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Magazine - Year 1964 - Version 2

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हिन्दू-धर्म की अगणित विशेषताएँ

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हिन्दू-धर्म वह विकासमान विधि व्यवस्था है जो युगों-युगों से मानव-जीवन को वैयक्तिक, सामाजिक, भौतिक, आध्यात्मिक आदि सभी क्षेत्रों में प्रगति की ओर अग्रसर करती आ रही हैं। यद्यपि हिन्दू-धर्म भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले जन-समाज की जीवन पद्धति से अभिन्न रहा है तथापि यह सार्वभौम मूल्यों---तथ्यों पर आधारित होने के कारण मानवधर्म---सनातनधर्म के रूप में प्रतिष्ठित है। और इसीलिए हिन्दू-धर्म को किन्हीं जातीय, भौगोलिक, मान्यताओं की सीमाओं में बाँधना अयुक्त है।

हिन्दू-धर्म, सनातन-धर्म है। सार्वभौम है, मानवमात्र का धर्म है। इसकी कोई आदि तिथि नहीं, इसका आरम्भ तो उसी दिन से हो गया जिस दिन से मनुष्य ने अपने जीवन को उन्नत, विकसित, उत्कृष्ट बनाने की दिशा में सोचना प्रारम्भ किया। हिन्दू-धर्म की कोई क्षेत्रीय जातीय मर्यादायें नहीं है। क्योंकि यह विश्व कल्याण की कामना लेकर चलता है। सबके सुख समृद्धि की भावना से ओत-प्रोत है यह। पाश्चात्य विद्वान् रोम्याँ रोला ने कहा है —”मैंने यूरोप और एशिया के सभी धर्मों का अध्ययन किया है। परन्तु मुझे उन सब में हिन्दू-धर्म ही सर्वश्रेष्ठ दिखाई देता है।” आगे उन्होंने कहा है “मेरा विश्वास है कि इसके सामने एक दिन समस्त जगत को सिर झुकाना पड़ेगा।”

हिन्दू-धर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आध्यात्मिक मान्यतायें—आस्थायें हैं। अध्यात्म ही हिन्दू-धर्म की आत्मा है। यह आध्यात्मिक मान्यताओं को अन्य मान्यताओं की अपेक्षा अधिक महत्व देता है। हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य को अपनी सीमित चेतना का उपयोग उच्चस्तर, असीम आत्म-अस्तित्व तथा परमानन्द की प्राप्ति के लिए करना आवश्यक है। लेकिन जगत को भुलाकर नहीं। इस आध्यात्मिक साधना की तपस्थली जगत को बनाकर ही लक्ष्य सन्धान करना होगा। जगत में ही मुक्ति प्राप्त करनी होगी, ऐसी हिन्दू-धर्म की मान्यता है। हिन्दू-धर्म समस्त ब्रह्माण्ड की आध्यात्मिक एकता को लेकर चलता है और उसका प्रयोग मानव-जीवन में करके उसे व्यापक एवं महान् बनाना है। यही “सर्वोच्च तादात्म्य” है। सीमित-लघु में अपूर्णता है, अज्ञान है, इसलिए असन्तोष भी है। हिन्दू-धर्म मनुष्य को अपनी संकीर्णता, अज्ञान, लघुता से उठाकर —पूर्णता और ज्ञान के प्रकाश-पुँज में स्थित देखना चाहता है जहाँ उसके समस्त असन्तोष, दुःख नष्ट हो जाते हैं। इसे ही मुक्ति कहते हैं।

असीमित अनन्त के ज्ञान-प्रकाश में मुक्ति ही हिन्दू-धर्म की मूल मान्यता है, इसके अनुसार मोक्ष ही मानव-जीवन का परम पुरुषार्थ है, जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। लेकिन इस मुक्ति या मोक्ष को यहीं, इसी जीवन में, इसी धरती पर मानवीय सम्बन्धों में प्राप्त करना है। जीवन की कार्य-पद्धति को मूर्त देखना है। हिन्दू-धर्म हमारे समस्त कर्मों को ईश्वरोन्मुखी बनाकर, उन्हें पवित्र बनाकर, लक्ष्य-सन्धान करने का साधन बनाता है।

हिन्दू-धर्म की एक महत्वपूर्ण विशेषता है इसकी अजर अमर जीवनी-शक्ति । आश्चर्य होता है युगों-युगों के भीषण प्रहार, राजनैतिक सामाजिक परिवर्तनों के बाद भी यह अपना अस्तित्व बनाये हुए है। इसमें भी विशेषता यह है कि हिन्दू-धर्म किसी भी रूप में आक्रमणकारी नहीं रहा है, जब कि अन्य धर्मों के नाम पर संसार में भीषण रक्तपात हुए, मानव-जाति के किसी भाग को शोषण का शिकार होना पड़ा।

