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Magazine - Year 1964 - Version 2

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गौरव, निरन्तर चलते रहने में है।

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वेद भगवान् का मत है-”आरोहणमाक्रमण जीवतो जीवतोऽनम्” जीवन के लिए सबसे आवश्यक बात यह है कि उसे रुकना नहीं चाहिए। उन्नत होना और आगे बढ़ना जीवन का स्वाभाविक धर्म है। यह विकास यात्रा द्रुतगति से सर्वत्र चल रही है। वैज्ञानिकों का कथन है कि यह पृथ्वी जिस पर हम निवास करते हैं 365+1/4 दिन में सूर्य की परिक्रमा कर लेती है। सूर्य को भी चुपचाप बैठने में चैन नहीं मिला। वह भी सौरमण्डल के समस्त दो खरब नक्षत्रों को लेकर कृत्तिका की यात्रा पर निकल पड़ा। कृत्तिका अभिजित की ओर, अभिजित किसी चौथे ग्रह की ओर। सभी के सभी चलायमान हैं किसी को चुपचाप बैठने में आनन्द नहीं आता। चलते रहना, क्रियाशील बने रहना सृष्टि का सनातन नियम है। जहाँ रुके वहीं मौत है, वहीं जड़ता है। चलना जीवन का प्रतीक है, रुक जाना ही मृत्यु है।

कहते हैं “आलसी को पाप खा जाता है।” यह बात सच है कि अकर्मण्यता से अवांछनीय तत्वों को प्रोत्साहन मिलता है, फलतः विनाश के क्षण मानवीय प्रगति पर हावी हो जाते है। परिश्रम के अभाव में सौभाग्य की प्राप्ति सम्भव नहीं। जो चलता है वह ऐश्वर्यों और महान् विभूतियों का स्वामी बन जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण का प्रेरक विचार है :-

माऽनाश्रान्ताय श्रीरस्ति.......

डडडडडडडडडडडडडडडडडडड

चरैवेति चरैवेति॥

अर्थात्—जो चलता है उसकी जाँघें पुष्ट बनती हैं। फल प्राप्ति तक उद्योग करने वाला व्यक्ति पुरुषार्थी होता हैं। प्रयत्नशील पुरुष के पाप-ताप, भव-बन्धन मार्ग में ही नष्ट हो जाते है, इसलिए चलते रहो, चलते रहो।

जीवन की शक्ति, सौंदर्य और सफलता चलते रहने में है। जीवन की सार्थकता भी इसी में है किन्तु यह समझ लेना आवश्यक है कि हमारी यात्रा सोद्देश्य हो। जीवन का एक निश्चित लक्ष्य हो। यह उद्देश्य भौतिक सुखों की आकाँक्षा भी हो सकता है। किन्तु इससे शरीर धारण और मानव-जीवन में जो विशेषताएँ दिखाई देती हैं उनका कुछ भी उपयोग नहीं हो पाता। मनुष्य को विचार, बल, भाषा लिपि, विचारों के आदान-प्रदान की जो सुविधाएँ मिली हैं, वे किसी विशेष प्रयोजन के लिए दी गई जान पड़ती हैं। संसार के सभी धर्म और जाति के नेताओं, महापुरुषों के इस सम्बन्ध में दो मत नहीं हैं। सभी ने यह स्वीकार किया है कि मानव-जीवन का लक्ष्य अंतर्दर्शन है। आत्म-ज्ञान पाये बिना वह चिरविश्रान्ति का भागी नहीं बन सकता। इस सत्य की मशाल को जो मजबूती से हाथों में पकड़कर सदैव आगे बढ़ता रहता है उसी का जीवन-उद्देश्य पूरा होता है। इसी में स्वास्थ्य, शक्ति , स्वतन्त्रता और स्वावलम्बन सन्निहित है।

अकर्मण्य पुरुष का जीवन बहुत संकुचित अशक्त और अन्धकारमय होता है। प्रगति का दुर्गति से गहरा सम्बन्ध है। जिनके जीवन में क्रियाशीलता नहीं होती, जो आलस्य में पड़े अपना समय व्यर्थ गँवाते रहते हैं उन्हें अन्त में पछतावा ही हाथ लगता है। कौन जाने जो परिस्थितियाँ हमें आज उपलब्ध हैं। वे कल भी बनी रहेंगी। यह संसार परिवर्तनशील है। आज जहाँ हरे-भरे खेत खड़े हैं वहाँ एक दिन के अन्धड़, तूफान से मैदान दिखाई पड़ने लगता है। हिमालय के बारे में लोगों का कहना है कि वहाँ किसी जमाने में समुद्र था। कब कोई नखलिस्तान, रेगिस्तान में बदल जाय यह कहा नहीं जा सकता। इसलिए आज जो शक्ति और साधन हमें मिले हैं, उन्हें ही लेकर आगे बढ़ चलें अपने जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए। दौड़ लगादें तो जीवन के सूर्य को छुपने के पूर्व प्राप्त कर सकते हैं। न भी मिले तो समीप तो पहुँच ही सकते हैं, आगे के लिये अधिक सुविधाजनक,अधिक अनुकूल परिस्थितियाँ तो पैदा कर ही सकते हैं।

