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Magazine - Year 1964 - Version 2

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चिन्ता में डूबे रहने से क्या फायदा?

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चिन्ता एक विनाशक वृति है, जो मनुष्य की शक्ति और समय का अनावश्यक मात्रा में क्षरण करती रहती हैं। जिस शक्ति के द्वारा मनुष्य अपना स्वास्थ्य सुधार सकता था, आजीविका कमा सकता था, विद्याध्ययन अथवा कोई उपयोगी कला सीख सकता था, वह व्यर्थ ही बरबाद हो जाती है। जितने समय को वह शारीरिक मानसिक, आर्थिक अथवा किसी अन्य प्रयोजन में, विकास के काम में लगा सकता था उसे छोटी-छोटी बातों की चिन्ताओं में ही गंवाता रहता है। मनुष्य जीवन किसी महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये मिलता है, इसे छोटी-छोटी बातों की चिन्ताओं में गंवा देना समझदारी की बात नहीं। अपने जीवनलक्ष्य को समझना और उसमें अन्त तक तत्परता पूर्वक लगे रहना तभी सम्भव हो सकता है जब चिन्ताओं से छुटकारा पायें, इनसे दूर रहें और इनसे क्षरित होने वाली शक्तियों को बचाकर अपने निर्दिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में लगायें।

चिन्ताओं से मनुष्य की रचनात्मक क्रिया-शक्ति में थोड़ी कमी ही आती अथवा थोड़ा समय ही बरबाद होकर रह जाता तो भी विशेष हानि न थी। दैनिक कार्यों में, चलने उठने बैठने और अन्य कई ऐसे कार्य होते हैं जिनमें निष्प्रयोजन कुछ शक्ति भी लग जाती है कुछ समय भी। किन्तु उसकी हानि भी वहीं समाप्त हो जाती है। पर चिन्तायें अपने पीछे भी एक विषाक्त वातावरण बना जाती हैं जो मनुष्य की जीवन शक्ति का चिरकाल तक शोषण करता रहता है। इनसे जितना ही बचाव किया जाता है, ये शहद की मक्खी की तरह उतना ही पीछा करती और अपने विषदंश चुभोती रहती हैं। मनुष्य चिन्ताओं के जाल में फँस कर अपनी मौत के ही सरंजाम जुटाता रहता हैं। जीवन-मृत्यु अकालमृत्यु की ओर तेजी से ले जाने वाली यह चिन्तायें ही होती हैं। किसी कवि ने लिखा है :—

चिन्ता चंगुल ही परयो तो न चिता को शंक।

यह सोखै बूँदन जियत मुये जात वा अंक॥

अर्थात् चिता तो मुर्दा को जलाती है किन्तु चिन्ता तो जीवित मनुष्य को तिल-तिल घुला-घुला कर मारती है।

चिन्ताओं से मस्तिष्क के अन्तराल में कार्य करने वाली सेल या फाइबर शक्तियों से किस प्रकार जीवन शक्ति का तड़ित क्षरण होता है, इसका पता जर्मनी के डॉक्टरों ने एक प्रयोग से लगाया। किसी पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति को अचानक चिन्ता जनक समाचार सुनाया गया। इस से वह घबड़ा कर उठने लगा तो उसे चक्कर आ गया और गिर गया। डॉक्टरों ने शारीरिक परीक्षा के बाद देखा कि उसकी इतनी शक्ति एक ही झटके में समाप्त हो गई जिससे वह एक सप्ताह तक लगातार श्रम कर सकता था। चिन्तायें मस्तिष्क को उत्तेजित करती हैं जिससे शक्ति का बुरी तरह अपव्यय होता रहता है। इससे मनुष्य के सौंदर्य, शारीरिक बल और ज्ञान का नाश होता रहता है।

चिन्ता जीवन की शत्रु है। शत्रु का काम होता है, त्रास देना, भयभीत रखना और दाँव लगते ही आक्रमण करना। ठीक ऐसा ही काम चिन्तायें करती हैं। दिन-रात मनुष्य को घुलाती रहती हैं। रक्त , वीर्य, बल और बुद्धि का निरन्तर शोषण करती रहती हैं। व्यक्ति को निराश बना देती हैं। इससे मनुष्य सदैव डरा-डरा सा बना रहता है। कुछ दिन ऐसी ही स्थिति बनी रहने से चिड़चिड़ापन, अर्द्धविक्षिप्तता तक की नौबत आ जाती है। स्थिति अधिक विकृत हो जाने पर मनुष्य के प्राण ही ले कर छोड़ती हैं। छोटी-सी बात को लेकर इतने बड़े दुष्परिणाम तक पहुँचने की बात कुछ असंगत लगती है किन्तु होता ऐसा ही है। चिन्ता का रोग भीतर ही भीतर गलाता है। यह स्थिति बड़ी खतरनाक होती है इसका किसी चिकित्सक के पास इलाज भी नहीं। इसका परिणाम अन्ततः अकाल मृत्यु ही होता है।

