पर्वतों में रहने वाली अन्य जातियाँ कब की शान्ति प्राप्त कर चुकी होतीं।

अशान्ति का कारण है आन्तरिक दुर्बलता। स्वार्थी मनुष्य बहुत चाहते हैं और उसमें कमी रहने पर खिन्न होते हैं। अहंकारी का क्षोभ ही उसे जलाता रहता है। कायर मनुष्य हिलते हुए पत्ते से भी डरता है और उसे अपना भविष्य अन्धकार से घिरा दीखता है। असंयमी की तृष्णा कभी शान्त नहीं होती । इस कुचक्र में फँसा हुआ मनुष्य सदा विक्षुब्ध ही रहेगा भले ही उसने अपना निवास सुनसान एकान्त में बना लिया हो।

नदी या पर्वत सुहावने अवश्य लगते हैं। विश्राम या जलवायु की दृष्टि से वे स्वास्थ्यकर हो सकते हैं पर शान्ति का उनमें निवास नहीं। चेतन आत्मा को यह जड़ पदार्थ भला शान्ति कैसे दे पावेंगे? शान्ति अन्दर रहती है और जिसने उसे पाया है उसे अन्दर ही मिली है। अशान्ति उत्पन्न करने वाली विकृतियों को जब तक परास्त न किया जाय तब तक शान्ति का दर्शन नहीं हो सकता, भले ही कितने ही सुरम्य स्थानों में कोई निवास क्यों न करता रहे।

......सन्त तिरुवल्लुवर