भगवान् कृष्ण ने लिखा है :—

ईश्वरः सर्वभूतानाँ ह्मद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रामयर्न्सव भूतानि यन्त्रारुढ़ानि मायया॥

अर्थात्-संसार की प्रत्येक वस्तु में एक ही आध्यात्मिक प्राण-शक्ति परमात्मा,विद्यमान है। प्रकृति अपनी सम्पूर्ण पार्थिव शक्तियों के साथ निश्चित योजना के अनुसार जीवन का निर्माण करती हुई आगे बढ़ती दिखाई देती है। प्रकृति में न तो आलस्य है न स्तब्धता। मनुष्य की अन्तः प्रकृति भी यही चाहती है कि हम रुकें नहीं। जर्मनी के महाकवि गेटे ने लिखा है कि अपनी प्रगति और विकास-क्रम में प्रकृति जिस प्रकार रुकना नहीं जानती मनुष्य भी वैसे ही सक्रिय रहे तो वह सहज ही अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। प्रकृति के इस गुण की अवहेलना ही मृत्यु का कारण है।

जीवन एक महान यात्रा है जिसकी सुघड़ता सदैव चलते रहने में है। जब तक हम चलते रहते हैं तब तक हमारी शक्तियों का उपयोग होता रहता है। रेलगाड़ी जब किसी स्टेशन पर थोड़ी देर खड़ी रहती है तो इंजन की सुरक्षा के लिए उसके अन्दर भरी हुई सारी भाप शक्ति को बाहर निकाल देना पड़ता है। ऐसा न किया जाय तो अपनी ही शक्ति अपना ही विनाश करने को तत्पर हो जाती है। शक्ति का सदुपयोग तभी तक बना रहता है जबतक पाँव आगे बढ़ते रहते हैं। रुक जाते हैं तो शक्ति विघटन का खतरा पैदा हो जाता है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षण का उपयोग अपनी विकास-यात्रा की पूर्ति में होना चाहिए।

जीवन को एक संग्राम मानें तो मनुष्य को एक सैनिक मानना, पड़ेगा। सिपाही का प्रमुख कार्य है लड़ना संघर्ष करना। मनुष्य जीवन में शत्रुओं की कमी नहीं है। काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर के षडरिपु हर क्षेत्र में मनुष्य को परास्त करने की ताक में बैठे रहते हैं। दुश्मन को जीतने के लिए जब बन्दूक में संगीन चढ़ाकर सिपाही आगे बढ़ता है तो अपने दुश्मनों को रौंदता, मारता, काटता हुआ आगे बढ़ता जाता है। सिपाही होने का गौरव भी इसी में है कि उसके पाँव पीछे न पड़ें, विजय और स्वच्छन्दता भी इसी में है। जो डरकर पीछे रह जाते हैं उन्हें पराधीन होकर ही जीना पड़ता है। उस जीवन का कोई मूल्य नहीं जो हिम्मत-पस्त होकर जीवन-संग्राम में आगे बढ़ने से इनकार कर देता है।

आगे बढ़ने का अर्थ यहाँ जमीन नापने या पैदल चलने से नहीं है। यह संकेत आध्यात्मिक विकास के लिए है। आध्यात्मिक-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जो उद्योग करना पड़ता है, उसे आगे बढ़ना, चलना, यात्रा पूरी करना कहा जा सकता है। यह मंजिल विचार और व्यवहार दोनों से प्राप्त की जाती है। विचार मनुष्य की असाधारण शक्ति है। इस के बल पर संसार का सत्य-असत्य प्रकट होता है। ज्ञान की विशेषता मनुष्य में न रही होती तो उसका जीवन भी पशुओं जैसा होता। बेचारा आदमी रीछ, भालू, बन्दर, लोमड़ी, खरगोश के समान ही इधर-उधर निरुद्देश्य भटक रहा होता। पर विचार शक्ति के द्वारा वह एक आध्यात्मिक जगत का निर्माण करता है। इसी से उसकी जीवन-धारण की प्रक्रिया पूरी होती है। अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, मनुष्य को विचारशक्ति के ही द्वारा होता है।

मनुष्य यदि खाने-पीने और सामान्य स्तर का जीवन जीने तक ही सीमित बना रहे तो यह माना जायगा कि वह अकर्मण्य है। उसमें जीवन नहीं है। निर्जीव है, मुर्दा है। जो इतनी बड़ी शक्ति पाकर भी आगे बढ़ना नहीं चाहता वह कायर पुरुष है। कायर वही है जिसमें संघर्षों से दो-दो हाथ करते हुए आगे बढ़ने का साहस नहीं होता। हजारों लाखों को रोज ही मुर्दा घाटों पर जलते देखते हैं फिर भी हम अपनी जीवन की नश्वरता को नहीं पहचानते। रोज ही हजारों महापुरुषों के सान्निध्य से गुजर जाते हैं पर अपने को उनसे कुछ भी प्रेरणा नहीं मिलती। क्या कहें ऐसे आदमी को जिसे विचार का पारस मिला है तो भी निर्धन है। शक्ति मिली है पर निर्बल बना हुआ इन्सान अपने लक्ष्य से भटक गया है, केवल इसलिए कि वह आगे बढ़ने, चलते रहने की हिम्मत नहीं बाँध पाता।