महाभारत के भीषण संग्राम के कारण हिन्दू-धर्म की मान्यता, रूप अस्त-व्यस्त हो गया था। तब व्यास तथा अन्य तत्कालीन ऋषियों ने हिन्दू-धर्म को व्यवस्थित किया। वैदिक युग के समाप्त होते हुए यज्ञ-यागादि धर्म-कर्मों के नाम पर अनेकों बुराइयां पैदा हो गई थीं, तब बौद्ध-धर्म के रूप में ही हिन्दू-धर्म का नवीन संस्करण हुआ और अपने युग में मानव-जाति का पथ-प्रदर्शन किया। आठवीं शताब्दी में जब ह्रसशील बौद्ध धर्म, शाक्त -सम्प्रदायों के रक्त पूर्ण जादुई अपराधों, अनाचार का जोर था, तब शंकराचार्य का उदय हुआ और उन्होंने हिन्दू धर्म का पुनर्नवीनीकरण करके उसे सशक्त बनाया। श्रीशंकर ने अल्पायु में ही ह्रासोन्मुखी बौद्धधर्म को खदेड़ दिया। विभिन्न मत मतान्तरों का शुद्धिकरण कर उनमें समन्वय पैदा करके हिन्दू-धर्म को दृढ़ आधार प्रदान किया।

सोलहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक हिन्दू-धर्म के समक्ष और भी कठिन अवसर आए। मुस्लिम शासन में हिन्दू-धर्म को नष्ट-भ्रष्ट करने के दुष्प्रयत्न कुछ कम नहीं हुए। हिन्दुओं को नीच समझना, उनका बल-पूर्वक धर्म परिवर्तन, उनके धार्मिक स्थानों को नष्ट करना, धार्मिक क्रिया कर्मों पर दण्ड देना आदि ने एक बारगी हिन्दू-धर्म को हिला दिया। मथुरा, अयोध्या, काशी, सोमनाथ आदि तीर्थ स्थानों को कई बार नष्ट-भ्रष्ट किया गया। लेकिन हिन्दू-धर्म की निर्माण की शक्ति पर आश्चर्य होता है कि सात सौ वर्षों की अवधि में हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने के प्रबल प्रयत्न किये गए किन्तु उनमें स्थायी सफलता न मिली। हर तोड़-फोड़ का पुनर्निर्माण होता रहा। मुस्लिम अत्याचारों के बावजूद भी हिन्दू-धर्म अधिकाधिक विकसित हुआ। चैतन्य, सूर, मीरा, तुलसी, जैसे भक्तों का उदय हुआ और उन्होंने इसे जीवित रखा।

अंग्रेजों के आगमन के साथ-साथ हिन्दू-धर्म पर एक और संकट आया। वह था ईसाई-मिशनरियों का धर्म प्रचार और अंग्रेजी ढंग की शिक्षा। इन्होंने एक ओर अबोध लोगों को बहकाकर धर्म-परिवर्तन के लिए प्रोत्साहन दिया तो दूसरी ओर अंग्रेजी ढंग से भारतीय समाज को शिक्षा दी, जिसका उद्देश्य भी उन्हें ईसाई बनाना था। लेकिन देश के महापुरुषों ने तत्काल इस खतरे को पहचाना और राजा राममोहन राय, विवेकानन्द, दयानन्द, तिलक, अरविन्द, महात्मा गाँधी जैसे व्यक्तियों ने इस खतरे के प्रति समाज को जागरुक किया। लेकिन अभी तक भी यह खतरा बना हुआ है, यह पूरी तरह दूर नहीं किया जा सका है। वर्तमान पीढ़ी पर यह दायित्व है कि वह इस चुनौती का सामना करे।

हिन्दू-धर्म किसी एक व्यक्ति का बताया हुआ या किसी पुस्तक विशेष में लिखा हुआ धर्म नहीं है, अपितु यह अनेकों ऋषियों, विचारकों, चिन्तकों, तत्वदर्शियों के चिन्तन, शोध, प्रयोग, अनुभवों की उपज है। हिन्दू-धर्म का प्रवर्तक कोई एक व्यक्ति नहीं रहा है। यह एक बहुत बड़े विद्वत् समाज की वैज्ञानिक शोध का परिणाम है। इसीलिए हिन्दू-धर्म किन्हीं बँधी बँधायी लकीरों, मान्यताओं पर नहीं चलता वरन् वह ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है जो कभी नहीं बदलते।

यद्यपि समयानुसार हमारे साधन, परम्पराओं, मान्यताओं में परिवर्तन होता रहता है लेकिन मूल सत्य, हिन्दू धर्म की आत्मा सदैव अपरिवर्तित रहती है। भारतीय जीवन के कुछ पहलुओं को देखकर ऐसा भाव होने लगता है कि हिन्दू-धर्म पुरानी मान्यताओं, परम्पराओं का खण्डहर है। कुछ सीमा तक यह सही भी हो सकता है, लेकिन एक अनन्त परम्परा के रूप में चली आ रही क्रांतदर्शी आत्माएँ हिन्दू-धर्म की ही देन हैं जो समय-समय पर इस क्षीणता, पुरातनता के मैल को साफ कर मूलभूत तत्वों की दृढ़ता से घोषणा करती हैं। समस्त पुरातन को ही नवीन रूप दे डालती हैं। यही हिन्दू-धर्म की चिर नूतनता, सजीवता का चिन्ह है—वैज्ञानिकता का प्रमाण है।

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