चिन्तायें आखिर आती क्यों हैं, यह विचारणीय प्रश्न है। अधिक गहराई में जाकर देखें तो इनका आधार बड़ा ही टूटा फूटा सड़ा-गला-सा लगता है। चिन्तायें आती नहीं, मनुष्य स्वयं उन्हें बुलाता है और अपने पास पाल कर रखता है। चिन्ता का अर्थ है किसी समस्या से हार मान लेना, अपने आप को पराजित घोषित कर देना। यह एक मनोविकार है जो मनुष्य की दुर्बलता प्रकट करता है। प्रस्तावित कठिनाई को अपनी शक्ति से बड़ी मान लेने के अतिरिक्त चिन्ताओं का और कोई भी अस्तित्व नहीं। खान-पान, रहन-सहन और सामाजिक व्यवहार की अनेकों चिन्तायें होती हैं किन्तु इनके आधार इतने छोटे होते हैं कि उन्हें जानने से हँसी आती है। अपना पड़ोसी अच्छा खाता पाता है। उसकी नौकरी भी अच्छी है। पर खुद का भोजन बड़ा रूखा-सूखा होता है। वेतन भी कम मिलता है। इन्हीं बातों को विवशतापूर्वक देखने का अर्थ है चिन्ता। दूसरा अच्छा खाना है तो क्या हुआ, कितने ही तो ऐसे हैं जो बेचारे एक समय ही भोजन पाते हैं। आपको केवल सौ रुपये ही वेतन मिलता हैं तो असंख्य ऐसे हैं जो दिन भर कठोर श्रम करके भी शाम तक बारह आने कमा पाते हैं। तब फिर यह चिन्ता क्यों? इससे यही पता चलता है कि चिन्ताओं का आधार उतना बड़ा नहीं होता जितना लोग उसे महत्व देते हैं।

चिन्ताओं के द्वारा अपनी कार्य क्षमता घटा देना, जीवन में घबराहट उत्पन्न करना अल्प विकसित बुद्धि वालों का काम है। यह आत्म विश्वास की कमी का द्योतक है। इन्हें बढ़ाओ नहीं, दूर कीजिये। यह आपके शत्रु है। इनके कारण पूरे मन से अपने विकास पथ पर अग्रसर न हो सकोगे। अधूरे मन से कभी अपनी क्षमता को दोष देते रहे कभी लक्ष्य प्राप्ति को बड़ा दुस्तर कार्य मानते रहें तो ये आपको गुलाम बना लेंगी। इससे सफलता की प्राप्ति में सन्देह ही बना रहेगा। आशावाद और कर्मठता को अपने जीवन में धारण करने से वह आसुरी चिन्तायें अपने आप लौट जायेंगी। इनसे हार मान लेने का अर्थ है जीवन के प्रति नैराश्य। इसका परिणाम है पतन की ओर उन्मुख होना, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसलिये अपने जीवन को समुन्नत बनाने के लिये इन्हें सदैव दूर रखिये, अन्यथा ये असमय ही खा जाने वाली डाकिनें हैं।

चिन्ताओं से बचाव का सबसे अच्छा साधन है आध्यात्मिक धारणा। इस संसार में जो कुछ हो रहा है वह सब एक खेल मात्र है। किसी का अभिनय सुखद होता है किसी का दुखद। नाटक करने वाले अभिनेता यह जानते हैं यह सब स्टेज तक ही है। रंग मंच से नीचे आ जाने पर सब अपने पुराने रूप में आ जाते हैं। जीवन की विभिन्न क्रियाओं को भी इसी प्रकार देखना और मानना चाहिये। यहाँ की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है, यहाँ का प्रत्येक पदार्थ नाशवान है। इसलिये इनके परिणामों की आसक्ति से दूर रहना ही श्रेयस्कर है। इससे चिन्ताओं से अपने आप छुटकारा मिल जाता है। विशुद्ध कर्त्तव्य भावना से यहाँ का प्रत्येक कार्य, क्रिया व्यापार चलाते रहना ही अच्छा है। समस्याओं से अपनी सामर्थ्य को छोटा मान लेना चिन्ता का कारण है। आप अपनी समस्याओं को संयोग या पार्ट मात्र मानिये। उन्हें निकालिये सही किन्तु कठिनाइयों की चिन्ता न कीजिये तो ही जीवन लक्ष्य की ओर सफलतापूर्वक अग्रसर हो जाना सम्भव होगा। चिन्ताओं के चक्कर में ही पड़े रहे तो आपका विचार क्षेत्र भी संकुचित बना रहेगा। विचारों का दायरा न बढ़ा तो वह स्थिति कहाँ बन पड़ेगी जिसके लिये अमूल्य मानव जीवन मिला है।

चिन्तायें जीवन विकास में गतिरोध उत्पन्न करती हैं। मनुष्य की कार्य क्षमता को पंगु बना देती हैं। इससे मानवीय विकास का मार्ग भी रुक जाता है। मनुष्य एक अपनी अलग दुनिया बना लेता है, इसे चिन्ताओं की दुनिया ही कहना उपयुक्त लगता है। जब तक जीवात्मा इस छोटे से क्रिया क्षेत्र में फँसी रहती है जब तक वह अपने शाश्वत स्वरूप को समझ नहीं पाती। लघु से महत् की आकाँक्षा कोरी कल्पना मात्र बनी रहती है। सफलता का मूल अंग एक ही है कि अपनी चिन्ताओं से छुटकारा पाइये। तभी वह स्थिति बन सकती है जब अपने जीवन लक्ष्य की दिशा में भी कुछ प्रगति की जा सके।

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