वह चाहता तो आत्म-निरीक्षण और जीवन शोधन करते हुए आगे बढ़ता । विश्वात्मा के साथ मेल पैदा करता। आत्मीयता, समता, सहानुभूति और सहचरत्व का विकास करते हुए अपना जीवन-लक्ष्य सहज ही पूरा कर लेता किन्तु बैठे रहकर उसने कितनी भारी क्षति कर ली इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।

प्रगति होती है आचरण से। विचारों से जो सिद्धान्त मस्तिष्क में आते हैं वे आचरण में प्रयुक्त होकर अपनी स्थिति के अनुरूप पतन या विकास में सहायक होते हैं। सत्कर्मों से स्वर्ग प्राप्ति की कामना की जाती है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के मंगलमय सुकृत्य मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में सहायक होते हैं। जिन्होंने सदाचार की महत्ता को समझ लिया वे जीवन पथ पर आधे पार हो गये, ऐसा समझना चाहिए किन्तु जिन्हें अभी तक स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, कलह और कटुता से ही छुटकारा नहीं मिला, उनके भाग्य में पशुवत् यंत्रणायें ही भोगनी लिखी हैं। मनुष्य जीवन जैसा अलभ्य अवसर पाकर भी जो आगे न बढ़ सका, उसे जितना धिक्कारा जाय वह कम ही है।

मनुष्य सत्कर्मों के प्रकाश में आगे बढ़ता है और दुष्कृत्यों के अन्धकार में इधर-उधर भटकता, मारा-मारा घूमता रहता है। अपनी शक्तियों और सामर्थ्यों का नाश करता देखा जाता है। मनुष्य इसका जिम्मेदार स्वयं ही है।

योग वसिष्ठ ने कहा है—

न च निस्पन्दता लोके दृष्टेहशवताँ बिना।

स्पन्दाच्च फलं संप्राप्ति स्तस्मात दैवं निरर्थकम्॥

अर्थात्—जो अपनी सफलता के लिए देवताओं के भरोसे बैठे हैं वे अकर्मण्य हैं। उन्हें ही मृत मानते हैं। फल की प्राप्ति उचित कर्म करने से ही होती है।

स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे “मानव जीवन का सारा रहस्य उसकी वृद्धि में है।” उसे दिन-दिन आगे बढ़ना चाहिए। अकर्मण्य होने से मनुष्य पथ-भ्रष्ट हो जाता है और पतित बनकर निकृष्ट जीवन जिया करता है। गति का आधार कर्म है। सत्कर्मों से सद्गति होना निश्चित है। पर बैठे रहने से तो न आध्यात्मिक सफलता हाथ लगेगी न साँसारिक सुख ही मिलेंगे। इसीलिए भगवान् कृष्ण ने कहा है—”हे अर्जुन! तू कर्म करना छोड़ देगा तो तेरी जीवन यात्रा भी नहीं चल सकती।”

चलने का अर्थ है अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना। उन्नति के लिए निरन्तर उद्योग करना, विकास की ओर उन्मुख होना और एक ऐसा सुव्यवस्थित जीवन बिताना जिसमें प्राण हों, शक्ति हो और सामञ्जस्य हो। यह विकास सत्य का विकास हो, यह राह ज्ञान की राह हो तो निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि हमारे पाँव ठीक दिशा में बढ़ रहे हैं।

मानव-जीवन का प्रमुख आदर्श है नैतिक विकास करना। इससे मनुष्य का विकास सम्भव होगा। सहयोगपूर्वक नैतिक जीवन जीने से ही परस्पर हित संरक्षित बने रहते हैं। सूर्य का मार्ग भिन्न है। चन्द्रमा अपनी दूसरी राह जाता है। सभी अपने-अपने निर्दिष्ट पथ पर चलते हुए अपनी विकास यात्रा पूरी कर रहे हैं। आत्मा का ध्यान बनाये रखने से मनुष्य कुमार्गगामी नहीं होता। जिस प्रकार दूसरे यह उपग्रह अपनी निश्चित कक्षा में बढ़ते रहते हैं उसी प्रकार मनुष्य की भी एक कक्षा है, आध्यात्मिक कक्षा। ग्रह अपने इसी निश्चित पथ पर चलता हुआ निरन्तर आगे बढ़ता रहे— इसी में उसकी सफलता है, इसी में मानव-जीवन का गौरव है।

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